आदि पर्व · अध्याय 227
युधिष्ठिर का अभिषेक और इन्द्रप्रस्थ का निर्माण
गान्धारी द्रौपदी का स्वागत करती हैं, पर उसमें अपने पुत्रों की मृत्यु देखती हैं, और कुन्ती व पाण्डवों को पाण्डु के भवन में ठहरवाती हैं। धृतराष्ट्र श्रीकृष्ण की सम्मति और व्यास की अध्यक्षता में युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करते हैं, फिर उन्हें आधा राज्य देकर पौरवों की उजड़ी राजधानी खाण्डवप्रस्थ भेज देते हैं, जबकि दुर्योधन नगरवासियों को उनके साथ जाने से रोकता है। श्रीकृष्ण के स्मरण करने पर इन्द्र विश्वकर्मा को भेजते हैं, जो परकोटों, उद्यानों और सरोवरों से युक्त भव्य इन्द्रप्रस्थ नगर बनाते हैं; युधिष्ठिर धूमधाम से उसमें प्रवेश करते हैं, और उनका आभार तथा कुन्ती की विदाई सुनकर श्रीकृष्ण बलराम के साथ द्वारका लौट जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.227.1)
दुर्योधनस्य महिषी काशिराजसुता तदा । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां वधूभिः सहिता तदा ॥
duryodhanasya mahiṣī kāśirājasutā tadā | dhṛtarāṣṭrasya putrāṇāṃ vadhūbhiḥ sahitā tadā
तब दुर्योधन की पटरानी, काशिराज की पुत्री, धृतराष्ट्र के पुत्रों की वधुओं के साथ
श्लोक 2 (1.227.2)
पाञ्चालीं प्रतिजग्राह साध्वीं श्रियमिवापराम् । पूजयामास पूजार्हां शचीदेवीमिवागताम् ॥
pāñcālīṃ pratijagrāha sādhvīṃ śriyamivāparām | pūjayāmāsa pūjārhāṃ śacīdevīmivāgatām
साध्वी पांचाली की अगवानी की, मानो वह दूसरी लक्ष्मी हो; और उस पूजनीया का ऐसा सत्कार किया मानो स्वयं देवी शची पधारी हों।
श्लोक 3 (1.227.3)
ववन्दे तत्र गान्धारीं कृष्णया सह माधवी । आशिषश्च प्रयुक्त्वा तु पाञ्चालीं परिषस्वजे ॥
vavande tatra gāndhārīṃ kṛṣṇayā saha mādhavī | āśiṣaśca prayuktvā tu pāñcālīṃ pariṣasvaje
वहाँ माधवी कुन्ती ने कृष्णा के साथ गान्धारी को प्रणाम किया; और गान्धारी ने आशीर्वाद देकर पांचाली को गले लगा लिया।
श्लोक 4 (1.227.4)
परिष्वज्यैव गान्धारी कृष्णां कमललोचनाम् । पुत्राणां मम पाञ्चाली मृत्युरेवेत्यमन्यत ॥
pariṣvajyaiva gāndhārī kṛṣṇāṃ kamalalocanām | putrāṇāṃ mama pāñcālī mṛtyurevetyamanyata
पर कमलनयनी कृष्णा को गले लगाते ही गान्धारी के मन में आया — "यह पांचाली मेरे पुत्रों की मृत्यु ही है।"
श्लोक 5 (1.227.5)
संचिन्त्य विदुरं प्राह युक्तितः सुबलात्मजा । कुन्तीं राजसुतां क्षत्तः सवधूं सपरिच्छदाम् ॥
saṃcintya viduraṃ prāha yuktitaḥ subalātmajā | kuntīṃ rājasutāṃ kṣattaḥ savadhūṃ saparicchadām
सोच-विचारकर सुबल की पुत्री ने युक्तिपूर्वक विदुर से कहा — "हे क्षत्ता, राजकुमारी कुन्ती को उसकी बहू और परिजनों सहित
श्लोक 6 (1.227.6)
पाण्डोर्निवेशनं शीघ्रं नीयतां यदि रोचते । करणेन मुहूर्तेन नक्षत्रेण शुभे तिथौ ॥
pāṇḍorniveśanaṃ śīghraṃ nīyatāṃ yadi rocate | karaṇena muhūrtena nakṣatreṇa śubhe tithau
यदि उचित समझो तो शुभ करण, शुभ मुहूर्त, शुभ नक्षत्र और शुभ तिथि में शीघ्र पाण्डु के भवन में पहुँचा दिया जाए,
श्लोक 7 (1.227.7)
यथा सुखं तथा कुन्ती रंस्यते स्वगृहे सुतैः । तथेत्येव तदा क्षत्ता कारयामास तत्तथा ॥
yathā sukhaṃ tathā kuntī raṃsyate svagṛhe sutaiḥ | tathetyeva tadā kṣattā kārayāmāsa tattathā
ताकि कुन्ती अपने घर में पुत्रों के साथ सुख से रहे।" "ऐसा ही हो" कहकर विदुर ने वैसा ही करवा दिया।
श्लोक 8 (1.227.8)
पूजयामासुरत्यर्थं बान्धवाः पाण्डवांस्तदा । नागराः श्रेणिमुख्याश्च पूजयन्ति स्म पाण्डवान् ॥
pūjayāmāsuratyarthaṃ bāndhavāḥ pāṇḍavāṃstadā | nāgarāḥ śreṇimukhyāśca pūjayanti sma pāṇḍavān
तब बन्धु-बान्धवों ने पाण्डवों का बहुत आदर-सत्कार किया; नगरवासी और श्रेणियों के मुखिया भी पाण्डवों का सम्मान करने लगे।
श्लोक 9 (1.227.9)
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णो बाह्लीकः ससुतस्तदा । शासनाद्धृतराष्ट्रस्य अकुर्वन्नतिथिक्रियाम् ॥
bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ karṇo bāhlīkaḥ sasutastadā | śāsanāddhṛtarāṣṭrasya akurvannatithikriyām
भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण और पुत्र सहित बाह्लीक ने तब धृतराष्ट्र की आज्ञा से उनका आतिथ्य-सत्कार किया।
श्लोक 10 (1.227.10)
एवं विहरतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम् । नेता सर्वस्य कार्यस्य विदुरो राजशासनात् ॥
evaṃ viharatāṃ teṣāṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | netā sarvasya kāryasya viduro rājaśāsanāt
इस प्रकार वे महात्मा पाण्डव वहाँ आनन्द से रहने लगे, और राजा की आज्ञा से विदुर उनके सब कामों की देखरेख करते थे।
श्लोक 11 (1.227.11)
विश्रान्तास्ते महात्मानः कंचित्कालं सकेशवाः । आहूता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च ॥
viśrāntāste mahātmānaḥ kaṃcitkālaṃ sakeśavāḥ | āhūtā dhṛtarāṣṭreṇa rājñā śāntanavena ca
केशव सहित उन महात्माओं ने कुछ समय विश्राम कर लिया, तब राजा धृतराष्ट्र और शान्तनुनन्दन भीष्म ने उन्हें बुलवाया।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 12 (1.227.12)
भ्रातृभिः सह कौन्तेय निबोधेदं वचो मम । पाण्डुना वर्धितं राज्यं पाण्डुना पालितं जगत् ॥
bhrātṛbhiḥ saha kaunteya nibodhedaṃ vaco mama | pāṇḍunā vardhitaṃ rājyaṃ pāṇḍunā pālitaṃ jagat
"हे कुन्तीपुत्र, अपने भाइयों के साथ मेरी यह बात सुनो। यह राज्य पाण्डु ने बढ़ाया था, इस जगत की रक्षा पाण्डु ने की थी।
श्लोक 13 (1.227.13)
शासनान्मम कौन्तेय मम भ्राता महाबलः । कृतवान्दुष्करं कर्म नित्यमेव विशांपते ॥
śāsanānmama kaunteya mama bhrātā mahābalaḥ | kṛtavānduṣkaraṃ karma nityameva viśāṃpate
हे कुन्तीपुत्र, हे प्रजानाथ, मेरा महाबली भाई मेरी आज्ञा से सदा कठिन से कठिन काम करता रहा।
श्लोक 14 (1.227.14)
तस्मात्त्वमपि कौन्तेय शासनं कुरु मा चिरम् । मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वेऽहंकारसंयुताः ॥
tasmāttvamapi kaunteya śāsanaṃ kuru mā ciram | mama putrā durātmānaḥ sarve'haṃkārasaṃyutāḥ
इसलिए हे कुन्तीपुत्र, तुम भी बिना देर किए मेरी आज्ञा का पालन करो। मेरे पुत्र दुष्टात्मा हैं, सब के सब अहंकार से भरे हुए।
श्लोक 15 (1.227.15)
शासनं न करिष्यन्ति मम नित्यं युधिष्ठिर । स्वकार्यनिरतैर्नित्यमवलिप्तैर्दुरात्मभिः ॥
śāsanaṃ na kariṣyanti mama nityaṃ yudhiṣṭhira | svakāryaniratairnityamavaliptairdurātmabhiḥ
हे युधिष्ठिर, वे कभी मेरा कहना नहीं मानेंगे। अपने ही स्वार्थ में लगे, सदा घमण्डी और दुष्टात्मा उन लोगों के साथ
श्लोक 16 (1.227.16)
पुनर्वै विग्रहो मा भूत्खाण्डवप्रस्थमाविश । न हि वो वसतस्तत्र कश्चिच्छक्तः प्रबाधितुम् ॥
punarvai vigraho mā bhūtkhāṇḍavaprasthamāviśa | na hi vo vasatastatra kaścicchaktaḥ prabādhitum
फिर से कोई कलह न हो, इसलिए तुम खाण्डवप्रस्थ चले जाओ। वहाँ रहते हुए तुम्हें कोई सता नहीं सकेगा,
श्लोक 17 (1.227.17)
संरक्ष्यमाणान्पार्थेन त्रिदशानिव वज्रिणा । अर्धराज्यं तु संप्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविश ॥
saṃrakṣyamāṇānpārthena tridaśāniva vajriṇā | ardharājyaṃ tu saṃprāpya khāṇḍavaprasthamāviśa
क्योंकि जैसे वज्रधारी इन्द्र देवताओं की रक्षा करते हैं, वैसे ही अर्जुन तुम्हारी रक्षा करेगा। आधा राज्य लेकर खाण्डवप्रस्थ चले जाओ।
श्लोक 18 (1.227.18)
केशवो यदि मन्यते तत्कर्तव्यमसंशयम् ॥
keśavo yadi manyate tatkartavyamasaṃśayam
यदि केशव इसे उचित मानें, तो बिना संशय यही करना चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (1.227.19)
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं नृपं सर्वे प्रणम्य च । वासुदेवेन संमन्त्र्य पाण्डवाः समुपाविशन् ॥
pratigṛhya tu tadvākyaṃ nṛpaṃ sarve praṇamya ca | vāsudevena saṃmantrya pāṇḍavāḥ samupāviśan
उनकी बात स्वीकार कर सब पाण्डवों ने राजा को प्रणाम किया और वासुदेव से सलाह करके बैठ गए।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 20 (1.227.20)
अभिषेकस्य संभारान्क्षत्तरानय मा चिरम् । अभिषिक्तं करिष्यामि ह्यद्य वै कुरुनन्दनम् ॥
abhiṣekasya saṃbhārānkṣattarānaya mā ciram | abhiṣiktaṃ kariṣyāmi hyadya vai kurunandanam
"हे क्षत्ता, अभिषेक की सामग्री तुरन्त ले आओ। आज ही मैं कुरुनन्दन युधिष्ठिर का अभिषेक करवाऊँगा।
श्लोक 21 (1.227.21)
ब्राह्मणा नैगमश्रेष्ठाः श्रेणीमुख्याश्च सर्वतः । आहूयन्तां प्रकृतयो बान्धवाश्च विशेषतः ॥
brāhmaṇā naigamaśreṣṭhāḥ śreṇīmukhyāśca sarvataḥ | āhūyantāṃ prakṛtayo bāndhavāśca viśeṣataḥ
चारों ओर से ब्राह्मणों, श्रेष्ठ व्यापारियों और श्रेणियों के मुखियाओं को बुलाया जाए; प्रजा को और विशेष रूप से बन्धु-बान्धवों को भी।
श्लोक 22 (1.227.22)
पुण्याहं वाच्यतां तात गोसहस्रं प्रदीयताम् । ग्राममुख्याश्च विप्रेभ्यो दीयन्तां बहुदक्षिणाः ॥
puṇyāhaṃ vācyatāṃ tāta gosahasraṃ pradīyatām | grāmamukhyāśca viprebhyo dīyantāṃ bahudakṣiṇāḥ
हे तात, पुण्याहवाचन कराया जाए, एक हज़ार गौएँ दान दी जाएँ, और ब्राह्मणों को भरपूर दक्षिणा के साथ प्रमुख गाँव दिए जाएँ।
श्लोक 23 (1.227.23)
अङ्गदे मकुटं क्षत्तर्हस्ताभरणमानय । मुक्तावलीश्च हारं च निष्काणि कटकानि च ॥
aṅgade makuṭaṃ kṣattarhastābharaṇamānaya | muktāvalīśca hāraṃ ca niṣkāṇi kaṭakāni ca
हे क्षत्ता, बाजूबन्द, मुकुट और हाथों के आभूषण ले आओ; मोतियों की लड़ियाँ, हार, स्वर्ण-निष्क और कंगन भी;
श्लोक 24 (1.227.24)
कटिबन्धश्च सूत्रं च तथोदरनिबन्धनम् । अष्टोत्तरसहस्रं तु ब्राह्मणाधिष्ठिता गजाः ॥
kaṭibandhaśca sūtraṃ ca tathodaranibandhanam | aṣṭottarasahasraṃ tu brāhmaṇādhiṣṭhitā gajāḥ
करधनी, यज्ञोपवीत और कमरबन्द; और एक हज़ार आठ हाथी, जिन पर ब्राह्मण विराजमान हों।
श्लोक 25 (1.227.25)
जाह्नवीसलिलं शीघ्रमानीयन्तां पुरोहितैः । अभिषेकोदकक्लिन्नं सर्वाभरणभूषितम् ॥
jāhnavīsalilaṃ śīghramānīyantāṃ purohitaiḥ | abhiṣekodakaklinnaṃ sarvābharaṇabhūṣitam
पुरोहित शीघ्र गंगाजल ले आएँ। अभिषेक के जल से भीगे, सब आभूषणों से सजे,
श्लोक 26 (1.227.26)
औपवाह्योपरिगतं दिव्यचामरवीजितम् । सुवर्णमणिचित्रेण श्वेतच्छत्रेण शोभितम् ॥
aupavāhyoparigataṃ divyacāmaravījitam | suvarṇamaṇicitreṇa śvetacchatreṇa śobhitam
राजकीय हाथी पर बैठे, दिव्य चँवरों से हवा किए जाते हुए, सोने और मणियों से जड़े श्वेत छत्र से शोभित,
श्लोक 27 (1.227.27)
जयेति द्विजवाक्येन स्तूयमानं नृपैस्तथा । दृष्ट्वा कुन्तीसुतं ज्येष्ठमाजमीढं युधिष्ठिरम् ॥
jayeti dvijavākyena stūyamānaṃ nṛpaistathā | dṛṣṭvā kuntīsutaṃ jyeṣṭhamājamīḍhaṃ yudhiṣṭhiram
ब्राह्मणों के 'जय हो' के घोष और राजाओं की स्तुति से सम्मानित — कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र, अजमीढवंशी युधिष्ठिर को इस रूप में देखकर
श्लोक 28 (1.227.28)
प्रीताः प्रीतेन मनसा प्रशंसन्तु परे जनाः । पाण्डोः कृतोपकारस्य राज्यं दत्वा ममैव च ॥
prītāḥ prītena manasā praśaṃsantu pare janāḥ | pāṇḍoḥ kṛtopakārasya rājyaṃ datvā mamaiva ca
दूसरे लोग प्रसन्न होकर प्रसन्न मन से उसकी प्रशंसा करें। पाण्डु ने मेरा बड़ा उपकार किया था; राज्य देकर मैं स्वयं
श्लोक 29 (1.227.29)
प्रतिक्रिया कृतमिदं भविष्यति न संशयः । भीष्मो द्रोणः कृपः क्षत्ता साधुसाध्वित्यथाब्रुवन् ॥
pratikriyā kṛtamidaṃ bhaviṣyati na saṃśayaḥ | bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ kṣattā sādhusādhvityathābruvan
उसका प्रतिदान कर दूँगा — इसमें कोई संदेह नहीं।" तब भीष्म, द्रोण, कृप और विदुर ने कहा — "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा!"
वासुदेव उवाच
श्लोक 30 (1.227.30)
युक्तमेतन्महाभाग कौरवाणां यशस्करम् । शीघ्रमद्यैव राजेन्द्र त्वयोक्तं कर्तुमर्हसि ॥
yuktametanmahābhāga kauravāṇāṃ yaśaskaram | śīghramadyaiva rājendra tvayoktaṃ kartumarhasi
"हे महाभाग, यह उचित है और कौरवों का यश बढ़ाने वाला है। हे राजेन्द्र, आपने जो कहा है उसे आज ही, तुरन्त पूरा कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (1.227.31)
इत्येवमुक्तो वार्ष्णेयस्त्वरयामास तत्तदा । तथोक्तं धृतराष्ट्रेण कारयामास केशवः ॥
ityevamukto vārṣṇeyastvarayāmāsa tattadā | tathoktaṃ dhṛtarāṣṭreṇa kārayāmāsa keśavaḥ
ऐसा कहे जाने पर वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण ने तुरन्त काम में शीघ्रता करवाई; धृतराष्ट्र ने जैसा कहा था, केशव ने वैसा ही सब करवाया।
श्लोक 32 (1.227.32)
तस्मिन्क्षणे महाराज कृष्णद्वैपायनस्तदा । आगत्य कुरुभिः सर्वैः पूजितः ससुहृद्गणैः ॥
tasminkṣaṇe mahārāja kṛṣṇadvaipāyanastadā | āgatya kurubhiḥ sarvaiḥ pūjitaḥ sasuhṛdgaṇaiḥ
हे महाराज, उसी क्षण कृष्णद्वैपायन व्यास वहाँ आ पहुँचे, और सब कुरुवंशियों ने अपने सुहृदों सहित उनका पूजन किया।
श्लोक 33 (1.227.33)
मूर्धाभिषिक्तैः सहितो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । कारयामास विधिवत्केशवानुमते तदा ॥
mūrdhābhiṣiktaiḥ sahito brāhmaṇairvedapāragaiḥ | kārayāmāsa vidhivatkeśavānumate tadā
अभिषिक्त राजाओं और वेदों के पारंगत ब्राह्मणों के साथ मिलकर उन्होंने केशव की सम्मति से विधिपूर्वक अभिषेक करवाया।
श्लोक 34 (1.227.34)
कृपो द्रोणश्च भीष्मश्च धौम्यश्च व्यासकेशवौ । बाह्लीकः सोमदत्तश्च चातुर्वेद्यपुरस्कृताः ॥
kṛpo droṇaśca bhīṣmaśca dhaumyaśca vyāsakeśavau | bāhlīkaḥ somadattaśca cāturvedyapuraskṛtāḥ
कृप, द्रोण, भीष्म, धौम्य, व्यास, केशव, बाह्लीक और सोमदत्त ने, चारों वेदों के ज्ञाताओं को आगे रखकर,
श्लोक 35 (1.227.35)
अभिषेकं तदा चक्रुर्भद्रपीठे सुसंस्कृतम् ॥
abhiṣekaṃ tadā cakrurbhadrapīṭhe susaṃskṛtam
तब सुसज्जित भद्रपीठ पर उनका अभिषेक किया।
व्यास उवाच
श्लोक 36 (1.227.36)
जित्वा तु पृथिवीं कृत्स्नां वशे कृत्वा नृपान्भवान् । राजसूयादिभिर्यज्ञैः क्रतुभिर्वरदक्षिणैः ॥
jitvā tu pṛthivīṃ kṛtsnāṃ vaśe kṛtvā nṛpānbhavān | rājasūyādibhiryajñaiḥ kratubhirvaradakṣiṇaiḥ
"सारी पृथ्वी को जीतकर और राजाओं को अपने वश में करके, राजसूय आदि यज्ञों और उत्तम दक्षिणा वाले क्रतुओं के द्वारा,
श्लोक 37 (1.227.37)
स्नात्वा ह्यवभृथस्नानं मोदतां बान्धवैः सह । एवमुक्त्वा तु ते सर्वे आशीर्भिरभिपूजयन् ॥
snātvā hyavabhṛthasnānaṃ modatāṃ bāndhavaiḥ saha | evamuktvā tu te sarve āśīrbhirabhipūjayan
अवभृथ-स्नान करके आप अपने बन्धुओं के साथ आनन्द मनाएँ।" ऐसा कहकर उन सबने आशीर्वादों से उनका सम्मान किया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (1.227.38)
मूर्धाभिषिक्तः कौरव्यः सर्वाभरणभूषितः । जयेति संस्तुतो राजा प्रददौ धनमक्षयम् ॥
mūrdhābhiṣiktaḥ kauravyaḥ sarvābharaṇabhūṣitaḥ | jayeti saṃstuto rājā pradadau dhanamakṣayam
अभिषिक्त होकर, सब आभूषणों से सजे और 'जय हो' के घोष से स्तुत उस कौरव राजा ने अक्षय धन का दान किया।
श्लोक 39 (1.227.39)
सर्वमूर्धाभिषिक्तैश्च पूजितः कुरुनन्दनः । औपवाह्यमथारुह्य श्वेतच्छत्रेण शोभितः ॥
sarvamūrdhābhiṣiktaiśca pūjitaḥ kurunandanaḥ | aupavāhyamathāruhya śvetacchatreṇa śobhitaḥ
सभी मूर्धाभिषिक्त राजाओं से सम्मानित वे कुरुनन्दन श्वेत छत्र से शोभित होकर राजकीय हाथी पर सवार हुए,
श्लोक 40 (1.227.40)
रराज राजाभिमतो महेन्द्र इव दैवतैः । ततः प्रदक्षिणीकृत्य नगरं नागसाह्वयम् ॥
rarāja rājābhimato mahendra iva daivataiḥ | tataḥ pradakṣiṇīkṛtya nagaraṃ nāgasāhvayam
और राजाओं के प्रिय वे राजा देवताओं के बीच महेन्द्र की भाँति सुशोभित हुए। फिर हस्तिनापुर नगर की प्रदक्षिणा करके
श्लोक 41 (1.227.41)
प्रविवेश तदा राजा नागरैः पूजितो गृहम् । मूर्धाभिषिक्तं कौन्तेयमभ्यगच्छन्त कौरवाः ॥
praviveśa tadā rājā nāgaraiḥ pūjito gṛham | mūrdhābhiṣiktaṃ kaunteyamabhyagacchanta kauravāḥ
नगरवासियों से सम्मानित राजा ने अपने भवन में प्रवेश किया। अभिषिक्त कुन्तीपुत्र के पास कौरव आए —
श्लोक 42 (1.227.42)
गान्धारिपुत्राः शोचन्तः सर्वे ते सह बान्धवैः । ज्ञात्वा शोकं च पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदं ॥
gāndhāriputrāḥ śocantaḥ sarve te saha bāndhavaiḥ | jñātvā śokaṃ ca putrāṇāṃ dhṛtarāṣṭro'bravīdidaṃ
गान्धारी के सब पुत्र, शोक करते हुए, अपने बन्धुओं के साथ। पुत्रों का शोक जानकर धृतराष्ट्र ने यह कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 43 (1.227.43)
समक्षं वासुदेवस्य कुरूणां च समक्षतः । अभिषेकस्त्वया प्राप्तो दुष्प्रापो ह्यकृतात्मभिः ॥
samakṣaṃ vāsudevasya kurūṇāṃ ca samakṣataḥ | abhiṣekastvayā prāpto duṣprāpo hyakṛtātmabhiḥ
"वासुदेव के सामने और कुरुओं के सामने तुमने वह अभिषेक पाया है, जो अजितात्मा लोगों के लिए दुर्लभ है।
श्लोक 44 (1.227.44)
गच्छ त्वमद्यैव नृप कृतकृत्योऽसि कौरव । आयुः पुरूरवा राजन्नहुषेण ययातिना ॥
gaccha tvamadyaiva nṛpa kṛtakṛtyo'si kaurava | āyuḥ purūravā rājannahuṣeṇa yayātinā
हे राजन्, आज ही चले जाओ; हे कौरव, तुम कृतार्थ हो गए। हे राजन्, आयु, पुरूरवा, नहुष और ययाति
श्लोक 45 (1.227.45)
तत्रैव निवसन्ति स्म खाण्डवे तु नृपोत्तम । राजधानी तु सर्वेषां पौरवाणां महाभुज ॥
tatraiva nivasanti sma khāṇḍave tu nṛpottama | rājadhānī tu sarveṣāṃ pauravāṇāṃ mahābhuja
हे नृपश्रेष्ठ, उसी खाण्डव में रहा करते थे। हे महाबाहु, वह सब पौरवों की राजधानी थी;
श्लोक 46 (1.227.46)
विनाशितं मुनिगणैर्लोभाद्बुधसुतस्य वै । तस्मात्त्वं खाण्डवप्रस्थं पुरं राष्ट्रं च वर्धय ॥
vināśitaṃ munigaṇairlobhādbudhasutasya vai | tasmāttvaṃ khāṇḍavaprasthaṃ puraṃ rāṣṭraṃ ca vardhaya
बुध के पुत्र के लोभ के कारण मुनियों ने उसे उजाड़ दिया था। इसलिए तुम खाण्डवप्रस्थ नगर और राष्ट्र दोनों को समृद्ध करो।
श्लोक 47 (1.227.47)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च कृतलक्षणाः । त्वद्भक्त्या जन्तवश्चान्ये भजन्त्येव पुरं शुभम् ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāśca kṛtalakṣaṇāḥ | tvadbhaktyā jantavaścānye bhajantyeva puraṃ śubham
उत्तम लक्षणों वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, तथा अन्य प्राणी भी तुम्हारे प्रति भक्ति के कारण उस सुन्दर नगर में अवश्य आ बसेंगे।
श्लोक 48 (1.227.48)
पुरं राष्ट्रं समृद्धं वै धनधान्यसमाकुलम् । तस्माद्गच्छस्व कौन्तेय भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥
puraṃ rāṣṭraṃ samṛddhaṃ vai dhanadhānyasamākulam | tasmādgacchasva kaunteya bhrātṛbhiḥ sahito'nagha
वह नगर और राष्ट्र धन-धान्य से भरकर समृद्ध होगा। इसलिए हे निष्पाप कुन्तीपुत्र, अपने भाइयों के साथ जाओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 49 (1.227.49)
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं तस्मै सर्वे प्रणम्य च । रथैर्नागैर्हयैश्चापि सहितास्तु पदातिभिः ॥
pratigṛhya tu tadvākyaṃ tasmai sarve praṇamya ca | rathairnāgairhayaiścāpi sahitāstu padātibhiḥ
उनकी बात मानकर सबने उन्हें प्रणाम किया, और रथों, हाथियों, घोड़ों तथा पैदल सैनिकों के साथ
श्लोक 50 (1.227.50)
प्रतस्थिरे ततो घोषसंयुक्तैः स्यन्दनैर्वरैः । तान्दृष्ट्वा नागराः सर्वे भक्त्या चैव प्रतस्थिरे ॥
pratasthire tato ghoṣasaṃyuktaiḥ syandanairvaraiḥ | tāndṛṣṭvā nāgarāḥ sarve bhaktyā caiva pratasthire
वे घरघराते उत्तम रथों पर चल पड़े। उन्हें देखकर सारे नगरवासी भी भक्तिभाव से साथ चल पड़े।
श्लोक 51 (1.227.51)
गच्छतः पाण्डवैः सार्धं दृष्ट्वा नागपुरालयात् । पाण्डवैः सहिता गन्तुं नार्हतेति च नागरान् ॥
gacchataḥ pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ dṛṣṭvā nāgapurālayāt | pāṇḍavaiḥ sahitā gantuṃ nārhateti ca nāgarān
उन्हें पाण्डवों के साथ हस्तिनापुर से जाते देखकर दुर्योधन ने ठहराया कि नगरवासी पाण्डवों के साथ न जाएँ;
श्लोक 52 (1.227.52)
घोषयामास नगरे धार्तराष्ट्रः ससौबलः । ततस्ते पाण्डवास्तत्र गत्वा कृष्णपुरोगमाः ॥
ghoṣayāmāsa nagare dhārtarāṣṭraḥ sasaubalaḥ | tataste pāṇḍavāstatra gatvā kṛṣṇapurogamāḥ
और शकुनि के साथ मिलकर उसने नगर में इसकी घोषणा करवा दी। फिर श्रीकृष्ण को आगे करके पाण्डव वहाँ पहुँचे
श्लोक 53 (1.227.53)
मण्डयाञ्चक्रिरे तद्वै पुरं स्वर्गादिव च्युतम् । वासुदेवो जगन्नाथश्चिन्तयामास वासवम् ॥
maṇḍayāñcakrire tadvai puraṃ svargādiva cyutam | vāsudevo jagannāthaścintayāmāsa vāsavam
और उस नगर को सजाने लगे, जो मानो स्वर्ग से उतर आया हो। जगन्नाथ वासुदेव ने इन्द्र का स्मरण किया।
श्लोक 54 (1.227.54)
महेन्द्रश्चिन्तितो राजन्विश्वकर्माणमादिशत् । विश्वकर्मन्महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत्पुरम् ॥
mahendraścintito rājanviśvakarmāṇamādiśat | viśvakarmanmahāprājña adyaprabhṛti tatpuram
हे राजन्, स्मरण किए जाते ही महेन्द्र ने विश्वकर्मा को आदेश दिया — "हे महाबुद्धिमान विश्वकर्मा, आज से वह नगर
श्लोक 55 (1.227.55)
इन्द्रप्रस्थमिति ख्यातं दिव्यं भूम्यां भविष्यति । महेन्द्रशासनाद्गत्वा विश्वकर्मा तु केशवम् ॥
indraprasthamiti khyātaṃ divyaṃ bhūmyāṃ bhaviṣyati | mahendraśāsanādgatvā viśvakarmā tu keśavam
पृथ्वी पर दिव्य इन्द्रप्रस्थ के नाम से प्रसिद्ध होगा।" महेन्द्र की आज्ञा से विश्वकर्मा केशव के पास गए,
श्लोक 56 (1.227.56)
प्रणम्य प्रणिपातार्हं किं करोमीत्यभाषत । वासुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा विश्वकर्माणमूचिवान् ॥
praṇamya praṇipātārhaṃ kiṃ karomītyabhāṣata | vāsudevastu tacchrutvā viśvakarmāṇamūcivān
और प्रणाम के योग्य उन प्रभु को प्रणाम करके बोले — "मैं क्या करूँ?" यह सुनकर वासुदेव ने विश्वकर्मा से कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 57 (1.227.57)
कुरुष्व कुरुराजस्य महेन्द्रपुरसन्निभम् । इन्द्रेण कृतनामानमिन्द्रप्रस्थं महापुरम् ॥
kuruṣva kururājasya mahendrapurasannibham | indreṇa kṛtanāmānamindraprasthaṃ mahāpuram
"कुरुराज के लिए महेन्द्र की पुरी जैसा एक महान नगर बनाओ, जिसका नाम इन्द्र ने रखा है — इन्द्रप्रस्थ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 58 (1.227.58)
ततः पुण्ये शिवे देशे शान्तिं कृत्वा महारथाः । स्वस्तिवाच्य यथान्यायमिन्द्रप्रस्थं भवत्विति ॥
tataḥ puṇye śive deśe śāntiṃ kṛtvā mahārathāḥ | svastivācya yathānyāyamindraprasthaṃ bhavatviti
तब उन महारथियों ने एक पवित्र और मंगलमय स्थान पर शान्ति-कर्म किया, और विधिपूर्वक स्वस्तिवाचन कराकर कहा — "यह इन्द्रप्रस्थ हो।"
श्लोक 59 (1.227.59)
तत्पुरं मापयामासुर्द्वैपायनपुरोगमाः । ततः स विश्वकर्मा तु चकार पुरमुत्तमम् ॥
tatpuraṃ māpayāmāsurdvaipāyanapurogamāḥ | tataḥ sa viśvakarmā tu cakāra puramuttamam
फिर द्वैपायन व्यास को आगे रखकर उन्होंने उस नगर की नाप-जोख करवाई। तब विश्वकर्मा ने एक उत्तम नगर का निर्माण किया।
श्लोक 60 (1.227.60)
सागरप्रतिरूपाभिः परिखाभिरलङ्कृतम् । प्राकारेण च संपन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता ॥
sāgarapratirūpābhiḥ parikhābhiralaṅkṛtam | prākāreṇa ca saṃpannaṃ divamāvṛtya tiṣṭhatā
वह समुद्र जैसी खाइयों से सुशोभित था, और आकाश को घेरकर खड़े परकोटे से युक्त था,
श्लोक 61 (1.227.61)
पाण्डुराभ्रप्रकाशेन हिमरश्मिनिभेन च । शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ॥
pāṇḍurābhraprakāśena himaraśminibhena ca | śuśubhe tatpuraśreṣṭhaṃ nāgairbhogavatī yathā
जो श्वेत बादलों-सा उजला और चन्द्रमा-सा चमकीला था; वह श्रेष्ठ नगर नागों से भरी भोगवती की तरह शोभित हुआ।
श्लोक 62 (1.227.62)
द्विपक्षगरुडप्रख्यैर्द्वारैः सौधैश्च शोभितम् । गुप्तमभ्रचयप्रख्यैर्गोपुरैर्मन्दरोपमैः ॥
dvipakṣagaruḍaprakhyairdvāraiḥ saudhaiśca śobhitam | guptamabhracayaprakhyairgopurairmandaropamaiḥ
दोनों पंख फैलाए गरुड़ जैसे द्वारों और महलों से वह शोभित था, और मेघों के समूह जैसे, मन्दराचल-से ऊँचे गोपुरों से सुरक्षित था।
श्लोक 63 (1.227.63)
विविधैरपि निर्विद्धैः शस्त्रोपेतैः सुसंवृतैः । शक्तिभिश्चावृतं तद्धि द्विजिह्वैरिव पन्नगैः ॥
vividhairapi nirviddhaiḥ śastropetaiḥ susaṃvṛtaiḥ | śaktibhiścāvṛtaṃ taddhi dvijihvairiva pannagaiḥ
वह भाँति-भाँति के सघन, शस्त्रों से सज्जित और भली-भाँति ढके मोर्चों से घिरा था, और दो जीभों वाले सर्पों जैसी शक्तियों (भालों) से आवृत था।
श्लोक 64 (1.227.64)
तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुभे योधरक्षितम् । तीक्ष्णाङ्कुशशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैश्च शोभितम् ॥
talpaiścābhyāsikairyuktaṃ śuśubhe yodharakṣitam | tīkṣṇāṅkuśaśataghnībhiryantrajālaiśca śobhitam
अभ्यास के लिए बने बुर्जों से युक्त और योद्धाओं से रक्षित वह नगर चमक रहा था; तीखे अंकुशों, शतघ्नियों और यन्त्रों के जालों से सुशोभित था,
श्लोक 65 (1.227.65)
आयसैश्च महाचक्रैः शुशुभे तत्पुरोत्तमम् । सुविभक्तमहारथ्यं देवताबाधवर्जितम् ॥
āyasaiśca mahācakraiḥ śuśubhe tatpurottamam | suvibhaktamahārathyaṃ devatābādhavarjitam
और लोहे के बड़े-बड़े चक्रों से वह उत्तम नगर शोभा पा रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी सड़कें सुव्यवस्थित ढंग से बनी थीं, और वह दैवी उपद्रवों से मुक्त था।
श्लोक 66 (1.227.66)
विरोचमानं विविधैः पाण्डुरैर्भवनोत्तमैः । तत्त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत ॥
virocamānaṃ vividhaiḥ pāṇḍurairbhavanottamaiḥ | tattriviṣṭapasaṃkāśamindraprasthaṃ vyarocata
भाँति-भाँति के श्वेत, उत्तम भवनों से जगमगाता वह इन्द्रप्रस्थ स्वर्ग के समान शोभित हुआ,
श्लोक 67 (1.227.67)
मेघवृन्दमिवाकाशे विद्धं विद्युत्समावृतम् । तत्र रम्ये शिवे देशे कौरव्यस्य निवेशनम् ॥
meghavṛndamivākāśe viddhaṃ vidyutsamāvṛtam | tatra ramye śive deśe kauravyasya niveśanam
मानो आकाश में बिजलियों से घिरा और चीरा गया मेघ-समूह हो। वहाँ एक रमणीय, मंगलमय स्थान पर कौरव राजा का भवन
श्लोक 68 (1.227.68)
शुशुभे धनसंपूर्णं धनाध्यक्षक्षयोपमम् । तत्रागच्छन्द्विजा राजन्सर्ववेदविदां वराः ॥
śuśubhe dhanasaṃpūrṇaṃ dhanādhyakṣakṣayopamam | tatrāgacchandvijā rājansarvavedavidāṃ varāḥ
धन से भरा हुआ, धनपति कुबेर के भवन के समान शोभित था। हे राजन्, वहाँ सब वेदों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ ब्राह्मण आए,
श्लोक 69 (1.227.69)
निवासं रोचयन्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा । वणिजश्चाययुस्तत्र नानादिग्भ्यो धनार्थिनः ॥
nivāsaṃ rocayanti sma sarvabhāṣāvidastathā | vaṇijaścāyayustatra nānādigbhyo dhanārthinaḥ
और सब भाषाओं के जानकार लोगों ने वहाँ बसना पसन्द किया। धन की इच्छा से अनेक दिशाओं से व्यापारी वहाँ आए,
श्लोक 70 (1.227.70)
सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा । उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्ततः ॥
sarvaśilpavidastatra vāsāyābhyāgamaṃstadā | udyānāni ca ramyāṇi nagarasya samantataḥ
और सब प्रकार के शिल्पों के जानकार भी तब वहाँ बसने के लिए आ गए। नगर के चारों ओर रमणीय उद्यान थे,
श्लोक 71 (1.227.71)
आम्रैराम्रातकैर्नीपैरशोकैश्चम्पकैस्तथा । पुन्नागैर्नागपुष्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा ॥
āmrairāmrātakairnīpairaśokaiścampakaistathā | punnāgairnāgapuṣpaiśca lakucaiḥ panasaistathā
जिनमें आम, आमड़ा, कदम्ब, अशोक, चम्पा, पुन्नाग, नागकेसर, लकुच और कटहल के वृक्ष थे,
श्लोक 72 (1.227.72)
शालतालतमालैश्च बकुलैश्च सकेतकैः । मनोहरैः सुपुष्पैश्च फलभारावनामितैः ॥
śālatālatamālaiśca bakulaiśca saketakaiḥ | manoharaiḥ supuṣpaiśca phalabhārāvanāmitaiḥ
शाल, ताड़, तमाल, बकुल और केतकी — मनोहर, फूलों से लदे और फलों के बोझ से झुके हुए;
श्लोक 73 (1.227.73)
प्राचीनामलकैर्लोध्रैरङ्कोलैश्च सुपुष्पितैः । जम्बूभिः पाटलाभिश्च कुब्जकैरतिमुक्तकैः ॥
prācīnāmalakairlodhrairaṅkolaiśca supuṣpitaiḥ | jambūbhiḥ pāṭalābhiśca kubjakairatimuktakaiḥ
प्राचीनामलक, लोध्र और भरपूर खिले अंकोल, जामुन, पाटल, कुब्जक और अतिमुक्तक,
श्लोक 74 (1.227.74)
करवीरैः पारिजातैरन्यैश्च विविधैर्द्रुमैः । नित्यपुष्पफलोपेतैर्नानाद्विजगणायुतैः ॥
karavīraiḥ pārijātairanyaiśca vividhairdrumaiḥ | nityapuṣpaphalopetairnānādvijagaṇāyutaiḥ
कनेर, पारिजात और भाँति-भाँति के दूसरे वृक्ष, जो सदा फूलों-फलों से युक्त और पक्षियों के झुण्डों से भरे रहते थे।
श्लोक 75 (1.227.75)
मत्तबर्हिणसंघुष्टं कोकिलैश्च सदामदैः । गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहैः ॥
mattabarhiṇasaṃghuṣṭaṃ kokilaiśca sadāmadaiḥ | gṛhairādarśavimalairvividhaiśca latāgṛhaiḥ
वे उद्यान मतवाले मोरों की बोली और सदा मस्त रहने वाली कोयलों से गूँजते रहते थे। वहाँ दर्पण जैसे निर्मल भवन थे, भाँति-भाँति के लतागृह थे,
श्लोक 76 (1.227.76)
मनोहरैश्चित्रगृहैस्तथा जगतिपर्वतैः । वापीभिर्विविधाभिश्च पूर्णाभिः परमाम्भसा ॥
manoharaiścitragṛhaistathā jagatiparvataiḥ | vāpībhirvividhābhiśca pūrṇābhiḥ paramāmbhasā
मनोहर चित्रशालाएँ और कृत्रिम पर्वत थे, और उत्तम जल से भरी भाँति-भाँति की बावड़ियाँ थीं,
श्लोक 77 (1.227.77)
सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः । हंसकारण्डवयुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः ॥
sarobhiratiramyaiśca padmotpalasugandhibhiḥ | haṃsakāraṇḍavayutaiścakravākopaśobhitaiḥ
और कमलों तथा उत्पलों की सुगन्ध से भरे, हंसों और कारण्डवों से युक्त, चकवों से सुशोभित अत्यन्त रमणीय सरोवर थे।
श्लोक 78 (1.227.78)
रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः । तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुबहूनि च ॥
ramyāśca vividhāstatra puṣkariṇyo vanāvṛtāḥ | taḍāgāni ca ramyāṇi bṛhanti subahūni ca
वहाँ वनों से घिरी अनेक सुन्दर पुष्करिणियाँ थीं, और बहुत-से रमणीय, विशाल तालाब थे।
श्लोक 79 (1.227.79)
नदी च नन्दिनी नाम सा पुरीमुपगूहति । चातुर्वर्ण्यसमाकीर्णमन्यैः शिल्पिभिरावृतम् ॥
nadī ca nandinī nāma sā purīmupagūhati | cāturvarṇyasamākīrṇamanyaiḥ śilpibhirāvṛtam
नन्दिनी नाम की नदी उस नगरी को घेरे हुए बहती है। वह नगर चारों वर्णों के लोगों से भरा था और दूसरे शिल्पियों से भी बसा हुआ था,
श्लोक 80 (1.227.80)
सर्वदाभिसृतं सद्भिः कारितं विश्वकर्मणा । उपभोगसमृद्धैश्च सर्वद्रव्यसमावृतम् ॥
sarvadābhisṛtaṃ sadbhiḥ kāritaṃ viśvakarmaṇā | upabhogasamṛddhaiśca sarvadravyasamāvṛtam
सदा सज्जनों के आवागमन से युक्त, विश्वकर्मा का बनाया हुआ, भोग-सामग्री से सम्पन्न और सब प्रकार की वस्तुओं से भरपूर था,
श्लोक 81 (1.227.81)
नित्यमार्यजनोपेतं नरनारीगणैर्युतम् । वाजिवारणसंपूर्णं गोभिरुष्ट्रैः खरैरजैः ॥
nityamāryajanopetaṃ naranārīgaṇairyutam | vājivāraṇasaṃpūrṇaṃ gobhiruṣṭraiḥ kharairajaiḥ
सदा आर्यजनों से युक्त, नर-नारियों के समूहों से भरा, घोड़ों और हाथियों से पूर्ण, गायों, ऊँटों, गधों और बकरियों से युक्त।
श्लोक 82 (1.227.82)
तत्त्रिविष्टपसङ्काशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत । पुरीं सर्वगुणोपेतां निर्मितां विश्वकर्मणा ॥
tattriviṣṭapasaṅkāśamindraprasthaṃ vyarocata | purīṃ sarvaguṇopetāṃ nirmitāṃ viśvakarmaṇā
वह इन्द्रप्रस्थ स्वर्ग के समान शोभित हुआ। सब गुणों से सम्पन्न, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित उस नगरी में
श्लोक 83 (1.227.83)
पौरवाणामधिपतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । कृतमङ्गलसत्कारैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥
pauravāṇāmadhipatiḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | kṛtamaṅgalasatkārairbrāhmaṇairvedapāragaiḥ
पौरवों के स्वामी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर पधारे। वेदों के पारंगत ब्राह्मणों ने मंगलाचार और सत्कार किया;
श्लोक 84 (1.227.84)
द्वैपायनं पुरस्कृत्य धौम्यस्याभिमते स्थितः । भ्रातृभिः सहितो राजा राजमार्गमतीत्य च ॥
dvaipāyanaṃ puraskṛtya dhaumyasyābhimate sthitaḥ | bhrātṛbhiḥ sahito rājā rājamārgamatītya ca
द्वैपायन व्यास को आगे रखकर और धौम्य की सम्मति पर चलते हुए, भाइयों के साथ राजा राजमार्ग को पार करते हुए,
श्लोक 85 (1.227.85)
औपवाह्यगतो राजा केशवेन सहाभिभूः । तोरणद्वारसुमुखं द्वात्रिंशद्द्वारसंयुतम् ॥
aupavāhyagato rājā keśavena sahābhibhūḥ | toraṇadvārasumukhaṃ dvātriṃśaddvārasaṃyutam
राजकीय हाथी पर समर्थ केशव के साथ सवार होकर, तोरणों से सजे सुन्दर द्वार वाले, बत्तीस द्वारों से युक्त उस नगर में
श्लोक 86 (1.227.86)
वर्धमानपुरद्वारात्प्रविवेश महाद्युतिः । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषाः श्रूयन्ते बहवो भृशम् ॥
vardhamānapuradvārātpraviveśa mahādyutiḥ | śaṅkhadundubhinirghoṣāḥ śrūyante bahavo bhṛśam
उन महातेजस्वी राजा ने वर्धमान नामक नगरद्वार से प्रवेश किया। शंखों और नगाड़ों का बहुत ऊँचा घोष सुनाई देने लगा,
श्लोक 87 (1.227.87)
जयेति ब्राह्मणगिरः श्रूयन्ते च सहस्रशः । संस्तूयमानो मुनिभिः सूतमागधबन्दिभिः ॥
jayeti brāhmaṇagiraḥ śrūyante ca sahasraśaḥ | saṃstūyamāno munibhiḥ sūtamāgadhabandibhiḥ
और ब्राह्मणों के 'जय हो' के हज़ारों स्वर सुनाई देने लगे। मुनियों तथा सूत, मागध और बन्दीजनों से स्तुति पाते हुए
श्लोक 88 (1.227.88)
औपवाह्यगतो राजा राजमार्गमतीत्य च । कृतमङ्गलसत्कारं प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥
aupavāhyagato rājā rājamārgamatītya ca | kṛtamaṅgalasatkāraṃ praviveśa gṛhottamam
राजकीय हाथी पर सवार राजा राजमार्ग पार करके उस उत्तम भवन में प्रविष्ट हुए, जहाँ मंगलाचार और सत्कार की तैयारी की गई थी।
श्लोक 89 (1.227.89)
प्रविश्य भवनं राजा नागरैरभिसंवृतः । प्रहृष्टमुदितैरासीत्सत्कारैरभिपूजितः ॥
praviśya bhavanaṃ rājā nāgarairabhisaṃvṛtaḥ | prahṛṣṭamuditairāsītsatkārairabhipūjitaḥ
भवन में प्रवेश करने पर हर्षित और प्रसन्न नगरवासियों से घिरे राजा का भाँति-भाँति के सत्कारों से पूजन किया गया।
श्लोक 90 (1.227.90)
पूजयामास विप्रेन्द्रान्केशवेन महात्मना । ततस्तु राष्ट्रं नगरं नरनारीगणायुतम् ॥
pūjayāmāsa viprendrānkeśavena mahātmanā | tatastu rāṣṭraṃ nagaraṃ naranārīgaṇāyutam
महात्मा केशव के साथ उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणों का पूजन किया। फिर नर-नारियों के समूहों से भरा
श्लोक 91 (1.227.91)
गोधनैश्च समाकीर्णं सस्यैर्वृद्धिं तदागमत् ॥
godhanaiśca samākīrṇaṃ sasyairvṛddhiṃ tadāgamat
और गोधन से परिपूर्ण वह राष्ट्र और नगर फसलों की बढ़वार से समृद्ध हो गया।
श्लोक 92 (1.227.92)
तेषां पुण्यजनोपेतं राष्ट्रमाविशतां महत् । पाण्डवानां महाराज शश्वत्प्रीतिरवर्धत ॥
teṣāṃ puṇyajanopetaṃ rāṣṭramāviśatāṃ mahat | pāṇḍavānāṃ mahārāja śaśvatprītiravardhata
हे महाराज, पुण्यात्मा लोगों से भरे उस विशाल राष्ट्र में बसते हुए पाण्डवों का आनन्द निरन्तर बढ़ता गया।
श्लोक 93 (1.227.93)
सौबलेन च कर्णेन धार्तराष्ट्रैः कृपेण च । तथा भीष्मेण राज्ञा च धर्मप्रणयिना सदा ॥
saubalena ca karṇena dhārtarāṣṭraiḥ kṛpeṇa ca | tathā bhīṣmeṇa rājñā ca dharmapraṇayinā sadā
इस प्रकार शकुनि और कर्ण, धृतराष्ट्र के पुत्रों और कृप, तथा सदा धर्म का पालन करने वाले भीष्म और राजा धृतराष्ट्र की व्यवस्था से
श्लोक 94 (1.227.94)
पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः । पञ्चभिस्तैर्महेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समावृतम् ॥
pāṇḍavāḥ samapadyanta khāṇḍavaprasthavāsinaḥ | pañcabhistairmaheṣvāsairindrakalpaiḥ samāvṛtam
पाण्डव खाण्डवप्रस्थ के निवासी बन गए। इन्द्र के समान उन पाँच महाधनुर्धरों से घिरा हुआ
श्लोक 95 (1.227.95)
शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा । ततस्तु विश्वकर्माणं पूजयित्वा विसृज्य च ॥
śuśubhe tatpuraśreṣṭhaṃ nāgairbhogavatī yathā | tatastu viśvakarmāṇaṃ pūjayitvā visṛjya ca
वह श्रेष्ठ नगर नागों से भरी भोगवती की तरह शोभित हुआ। फिर विश्वकर्मा का सत्कार करके उन्हें विदा किया,
श्लोक 96 (1.227.96)
द्वैपायनं च संपूज्य विसृज्य च नराधिपः । वार्ष्णेयमब्रवीद्राजा गन्तुकामं कृतक्षणम् ॥
dvaipāyanaṃ ca saṃpūjya visṛjya ca narādhipaḥ | vārṣṇeyamabravīdrājā gantukāmaṃ kṛtakṣaṇam
और द्वैपायन व्यास का पूजन करके उन्हें भी विदा किया; तब नरपति राजा युधिष्ठिर ने जाने को उत्सुक और अवसर की प्रतीक्षा कर रहे श्रीकृष्ण से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 97 (1.227.97)
तव प्रसादाद्वार्ष्णेय राज्यं प्राप्तं मयाऽनघ । प्रसादादेव ते वीर शून्यं राष्ट्रं सुदुर्गमम् ॥
tava prasādādvārṣṇeya rājyaṃ prāptaṃ mayā'nagha | prasādādeva te vīra śūnyaṃ rāṣṭraṃ sudurgamam
"हे निष्पाप वार्ष्णेय, आपकी कृपा से ही मुझे राज्य मिला है; हे वीर, आपकी कृपा से ही यह सूना और दुर्गम राष्ट्र हमारा हुआ है।
श्लोक 98 (1.227.98)
तवैव तु प्रसादेन राज्यस्थाश्च भवामहे । गतिस्त्वमापत्कालेऽपि पाण्डवानां च माधव ॥
tavaiva tu prasādena rājyasthāśca bhavāmahe | gatistvamāpatkāle'pi pāṇḍavānāṃ ca mādhava
आपकी ही कृपा से हम राज्य में स्थिर हैं। हे माधव, विपत्ति के समय में भी पाण्डवों के सहारे आप ही हैं।
श्लोक 99 (1.227.99)
ज्ञात्वा तु कृत्यं कर्तव्यं कारयस्व भवान्हि नः । यदिष्टमनुमन्तव्यं पाण्डवानां त्वयाऽनघ ॥
jñātvā tu kṛtyaṃ kartavyaṃ kārayasva bhavānhi naḥ | yadiṣṭamanumantavyaṃ pāṇḍavānāṃ tvayā'nagha
जो करने योग्य है उसे जानकर आप ही हमसे करवाइए; और हे निष्पाप, पाण्डव जो चाहें, उसकी आप अनुमति दीजिए।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 100 (1.227.100)
त्वत्प्रभावान्महाराज्यं संप्राप्तं हि स्वधर्मतः । पितृपैतामहं राज्यं कथं न स्यात्तव प्रभो ॥
tvatprabhāvānmahārājyaṃ saṃprāptaṃ hi svadharmataḥ | pitṛpaitāmahaṃ rājyaṃ kathaṃ na syāttava prabho
"हे महाराज, अपने ही प्रभाव और अपने ही धर्म से आपने यह विशाल राज्य पाया है। हे प्रभो, बाप-दादों का राज्य आपका कैसे न होता?
श्लोक 101 (1.227.101)
धार्तराष्ट्रा दुराचाराः किं करिष्यन्ति पाण्डवान् । यथेष्टं पालय जगच्छश्वद्धर्मधुरं वह ॥
dhārtarāṣṭrā durācārāḥ kiṃ kariṣyanti pāṇḍavān | yatheṣṭaṃ pālaya jagacchaśvaddharmadhuraṃ vaha
दुराचारी धृतराष्ट्र-पुत्र पाण्डवों का क्या बिगाड़ लेंगे? आप अपनी इच्छा के अनुसार जगत का पालन कीजिए और सदा धर्म का भार उठाइए।
श्लोक 102 (1.227.102)
पुनः पुनश्च संहर्षाद्ब्राह्मणान्भर पौरव । अद्यैव नारदः श्रीमानागमिष्यति सत्वरः ॥
punaḥ punaśca saṃharṣādbrāhmaṇānbhara paurava | adyaiva nāradaḥ śrīmānāgamiṣyati satvaraḥ
हे पौरव, बार-बार प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणों का भरण-पोषण कीजिए। आज ही श्रीमान नारद शीघ्रता से यहाँ आएँगे;
श्लोक 103 (1.227.103)
आदत्स्व तस्य वाक्यानि शासनं कुरु तस्य वै । एवमुक्त्वा ततः कुन्तीमभिवाद्य जनार्दनः ॥
ādatsva tasya vākyāni śāsanaṃ kuru tasya vai | evamuktvā tataḥ kuntīmabhivādya janārdanaḥ
उनकी बातें ग्रहण कीजिए और उनकी आज्ञा का पालन कीजिए।" ऐसा कहकर जनार्दन ने कुन्ती को प्रणाम किया
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 104 (1.227.104)
उवाच श्लक्ष्णया वाचा गमिष्यामि नमोऽस्तु ते ॥
uvāca ślakṣṇayā vācā gamiṣyāmi namo'stu te
और मधुर वाणी में कहा — "मैं जाऊँगा; आपको प्रणाम है।"
कुन्त्युवाच
श्लोक 105 (1.227.105)
जातुषं गृहमासाद्य मया प्राप्तं यदानघ ॥
jātuṣaṃ gṛhamāsādya mayā prāptaṃ yadānagha
"हे निष्पाप, लाक्षागृह में पहुँचकर मुझ पर जो बीती,
श्लोक 106 (1.227.106)
आर्येण समभिज्ञातं त्वया वै यदुपुङ्गव । त्वया नाथेन गोविन्द दुःखं तीर्णं महत्तरम् ॥
āryeṇa samabhijñātaṃ tvayā vai yadupuṅgava | tvayā nāthena govinda duḥkhaṃ tīrṇaṃ mahattaram
उसे हे यदुश्रेष्ठ, आप भली-भाँति जानते हैं। हे गोविन्द, आप जैसे रक्षक के कारण ही हम उस बहुत बड़े दुःख से पार हुए।
श्लोक 107 (1.227.107)
त्वं हि नाथस्त्वनाथानां दरिद्राणां विशेषतः । सर्वदुःखानि शाम्यन्ति तव संदर्शनान्मम ॥
tvaṃ hi nāthastvanāthānāṃ daridrāṇāṃ viśeṣataḥ | sarvaduḥkhāni śāmyanti tava saṃdarśanānmama
आप अनाथों के नाथ हैं, और विशेष रूप से दीनों के। आपके दर्शन मात्र से मेरे सब दुःख शान्त हो जाते हैं।
श्लोक 108 (1.227.108)
स्मरस्वैनान्महाप्राज्ञ तेन जीवन्ति पाण्डवाः ॥
smarasvainānmahāprājña tena jīvanti pāṇḍavāḥ
हे महाप्राज्ञ, इनका स्मरण रखिएगा; उसी के बल पर पाण्डव जीते हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 109 (1.227.109)
करिष्यामीति चामन्त्र्य अभिवाद्य पितृष्वसाम् । गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः सहानुगः ॥
kariṣyāmīti cāmantrya abhivādya pitṛṣvasām | gamanāya matiṃ cakre vāsudevaḥ sahānugaḥ
"ऐसा ही करूँगा" कहकर, विदा लेकर उन्होंने अपनी बुआ को प्रणाम किया; और वासुदेव ने अपने अनुचरों सहित जाने का निश्चय किया।
श्लोक 110 (1.227.110)
तान्निवेश्य ततो वीरः सह रामेण कौरवान् । ययौ द्वारवतीं राजन्पाण्डवानुमते तदा ॥
tānniveśya tato vīraḥ saha rāmeṇa kauravān | yayau dvāravatīṃ rājanpāṇḍavānumate tadā
हे राजन्, उन कुरुवंशी पाण्डवों को वहाँ बसाकर वीर श्रीकृष्ण बलराम के साथ पाण्डवों की अनुमति से द्वारका चले गए।