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आदि पर्व · अध्याय 229

सुन्द और उपसुन्द को ब्रह्मा का वरदान

नारद हिरण्यकशिपु के वंश में उत्पन्न दैत्य निकुम्भ के पुत्र सुन्द और उपसुन्द की कथा आरम्भ करते हैं — दो ऐसे भाई जो इतने घनिष्ठ थे मानो एक ही प्राणी दो शरीरों में हो। तीनों लोकों को जीतने का संकल्प करके वे विन्ध्य पर्वत पर कठोर तप करते हैं और देवताओं द्वारा भेजे गए हर प्रलोभन और माया को झेल जाते हैं। ब्रह्मा उन्हें अमरत्व तो नहीं देते, पर यह वर देते हैं कि तीनों लोकों में एक-दूसरे को छोड़कर कोई उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकेगा। वे विजयी होकर घर लौटते हैं और निरन्तर भोग-विलास और उत्सव में डूब जाते हैं।

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नारद उवाच

श्लोक 1 (1.229.1)

शृणु मे विस्तरेणेममितिहासं पुरातनम् । भ्रातृभिः सहितः पार्थ यथा वृत्तं युधिष्ठिर ॥

śṛṇu me vistareṇemamitihāsaṃ purātanam | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ pārtha yathā vṛttaṃ yudhiṣṭhira

हे पार्थ युधिष्ठिर! अपने भाइयों के साथ यह प्राचीन इतिहास, जैसा घटित हुआ था, मुझसे विस्तार से सुनो।

श्लोक 2 (1.229.2)

महासुरस्यान्ववाये हिरण्यकशिपोः पुरा । निकुम्भो नाम दैत्येन्द्रस्तेजस्वी बलवानभूत् ॥

mahāsurasyānvavāye hiraṇyakaśipoḥ purā | nikumbho nāma daityendrastejasvī balavānabhūt

प्राचीन काल में महान् असुर हिरण्यकशिपु के वंश में निकुम्भ नाम का एक तेजस्वी और बलवान् दैत्यराज हुआ।

श्लोक 3 (1.229.3)

तस्य पुत्रौ महावीर्यौ जातौ भीमपराक्रमौ । सुन्दोपसुन्दौ दैत्येन्द्रौ दारुणौ क्रूरमानसौ ॥

tasya putrau mahāvīryau jātau bhīmaparākramau | sundopasundau daityendrau dāruṇau krūramānasau

उसके दो पुत्र हुए — महापराक्रमी, भयंकर वीर्य वाले सुन्द और उपसुन्द, जो दैत्यों के स्वामी, भीषण और क्रूर हृदय वाले थे।

श्लोक 4 (1.229.4)

तावेकनिश्चयौ दैत्यावेककार्यार्थसंमतौ । निरन्तरमवर्तेतां समदुःखसुखावुभौ ॥

tāvekaniścayau daityāvekakāryārthasaṃmatau | nirantaramavartetāṃ samaduḥkhasukhāvubhau

वे दोनों दैत्य एक ही निश्चय वाले थे और हर कार्य तथा प्रयोजन में एकमत थे; सुख-दुःख में समान रहते हुए वे निरन्तर साथ-साथ रहते थे।

श्लोक 5 (1.229.5)

विनाऽन्योन्यं न भुञ्जाते विनाऽन्योन्यं न जल्पतः । अन्योन्यस्य प्रियकरावन्योन्यस्य प्रियंवदौ ॥

vinā'nyonyaṃ na bhuñjāte vinā'nyonyaṃ na jalpataḥ | anyonyasya priyakarāvanyonyasya priyaṃvadau

वे एक-दूसरे के बिना न भोजन करते थे, न बात करते थे; दोनों एक-दूसरे का प्रिय करने वाले और एक-दूसरे से प्रिय बोलने वाले थे।

श्लोक 6 (1.229.6)

एकशीलसमाचारौ द्विधैवैकोऽभवत्कृतः । तौ विवृद्धौ महावीर्यौ कार्येष्वप्येकनिश्चयौ ॥

ekaśīlasamācārau dvidhaivaiko'bhavatkṛtaḥ | tau vivṛddhau mahāvīryau kāryeṣvapyekaniścayau

स्वभाव और आचरण में वे एक-से थे, मानो एक ही व्यक्ति दो रूपों में बँट गया हो। बड़े होकर वे महापराक्रमी हुए और सब कार्यों में एक ही निश्चय रखते थे।

श्लोक 7 (1.229.7)

त्रैलोक्यविजयार्थाय समाधायैकनिश्चयम् । दीक्षां कृत्वा गतौ विन्ध्यं तावुग्रं तेपतुस्तपः ॥

trailokyavijayārthāya samādhāyaikaniścayam | dīkṣāṃ kṛtvā gatau vindhyaṃ tāvugraṃ tepatustapaḥ

तीनों लोकों को जीतने का एक ही संकल्प करके उन्होंने दीक्षा ली, विन्ध्य पर्वत पर गए और वहाँ उग्र तप करने लगे।

श्लोक 8 (1.229.8)

तौ तु दीर्घेण कालेन तपोयुक्तौ बभूवतुः । क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणौ ॥

tau tu dīrgheṇa kālena tapoyuktau babhūvatuḥ | kṣutpipāsāpariśrāntau jaṭāvalkaladhāriṇau

दीर्घकाल तक वे तप में लीन रहे; भूख-प्यास से थके हुए, जटा और वल्कल धारण किए हुए।

श्लोक 9 (1.229.9)

मलोपचितसर्वाङ्गौ वायुभक्षौ बभूवतुः । आत्ममांसानि जुह्वन्तौ पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठितौ । ऊर्ध्वबाहू चानिमिषौ दीर्घकालं धृतव्रतौ ॥

malopacitasarvāṅgau vāyubhakṣau babhūvatuḥ | ātmamāṃsāni juhvantau pādāṅguṣṭhāgradhiṣṭhitau | ūrdhvabāhū cānimiṣau dīrghakālaṃ dhṛtavratau

उनके सारे अंग मैल से ढक गए और वे केवल वायु पर रहने लगे; अपने ही मांस की आहुति देते हुए, पैरों के अँगूठों के अग्रभाग पर खड़े, भुजाएँ ऊपर उठाए और पलक न झपकाते हुए वे दीर्घकाल तक व्रत में दृढ़ रहे।

श्लोक 10 (1.229.10)

तयोस्तपःप्रभावेण दीर्घकालं प्रतापितः । धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tayostapaḥprabhāveṇa dīrghakālaṃ pratāpitaḥ | dhūmaṃ pramumuce vindhyastadadbhutamivābhavat

उनके तप के प्रभाव से दीर्घकाल तक तपते-तपते विन्ध्य पर्वत धुआँ छोड़ने लगा; यह एक अद्भुत-सी घटना थी।

श्लोक 11 (1.229.11)

ततो देवा भयं जग्मुरुग्रं दृष्ट्वा तयोस्तपः । तपोविघातार्थमथो देवा विघ्नानि चक्रिरे ॥

tato devā bhayaṃ jagmurugraṃ dṛṣṭvā tayostapaḥ | tapovighātārthamatho devā vighnāni cakrire

तब उनका उग्र तप देखकर देवता भयभीत हो गए, और उस तप को भंग करने के लिए देवताओं ने विघ्न खड़े किए।

श्लोक 12 (1.229.12)

रत्नैः प्रलोभयामासुः स्त्रीभिश्चोभौ पुनःपुनः । न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥

ratnaiḥ pralobhayāmāsuḥ strībhiścobhau punaḥpunaḥ | na ca tau cakraturbhaṅgaṃ vratasya sumahāvratau

उन्होंने रत्नों और स्त्रियों से दोनों को बार-बार लुभाया, पर महान् व्रत वाले उन दोनों ने अपना व्रत नहीं तोड़ा।

श्लोक 13 (1.229.13)

अथ मायां पुनर्देवास्तयोश्चक्रुर्महात्मनोः । भगिन्यो मातरो भार्यास्तयोश्चात्मजनस्तथा ॥

atha māyāṃ punardevāstayoścakrurmahātmanoḥ | bhaginyo mātaro bhāryāstayoścātmajanastathā

तब देवताओं ने उन दोनों महाबलियों पर फिर से माया रची — उनकी बहनें, माताएँ, पत्नियाँ और उनके आत्मीय जन भी

श्लोक 14 (1.229.14)

प्रपात्यमाना विस्रस्ताः शूलहस्तेन रक्षसा । भ्रष्टाभरणकेशान्ता भ्रष्टाभरणवाससः ॥

prapātyamānā visrastāḥ śūlahastena rakṣasā | bhraṣṭābharaṇakeśāntā bhraṣṭābharaṇavāsasaḥ

हाथ में शूल लिए एक राक्षस द्वारा पटके जा रहे थे; वे अस्त-व्यस्त थे, उनके आभूषण और केश बिखर गए थे, गहने और वस्त्र खिसक रहे थे।

श्लोक 15 (1.229.15)

अभिभाष्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुक्रुशुः । न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥

abhibhāṣya tataḥ sarvāstau trāhīti vicukruśuḥ | na ca tau cakraturbhaṅgaṃ vratasya sumahāvratau

वे सब दोनों को पुकारकर चिल्लाने लगीं — "हमें बचाओ!" फिर भी महान् व्रत वाले उन दोनों ने अपना व्रत भंग नहीं किया।

श्लोक 16 (1.229.16)

यदा क्षोभं नोपयाति नार्तिमन्यतरस्तयोः । ततः स्त्रियस्ता भूतं च सर्वमन्तरधीयत ॥

yadā kṣobhaṃ nopayāti nārtimanyatarastayoḥ | tataḥ striyastā bhūtaṃ ca sarvamantaradhīyata

जब उनमें से कोई भी न विचलित हुआ, न व्यथित, तब वे स्त्रियाँ और वह सारा माया-दृश्य अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 17 (1.229.17)

ततः पितामहः साक्षादभिगम्य महासुरौ । वरेण च्छन्दयामास सर्वलोकहितः प्रभुः ॥

tataḥ pitāmahaḥ sākṣādabhigamya mahāsurau | vareṇa cchandayāmāsa sarvalokahitaḥ prabhuḥ

तब समस्त लोकों का हित करने वाले प्रभु पितामह स्वयं उन दोनों महासुरों के पास आए और उन्हें वर माँगने को कहा।

श्लोक 18 (1.229.18)

ततः सुन्दोपसुन्दौ तौ भ्रातरौ दृढविक्रमौ । दृष्ट्वा पितामहं देवं तस्थतुः प्राञ्जली तदा ॥

tataḥ sundopasundau tau bhrātarau dṛḍhavikramau | dṛṣṭvā pitāmahaṃ devaṃ tasthatuḥ prāñjalī tadā

तब दृढ़ पराक्रम वाले सुन्द और उपसुन्द दोनों भाई देव पितामह को देखकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

श्लोक 19 (1.229.19)

ऊचतुश्च प्रभुं देवं ततस्तौ सहितौ तदा । आवयोस्तपसाऽनेन यदि प्रीतः पितामहः ॥

ūcatuśca prabhuṃ devaṃ tatastau sahitau tadā | āvayostapasā'nena yadi prītaḥ pitāmahaḥ

और फिर दोनों ने मिलकर प्रभु देव से कहा — "यदि हमारे इस तप से पितामह प्रसन्न हैं,

सुन्दोपसुन्दावूचतुः

श्लोक 20 (1.229.20)

मायाविदावस्त्रविदौ बलिनौ कामरूपिणौ । उभावप्यमरौ स्यावः प्रसन्नो यदि नौ प्रभुः ॥

māyāvidāvastravidau balinau kāmarūpiṇau | ubhāvapyamarau syāvaḥ prasanno yadi nau prabhuḥ

तो हम दोनों माया और अस्त्रों के ज्ञाता, बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और अमर हो जाएँ — यदि प्रभु हम पर प्रसन्न हैं।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 21 (1.229.21)

ऋतेऽमरत्वं युवयोः सर्वमुक्तं भविष्यति । अन्यद्वृणीतं मृत्योश्च विधानममरैः समम् ॥

ṛte'maratvaṃ yuvayoḥ sarvamuktaṃ bhaviṣyati | anyadvṛṇītaṃ mṛtyośca vidhānamamaraiḥ samam

अमरत्व को छोड़कर तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब तुम्हें मिलेगा। उसके स्थान पर मृत्यु का कोई ऐसा विधान चुन लो जिससे तुम अमरों के समान हो जाओ।

श्लोक 22 (1.229.22)

प्रभविष्याव इति यन्महदभ्युद्यतं तपः । युवयोर्हेतुनानेन नामरत्वं विधीयते ॥

prabhaviṣyāva iti yanmahadabhyudyataṃ tapaḥ | yuvayorhetunānena nāmaratvaṃ vidhīyate

"हम प्रभुत्व पाएँगे" — इस भाव से तुमने जो महान् तप आरम्भ किया, इसी कारण तुम्हें अमरत्व नहीं दिया जाता।

श्लोक 23 (1.229.23)

त्रैलोक्यविजयार्थाय भवद्भ्यामास्थितं तपः । हेतुनाऽनेन दैत्येन्द्रौ न वां कामं करोम्यहम् ॥

trailokyavijayārthāya bhavadbhyāmāsthitaṃ tapaḥ | hetunā'nena daityendrau na vāṃ kāmaṃ karomyaham

तुम दोनों ने तीनों लोकों को जीतने के लिए तप किया है; इसी कारण, हे दैत्यराजो, मैं तुम्हारी यह कामना पूरी नहीं करता।

सुन्दोपसुन्दावूचतुः

श्लोक 24 (1.229.24)

त्रिषु लोकेषु यद्भूतं किंचित्स्थावरजङ्गमम् । सर्वस्मान्नौ भयं न स्यादृतेऽन्योन्यं पितामह ॥

triṣu lokeṣu yadbhūtaṃ kiṃcitsthāvarajaṅgamam | sarvasmānnau bhayaṃ na syādṛte'nyonyaṃ pitāmaha

हे पितामह! तीनों लोकों में जो कुछ भी चर या अचर है, उसमें से किसी से हमें भय न हो — केवल एक-दूसरे को छोड़कर।

पितामह उवाच

श्लोक 25 (1.229.25)

यत्प्रार्थितं यथोक्तं च काममेतद्ददानि वाम् । मृत्योर्विधानमेतच्च यथावद्वां भविष्यति ॥

yatprārthitaṃ yathoktaṃ ca kāmametaddadāni vām | mṛtyorvidhānametacca yathāvadvāṃ bhaviṣyati

तुमने जो माँगा है और जैसा कहा है, वह मनोरथ मैं तुम्हें देता हूँ। और तुम्हारी मृत्यु का यह विधान ठीक वैसा ही होगा।

नारद उवाच

श्लोक 26 (1.229.26)

ततः पितामहो दत्त्वा वरमेतत्तदा तयोः । निवर्त्य तपसस्तौ च ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥

tataḥ pitāmaho dattvā varametattadā tayoḥ | nivartya tapasastau ca brahmalokaṃ jagāma ha

तब पितामह उन्हें यह वर देकर और उन्हें तप से निवृत्त करके ब्रह्मलोक चले गए।

श्लोक 27 (1.229.27)

लब्ध्वा वराणि दैत्येन्द्रावथ तौ भ्रातरावुभौ । अवध्यौ सर्वलोकस्य स्वमेव भवनं गतौ ॥

labdhvā varāṇi daityendrāvatha tau bhrātarāvubhau | avadhyau sarvalokasya svameva bhavanaṃ gatau

वर पाकर वे दोनों दैत्यराज भाई, जो अब सारे संसार के लिए अवध्य थे, अपने ही भवन को लौट गए।

श्लोक 28 (1.229.28)

तौ तु लब्धवरौ दृष्ट्वा कृतकामौ मनस्विनौ । सर्वः सुहृज्जनस्ताभ्यां प्रहर्षमुपजग्मिवान् ॥

tau tu labdhavarau dṛṣṭvā kṛtakāmau manasvinau | sarvaḥ suhṛjjanastābhyāṃ praharṣamupajagmivān

उन मनस्वी भाइयों को वर पाया हुआ और सफल-मनोरथ देखकर उनके सभी सुहृद्जन अत्यन्त हर्षित हुए।

श्लोक 29 (1.229.29)

ततस्तौ तु जटा भित्त्वा मौलिनौ संबभूवतुः । महार्हाभरणोपेतौ विरजोम्बरधारिणौ ॥

tatastau tu jaṭā bhittvā maulinau saṃbabhūvatuḥ | mahārhābharaṇopetau virajombaradhāriṇau

तब उन दोनों ने अपनी जटाएँ काटकर मुकुट धारण किए; वे बहुमूल्य आभूषणों से सजे और निर्मल वस्त्र पहने रहने लगे।

श्लोक 30 (1.229.30)

अकालकौमुदीं चैव चक्रतुः सार्वकालिकीम् । नित्यः प्रमुदितः सर्वस्तयोश्चैव सुहृज्जनः ॥

akālakaumudīṃ caiva cakratuḥ sārvakālikīm | nityaḥ pramuditaḥ sarvastayoścaiva suhṛjjanaḥ

उन्होंने असमय ही कौमुदी-महोत्सव मनाया, जो सब समय चलता रहा, और उनके सब सुहृद्जन नित्य आनन्दित रहते थे।

श्लोक 31 (1.229.31)

भक्ष्यतां भुज्यतां नित्यं दीयतां रम्यतामिति । गीयतां पीयतां चेति शब्दश्चासीद्गृहे गृहे ॥

bhakṣyatāṃ bhujyatāṃ nityaṃ dīyatāṃ ramyatāmiti | gīyatāṃ pīyatāṃ ceti śabdaścāsīdgṛhe gṛhe

"खाओ, भोगो, दान दो, आनन्द मनाओ, गाओ, पियो!" — घर-घर में नित्य यही शब्द गूँजता था।

श्लोक 32 (1.229.32)

तत्रतत्र महानादैरुत्कृष्टतलनादितैः । हृष्टं प्रमुदितं सर्वं दैत्यानामभवत्पुरम् ॥

tatratatra mahānādairutkṛṣṭatalanāditaiḥ | hṛṣṭaṃ pramuditaṃ sarvaṃ daityānāmabhavatpuram

जगह-जगह बड़े कोलाहल और ज़ोरदार तालियों की ध्वनि से दैत्यों का सारा नगर हर्ष और आनन्द से भर गया।

श्लोक 33 (1.229.33)

तैस्तैर्विहारैर्बहुभिर्दैत्यानां कामरूपिणाम् । समाः संक्रीडतां तेषामहरेकमिवाभवत् ॥

taistairvihārairbahubhirdaityānāṃ kāmarūpiṇām | samāḥ saṃkrīḍatāṃ teṣāmaharekamivābhavat

इच्छानुसार रूप धारण करने वाले उन दैत्यों के अनेक प्रकार के विहारों में क्रीड़ा करते हुए वर्षों का समय उन्हें एक दिन के समान बीत गया।

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