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आदि पर्व · अध्याय 231

तिलोत्तमा की सृष्टि

नारद अपनी कथा आगे बढ़ाते हैं। सुन्द और उपसुन्द के किए संहार से दुखी देवता और ऋषि ब्रह्मा के पास जाते हैं। ब्रह्मा विश्वकर्मा से तीनों लोकों की सारी सुन्दरता लेकर एक अनुपम स्त्री रचवाते हैं, जिसका नाम तिलोत्तमा पड़ता है, क्योंकि वह रत्नों को तिल-तिल जोड़कर बनी थी। ब्रह्मा उसे दोनों भाइयों में फूट डालने भेजते हैं; जब वह सभा की परिक्रमा करती है तो उसे देखने की उत्कण्ठा में शिव के चार मुख और इन्द्र के हज़ार नेत्र हो जाते हैं।

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नारद उवाच

श्लोक 1 (1.231.1)

ततो देवर्षयः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः । जग्मुस्तदा परमार्तिं दृष्ट्वा तत्कदनं महत् ॥

tato devarṣayaḥ sarve siddhāśca paramarṣayaḥ | jagmustadā paramārtiṃ dṛṣṭvā tatkadanaṃ mahat

तब सब देवर्षि, सिद्ध और परमर्षि उस भीषण संहार को देखकर अत्यन्त व्यथित हो उठे।

श्लोक 2 (1.231.2)

तेऽभिजग्मुर्जितक्रोधा जितात्मानो जितेन्द्रियाः । पितामहस्य भवनं जगतः कृपया तदा ॥

te'bhijagmurjitakrodhā jitātmāno jitendriyāḥ | pitāmahasya bhavanaṃ jagataḥ kṛpayā tadā

क्रोध, मन और इन्द्रियों को जीत चुके वे ऋषि तब जगत् पर करुणा करके पितामह ब्रह्मा के भवन में गए।

श्लोक 3 (1.231.3)

ततो ददृशुरासीनं सह देवैः पितामहम् । सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव समन्तात्परिवारितम् ॥

tato dadṛśurāsīnaṃ saha devaiḥ pitāmaham | siddhairbrahmarṣibhiścaiva samantātparivāritam

वहाँ उन्होंने देवताओं के साथ बैठे पितामह को देखा, जो चारों ओर से सिद्धों और ब्रह्मर्षियों से घिरे थे।

श्लोक 4 (1.231.4)

तत्र देवो महादेवस्तत्राग्निर्वायुना सह । चन्द्रादित्यौ च शक्रश्च पारमेष्ठ्यास्तथर्षयः ॥

tatra devo mahādevastatrāgnirvāyunā saha | candrādityau ca śakraśca pārameṣṭhyāstatharṣayaḥ

वहाँ महादेव थे, वायु के साथ अग्नि थे, चन्द्रमा और सूर्य थे, इन्द्र थे, और परमेष्ठी ब्रह्मा से उत्पन्न ऋषिगण भी थे;

श्लोक 5 (1.231.5)

वैखानसा वालखिल्या वानप्रस्था मरीचिपाः । अजाश्चैवाविमूढाश्च तेजोगर्भास्तपस्विनः ॥

vaikhānasā vālakhilyā vānaprasthā marīcipāḥ | ajāścaivāvimūḍhāśca tejogarbhāstapasvinaḥ

वैखानस, वालखिल्य, वानप्रस्थ, मरीचिप, अज, अविमूढ और तेजोगर्भ — ये सब तपस्वी भी वहाँ थे।

श्लोक 6 (1.231.6)

ऋषयः सर्व एवैते पितामहमुपागमन् । ततोऽभिगम्य ते दीनाः सर्व एव महर्षयः ॥

ṛṣayaḥ sarva evaite pitāmahamupāgaman | tato'bhigamya te dīnāḥ sarva eva maharṣayaḥ

ये सभी ऋषि पितामह के पास आए थे। तब उन दुखी महर्षियों ने पास जाकर सबने मिलकर

श्लोक 7 (1.231.7)

सुन्दोपसुन्दयोः कर्म सर्वमेव शशंसिरे । यथा हृतं यथा चैव कृतं येन क्रमेण च ॥

sundopasundayoḥ karma sarvameva śaśaṃsire | yathā hṛtaṃ yathā caiva kṛtaṃ yena krameṇa ca

सुन्द और उपसुन्द के सारे कर्म कह सुनाए — उन्होंने क्या छीना, कैसे किया और किस क्रम से किया।

श्लोक 8 (1.231.8)

न्यवेदयंस्ततः सर्वमखिलेन पितामहे । ततो देवगणाः सर्वे ते चैव परमर्षयः ॥

nyavedayaṃstataḥ sarvamakhilena pitāmahe | tato devagaṇāḥ sarve te caiva paramarṣayaḥ

उन्होंने सारा वृत्तान्त पूरा-पूरा पितामह के सामने रख दिया। तब सब देवगणों और उन परमर्षियों ने

श्लोक 9 (1.231.9)

तमेवार्थं पुरस्कृत्य पितामहमचोदयन् । ततः पितामहः श्रुत्वा सर्वेषां तद्वचस्तदा ॥

tamevārthaṃ puraskṛtya pitāmahamacodayan | tataḥ pitāmahaḥ śrutvā sarveṣāṃ tadvacastadā

उसी विषय को आगे रखकर पितामह से आग्रह किया। तब उन सबकी बात सुनकर पितामह ने

श्लोक 10 (1.231.10)

मुहूर्तमिव संचिन्त्य कर्तव्यस्य च निश्चयम् । तयोर्वधं समुद्दिश्य विश्वकर्माणमाह्वयत् ॥

muhūrtamiva saṃcintya kartavyasya ca niścayam | tayorvadhaṃ samuddiśya viśvakarmāṇamāhvayat

क्षण-भर सोचकर कर्तव्य का निश्चय किया और उन दोनों के वध का उद्देश्य मन में रखकर विश्वकर्मा को बुलाया।

श्लोक 11 (1.231.11)

दृष्ट्वा च विश्वकर्माणं व्यादिदेश पितामहः । सृज्यतां प्रार्थनीयैका प्रमदेति महातपाः ॥

dṛṣṭvā ca viśvakarmāṇaṃ vyādideśa pitāmahaḥ | sṛjyatāṃ prārthanīyaikā pramadeti mahātapāḥ

विश्वकर्मा को देखकर महातपस्वी पितामह ने आज्ञा दी — "एक ऐसी स्त्री रची जाए जिसे सब पाना चाहें।"

श्लोक 12 (1.231.12)

पितामहं नमस्कृत्य तद्वाक्यमभिनन्द्य च । निर्ममे योषितं दिव्यां चिन्तयित्वा पुनःपुनः ॥

pitāmahaṃ namaskṛtya tadvākyamabhinandya ca | nirmame yoṣitaṃ divyāṃ cintayitvā punaḥpunaḥ

विश्वकर्मा ने पितामह को प्रणाम किया, उनकी आज्ञा का अभिनन्दन किया और बार-बार विचार करके एक दिव्य स्त्री का निर्माण किया।

श्लोक 13 (1.231.13)

त्रिषु लोकेषु यत्किंचिद्भूतं स्थावरजङ्गमम् । समानयद्दर्शनीयं तत्तदत्र स विश्ववित् ॥

triṣu lokeṣu yatkiṃcidbhūtaṃ sthāvarajaṅgamam | samānayaddarśanīyaṃ tattadatra sa viśvavit

तीनों लोकों में चर-अचर प्राणियों में जो कुछ भी दर्शनीय था, उस सर्वज्ञ शिल्पी ने वह सब वहाँ ला जुटाया।

श्लोक 14 (1.231.14)

कोटिशश्चैव रत्नानि तस्या गात्रे न्यवेशत् । तां रत्नसङ्घातमयीमसृजद्देवरूपिणीम् ॥

koṭiśaścaiva ratnāni tasyā gātre nyaveśat | tāṃ ratnasaṅghātamayīmasṛjaddevarūpiṇīm

उसने उसके अंगों में करोड़ों रत्न जड़ दिए और इस प्रकार रत्नों के समूह से बनी, देवी-रूपिणी उस स्त्री को रचा।

श्लोक 15 (1.231.15)

सा प्रयत्नेन महता निर्मिता विश्वकर्मणा । त्रिषु लोकेषु नारीणां रूपेणाप्रतिमाभवत् ॥

sā prayatnena mahatā nirmitā viśvakarmaṇā | triṣu lokeṣu nārīṇāṃ rūpeṇāpratimābhavat

विश्वकर्मा ने बड़े यत्न से उसे बनाया था, इसलिए तीनों लोकों की स्त्रियों में रूप में उसकी कोई बराबरी न रही।

श्लोक 16 (1.231.16)

न तस्याः सूक्ष्ममप्यस्ति यद्गात्रे रूपसंपदा । नियुक्ता यत्र वा दृष्टिर्न सज्जति निरीक्षताम् ॥

na tasyāḥ sūkṣmamapyasti yadgātre rūpasaṃpadā | niyuktā yatra vā dṛṣṭirna sajjati nirīkṣatām

उसके शरीर में सूक्ष्म-सा भी ऐसा अंग न था जो रूप-सम्पदा से रहित हो, और न कोई ऐसा अंग था जहाँ देखने वालों की दृष्टि पड़कर अटक न जाती हो।

श्लोक 17 (1.231.17)

सा विग्रहवतीव श्रीः कामरूपा वपुष्मती । पितामहमुपातिष्ठत्किं करोमीति चाब्रवीत् ॥

sā vigrahavatīva śrīḥ kāmarūpā vapuṣmatī | pitāmahamupātiṣṭhatkiṃ karomīti cābravīt

मानो साक्षात् देहधारिणी लक्ष्मी हो — इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, सुन्दर देह वाली — वह पितामह के सामने उपस्थित हुई और बोली, "मैं क्या करूँ?"

श्लोक 18 (1.231.18)

प्रीतो भूत्वा स दृष्ट्वैव प्रीत्या चास्यै वरं ददौ । कान्तत्वं सर्वभूतानां साश्रियानुत्तमं वपुः ॥

prīto bhūtvā sa dṛṣṭvaiva prītyā cāsyai varaṃ dadau | kāntatvaṃ sarvabhūtānāṃ sāśriyānuttamaṃ vapuḥ

उसे देखते ही प्रसन्न होकर पितामह ने प्रेमपूर्वक उसे वर दिया — कि वह सब प्राणियों को प्रिय लगेगी और उसका शरीर अनुपम शोभा से युक्त होगा।

श्लोक 19 (1.231.19)

सा तेन वरदानेन कर्तुश्च क्रियया तदा । जहार सर्वभूतानां चक्षूंषि च मनांसि च ॥

sā tena varadānena kartuśca kriyayā tadā | jahāra sarvabhūtānāṃ cakṣūṃṣi ca manāṃsi ca

उस वरदान से और अपने रचयिता की कारीगरी से वह तब सब प्राणियों के नेत्र और मन हर लेती थी।

श्लोक 20 (1.231.20)

तिलंतिलं समानीय रत्नानां यद्विनिर्मिता । तिलोत्तमेति तत्तस्या नाम चक्रे पितामहः ॥

tilaṃtilaṃ samānīya ratnānāṃ yadvinirmitā | tilottameti tattasyā nāma cakre pitāmahaḥ

क्योंकि वह रत्नों को तिल-तिल करके जोड़कर बनाई गई थी, इसलिए पितामह ने उसका नाम "तिलोत्तमा" रखा।

श्लोक 21 (1.231.21)

ब्रह्माणं सा नमस्कृत्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् । किं कार्यं मयि भूतेश येनास्म्यद्येह निर्मिता ॥

brahmāṇaṃ sā namaskṛtya prāñjalirvākyamabravīt | kiṃ kāryaṃ mayi bhūteśa yenāsmyadyeha nirmitā

उसने ब्रह्मा को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा — "हे भूतेश, मुझसे कौन-सा कार्य लेना है, जिसके लिए आज मुझे यहाँ रचा गया है?"

पितामह उवाच

श्लोक 22 (1.231.22)

गच्छ सुन्दोपसुन्दाभ्यामसुराभ्यां तिलोत्तमे । प्रार्थनीयेन रूपेण कुरु भद्रे प्रलोभनम् ॥

gaccha sundopasundābhyāmasurābhyāṃ tilottame | prārthanīyena rūpeṇa kuru bhadre pralobhanam

हे तिलोत्तमे, तुम असुर सुन्द और उपसुन्द के पास जाओ और हे भद्रे, अपने मनमोहक रूप से उन्हें लुभाओ।

श्लोक 23 (1.231.23)

त्वत्कृते दर्शनादेव रूपसंपत्कृतेन वै । विरोधः स्याद्यथा ताभ्यामन्योन्येन तथा कुरु ॥

tvatkṛte darśanādeva rūpasaṃpatkṛtena vai | virodhaḥ syādyathā tābhyāmanyonyena tathā kuru

ऐसा करो कि केवल तुम्हें देखने से ही, तुम्हारी रूप-सम्पदा के कारण, तुम्हारे लिए उन दोनों में आपस में वैर ठन जाए।

नारद उवाच

श्लोक 24 (1.231.24)

सा तथेति प्रतिज्ञाय नमस्कृत्य पितामहम् । चकार मण्डलं तत्र विबुधानां प्रदक्षिणम् ॥

sā tatheti pratijñāya namaskṛtya pitāmaham | cakāra maṇḍalaṃ tatra vibudhānāṃ pradakṣiṇam

"ऐसा ही होगा" कहकर उसने प्रतिज्ञा की, पितामह को प्रणाम किया और वहाँ देवताओं की मण्डली की परिक्रमा करने लगी।

श्लोक 25 (1.231.25)

प्राङ्मुखो भगवानास्ते दक्षिणेन महेश्वरः । देवाश्चैवोत्तरेणासन्सर्वतस्त्वृषयोऽभवन् ॥

prāṅmukho bhagavānāste dakṣiṇena maheśvaraḥ | devāścaivottareṇāsansarvatastvṛṣayo'bhavan

भगवान् ब्रह्मा पूर्व की ओर मुख करके बैठे थे, दक्षिण में महेश्वर थे, उत्तर में देवता थे और चारों ओर ऋषि थे।

श्लोक 26 (1.231.26)

कुर्वन्त्यां तु तदा तत्र मण्डलं तत्प्रदक्षिणम् । इन्द्रः स्थाणुश्च भगवान्धैर्येण तु परिच्युतौ ॥

kurvantyāṃ tu tadā tatra maṇḍalaṃ tatpradakṣiṇam | indraḥ sthāṇuśca bhagavāndhairyeṇa tu paricyutau

जब वह वहाँ उस मण्डली की परिक्रमा कर रही थी, तब इन्द्र और भगवान् स्थाणु (शिव) — दोनों का धैर्य डिग गया।

श्लोक 27 (1.231.27)

द्रष्टुकामस्य चात्यर्थं गतायां पार्श्वतस्तथा । अन्यदञ्चितपद्माक्षं दक्षिणं निःसृतं मुखम् ॥

draṣṭukāmasya cātyarthaṃ gatāyāṃ pārśvatastathā | anyadañcitapadmākṣaṃ dakṣiṇaṃ niḥsṛtaṃ mukham

जब वह उनके पार्श्व की ओर गई, तब उसे देखने को अत्यन्त उत्सुक स्थाणु का एक और मुख, सुन्दर कमल-से नेत्रों वाला, दक्षिण दिशा में प्रकट हो गया।

श्लोक 28 (1.231.28)

पृष्ठतः परिवर्तन्त्यां पश्चिमं निःसृतं मुखम् । गतायां चोत्तरं पार्श्वमुत्तरं निःसृतं मुखम् ॥

pṛṣṭhataḥ parivartantyāṃ paścimaṃ niḥsṛtaṃ mukham | gatāyāṃ cottaraṃ pārśvamuttaraṃ niḥsṛtaṃ mukham

जब वह पीछे की ओर घूमी तो पश्चिम की ओर एक मुख निकल आया, और जब वह उत्तर पार्श्व की ओर गई तो उत्तर की ओर एक मुख निकल आया।

श्लोक 29 (1.231.29)

महेन्द्रस्यापि नेत्राणां पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः । रक्तान्तानां विशालानां सहस्रं सर्वतोऽभवत् ॥

mahendrasyāpi netrāṇāṃ pṛṣṭhataḥ pārśvato'grataḥ | raktāntānāṃ viśālānāṃ sahasraṃ sarvato'bhavat

महेन्द्र के भी पीछे, बगल में और आगे — सब ओर लाल कोरों वाले हज़ार विशाल नेत्र हो गए।

श्लोक 30 (1.231.30)

एवं चतुर्मुखः स्थाणुर्महादेवोऽभवत्पुरा । तथा सहस्रनेत्रश्च बभूव बलसूदनः ॥

evaṃ caturmukhaḥ sthāṇurmahādevo'bhavatpurā | tathā sahasranetraśca babhūva balasūdanaḥ

इस प्रकार प्राचीन काल में महादेव स्थाणु चतुर्मुख हुए और बल का संहार करने वाले इन्द्र सहस्रनेत्र बन गए।

श्लोक 31 (1.231.31)

तथा देवनिकायानां महर्षीणां च सर्वशः । मुखानि चाभ्यवर्तन्त येन याति तिलोत्तमा ॥

tathā devanikāyānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ | mukhāni cābhyavartanta yena yāti tilottamā

इसी प्रकार देवगणों और महर्षियों के मुख भी सब ओर उधर-उधर घूम जाते थे, जिधर तिलोत्तमा जाती थी।

श्लोक 32 (1.231.32)

तस्या गात्रे निपतिता दृष्टिस्तेषां महात्मनाम् । सर्वेषामेव भूयिष्ठमृते देवं पितामहम् ॥

tasyā gātre nipatitā dṛṣṭisteṣāṃ mahātmanām | sarveṣāmeva bhūyiṣṭhamṛte devaṃ pitāmaham

उन सब महात्माओं की दृष्टि उसके शरीर पर पड़ती और प्रायः वहीं टिकी रहती — केवल भगवान् पितामह को छोड़कर।

श्लोक 33 (1.231.33)

गच्छन्त्यां तु तया सर्वे देवाश्च परमर्षयः । कृतमित्येव तत्कार्यं मेनिरे रूपसंपदा ॥

gacchantyāṃ tu tayā sarve devāśca paramarṣayaḥ | kṛtamityeva tatkāryaṃ menire rūpasaṃpadā

जब वह चली तो सब देवताओं और परमर्षियों ने उसकी रूप-सम्पदा देखकर मान लिया कि वह कार्य अब हो ही गया।

श्लोक 34 (1.231.34)

तिलोत्तमायां तस्यां तु गतायां लोकभावनः । कृतं कार्यमिति श्रीमानब्रवीच्च पितामहः । सर्वान्विसर्जयामास देवानृषिगणांश्च तान् ॥

tilottamāyāṃ tasyāṃ tu gatāyāṃ lokabhāvanaḥ | kṛtaṃ kāryamiti śrīmānabravīcca pitāmahaḥ | sarvānvisarjayāmāsa devānṛṣigaṇāṃśca tān

तिलोत्तमा के चले जाने पर लोकों के रचयिता श्रीमान् पितामह ने कहा — "कार्य सम्पन्न हो गया", और सब देवताओं तथा ऋषिगणों को विदा कर दिया।

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