आदि पर्व · अध्याय 232
सुन्द-उपसुन्द का अन्त और पाण्डवों का नियम
नारद अपनी कथा पूरी करते हैं: तीनों लोकों के स्वामी बने दोनों असुर भाई विन्ध्य पर्वत पर भोग-विलास कर रहे होते हैं, तभी तिलोत्तमा फूल चुनती हुई वहाँ आती है। दोनों उसका एक-एक हाथ पकड़कर उस पर अपना दावा करते हैं और नशे में भरे क्रोध में गदाओं से एक-दूसरे को मार डालते हैं; ब्रह्मा तिलोत्तमा को वर देते हैं। नारद पाण्डवों को समझाते हैं कि द्रौपदी के कारण उनमें फूट न पड़े, और उनके सामने पाण्डव यह नियम बनाते हैं कि जो भाई द्रौपदी के साथ बैठे दूसरे भाई के पास जा पहुँचे, वह बारह महीने ब्रह्मचारी होकर वन में रहे।
नारद उवाच
श्लोक 1 (1.232.1)
जित्वा तु पृथिवीं दैत्यौ निःसपत्नौ गतव्यथौ । कृत्वा त्रैलोक्यमव्यग्रं कृतकृत्यौ बभूवतुः ॥
jitvā tu pṛthivīṃ daityau niḥsapatnau gatavyathau | kṛtvā trailokyamavyagraṃ kṛtakṛtyau babhūvatuḥ
पृथ्वी को जीतकर वे दोनों दैत्य शत्रुहीन और निश्चिन्त हो गए; तीनों लोकों को शान्त करके वे कृतकृत्य हो गए।
श्लोक 2 (1.232.2)
देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम् । आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टिमुपागतौ ॥
devagandharvayakṣāṇāṃ nāgapārthivarakṣasām | ādāya sarvaratnāni parāṃ tuṣṭimupāgatau
देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, नागों, राजाओं और राक्षसों के सारे रत्न लेकर वे परम सन्तुष्ट हो गए।
श्लोक 3 (1.232.3)
यदा न प्रतिषेद्धारस्तयोः सन्तीह केचन । निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजह्रातेऽमराविव ॥
yadā na pratiṣeddhārastayoḥ santīha kecana | nirudyogau tadā bhūtvā vijahrāte'marāviva
जब संसार में उन्हें रोकने वाला कोई न रहा, तब वे उद्यम छोड़कर देवताओं की भाँति विहार करने लगे।
श्लोक 4 (1.232.4)
स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्ष्यभोज्यैः सुपुष्कलैः । पानैश्च विविधैर्हृद्यैः परां प्रीतिमवापतुः ॥
strībhirmālyaiśca gandhaiśca bhakṣyabhojyaiḥ supuṣkalaiḥ | pānaiśca vividhairhṛdyaiḥ parāṃ prītimavāpatuḥ
स्त्रियों, मालाओं, सुगन्धों, भरपूर भक्ष्य-भोज्य पदार्थों और भाँति-भाँति के मनभावन पेयों से वे परम आनन्द पाते रहे।
श्लोक 5 (1.232.5)
अन्तःपुरवनोद्याने पर्वतेषु वनेषु च । यथेप्सितेषु देशेषु विजह्रातेऽमराविव ॥
antaḥpuravanodyāne parvateṣu vaneṣu ca | yathepsiteṣu deśeṣu vijahrāte'marāviva
अन्तःपुर के वनों और उद्यानों में, पर्वतों पर और वनों में — जहाँ भी मन चाहा, वहाँ वे देवताओं की भाँति विहार करते रहे।
श्लोक 6 (1.232.6)
ततः कदाचिद्विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले । पुष्पिताग्रेषु सालेषु विहारमभिजग्मतुः ॥
tataḥ kadācidvindhyasya prasthe samaśilātale | puṣpitāgreṣu sāleṣu vihāramabhijagmatuḥ
फिर एक बार वे विन्ध्य पर्वत के एक पठार पर, समतल शिला वाले स्थान पर, फूलों से लदे शिखरों वाले साल-वृक्षों के बीच विहार करने गए।
श्लोक 7 (1.232.7)
दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ । वरासनेषु संहृष्टौ सह स्त्रीभिर्निषीदतुः ॥
divyeṣu sarvakāmeṣu samānīteṣu tāvubhau | varāsaneṣu saṃhṛṣṭau saha strībhirniṣīdatuḥ
सब दिव्य भोग-सामग्री ला दी जाने पर वे दोनों प्रसन्न होकर स्त्रियों के साथ उत्तम आसनों पर बैठ गए।
श्लोक 8 (1.232.8)
ततो वादित्रनृत्ताभ्यामुपातिष्ठन्त तौ स्त्रियः । गीतैश्च स्तुतिसंयुक्तैः प्रीत्या समुपजग्मिरे ॥
tato vāditranṛttābhyāmupātiṣṭhanta tau striyaḥ | gītaiśca stutisaṃyuktaiḥ prītyā samupajagmire
तब स्त्रियाँ बाजों और नृत्य से उनकी सेवा करने लगीं और स्तुति-भरे गीत गाती हुई प्रेम से उनके पास आईं।
श्लोक 9 (1.232.9)
ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती । वेषं सा क्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा ॥
tatastilottamā tatra vane puṣpāṇi cinvatī | veṣaṃ sā kṣiptamādhāya raktenaikena vāsasā
तभी तिलोत्तमा उस वन में फूल चुनती हुई, एक ही लाल वस्त्र को ढीले-ढाले ढंग से ओढ़े,
श्लोक 10 (1.232.10)
नदीतीरेषु जातान्सा कर्णिकारान्प्रचिन्वती । शनैर्जगाम तं देशं यत्रास्तां तौ महासुरौ ॥
nadītīreṣu jātānsā karṇikārānpracinvatī | śanairjagāma taṃ deśaṃ yatrāstāṃ tau mahāsurau
नदी-तटों पर खिले कर्णिकार के फूल चुनती हुई धीरे-धीरे उस स्थान पर आ पहुँची जहाँ वे दोनों महासुर बैठे थे।
श्लोक 11 (1.232.11)
तौ तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ । दृष्ट्वैव तां वरारोहां व्यथितौ संबभूवतुः ॥
tau tu pītvā varaṃ pānaṃ madaraktāntalocanau | dṛṣṭvaiva tāṃ varārohāṃ vyathitau saṃbabhūvatuḥ
उत्तम मदिरा पीकर उनकी आँखों के कोने नशे से लाल हो रहे थे; उस सुन्दरी को देखते ही वे दोनों व्याकुल हो उठे।
श्लोक 12 (1.232.12)
तावुत्थायासनं हित्वा जग्मतुर्यत्र सा स्थिता । उभौ च कामसंमत्तावुभौ प्रार्थयतश्च ताम् ॥
tāvutthāyāsanaṃ hitvā jagmaturyatra sā sthitā | ubhau ca kāmasaṃmattāvubhau prārthayataśca tām
वे आसन छोड़कर उठे और वहाँ गए जहाँ वह खड़ी थी; दोनों काम से उन्मत्त थे और दोनों उससे प्रणय-याचना करने लगे।
श्लोक 13 (1.232.13)
दक्षिणे तां करे सुभ्रूं सुन्दो जग्राह पाणिना । उपसुन्दोऽपि जग्राह वामे पाणौ तिलोत्तमाम् ॥
dakṣiṇe tāṃ kare subhrūṃ sundo jagrāha pāṇinā | upasundo'pi jagrāha vāme pāṇau tilottamām
सुन्द ने उस सुन्दर भौंहों वाली को दाहिने हाथ से पकड़ लिया और उपसुन्द ने भी तिलोत्तमा का बायाँ हाथ पकड़ लिया।
श्लोक 14 (1.232.14)
वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च । धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च ॥
varapradānamattau tāvaurasena balena ca | dhanaratnamadābhyāṃ ca surāpānamadena ca
मिले हुए वरदान के मद में, अपने स्वाभाविक बल के मद में, धन और रत्नों के मद में और मदिरा-पान के नशे में —
श्लोक 15 (1.232.15)
सर्वैरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ । मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः ॥
sarvairetairmadairmattāvanyonyaṃ bhrukuṭīkṛtau | madakāmasamāviṣṭau parasparamathocatuḥ
इन सब मदों से उन्मत्त होकर दोनों ने एक-दूसरे पर भौंहें तान लीं, और नशे तथा काम के आवेश में एक-दूसरे से बोले।
श्लोक 16 (1.232.16)
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत । मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत ॥
mama bhāryā tava gururiti sundo'bhyabhāṣata | mama bhāryā tava vadhūrupasundo'bhyabhāṣata
सुन्द ने कहा — "यह मेरी पत्नी है, अतः तुम्हारे लिए पूज्य है।" उपसुन्द ने कहा — "यह मेरी पत्नी है, अतः तुम्हारी बहू है।"
श्लोक 17 (1.232.17)
नैषा तव ममैषेति ततस्तौ मन्युराविशत् । तस्या रूपेण संमत्तौ विगतस्नेहसौहृदौ ॥
naiṣā tava mamaiṣeti tatastau manyurāviśat | tasyā rūpeṇa saṃmattau vigatasnehasauhṛdau
"यह तुम्हारी नहीं, मेरी है" — इस पर दोनों में क्रोध भर गया। उसके रूप से उन्मत्त होकर उनका स्नेह और सौहार्द जाता रहा।
श्लोक 18 (1.232.18)
तस्या हेतोर्गदे भीमे संगृह्णीतामुभौ तदा । प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तौ काममोहितौ ॥
tasyā hetorgade bhīme saṃgṛhṇītāmubhau tadā | pragṛhya ca gade bhīme tasyāṃ tau kāmamohitau
उसके कारण तब दोनों ने भयंकर गदाएँ उठा लीं; उसकी कामना से मोहित होकर, उन भीषण गदाओं को थामकर
श्लोक 19 (1.232.19)
अहंपूर्वमहंपूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः । तौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्धरणीतले ॥
ahaṃpūrvamahaṃpūrvamityanyonyaṃ nijaghnatuḥ | tau gadābhihatau bhīmau petaturdharaṇītale
"पहले मैं, पहले मैं" कहते हुए उन्होंने एक-दूसरे पर प्रहार किया। गदाओं की चोट खाकर वे दोनों भयानक असुर धरती पर गिर पड़े,
श्लोक 20 (1.232.20)
रुधिरेणावसिक्ताङ्गौ द्वाविवार्कौ नभश्च्युतौ । ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा ॥
rudhireṇāvasiktāṅgau dvāvivārkau nabhaścyutau | tatastā vidrutā nāryaḥ sa ca daityagaṇastathā
उनके अंग रक्त से लथपथ थे — मानो आकाश से दो सूर्य गिर पड़े हों। तब वे स्त्रियाँ भाग खड़ी हुईं और दैत्यों का दल भी;
श्लोक 21 (1.232.21)
पातालमगमत्सर्वो विषादभयकम्पितः । ततः पितामहस्तत्र सहदेवैर्महर्षिभिः ॥
pātālamagamatsarvo viṣādabhayakampitaḥ | tataḥ pitāmahastatra sahadevairmaharṣibhiḥ
विषाद और भय से काँपते हुए वे सब पाताल चले गए। तब पितामह देवताओं और महर्षियों के साथ
श्लोक 22 (1.232.22)
आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम् । वरेण च्छन्दयामास भगवान्प्रपितामहः ॥
ājagāma viśuddhātmā pūjayaṃśca tilottamām | vareṇa cchandayāmāsa bhagavānprapitāmahaḥ
वहाँ आए; उन शुद्धात्मा ने तिलोत्तमा का सम्मान किया, और भगवान् प्रपितामह ने उससे वर माँगने को कहा।
श्लोक 23 (1.232.23)
वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः । आदित्यचरिताँल्लोकान्विचरिष्यसि भामिनि ॥
varaṃ ditsuḥ sa tatraināṃ prītaḥ prāha pitāmahaḥ | ādityacaritām̐llokānvicariṣyasi bhāmini
उसे वर देने की इच्छा से प्रसन्न पितामह ने वहाँ उससे कहा — "हे भामिनि, तुम सूर्य के विचरण वाले लोकों में विचरोगी,
श्लोक 24 (1.232.24)
तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन । एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वलोकपितामहः ॥
tejasā ca sudṛṣṭāṃ tvāṃ na kariṣyati kaścana | evaṃ tasyai varaṃ dattvā sarvalokapitāmahaḥ
और तुम्हारे तेज के कारण कोई तुम्हें भली-भाँति देख नहीं सकेगा।" उसे ऐसा वर देकर सब लोकों के पितामह
श्लोक 25 (1.232.25)
इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ ॥
indre trailokyamādhāya brahmalokaṃ gataḥ prabhuḥ | evaṃ tau sahitau bhūtvā sarvārtheṣvekaniścayau
प्रभु ने तीनों लोकों का भार इन्द्र को सौंपा और ब्रह्मलोक चले गए। इस प्रकार वे दोनों, जो सदा साथ रहते थे और हर बात में एकमत थे,
श्लोक 26 (1.232.26)
तिलोत्तमार्थं संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः । तस्माद्ब्रवीमि वः स्नेहात्सर्वान्भरतसत्तमाः ॥
tilottamārthaṃ saṃkruddhāvanyonyamabhijaghnatuḥ | tasmādbravīmi vaḥ snehātsarvānbharatasattamāḥ
तिलोत्तमा के लिए क्रुद्ध होकर एक-दूसरे को मार बैठे। इसलिए हे भरतश्रेष्ठो, मैं स्नेहवश तुम सबसे कहता हूँ —
श्लोक 27 (1.232.27)
यथा वो नात्र भेदः स्यात्सर्वेषां द्रौपदीकृते । तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत्प्रियमिच्छथ ॥
yathā vo nātra bhedaḥ syātsarveṣāṃ draupadīkṛte | tathā kuruta bhadraṃ vo mama cetpriyamicchatha
ऐसा उपाय करो कि द्रौपदी के कारण तुम सबमें यहाँ फूट न पड़े। तुम्हारा कल्याण हो — यदि मेरा प्रिय करना चाहते हो तो ऐसा ही करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (1.232.28)
एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा । समयं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्यवशमागताः । समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः ॥
evamuktā mahātmāno nāradena maharṣiṇā | samayaṃ cakrire rājaṃste'nyonyavaśamāgatāḥ | samakṣaṃ tasya devarṣernāradasyāmitaujasaḥ
महर्षि नारद के ऐसा कहने पर, हे राजन्, उन महात्मा पाण्डवों ने आपस में एकमत होकर, अमित तेजस्वी देवर्षि नारद के सामने ही एक नियम बनाया —
श्लोक 29 (1.232.29)
एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद्वर्षमकल्मषा । द्रौपद्या नः सहासीनानन्योन्यं योऽभिदर्शयेत् । स नो द्वादश मासानि ब्रह्मचारी वने वसेत् ॥
ekaikasya gṛhe kṛṣṇā vasedvarṣamakalmaṣā | draupadyā naḥ sahāsīnānanyonyaṃ yo'bhidarśayet | sa no dvādaśa māsāni brahmacārī vane vaset
"निष्पाप कृष्णा बारी-बारी से एक-एक वर्ष हममें से प्रत्येक के घर रहेगी; और हममें से जो कोई द्रौपदी के साथ बैठे किसी दूसरे भाई को देख लेगा, वह बारह मास तक ब्रह्मचारी रहकर वन में वास करेगा।"
श्लोक 30 (1.232.30)
कृते तु समये तस्मिन्पाण्डवैर्धर्मचारिभिः । नारदोऽप्यगमत्प्रीत इष्टं देशं महामुनिः ॥
kṛte tu samaye tasminpāṇḍavairdharmacāribhiḥ | nārado'pyagamatprīta iṣṭaṃ deśaṃ mahāmuniḥ
धर्म पर चलने वाले पाण्डवों के यह नियम बना लेने पर महामुनि नारद भी प्रसन्न होकर अपने अभीष्ट स्थान को चले गए।
श्लोक 31 (1.232.31)
एवं तैः समयः पूर्वं कृतो नारदचोदितैः । न चाभिद्यन्त ते सर्वे तदान्योन्येन भारत ॥
evaṃ taiḥ samayaḥ pūrvaṃ kṛto nāradacoditaiḥ | na cābhidyanta te sarve tadānyonyena bhārata
इस प्रकार नारद की प्रेरणा से उन्होंने पहले यह नियम बनाया था, और हे भारत, उनमें आपस में कभी फूट नहीं पड़ी।
श्लोक 32 (1.232.32)
अभ्यनन्दन्त ते सर्वे तदान्योन्यं च पाण्डवाः । एतद्विस्तरशः सर्वमाख्यातं ते नराधिप ॥
abhyanandanta te sarve tadānyonyaṃ ca pāṇḍavāḥ | etadvistaraśaḥ sarvamākhyātaṃ te narādhipa
तब सब पाण्डव आपस में प्रसन्न रहे। हे नराधिप, यह सब मैंने तुम्हें विस्तार से कह सुनाया।
श्लोक 33 (1.232.33)
काले च तस्मिन्संपन्ने यथावज्जनमेजय ॥
kāle ca tasminsaṃpanne yathāvajjanamejaya
और हे जनमेजय, यथासमय जब वह काल आया —