आदि पर्व · अध्याय 233
अर्जुन का नियम-भंग और वनवास
पाण्डव धर्मपूर्वक राज्य करते हैं और कुरुवंशी फलते-फूलते हैं। जब चोर एक ब्राह्मण की गौएँ हर ले जाते हैं और वह खाण्डवप्रस्थ में सहायता की पुकार करता है, तब अर्जुन पाते हैं कि अस्त्र-शस्त्र वहीं रखे हैं जहाँ युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ बैठे हैं। ब्राह्मण के संकट और नियम के बीच तौलकर वे भीतर जाते हैं, धनुष लेते हैं और गौएँ लौटा लाते हैं। फिर वे बारह महीने के वनवास पर अड़ जाते हैं; युधिष्ठिर के क्षमा कर देने पर भी अर्जुन सत्य पर अटल रहकर वन को चल देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.233.1)
एवं ते समयं कृत्वा न्यवसंस्तत्र पाण्डवाः । वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान्महीक्षितः ॥
evaṃ te samayaṃ kṛtvā nyavasaṃstatra pāṇḍavāḥ | vaśe śastrapratāpena kurvanto'nyānmahīkṣitaḥ
यह नियम बनाकर पाण्डव वहाँ रहने लगे और अपने शस्त्र-बल से दूसरे राजाओं को अपने वश में करते रहे।
श्लोक 2 (1.233.2)
तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् । बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी ॥
teṣāṃ manujasiṃhānāṃ pañcānāmamitaujasām | babhūva kṛṣṇā sarveṣāṃ pārthānāṃ vaśavartinī
अमित तेजस्वी उन पाँचों नरसिंह पृथापुत्रों के प्रति कृष्णा (द्रौपदी) सदा अनुरक्त और अनुकूल रही।
श्लोक 3 (1.233.3)
ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः । बभूव परमप्रीता नागैरिव सरस्वती ॥
te tayā taiśca sā vīraiḥ patibhiḥ saha pañcabhiḥ | babhūva paramaprītā nāgairiva sarasvatī
वे उससे और वह अपने पाँचों वीर पतियों से परम प्रसन्न रहती थी, जैसे सरस्वती नदी अपने जल में क्रीड़ा करते गजों से प्रसन्न होती है।
श्लोक 4 (1.233.4)
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु । व्यवर्धन्कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ॥
vartamāneṣu dharmeṇa pāṇḍaveṣu mahātmasu | vyavardhankuravaḥ sarve hīnadoṣāḥ sukhānvitāḥ
महात्मा पाण्डवों के धर्मपूर्वक आचरण करते रहने से सब कुरुवंशी दोषरहित और सुखी होकर फलते-फूलते रहे।
श्लोक 5 (1.233.5)
अथ दीर्घेण कालेन ब्राह्मणस्य विशांपते । कस्यचित्तस्करा जह्रुः केचिद्गा नृपसत्तम ॥
atha dīrgheṇa kālena brāhmaṇasya viśāṃpate | kasyacittaskarā jahruḥ kecidgā nṛpasattama
फिर बहुत समय बीतने पर, हे प्रजानाथ, कुछ चोर किसी ब्राह्मण की गौएँ हर ले गए, हे नृपश्रेष्ठ।
श्लोक 6 (1.233.6)
ह्रियमाणे धने तस्मिन्ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः । आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत्स पाण्डवान् ॥
hriyamāṇe dhane tasminbrāhmaṇaḥ krodhamūrcchitaḥ | āgamya khāṇḍavaprasthamudakrośatsa pāṇḍavān
अपना धन छिनता देखकर क्रोध से बेसुध हुआ वह ब्राह्मण खाण्डवप्रस्थ आया और पाण्डवों को पुकार-पुकारकर कहने लगा —
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 7 (1.233.7)
ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः । प्रसह्य चास्मद्विषयादभ्यधावत पाण्डवाः ॥
hriyate godhanaṃ kṣudrairnṛśaṃsairakṛtātmabhiḥ | prasahya cāsmadviṣayādabhyadhāvata pāṇḍavāḥ
नीच, क्रूर और दुष्ट लोग बलपूर्वक हमारे देश से मेरा गोधन हरे लिए जा रहे हैं! हे पाण्डवो, दौड़ो!
श्लोक 8 (1.233.8)
ब्राह्मणस्य प्रशान्तस्य हविर्ध्वाङ्क्षैः प्रलुप्यते । शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्दति ॥
brāhmaṇasya praśāntasya havirdhvāṅkṣaiḥ pralupyate | śārdūlasya guhāṃ śūnyāṃ nīcaḥ kroṣṭābhimardati
एक शान्त ब्राह्मण की हवि कौए लूटे ले जा रहे हैं; बाघ की सूनी गुफा को एक नीच सियार रौंद रहा है।
श्लोक 9 (1.233.9)
अरक्षितारं राजानं बलिषद्भागहारिणम् । तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रं पापचारिणम् ॥
arakṣitāraṃ rājānaṃ baliṣadbhāgahāriṇam | tamāhuḥ sarvalokasya samagraṃ pāpacāriṇam
जो राजा प्रजा से कर के रूप में छठा भाग लेता है पर उसकी रक्षा नहीं करता, उसे सारे संसार का पापी कहा जाता है।
श्लोक 10 (1.233.10)
ब्राह्मणस्वे हृते चोरैर्धर्मार्थे च विलोपिते । रोरूयमाणे च मयि क्रियतां हस्तधारणा ॥
brāhmaṇasve hṛte corairdharmārthe ca vilopite | rorūyamāṇe ca mayi kriyatāṃ hastadhāraṇā
चोरों ने एक ब्राह्मण का धन हर लिया है, धर्म और अर्थ नष्ट हो रहे हैं, मैं फूट-फूटकर रो रहा हूँ — मेरा हाथ थामो, मेरी सहायता करो!
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (1.233.11)
रोरूयमाणस्याभ्याशे भृशं विप्रस्य पाण्डवः । तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ॥
rorūyamāṇasyābhyāśe bhṛśaṃ viprasya pāṇḍavaḥ | tāni vākyāni śuśrāva kuntīputro dhanañjayaḥ
पास ही फूट-फूटकर रोते उस ब्राह्मण की वे बातें कुन्तीपुत्र पाण्डव धनंजय ने सुनीं।
श्लोक 12 (1.233.12)
श्रुत्वैव च महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् । आयुधानि च यत्रासन्पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
śrutvaiva ca mahābāhurmā bhairityāha taṃ dvijam | āyudhāni ca yatrāsanpāṇḍavānāṃ mahātmanām
सुनते ही महाबाहु अर्जुन ने उस ब्राह्मण से कहा — "डरो मत।" पर जहाँ महात्मा पाण्डवों के आयुध रखे थे,
श्लोक 13 (1.233.13)
कृष्णया सह तत्रास्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः । संप्रवेशाय चाशक्तो गमनाय च पाण्डवः ॥
kṛṣṇayā saha tatrāste dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | saṃpraveśāya cāśakto gamanāya ca pāṇḍavaḥ
वहाँ धर्मराज युधिष्ठिर कृष्णा के साथ बैठे थे; इसलिए पाण्डुनन्दन न भीतर जा सकते थे, न लौट सकते थे।
श्लोक 14 (1.233.14)
तस्य चार्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनःपुनः । आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥
tasya cārtasya tairvākyaiścodyamānaḥ punaḥpunaḥ | ākrande tatra kaunteyaścintayāmāsa duḥkhitaḥ
उस पीड़ित ब्राह्मण के वचनों से बार-बार प्रेरित होकर, उस करुण पुकार के बीच कुन्तीनन्दन दुखी मन से सोचने लगे।
श्लोक 15 (1.233.15)
ह्रियमाणे धने तस्मिन्ब्राह्मणस्य तपस्विनः । अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः ॥
hriyamāṇe dhane tasminbrāhmaṇasya tapasvinaḥ | aśrupramārjanaṃ tasya kartavyamiti niścayaḥ
उस तपस्वी ब्राह्मण का धन हरा जा रहा था; अर्जुन ने निश्चय किया कि उसके आँसू पोंछना उनका कर्तव्य है।
अर्जुन उवाच
श्लोक 16 (1.233.16)
उपप्रेक्षणजोऽधर्मः सुमहान्स्यान्महीपतेः । यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ॥
upaprekṣaṇajo'dharmaḥ sumahānsyānmahīpateḥ | yadyasya rudato dvāri na karomyadya rakṣaṇam
यदि यह हमारे द्वार पर रो रहा है और मैं आज इसकी रक्षा नहीं करता, तो उपेक्षा से उत्पन्न बड़ा अधर्म राजा को लगेगा।
श्लोक 17 (1.233.17)
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे । प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ॥
anāstikyaṃ ca sarveṣāmasmākamapi rakṣaṇe | pratitiṣṭheta loke'sminnadharmaścaiva no bhavet
और इस संसार में सब लोगों के मन में हमारी रक्षा के प्रति अविश्वास जम जाएगा, और अधर्म भी हमें ही लगेगा।
श्लोक 18 (1.233.18)
अनापृच्छ्य तु राजानं गते मयि न संशयः । अजातशत्रोर्नृपतेर्मयि चैवानृतं भवेत् ॥
anāpṛcchya tu rājānaṃ gate mayi na saṃśayaḥ | ajātaśatrornṛpatermayi caivānṛtaṃ bhavet
परन्तु यदि मैं राजा से पूछे बिना चला जाऊँ, तो निःसन्देह अजातशत्रु महाराज के प्रति मुझसे अपराध होगा।
श्लोक 19 (1.233.19)
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम । सर्वमन्यत्परिहृतं धर्षणात्तु महीपतेः ॥
anupraveśe rājñastu vanavāso bhavenmama | sarvamanyatparihṛtaṃ dharṣaṇāttu mahīpateḥ
यदि मैं राजा के पास भीतर जाता हूँ तो मुझे वनवास करना होगा; इससे राजा के अपमान को छोड़कर बाकी सब दोष टल जाते हैं।
श्लोक 20 (1.233.20)
अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम । शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥
adharmo vai mahānastu vane vā maraṇaṃ mama | śarīrasya vināśena dharma eva viśiṣyate
चाहे मुझ पर बड़ा अधर्म लगे या वन में मेरी मृत्यु हो जाए — शरीर के नाश से भी बढ़कर धर्म ही है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (1.233.21)
एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशांपते ॥
evaṃ viniścitya tataḥ kuntīputro dhanañjayaḥ | anupraviśya rājānamāpṛcchya ca viśāṃpate
ऐसा निश्चय करके कुन्तीपुत्र धनंजय ने, हे प्रजानाथ, भीतर जाकर राजा से अनुमति ली,
श्लोक 22 (1.233.22)
मुखमाच्छाद्य निबिडमुत्तरीयेण वाससा । अग्रजं चार्जुनो गेहादभिवाद्याशु निःसृतः ॥
mukhamācchādya nibiḍamuttarīyeṇa vāsasā | agrajaṃ cārjuno gehādabhivādyāśu niḥsṛtaḥ
और अपने उत्तरीय वस्त्र से मुँह अच्छी तरह ढककर, बड़े भाई को प्रणाम करके अर्जुन तुरन्त घर से निकल आए।
श्लोक 23 (1.233.23)
धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत । ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत्परधनैषिणः ॥
dhanurādāya saṃhṛṣṭo brāhmaṇaṃ pratyabhāṣata | brāhmaṇāgamyatāṃ śīghraṃ yāvatparadhanaiṣiṇaḥ
धनुष लेकर उन्होंने हर्षित होकर ब्राह्मण से कहा — "हे ब्राह्मण, जल्दी आओ; जब तक पराया धन हरने वाले
श्लोक 24 (1.233.24)
न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद्गच्छावहे सह । यावन्निवर्तयाम्यद्य चोरहस्ताद्धनं तव ॥
na dūre te gatāḥ kṣudrāstāvadgacchāvahe saha | yāvannivartayāmyadya corahastāddhanaṃ tava
वे नीच दूर नहीं निकल गए हैं, तब तक हम दोनों साथ चलें, ताकि मैं आज चोरों के हाथ से तुम्हारा धन लौटा लाऊँ।"
श्लोक 25 (1.233.25)
सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी । शरैर्विध्वस्य तांश्चोरानवजित्य च तद्धनम् ॥
so'nusṛtya mahābāhurdhanvī varmī rathī dhvajī | śarairvidhvasya tāṃścorānavajitya ca taddhanam
उनका पीछा करके धनुष, कवच, रथ और ध्वजा से सज्जित महाबाहु अर्जुन ने बाणों से उन चोरों को नष्ट कर दिया और वह धन जीत लिया।
श्लोक 26 (1.233.26)
ब्राह्मणं समुपाकृत्य यशः प्राप्य च पाण्डवः । ततस्तद्गोधनं पार्थो दत्त्वा तस्मै द्विजातये ॥
brāhmaṇaṃ samupākṛtya yaśaḥ prāpya ca pāṇḍavaḥ | tatastadgodhanaṃ pārtho dattvā tasmai dvijātaye
ब्राह्मण का कार्य सिद्ध करके और यश पाकर पाण्डुनन्दन पार्थ ने वह गोधन उस द्विज को सौंप दिया,
श्लोक 27 (1.233.27)
आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची धनञ्जयः । सोऽभिवाद्य गुरून्सर्वान्सर्वैश्चाप्यभिनन्दितः ॥
ājagāma puraṃ vīraḥ savyasācī dhanañjayaḥ | so'bhivādya gurūnsarvānsarvaiścāpyabhinanditaḥ
और वीर सव्यसाची धनंजय नगर लौट आए। उन्होंने सब गुरुजनों को प्रणाम किया और सबने उनका अभिनन्दन किया,
श्लोक 28 (1.233.28)
धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश मे प्रभो । समयः समतिक्रान्तो भवत्संदर्शने मया ॥
dharmarājamuvācedaṃ vratamādiśa me prabho | samayaḥ samatikrānto bhavatsaṃdarśane mayā
फिर उन्होंने धर्मराज से कहा — "प्रभो, मुझे व्रत की आज्ञा दीजिए। आपको देखकर मैंने नियम तोड़ा है।
श्लोक 29 (1.233.29)
वनवासं गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः । इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् ॥
vanavāsaṃ gamiṣyāmi samayo hyeṣa naḥ kṛtaḥ | ityukto dharmarājastu sahasā vākyamapriyam
मैं वनवास को जाऊँगा, क्योंकि हमने यही नियम बनाया था।" यह अप्रिय बात सुनते ही धर्मराज सहसा
श्लोक 30 (1.233.30)
कथमित्यब्रवीद्वाचा शोकार्तः सज्जमानया । युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम् ॥
kathamityabravīdvācā śokārtaḥ sajjamānayā | yudhiṣṭhiro guḍākeśaṃ bhrātā bhrātaramacyutam
शोक से व्याकुल होकर लड़खड़ाती वाणी में बोले — "यह कैसे?" फिर भाई युधिष्ठिर ने अपने अडिग भाई गुडाकेश से,
श्लोक 31 (1.233.31)
उवाच दीनो राजा च धनञ्जयमिदं वचः । प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ ॥
uvāca dīno rājā ca dhanañjayamidaṃ vacaḥ | pramāṇamasmi yadi te mattaḥ śṛṇu vaco'nagha
दुखी राजा ने धनंजय से यह वचन कहा — "हे निष्पाप, यदि मैं तुम्हारे लिए प्रमाण हूँ, तो मेरी बात सुनो।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 32 (1.233.32)
अनुप्रवेशे यद्वीर कृतवांस्त्वं ममाप्रियम् । सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि ॥
anupraveśe yadvīra kṛtavāṃstvaṃ mamāpriyam | sarvaṃ tadanujānāmi vyalīkaṃ na ca me hṛdi
हे वीर, भीतर आकर तुमने जो मेरा अप्रिय किया, उस सबके लिए मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ; मेरे मन में कोई खेद नहीं है।
श्लोक 33 (1.233.33)
गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः । यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकः ॥
guroranupraveśo hi nopaghāto yavīyasaḥ | yavīyaso'nupraveśo jyeṣṭhasya vidhilopakaḥ
बड़े भाई के पास छोटे भाई का चले आना कोई दोष नहीं है; छोटे के पास बड़े का जाना ही मर्यादा का उल्लंघन है।
श्लोक 34 (1.233.34)
निवर्तस्व महाबाहो कुरुष्व वचनं मम । न हि ते धर्मलोपोऽस्ति न च ते धर्षणा कृता ॥
nivartasva mahābāho kuruṣva vacanaṃ mama | na hi te dharmalopo'sti na ca te dharṣaṇā kṛtā
लौट आओ, हे महाबाहो, मेरी बात मानो। न तुमसे धर्म का लोप हुआ है, न तुमने कोई अपराध किया है।
अर्जुन उवाच
श्लोक 35 (1.233.35)
न व्याजेन चरेद्धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् । न सत्याद्विचलिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥
na vyājena careddharmamiti me bhavataḥ śrutam | na satyādvicaliṣyāmi satyenāyudhamālabhe
मैंने आपसे ही सुना है कि धर्म का आचरण बहाने से नहीं करना चाहिए। मैं सत्य से नहीं डिगूँगा; सत्य के बल पर ही मैंने शस्त्र उठाया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (1.233.36)
सोऽभ्यनुज्ञाय राजानं वनचर्याय दीक्षितः । वने द्वादश मासांस्तु वासायानुजगाम ह ॥
so'bhyanujñāya rājānaṃ vanacaryāya dīkṣitaḥ | vane dvādaśa māsāṃstu vāsāyānujagāma ha
राजा से अनुमति लेकर और वनचर्या की दीक्षा लेकर वे बारह महीने वन में रहने के लिए चल पड़े।