आदि पर्व · अध्याय 234
अर्जुन और उलूपी
विद्वान् ब्राह्मणों, भक्तों और कथावाचकों के साथ अर्जुन वनों, नदियों और तीर्थों का भ्रमण करते हुए गंगाद्वार में डेरा डालते हैं। गंगा में स्नान करते समय नागकन्या उलूपी उन्हें खींचकर अपने पिता कौरव्य के भवन में ले जाती है। वह अपना प्रेम प्रकट करती है; अर्जुन अपने ब्रह्मचर्य-व्रत की बात कहते हैं, पर वह तर्क देती है कि वह व्रत केवल द्रौपदी के विषय में है और एक दुखी स्त्री के प्राण बचाना स्वयं धर्म है। अर्जुन रात भर उसके साथ रहते हैं और इरावान् का जन्म होता है; उलूपी उन्हें जल में अजेय होने का वर देकर गंगाद्वार लौटा देती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.234.1)
तं प्रयान्तं महाबाहुं कौरवाणां यशस्करम् । अनुजग्मुर्महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥
taṃ prayāntaṃ mahābāhuṃ kauravāṇāṃ yaśaskaram | anujagmurmahātmāno brāhmaṇā vedapāragāḥ
कौरवों का यश बढ़ाने वाले महाबाहु अर्जुन जब चले, तो वेदों के पारंगत महात्मा ब्राह्मण उनके पीछे चले —
श्लोक 2 (1.234.2)
वेदवेदाङ्गविद्वांसस्तथैवाध्यात्मचिन्तकाः । भैक्षाश्च भगवद्भक्ताः सूताः पौराणिकाश्च ये ॥
vedavedāṅgavidvāṃsastathaivādhyātmacintakāḥ | bhaikṣāśca bhagavadbhaktāḥ sūtāḥ paurāṇikāśca ye
वेद-वेदांगों के विद्वान्, अध्यात्म का चिन्तन करने वाले, भिक्षु, भगवद्भक्त, सूत और पुराणवक्ता,
श्लोक 3 (1.234.3)
कथकाश्चापरे राजञ्श्रमणाश्च वनौकसः । दिव्याख्यानानि ये चापि पठन्ति मधुरं द्विजाः ॥
kathakāścāpare rājañśramaṇāśca vanaukasaḥ | divyākhyānāni ye cāpi paṭhanti madhuraṃ dvijāḥ
और भी कथावाचक, हे राजन्, वनवासी श्रमण, तथा मधुर स्वर में दिव्य आख्यानों का पाठ करने वाले द्विज।
श्लोक 4 (1.234.4)
एतैश्चान्यैश्च बहुभिः सहायैः पाण्डुनन्दनः । वृतः श्लक्ष्णकथैः प्रायान्मरुद्भिरिव वासवः ॥
etaiścānyaiśca bahubhiḥ sahāyaiḥ pāṇḍunandanaḥ | vṛtaḥ ślakṣṇakathaiḥ prāyānmarudbhiriva vāsavaḥ
इनसे तथा और बहुत-से मधुरभाषी साथियों से घिरे पाण्डुनन्दन ऐसे चले जैसे मरुद्गणों से घिरे इन्द्र।
श्लोक 5 (1.234.5)
रमणीयानि चित्राणि वनानि च सरांसि च । सरितः सागरांश्चैव देशानपि च भारत ॥
ramaṇīyāni citrāṇi vanāni ca sarāṃsi ca | saritaḥ sāgarāṃścaiva deśānapi ca bhārata
हे भारत, उन्होंने रमणीय और विचित्र वन, सरोवर, नदियाँ, समुद्र और अनेक देश देखे,
श्लोक 6 (1.234.6)
पुण्यान्यपि च तीर्थानि ददर्श भरतर्षभः । स गङ्गाद्वारमाश्रित्य निवेशमकरोत्प्रभुः ॥
puṇyānyapi ca tīrthāni dadarśa bharatarṣabhaḥ | sa gaṅgādvāramāśritya niveśamakarotprabhuḥ
और पवित्र तीर्थ भी देखे; फिर भरतश्रेष्ठ प्रभु अर्जुन ने गंगाद्वार पहुँचकर वहाँ डेरा डाला।
श्लोक 7 (1.234.7)
तत्र तस्याद्भुतं कर्म शृणु त्वं जनमेजय । कृतवान्यद्विशुद्धात्मा पाण्डूनां प्रवरो हि सः ॥
tatra tasyādbhutaṃ karma śṛṇu tvaṃ janamejaya | kṛtavānyadviśuddhātmā pāṇḍūnāṃ pravaro hi saḥ
हे जनमेजय, वहाँ उस शुद्धात्मा, पाण्डवों में श्रेष्ठ अर्जुन ने जो अद्भुत कर्म किया, उसे सुनो।
श्लोक 8 (1.234.8)
निविष्टे तत्र कौन्तेये ब्राह्मणेषु च भारत । अग्निहोत्राणि विप्रास्ते प्रादुश्चक्रुरनेकशः ॥
niviṣṭe tatra kaunteye brāhmaṇeṣu ca bhārata | agnihotrāṇi viprāste prāduścakruranekaśaḥ
हे भारत, कुन्तीपुत्र और ब्राह्मणों के वहाँ ठहर जाने पर उन विप्रों ने अनेक अग्निहोत्र प्रज्वलित किए।
श्लोक 9 (1.234.9)
तेषु प्रबोध्यमानेषु ज्वलितेषु हुतेषु च । कृतपुष्पोपहारेषु तीरान्तरगतेषु च ॥
teṣu prabodhyamāneṣu jvaliteṣu huteṣu ca | kṛtapuṣpopahāreṣu tīrāntaragateṣu ca
जब वे अग्नियाँ जगाई गईं, प्रज्वलित हुईं, उनमें आहुतियाँ दी गईं, पुष्पों का उपहार चढ़ाया गया और वे नदी-तट के किनारों पर स्थापित थीं,
श्लोक 10 (1.234.10)
कृताभिषेकैर्विद्वद्भिर्नियतैः सत्पथे स्थितैः । शुशुभेऽतीव तद्राजन्गङ्गाद्वारं महात्मभिः ॥
kṛtābhiṣekairvidvadbhirniyataiḥ satpathe sthitaiḥ | śuśubhe'tīva tadrājangaṅgādvāraṃ mahātmabhiḥ
तब स्नान किए हुए, संयमी, सन्मार्ग पर स्थित उन विद्वान् महात्माओं से, हे राजन्, वह गंगाद्वार अत्यन्त शोभा पाने लगा।
श्लोक 11 (1.234.11)
तथा पर्याकुले तस्मिन्निवेशे पाण्डवर्षभः । अभिषेकाय कौन्तेयो गङ्गामवततार ह ॥
tathā paryākule tasminniveśe pāṇḍavarṣabhaḥ | abhiṣekāya kaunteyo gaṅgāmavatatāra ha
जब वह डेरा इस प्रकार चहल-पहल से भरा था, तब पाण्डवश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन स्नान करने के लिए गंगा में उतरे।
श्लोक 12 (1.234.12)
तत्राभिषेकं कृत्वा स तर्पयित्वा पितामहान् । उत्तितीर्षुर्जलाद्राजन्नग्निकार्यचिकीर्षया ॥
tatrābhiṣekaṃ kṛtvā sa tarpayitvā pitāmahān | uttitīrṣurjalādrājannagnikāryacikīrṣayā
वहाँ स्नान करके और पितरों का तर्पण करके, हे राजन्, वे अग्निहोत्र करने की इच्छा से जल से बाहर निकलने ही वाले थे,
श्लोक 13 (1.234.13)
अपकृष्टो महाबाहुर्नागराजस्य कन्यया । अन्तर्जले महाराज उलूप्या कामयानया ॥
apakṛṣṭo mahābāhurnāgarājasya kanyayā | antarjale mahārāja ulūpyā kāmayānayā
कि तभी, हे महाराज, उन्हें चाहने वाली नागराज की कन्या उलूपी ने उन महाबाहु को जल के भीतर खींच लिया।
श्लोक 14 (1.234.14)
ददर्श पाण्डवस्तत्र पावकं सुसमाहितः । कौरव्यस्याथ नागस्य भवने परमार्चिते ॥
dadarśa pāṇḍavastatra pāvakaṃ susamāhitaḥ | kauravyasyātha nāgasya bhavane paramārcite
वहाँ नाग कौरव्य के अत्यन्त सम्मानित भवन में पाण्डुनन्दन ने भली-भाँति स्थापित अग्नि देखी।
श्लोक 15 (1.234.15)
तत्राग्निकार्यं कृतवान्कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । अशङ्कमानेन हुतस्तेनातुष्यद्धुताशनः ॥
tatrāgnikāryaṃ kṛtavānkuntīputro dhanañjayaḥ | aśaṅkamānena hutastenātuṣyaddhutāśanaḥ
वहाँ कुन्तीपुत्र धनंजय ने अग्निहोत्र किया; निःशंक होकर दी गई उनकी आहुतियों से अग्निदेव सन्तुष्ट हुए।
श्लोक 16 (1.234.16)
अग्निकार्यं स कृत्वा तु नागराजसुतां तदा । प्रहसन्निव कौन्तेय इदं वचनमब्रवीत् ॥
agnikāryaṃ sa kṛtvā tu nāgarājasutāṃ tadā | prahasanniva kaunteya idaṃ vacanamabravīt
अग्निहोत्र करके कुन्तीनन्दन ने मानो हँसते हुए नागराज की पुत्री से यह वचन कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 17 (1.234.17)
किमिदं साहसं भीरु कृतवत्यसि भामिनि । कश्चायं सुभगे देशः का च त्वं कस्य वात्मजा ॥
kimidaṃ sāhasaṃ bhīru kṛtavatyasi bhāmini | kaścāyaṃ subhage deśaḥ kā ca tvaṃ kasya vātmajā
हे भीरु, हे भामिनि, तुमने यह कैसा साहस कर डाला? हे सुभगे, यह कौन-सा देश है, और तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो?
उलूप्युवाच
श्लोक 18 (1.234.18)
ऐरावतकुले जातः कौरव्यो नाम पन्नगः । तस्यास्मि दुहिता राजन्नुलूपी नाम पन्नगी ॥
airāvatakule jātaḥ kauravyo nāma pannagaḥ | tasyāsmi duhitā rājannulūpī nāma pannagī
ऐरावत के कुल में कौरव्य नाम के एक नाग हैं। हे राजन्, मैं उन्हीं की पुत्री उलूपी नाम की नागकन्या हूँ।
श्लोक 19 (1.234.19)
साऽहं त्वामभिषेकार्थमवतीर्णं समुद्रगाम् । दृष्ट्वैव पुरुषव्याघ्र कन्दर्पेणाभिमूर्च्छिता ॥
sā'haṃ tvāmabhiṣekārthamavatīrṇaṃ samudragām | dṛṣṭvaiva puruṣavyāghra kandarpeṇābhimūrcchitā
हे पुरुषसिंह, आपको स्नान के लिए समुद्र में मिलने वाली इस नदी में उतरते देखते ही मैं काम से मूर्च्छित हो गई।
श्लोक 20 (1.234.20)
तां मामनङ्गग्लपितां त्वत्कृते कुरुनन्दन । अनन्यां नन्दयस्वाद्य प्रदानेनात्मनोऽनघ ॥
tāṃ māmanaṅgaglapitāṃ tvatkṛte kurunandana | ananyāṃ nandayasvādya pradānenātmano'nagha
हे कुरुनन्दन, आपके लिए मैं काम से क्षीण हो रही हूँ और मेरा मन किसी और पर नहीं; हे निष्पाप, आज अपने को मुझे सौंपकर मुझे आनन्दित कीजिए।
अर्जुन उवाच
श्लोक 21 (1.234.21)
ब्रह्मचर्यमिदं भद्रे मम द्वादशमासिकम् । धर्मराजेन चादिष्टं नाहमस्मि स्वयं वशः ॥
brahmacaryamidaṃ bhadre mama dvādaśamāsikam | dharmarājena cādiṣṭaṃ nāhamasmi svayaṃ vaśaḥ
हे भद्रे, मेरा यह बारह महीने का ब्रह्मचर्य-व्रत है, जिसकी आज्ञा धर्मराज ने दी है; मैं अपने वश में नहीं हूँ।
श्लोक 22 (1.234.22)
तव चापि प्रियं कर्तुमिच्छामि जलचारिणि । अनृतं नोक्तपूर्वं च मया किंचन कर्हिचित् ॥
tava cāpi priyaṃ kartumicchāmi jalacāriṇi | anṛtaṃ noktapūrvaṃ ca mayā kiṃcana karhicit
हे जलचारिणी, मैं भी तुम्हारा प्रिय करना चाहता हूँ; पर मैंने आज तक कभी कोई असत्य नहीं कहा है।
श्लोक 23 (1.234.23)
कथं च नानृतं मे स्यात्तव चापि प्रियं भवेत् । न च पीड्येत मे धर्मस्तथा कुर्या भुजङ्गमे ॥
kathaṃ ca nānṛtaṃ me syāttava cāpi priyaṃ bhavet | na ca pīḍyeta me dharmastathā kuryā bhujaṅgame
हे नागकन्या, ऐसा उपाय करो कि मुझसे असत्य भी न हो, तुम्हारा प्रिय भी हो जाए और मेरे धर्म को भी आँच न आए।
उलूप्युवाच
श्लोक 24 (1.234.24)
जानाम्यहं पाण्डवेय यथा चरसि मेदिनीम् । यथा च ते ब्रह्मचर्यमिदमादिष्टवान्गुरुः ॥
jānāmyahaṃ pāṇḍaveya yathā carasi medinīm | yathā ca te brahmacaryamidamādiṣṭavānguruḥ
हे पाण्डुपुत्र, मैं जानती हूँ कि आप पृथ्वी पर क्यों विचर रहे हैं और आपके बड़े भाई ने आपको यह ब्रह्मचर्य-व्रत क्यों सौंपा है।
श्लोक 25 (1.234.25)
परस्परं वर्तमानान्द्रुपदस्यात्मजां प्रति । यो नोऽनुप्रविशेन्मोहात्स वै द्वादशमासिकम् ॥
parasparaṃ vartamānāndrupadasyātmajāṃ prati | yo no'nupraviśenmohātsa vai dvādaśamāsikam
द्रुपदकुमारी के साथ आपस में रहते हुए आप लोगों में से जो कोई मोहवश दूसरे के पास जा पहुँचे, वह बारह महीने तक
श्लोक 26 (1.234.26)
वने चरेद्ब्रह्मचर्यमिति वः समयः कृतः । तदिदं द्रौपदीहेतोरन्योन्यस्य प्रवासनम् ॥
vane caredbrahmacaryamiti vaḥ samayaḥ kṛtaḥ | tadidaṃ draupadīhetoranyonyasya pravāsanam
वन में ब्रह्मचर्य का पालन करे — यही आप लोगों का नियम है। अतः एक-दूसरे का यह निर्वासन द्रौपदी के कारण है;
श्लोक 27 (1.234.27)
कृतवांस्तत्र धर्मार्थमत्र धर्मो न दुष्यति । परित्राणं च कर्तव्यमार्तानां पृथुलोचन ॥
kṛtavāṃstatra dharmārthamatra dharmo na duṣyati | paritrāṇaṃ ca kartavyamārtānāṃ pṛthulocana
वह नियम आप लोगों ने वहाँ धर्म के लिए बनाया था, यहाँ उससे धर्म दूषित नहीं होता। और हे विशाललोचन, पीड़ितों की रक्षा करना तो कर्तव्य ही है।
श्लोक 28 (1.234.28)
कृत्वा मम परित्राणं तव धर्मो न लुप्यते । यदि वाप्यस्य धर्मस्य सूक्ष्मोऽपि स्याद्व्यतिक्रमः ॥
kṛtvā mama paritrāṇaṃ tava dharmo na lupyate | yadi vāpyasya dharmasya sūkṣmo'pi syādvyatikramaḥ
मेरी रक्षा करने से आपका धर्म नष्ट नहीं होगा; और यदि उस नियम का कोई सूक्ष्म उल्लंघन हो भी जाए,
श्लोक 29 (1.234.29)
स च ते धर्म एव स्याद्दत्त्वा प्राणान्ममार्जुन । भक्तां च भज मां पार्थ सतामेतन्मतं प्रभो ॥
sa ca te dharma eva syāddattvā prāṇānmamārjuna | bhaktāṃ ca bhaja māṃ pārtha satāmetanmataṃ prabho
तो हे अर्जुन, मुझे प्राणदान देना ही आपका धर्म होगा। हे पार्थ, मैं आपकी अनुरागिणी हूँ, मुझे अपनाइए; हे प्रभो, सज्जनों का यही मत है।
श्लोक 30 (1.234.30)
न करिष्यसि चेदेवं मृतां मामुपधारय । प्राणदानान्महाबाहो चर धर्ममनुत्तमम् ॥
na kariṣyasi cedevaṃ mṛtāṃ māmupadhāraya | prāṇadānānmahābāho cara dharmamanuttamam
यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो मुझे मरी हुई ही समझिए। हे महाबाहो, प्राणदान देकर सर्वोत्तम धर्म का आचरण कीजिए।
श्लोक 31 (1.234.31)
शरणं च प्रपन्नास्मि त्वामद्य पुरुषोत्तम । दीनाननाथान्कौन्तेय परिरक्षसि नित्यशः ॥
śaraṇaṃ ca prapannāsmi tvāmadya puruṣottama | dīnānanāthānkaunteya parirakṣasi nityaśaḥ
हे पुरुषोत्तम, आज मैं आपकी शरण में आई हूँ। हे कुन्तीनन्दन, आप सदा दीनों और अनाथों की रक्षा करते हैं।
श्लोक 32 (1.234.32)
साऽहं शरणमभ्येमि रोरवीमि च दुःखिता । याचे त्वां चाभिकामाहं तस्मात्कुरु मम प्रियम् । स त्वमात्मप्रदानेन सकामां कर्तुमर्हसि ॥
sā'haṃ śaraṇamabhyemi roravīmi ca duḥkhitā | yāce tvāṃ cābhikāmāhaṃ tasmātkuru mama priyam | sa tvamātmapradānena sakāmāṃ kartumarhasi
मैं आपकी शरण आती हूँ और दुख से रो रही हूँ; आपको चाहती हुई मैं आपसे याचना करती हूँ — इसलिए मेरा प्रिय कीजिए। अपने को सौंपकर मेरी कामना पूरी कीजिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (1.234.33)
एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पन्नगेश्वरकन्यया । कृतवांस्तत्तथा सर्वं धर्ममुद्दिश्य कारणम् ॥
evamuktastu kaunteyaḥ pannageśvarakanyayā | kṛtavāṃstattathā sarvaṃ dharmamuddiśya kāraṇam
नागराज की कन्या के ऐसा कहने पर कुन्तीपुत्र ने धर्म को ही कारण मानकर वह सब वैसा ही किया।
श्लोक 34 (1.234.34)
स नागभवने रात्रिं तामुषित्वा प्रतापवान् । पुत्रमुत्पादयामास स तस्यां सुमनोहरम् ॥
sa nāgabhavane rātriṃ tāmuṣitvā pratāpavān | putramutpādayāmāsa sa tasyāṃ sumanoharam
प्रतापी अर्जुन ने उस रात नागभवन में निवास किया और उससे एक अत्यन्त मनोहर पुत्र उत्पन्न किया —
श्लोक 35 (1.234.35)
इरावन्तं महाभागं महाबलपराक्रमम् । उदितेऽभ्युत्थितः सूर्ये कौरव्यस्य निवेशनात् ॥
irāvantaṃ mahābhāgaṃ mahābalaparākramam | udite'bhyutthitaḥ sūrye kauravyasya niveśanāt
महाभाग, महान बल और पराक्रम वाला इरावान्। सूर्योदय होने पर वे उठे और कौरव्य के भवन से चल पड़े।
श्लोक 36 (1.234.36)
आगतस्तु पुनस्तत्र गङ्गाद्वारं तया सह । परित्यज्य गता साध्वी उलूपी निजमन्दिरम् ॥
āgatastu punastatra gaṅgādvāraṃ tayā saha | parityajya gatā sādhvī ulūpī nijamandiram
वे उलूपी के साथ फिर वहाँ गंगाद्वार लौट आए; और वह साध्वी उलूपी उन्हें छोड़कर अपने भवन को चली गई,
श्लोक 37 (1.234.37)
दत्त्वा वरमजेयत्वं जले सर्वत्र भारत । साध्या जलचराः सर्वे भविष्यन्ति न संशयः ॥
dattvā varamajeyatvaṃ jale sarvatra bhārata | sādhyā jalacarāḥ sarve bhaviṣyanti na saṃśayaḥ
हे भारत, जाते-जाते उसने उन्हें जल में सर्वत्र अजेय होने का वर दिया — "सब जलचर निःसन्देह आपके वश में रहेंगे।"