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आदि पर्व · अध्याय 235

अर्जुन का चित्राङ्गदा से विवाह

ब्राह्मणों से विदा लेकर अर्जुन हिमालय के तीर्थों और पूर्व की पवित्र नदियों की यात्रा करते हैं और मार्ग में गौएँ तथा धन दान करते हैं। कलिङ्ग के द्वार पर साथ आए ब्राह्मण लौट जाते हैं, और कुछ साथियों के साथ अर्जुन समुद्र-तट के किनारे-किनारे दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, गोदावरी और कावेरी में स्नान करते हुए मणलूर पहुँचते हैं। वहाँ वे राजा चित्रवाहन से उनकी पुत्री चित्राङ्गदा को माँगते हैं; राजा बताते हैं कि उनके कुल में हर पीढ़ी में एक ही संतान होती है और यह कन्या पुत्रिका के रूप में नियत है, इसलिए इससे जन्मा पुत्र उनके वंश को चलाने के लिए यहीं रहेगा। अर्जुन यह शर्त मानकर उससे विवाह करते हैं और तीन महीने उसके साथ उस नगर में रहते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.235.1)

कथयित्वा च तत्सर्वं ब्राह्मणेभ्यः स भारत । प्रययौ हिमवत्पार्श्वं ततो वज्रधरात्मजः ॥

kathayitvā ca tatsarvaṃ brāhmaṇebhyaḥ sa bhārata | prayayau himavatpārśvaṃ tato vajradharātmajaḥ

हे भारत, ब्राह्मणों को यह सब बताकर वज्रधारी इन्द्र के पुत्र अर्जुन फिर हिमालय के पार्श्व-प्रदेश की ओर चल पड़े।

श्लोक 2 (1.235.2)

अगस्त्यवटमासाद्य वसिष्ठस्य च पर्वतम् । भृगुतुङ्गे च कौन्तेयः कृतवाञ्शौचमात्मनः ॥

agastyavaṭamāsādya vasiṣṭhasya ca parvatam | bhṛgutuṅge ca kaunteyaḥ kṛtavāñśaucamātmanaḥ

अगस्त्यवट और वसिष्ठ के पर्वत पर पहुँचकर कुन्तीपुत्र ने भृगुतुङ्ग पर स्नान करके स्वयं को पवित्र किया।

श्लोक 3 (1.235.3)

प्रददौ गोसहस्राणि सुबहूनि च भारत । निवेशांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत्कुरुसत्तमः ॥

pradadau gosahasrāṇi subahūni ca bhārata | niveśāṃśca dvijātibhyaḥ so'dadatkurusattamaḥ

हे भारत, कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ने हज़ारों गौएँ दान कीं और द्विजों को निवास-स्थान भी दिए।

श्लोक 4 (1.235.4)

हिरण्यबिन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः । दृष्टवान्पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यान्यायतनानि च ॥

hiraṇyabindostīrthe ca snātvā puruṣasattamaḥ | dṛṣṭavānpāṇḍavaśreṣṭhaḥ puṇyānyāyatanāni ca

हिरण्यबिन्दु तीर्थ में स्नान करके पाण्डवों में श्रेष्ठ उस पुरुषोत्तम ने वहाँ के पवित्र देवस्थानों के दर्शन किए।

श्लोक 5 (1.235.5)

अवतीर्य नरश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सह भारत । प्राचीं दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः ॥

avatīrya naraśreṣṭho brāhmaṇaiḥ saha bhārata | prācīṃ diśamabhiprepsurjagāma bharatarṣabhaḥ

हे भारत, पर्वत से उतरकर नरश्रेष्ठ भरतर्षभ अर्जुन ब्राह्मणों के साथ पूर्व दिशा में पहुँचने की इच्छा से आगे बढ़े।

श्लोक 6 (1.235.6)

आनुपूर्व्येण तीर्थानि दृष्टवान्कुरुसत्तमः । नदीं चोत्पलिनीं रम्यामरण्यं नैमिषं प्रति ॥

ānupūrvyeṇa tīrthāni dṛṣṭavānkurusattamaḥ | nadīṃ cotpalinīṃ ramyāmaraṇyaṃ naimiṣaṃ prati

कुरुश्रेष्ठ ने क्रम से अनेक तीर्थों के दर्शन किए — रमणीय उत्पलिनी नदी, और आगे नैमिषारण्य तक,

श्लोक 7 (1.235.7)

नन्दामपरनन्दां च कौशिकीं च यशस्विनीम् । महानदीं गयां चैव गङ्गामपि च भारत ॥

nandāmaparanandāṃ ca kauśikīṃ ca yaśasvinīm | mahānadīṃ gayāṃ caiva gaṅgāmapi ca bhārata

हे भारत, नन्दा और अपरनन्दा, यशस्विनी कौशिकी, महानदी, गया और गङ्गा भी।

श्लोक 8 (1.235.8)

एवं तीर्थानि सर्वाणि पश्यमानस्तथाश्रमान् । आत्मनः पावनं कुर्वन्ब्राह्मणेभ्यो ददौ च गाः ॥

evaṃ tīrthāni sarvāṇi paśyamānastathāśramān | ātmanaḥ pāvanaṃ kurvanbrāhmaṇebhyo dadau ca gāḥ

इस प्रकार सब तीर्थों और आश्रमों को देखते हुए, स्वयं को पवित्र करते हुए उन्होंने ब्राह्मणों को गौएँ दान कीं।

श्लोक 9 (1.235.9)

अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु यानि तीर्थानि कानिचित् । जगाम तानि सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च ॥

aṅgavaṅgakaliṅgeṣu yāni tīrthāni kānicit | jagāma tāni sarvāṇi puṇyānyāyatanāni ca

अङ्ग, वङ्ग और कलिङ्ग देशों में जो भी तीर्थ थे, उन सब में और वहाँ के पवित्र देवस्थानों में वे गए।

श्लोक 10 (1.235.10)

दृष्ट्वा च विधिवत्तानि धनं चापि ददौ ततः । कलिङ्गराष्ट्रद्वारेषु ब्राह्मणाः पाण्डवानुगाः । अभ्यनुज्ञाय कौन्तेयमुपावर्तन्त भारत ॥

dṛṣṭvā ca vidhivattāni dhanaṃ cāpi dadau tataḥ | kaliṅgarāṣṭradvāreṣu brāhmaṇāḥ pāṇḍavānugāḥ | abhyanujñāya kaunteyamupāvartanta bhārata

उनका विधिपूर्वक दर्शन करके उन्होंने वहाँ धन भी दान किया। हे भारत, कलिङ्ग राज्य के द्वार पर पाण्डव के पीछे-पीछे आए ब्राह्मण कुन्तीपुत्र से विदा लेकर लौट गए।

श्लोक 11 (1.235.11)

स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः । सहायैरल्पकैः शूरः प्रययौ यत्र सागरः ॥

sa tu tairabhyanujñātaḥ kuntīputro dhanañjayaḥ | sahāyairalpakaiḥ śūraḥ prayayau yatra sāgaraḥ

उनकी अनुमति पाकर वीर कुन्तीपुत्र धनञ्जय थोड़े-से साथियों के साथ वहाँ चले जहाँ समुद्र था।

श्लोक 12 (1.235.12)

स कलिङ्गानतिक्रम्य देशानायतनानि च । हर्म्याणि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभुः ॥

sa kaliṅgānatikramya deśānāyatanāni ca | harmyāṇi ramaṇīyāni prekṣamāṇo yayau prabhuḥ

कलिङ्ग देश को पार करके वे प्रभु वहाँ के प्रदेशों, देवस्थानों और रमणीय भवनों को देखते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 13 (1.235.13)

महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम् । गोदावर्यां ततः स्नात्वा तामतीत्य महाबलः ॥

mahendraparvataṃ dṛṣṭvā tāpasairupaśobhitam | godāvaryāṃ tataḥ snātvā tāmatītya mahābalaḥ

तपस्वियों से सुशोभित महेन्द्र पर्वत को देखकर उस महाबली ने फिर गोदावरी में स्नान किया और उसे पार किया;

श्लोक 14 (1.235.14)

कावेरीं तां समासाद्य सङ्गमे सागरस्य च । स्नात्वा संपूज्य देवांश्च पितॄंश्च मुनिभिः सह ॥

kāverīṃ tāṃ samāsādya saṅgame sāgarasya ca | snātvā saṃpūjya devāṃśca pitṝṃśca munibhiḥ saha

कावेरी पहुँचकर उन्होंने समुद्र से उसके सङ्गम पर स्नान किया और मुनियों के साथ देवताओं तथा पितरों का पूजन किया।

श्लोक 15 (1.235.15)

समुद्रतीरेण शनैर्मणलूरं जगाम ह ॥

samudratīreṇa śanairmaṇalūraṃ jagāma ha

फिर समुद्र-तट के किनारे-किनारे धीरे-धीरे चलते हुए वे मणलूर पहुँचे।

श्लोक 16 (1.235.16)

तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । अभिगम्य महाबाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम् ॥

tatra sarvāṇi tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca | abhigamya mahābāhurabhyagacchanmahīpatim

वहाँ सब तीर्थों और पवित्र देवस्थानों में जाकर वे महाबाहु राजा के पास पहुँचे —

श्लोक 17 (1.235.17)

मणलूरेश्वरं राजन्धर्मज्ञं चित्रवाहनम् । तस्य चित्राङ्गदा नाम दुहिता चारुदर्शना ॥

maṇalūreśvaraṃ rājandharmajñaṃ citravāhanam | tasya citrāṅgadā nāma duhitā cārudarśanā

हे राजन्, मणलूर के स्वामी धर्मज्ञ चित्रवाहन के पास। उनकी चित्राङ्गदा नाम की एक पुत्री थी, जो देखने में अत्यन्त सुन्दर थी।

श्लोक 18 (1.235.18)

तां ददर्श पुरे तस्मिन्विचरन्तीं यदृच्छया । दृष्ट्वा च तां वरारोहां चकमे चैत्रवाहनीम् ॥

tāṃ dadarśa pure tasminvicarantīṃ yadṛcchayā | dṛṣṭvā ca tāṃ varārohāṃ cakame caitravāhanīm

उन्होंने उसे उस नगर में स्वच्छन्द घूमते हुए देखा, और चित्रवाहन की उस सुन्दरी पुत्री को देखकर वे उसकी कामना करने लगे।

श्लोक 19 (1.235.19)

अभिगम्य च राजानमवदत्स्वं प्रयोजनम् । देहि मे खल्विमां राजन्क्षत्रियाय महात्मने ॥

abhigamya ca rājānamavadatsvaṃ prayojanam | dehi me khalvimāṃ rājankṣatriyāya mahātmane

राजा के पास जाकर उन्होंने अपना प्रयोजन बताया — "हे राजन्, इसे मुझ महात्मा क्षत्रिय को दे दीजिए।"

श्लोक 20 (1.235.20)

तच्छ्रुत्वा त्वब्रवीद्राजा कस्य पुत्रोऽसि नाम किम् । उवाच तं पाण्डवोऽहं कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ॥

tacchrutvā tvabravīdrājā kasya putro'si nāma kim | uvāca taṃ pāṇḍavo'haṃ kuntīputro dhanañjayaḥ

यह सुनकर राजा ने पूछा — "तुम किसके पुत्र हो, और तुम्हारा नाम क्या है?" उन्होंने उत्तर दिया — "मैं पाण्डव हूँ, कुन्तीपुत्र धनञ्जय।"

श्लोक 21 (1.235.21)

तमुवाचाथ राजा स सान्त्वपूर्वमिदं वचः । राजा प्रभञ्जनो नाम कुलेऽस्मिन्संबभूव ह ॥

tamuvācātha rājā sa sāntvapūrvamidaṃ vacaḥ | rājā prabhañjano nāma kule'sminsaṃbabhūva ha

तब राजा ने उनसे सान्त्वनापूर्वक यह कहा — "इस कुल में प्रभञ्जन नाम के एक राजा हुए थे।

चित्रवाहन उवाच

श्लोक 22 (1.235.22)

अपुत्रः प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम् । उग्रेण तपसा तेन देवदेवः पिनाकधृक् ॥

aputraḥ prasavenārthī tapastepe sa uttamam | ugreṇa tapasā tena devadevaḥ pinākadhṛk

वे निःसन्तान थे और सन्तान चाहते थे, इसलिए उन्होंने उत्तम तप किया। उस उग्र तप से पिनाकधारी देवाधिदेव,

श्लोक 23 (1.235.23)

ईश्वरस्तोषितः पार्थ देवदेव उमापतिः । स तस्मै भगवान्प्रादादेकैकं प्रसवं कुले ॥

īśvarastoṣitaḥ pārtha devadeva umāpatiḥ | sa tasmai bhagavānprādādekaikaṃ prasavaṃ kule

उमापति ईश्वर प्रसन्न हुए, हे पार्थ; और उन भगवान ने उन्हें यह वर दिया कि कुल में हर पीढ़ी में एक ही सन्तान होगी।

श्लोक 24 (1.235.24)

एकैकः प्रसवस्तस्माद्भवत्यस्मिन्कुले सदा । तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे ॥

ekaikaḥ prasavastasmādbhavatyasminkule sadā | teṣāṃ kumārāḥ sarveṣāṃ pūrveṣāṃ mama jajñire

तभी से इस कुल में सदा एक ही सन्तान होती है। मेरे सभी पूर्वजों के यहाँ पुत्र ही जन्मे,

श्लोक 25 (1.235.25)

एका च मम कन्येयं कुलस्योत्पादनी भृशम् । पुत्रो ममायमिति मे भावना पुरुषर्षभ ॥

ekā ca mama kanyeyaṃ kulasyotpādanī bhṛśam | putro mamāyamiti me bhāvanā puruṣarṣabha

पर मेरी यह एक ही सन्तान कन्या है, और कुल को आगे बढ़ाने का भार इसी पर है। हे पुरुषश्रेष्ठ, "यह मेरा पुत्र है" — मैं इसे ऐसा ही मानता हूँ।

श्लोक 26 (1.235.26)

पुत्रिकाहेतुविधिना संज्ञिता भरतर्षभ । तस्मादेकः सुतो योऽस्यां जायते भारत त्वया ॥

putrikāhetuvidhinā saṃjñitā bharatarṣabha | tasmādekaḥ suto yo'syāṃ jāyate bhārata tvayā

हे भरतश्रेष्ठ, पुत्रिका-विधि के अनुसार (जिसमें कन्या अपने पिता के लिए पुत्र उत्पन्न करने को नियत की जाती है) यह इस रूप में नियत की गई है। इसलिए हे भारत, तुमसे इसके गर्भ से जो एक पुत्र होगा,

श्लोक 27 (1.235.27)

एतच्छुल्कं भवत्वस्याः कुलकृज्जायतामिह । एतेन समयेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव ॥

etacchulkaṃ bhavatvasyāḥ kulakṛjjāyatāmiha | etena samayenemāṃ pratigṛhṇīṣva pāṇḍava

वही इसका शुल्क हो — वह यहीं जन्म लेकर इस कुल को चलाए। हे पाण्डव, इसी शर्त पर इसे स्वीकार करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (1.235.28)

स तथेति प्रतिज्ञाय तां कन्यां प्रतिगृह्य च । मासे त्रयोदशे पार्थः कृत्वा वैवाहिकीं क्रियाम् । उवास नगरे तस्मिन्मासांस्त्रीन्स तया सह ॥

sa tatheti pratijñāya tāṃ kanyāṃ pratigṛhya ca | māse trayodaśe pārthaḥ kṛtvā vaivāhikīṃ kriyām | uvāsa nagare tasminmāsāṃstrīnsa tayā saha

"ऐसा ही हो" — यह वचन देकर उन्होंने उस कन्या को स्वीकार किया; तेरहवें महीने में पार्थ ने विवाह-संस्कार किया और तीन महीने उसके साथ उस नगर में रहे।

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