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आदि पर्व · अध्याय 239

रैवतक उत्सव में अर्जुन द्वारा सुभद्रा-दर्शन

रैवतक पर्वत पर वृष्णि और अन्धक वंशियों के उत्सव में कृष्ण और परिव्राजक के वेश में छिपे अर्जुन घूमते हुए सखियों के बीच सुभद्रा को देखते हैं। अर्जुन उसी क्षण उस पर मोहित हो जाते हैं; कृष्ण उन्हें उसका परिचय देते हैं और यह कहकर कि स्वयंवर का परिणाम अनिश्चित है, यति-वेश में ही उसे बलपूर्वक हर ले जाने की सलाह देते हैं। दूत यह योजना इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर तक पहुँचाते हैं, जो कुन्ती सहित अनुमति दे देते हैं, और कृष्ण द्वारका लौट जाते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.239.1)

ततः कतिपयाहस्य तस्मिन्रैवतके गिरौ । वृष्ण्यन्धकानामभवदुत्सवो नृपसत्तम ॥

tataḥ katipayāhasya tasminraivatake girau | vṛṣṇyandhakānāmabhavadutsavo nṛpasattama

फिर कुछ दिनों के बाद, हे नृपश्रेष्ठ, उस रैवतक पर्वत पर वृष्णि और अन्धक वंशियों का एक उत्सव हुआ।

श्लोक 2 (1.239.2)

तत्र दानं ददुर्वीरा ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः । भोजवृष्ण्यन्धकाश्चैव महे तस्य गिरेस्तदा ॥

tatra dānaṃ dadurvīrā brāhmaṇebhyaḥ sahasraśaḥ | bhojavṛṣṇyandhakāścaiva mahe tasya girestadā

पर्वत के उस महोत्सव में भोज, वृष्णि और अन्धक वीरों ने हजारों ब्राह्मणों को दान दिया।

श्लोक 3 (1.239.3)

प्रासादै रत्नचित्रैश्च गिरेस्तस्य समन्ततः । स देशः शोभितो राजन्कल्पवृक्षैश्च सर्वशः ॥

prāsādai ratnacitraiśca girestasya samantataḥ | sa deśaḥ śobhito rājankalpavṛkṣaiśca sarvaśaḥ

हे राजन्, उस पर्वत के चारों ओर वह सारा प्रदेश रत्नों से चित्रित भवनों और कल्पवृक्षों से सब ओर सुशोभित था।

श्लोक 4 (1.239.4)

वादित्राणि च तत्रान्ये वादकाः समवादयन् । ननृतुर्नर्तकाश्चैव जगुर्गेयानि गायनाः ॥

vāditrāṇi ca tatrānye vādakāḥ samavādayan | nanṛturnartakāścaiva jagurgeyāni gāyanāḥ

वहाँ वादक तरह-तरह के बाजे बजा रहे थे, नर्तक नाच रहे थे और गायक गीत गा रहे थे।

श्लोक 5 (1.239.5)

अलङ्कृताः कुमाराश्च वृष्णीनां सुमहौजसाम् । यानैर्हाटकचित्रैश्च चञ्चूर्यन्ते स्म सर्वशः ॥

alaṅkṛtāḥ kumārāśca vṛṣṇīnāṃ sumahaujasām | yānairhāṭakacitraiśca cañcūryante sma sarvaśaḥ

महातेजस्वी वृष्णियों के अलंकृत कुमार सोने से चित्रित वाहनों पर सब ओर जगमगा रहे थे।

श्लोक 6 (1.239.6)

पौराश्च पादचारेण यानैरुच्चावचैस्तथा । सदाराः सानुयात्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥

paurāśca pādacāreṇa yānairuccāvacaistathā | sadārāḥ sānuyātrāśca śataśo'tha sahasraśaḥ

नगरवासी भी पैदल और छोटे-बड़े अनेक प्रकार के वाहनों पर, अपनी पत्नियों और अनुचरों के साथ, सैकड़ों-हजारों की संख्या में आए।

श्लोक 7 (1.239.7)

ततो हलधरः क्षीबो रेवतीसहितः प्रभुः । अनुगम्यमानो गन्धर्वैरचरत्तत्र भारत ॥

tato haladharaḥ kṣībo revatīsahitaḥ prabhuḥ | anugamyamāno gandharvairacarattatra bhārata

तब मदिरा से मत्त प्रभु हलधर (बलराम) रेवती के साथ, गन्धर्वों से अनुगत होकर, वहाँ विचरने लगे, हे भारत।

श्लोक 8 (1.239.8)

तथैव राजा वृष्णीनामुग्रसेनः प्रतापवान् । अनुगीयमानो गन्धर्वैः स्त्रीसहस्रसहायवान् ॥

tathaiva rājā vṛṣṇīnāmugrasenaḥ pratāpavān | anugīyamāno gandharvaiḥ strīsahasrasahāyavān

इसी प्रकार वृष्णियों के प्रतापी राजा उग्रसेन भी हजार स्त्रियों के साथ विचर रहे थे और गन्धर्व उनके पीछे-पीछे गान कर रहे थे।

श्लोक 9 (1.239.9)

रौक्मिणेयश्च साम्बश्च क्षीबौ समरदुर्मदौ । दिव्यमाल्याम्बरधरौ विजह्रातेऽमराविव ॥

raukmiṇeyaśca sāmbaśca kṣībau samaradurmadau | divyamālyāmbaradharau vijahrāte'marāviva

रुक्मिणी के पुत्र (प्रद्युम्न) और साम्ब, दोनों मद से मत्त और युद्ध में दुर्धर्ष, दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए, दो देवताओं की भाँति क्रीड़ा कर रहे थे।

श्लोक 10 (1.239.10)

अक्रूरः सारणश्चैव गदो बभ्रुर्विदूरथः । निशठश्चारुदेष्णश्च पृथुर्विपृथुरेव च ॥

akrūraḥ sāraṇaścaiva gado babhrurvidūrathaḥ | niśaṭhaścārudeṣṇaśca pṛthurvipṛthureva ca

अक्रूर, सारण, गद, बभ्रु और विदूरथ, निशठ, चारुदेष्ण, पृथु और विपृथु,

श्लोक 11 (1.239.11)

सत्यकः सात्यकिश्चैव भङ्गकारमहारवौ । हार्दिक्य उद्धवश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥

satyakaḥ sātyakiścaiva bhaṅgakāramahāravau | hārdikya uddhavaścaiva ye cānye nānukīrtitāḥ

सत्यक और सात्यकि, भंगकार और महारव, हार्दिक्य और उद्धव, तथा अन्य भी जिनके नाम यहाँ नहीं गिनाए गए —

श्लोक 12 (1.239.12)

एते परिवृताः स्त्रीभिर्गन्धर्वैश्च पृथक्पृथक् । तमुत्सवं रैवतके शोभयाञ्चक्रिरे तदा ॥

ete parivṛtāḥ strībhirgandharvaiśca pṛthakpṛthak | tamutsavaṃ raivatake śobhayāñcakrire tadā

ये सब, अलग-अलग स्त्रियों और गन्धर्वों से घिरे हुए, उस समय रैवतक के उस उत्सव की शोभा बढ़ा रहे थे।

श्लोक 13 (1.239.13)

वासुदेवो ययौ तत्र सह स्त्रीभिर्मुदान्वितः । दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यः परिव्राजमपश्यत ॥

vāsudevo yayau tatra saha strībhirmudānvitaḥ | dattvā dānaṃ dvijātibhyaḥ parivrājamapaśyata

वासुदेव भी आनन्दित होकर अपनी स्त्रियों के साथ वहाँ गए; और ब्राह्मणों को दान देकर उन्होंने उस परिव्राजक को देखा।

श्लोक 14 (1.239.14)

चित्रकौतूहले तस्मिन्वर्तमाने महाद्भुते । वासुदेवश्च पार्थश्च सहितौ परिजग्मतुः ॥

citrakautūhale tasminvartamāne mahādbhute | vāsudevaśca pārthaśca sahitau parijagmatuḥ

जब विचित्र कौतुकों से भरा वह अद्भुत उत्सव चल रहा था, तब वासुदेव और पार्थ साथ-साथ घूमने लगे।

श्लोक 15 (1.239.15)

तत्र चङ्क्रममाणौ तौ वसुदेवसुतां शुभाम् । अलङ्कृतां सखीमध्ये भद्रां ददृशतुस्तदा ॥

tatra caṅkramamāṇau tau vasudevasutāṃ śubhām | alaṅkṛtāṃ sakhīmadhye bhadrāṃ dadṛśatustadā

वहाँ टहलते हुए उन दोनों ने वसुदेव की सुन्दर पुत्री भद्रा को सखियों के बीच सजी-धजी देखा।

श्लोक 16 (1.239.16)

दृष्ट्वैव तामर्जुनस्य कन्दर्पः समजायत । तं तदैकाग्रमनसं कृष्णः पार्थमलक्षयत् ॥

dṛṣṭvaiva tāmarjunasya kandarpaḥ samajāyata | taṃ tadaikāgramanasaṃ kṛṣṇaḥ pārthamalakṣayat

उसे देखते ही अर्जुन के मन में काम जाग उठा। कृष्ण ने लक्ष्य किया कि पार्थ का मन उस समय उसी में एकाग्र हो गया है।

श्लोक 17 (1.239.17)

अब्रवीत्पुरुषव्याघ्रः प्रहसन्निव भारत । वनेचरस्य किमिदं कामेनालोड्यते मनः ॥

abravītpuruṣavyāghraḥ prahasanniva bhārata | vanecarasya kimidaṃ kāmenāloḍyate manaḥ

तब उस पुरुषसिंह ने, हे भारत, मानो मुस्कराते हुए कहा — "यह क्या? क्या एक वनवासी का मन भी काम से डोल रहा है?"

वासुदेव उवाच

श्लोक 18 (1.239.18)

ममैषा भगिनी पार्थ सारणस्य सहोदरी । सुभद्रा नाम भद्रं ते पितुर्मे दयिता सुता । यदि ते वर्तते बुद्धिर्वक्ष्यामि पितरं स्वयम् ॥

mamaiṣā bhaginī pārtha sāraṇasya sahodarī | subhadrā nāma bhadraṃ te piturme dayitā sutā | yadi te vartate buddhirvakṣyāmi pitaraṃ svayam

"पार्थ, यह मेरी बहन है, सारण की सगी बहन — इसका नाम सुभद्रा है, तुम्हारा कल्याण हो — यह मेरे पिता की लाड़ली बेटी है। यदि तुम्हारा मन इस पर आया है, तो मैं स्वयं पिताजी से बात करूँगा।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 19 (1.239.19)

दुहिता वसुदेवस्य वासुदेवस्य च स्वसा । रूपेण चैषा संपन्ना कमिवैषा न मोहयेत् ॥

duhitā vasudevasya vāsudevasya ca svasā | rūpeṇa caiṣā saṃpannā kamivaiṣā na mohayet

"यह वसुदेव की पुत्री है और वासुदेव (कृष्ण) की बहन, और रूप से ऐसी सम्पन्न है — यह भला किसे मोहित न कर देगी?"

श्लोक 20 (1.239.20)

कृतमेव तु कल्याणं सर्वं मम भवेद्ध्रुवम् । यदि स्यान्मम वार्ष्णेयी महिषीयं स्वसा तव ॥

kṛtameva tu kalyāṇaṃ sarvaṃ mama bhaveddhruvam | yadi syānmama vārṣṇeyī mahiṣīyaṃ svasā tava

"यदि वृष्णिकुल की यह कन्या, तुम्हारी बहन, मेरी पटरानी बन जाए, तो निश्चय ही मेरा सारा कल्याण सिद्ध हुआ समझो।"

श्लोक 21 (1.239.21)

प्राप्तौ तु क उपायः स्यात्तं ब्रवीहि जनार्दन । आस्थास्यामि तदा सर्वं यदि शक्यं नरेण तत् ॥

prāptau tu ka upāyaḥ syāttaṃ bravīhi janārdana | āsthāsyāmi tadā sarvaṃ yadi śakyaṃ nareṇa tat

"किन्तु इसे पाने का उपाय क्या हो सकता है? हे जनार्दन, वह मुझे बताओ। यदि वह मनुष्य के बस में है, तो मैं उसे पूरा करने में जुट जाऊँगा।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 22 (1.239.22)

स्वयंवरः क्षत्रियाणां विवाहः पुरुषर्षभ । स च संशयितः पार्थ स्वभावस्यानिमित्ततः ॥

svayaṃvaraḥ kṣatriyāṇāṃ vivāhaḥ puruṣarṣabha | sa ca saṃśayitaḥ pārtha svabhāvasyānimittataḥ

"हे पुरुषश्रेष्ठ, क्षत्रियों में स्वयंवर द्वारा विवाह की रीति है। पर पार्थ, उसका परिणाम अनिश्चित रहता है, क्योंकि स्त्री का मन किसी निश्चित कारण से नहीं बँधता।"

श्लोक 23 (1.239.23)

प्रसह्य हरणं चापि क्षत्रियाणां प्रशस्यते । विवाहहेतुः शूराणामिति धर्मविदो विदुः ॥

prasahya haraṇaṃ cāpi kṣatriyāṇāṃ praśasyate | vivāhahetuḥ śūrāṇāmiti dharmavido viduḥ

"क्षत्रियों में बलपूर्वक हरण भी प्रशंसनीय माना जाता है; धर्म के ज्ञाता कहते हैं कि शूरवीरों के लिए यह भी विवाह का एक आधार है।"

श्लोक 24 (1.239.24)

स त्वमर्जुन कल्याणीं प्रसह्य भगिनीं मम । यतिरूपधरस्त्वं तु यथा कालविपाकता । हर स्वयंवरे ह्यस्याः को वै वेद चिकीर्षितम् ॥

sa tvamarjuna kalyāṇīṃ prasahya bhaginīṃ mama | yatirūpadharastvaṃ tu yathā kālavipākatā | hara svayaṃvare hyasyāḥ ko vai veda cikīrṣitam

"अतः अर्जुन, तुम यति का वेश धारण किए हुए, समय के परिपाक के अनुसार, मेरी कल्याणी बहन को बलपूर्वक हर ले जाओ; क्योंकि स्वयंवर में कौन जानता है कि वह क्या करना चाहेगी?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (1.239.25)

ततोऽर्जुनश्च कृष्णश्च विनिश्चित्येतिकृत्यताम् । शीघ्रगान्पुरुषान्राजन्प्रेषयामासतुस्तदा ॥

tato'rjunaśca kṛṣṇaśca viniścityetikṛtyatām | śīghragānpuruṣānrājanpreṣayāmāsatustadā

तब अर्जुन और कृष्ण ने क्या करना है, इसका निश्चय करके, हे राजन्, शीघ्रगामी दूत भेजे

श्लोक 26 (1.239.26)

धर्मराजाय तत्सर्वमिन्द्रप्रस्थगताय वै । श्रुत्वैव च महाबाहुरनुजज्ञे समातृकः ॥

dharmarājāya tatsarvamindraprasthagatāya vai | śrutvaiva ca mahābāhuranujajñe samātṛkaḥ

इन्द्रप्रस्थ गए हुए धर्मराज को यह सब बताने के लिए। सुनते ही महाबाहु युधिष्ठिर ने माता सहित अपनी अनुमति दे दी।

श्लोक 27 (1.239.27)

भीमसेनस्तु तच्छ्रुत्वा कृतकृत्यं स्म मन्यते । इत्येवं मनुजैरुक्तं कृष्णः श्रुत्वा महामतिः ॥

bhīmasenastu tacchrutvā kṛtakṛtyaṃ sma manyate | ityevaṃ manujairuktaṃ kṛṣṇaḥ śrutvā mahāmatiḥ

भीमसेन ने यह सुनकर समझा कि काम बन ही गया। दूतों का यह कहा सुनकर महाबुद्धिमान कृष्ण ने

श्लोक 28 (1.239.28)

अनुज्ञाप्य तदा पार्थं हृदि स्थाप्य चिकीर्षितम् । इत्येवं मनुजैः सार्धं द्वारकां समुपेयिवान् ॥

anujñāpya tadā pārthaṃ hṛdi sthāpya cikīrṣitam | ityevaṃ manujaiḥ sārdhaṃ dvārakāṃ samupeyivān

तब पार्थ से विदा ली और अपनी योजना मन में रखकर उन लोगों के साथ द्वारका चले गए।

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