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आदि पर्व · अध्याय 240

यतिवेशधारी अर्जुन को सुभद्रा के भवन में ठहराने का निर्णय

युधिष्ठिर की अनुमति और कृष्ण की सलाह से अर्जुन यति के वेश में ही द्वारका के बाहर एक उपवन में सुभद्रा का चिन्तन करते हुए ठहरते हैं। उत्सव से लौटते वृष्णि वीर उनसे मिलते हैं, उनका सत्कार करते हैं और उनसे तीर्थयात्राओं की कथाएँ सुनते हैं। बलराम कृष्ण से पूछते हैं कि यह अतिथि वर्षा के महीनों में कहाँ रहे, और सुभद्रा के भवन के पास के उद्यान का प्रस्ताव रखते हैं; कृष्ण आपत्ति करते हैं कि यह व्यक्ति युवा और रूपवान है, पर बड़े भाई की बात मान लेते हैं, और बलराम उन्हें आदेश देते हैं कि यति को सुभद्रा के पास ले जाकर उसका भली-भाँति सत्कार करवाएँ।

अध्याय 239अध्याय-सूचीअध्याय 241

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.240.1)

चारैः संचारिते तस्मिन्ननुज्ञाते युधिष्ठिरे । वासुदेवाभ्यनुज्ञातः कथयित्वेतिकृत्यताम् ॥

cāraiḥ saṃcārite tasminnanujñāte yudhiṣṭhire | vāsudevābhyanujñātaḥ kathayitvetikṛtyatām

जब दूतों ने वह संदेश पहुँचा दिया और युधिष्ठिर ने अनुमति दे दी, तब वासुदेव की आज्ञा पाकर और करने योग्य बात पर विचार करके,

श्लोक 2 (1.240.2)

कृष्णस्य मतमास्थाय प्रययौ भरतर्षभः । द्वारकाया उपवने तस्थौ वै कार्यसाधनः ॥

kṛṣṇasya matamāsthāya prayayau bharatarṣabhaḥ | dvārakāyā upavane tasthau vai kāryasādhanaḥ

कृष्ण की सम्मति के अनुसार भरतश्रेष्ठ अर्जुन चल पड़े और अपना काम सिद्ध करने के लिए द्वारका के उपवन में ठहर गए।

श्लोक 3 (1.240.3)

निवृत्ते ह्युत्सवे तस्मिन्गिरौ रैवतके तदा । वृष्णयोऽप्यगमन्सर्वे पुरीं द्वारवतीमनु ॥

nivṛtte hyutsave tasmingirau raivatake tadā | vṛṣṇayo'pyagamansarve purīṃ dvāravatīmanu

रैवतक पर्वत पर वह उत्सव समाप्त होने पर सारे वृष्णि भी द्वारवती नगरी को लौट गए।

श्लोक 4 (1.240.4)

चिन्तयानस्ततो भद्रामुपविष्टः शिलातले । रमणीये वनोद्देशे बहुपादपसंवृते ॥

cintayānastato bhadrāmupaviṣṭaḥ śilātale | ramaṇīye vanoddeśe bahupādapasaṃvṛte

तब भद्रा का ध्यान करते हुए अर्जुन बहुत-से वृक्षों से घिरे एक रमणीय वन-प्रदेश में एक शिला पर बैठ गए —

श्लोक 5 (1.240.5)

सालतालाश्वकर्णैश्च बकुलैरर्जुनैस्तथा । चम्पकाशोकपुन्नागैः केतकैः पाटलैस्तथा ॥

sālatālāśvakarṇaiśca bakulairarjunaistathā | campakāśokapunnāgaiḥ ketakaiḥ pāṭalaistathā

साल, ताड़ और अश्वकर्ण, बकुल और अर्जुन, चम्पा, अशोक और पुन्नाग, केतकी और पाटल,

श्लोक 6 (1.240.6)

कर्णिकारैरशोकैश्च अङ्कोलैरतिमुक्तकैः । एवमादिभिरन्यैश्च संवृते स शिलातले ॥

karṇikārairaśokaiśca aṅkolairatimuktakaiḥ | evamādibhiranyaiśca saṃvṛte sa śilātale

कर्णिकार और अशोक, अंकोल और अतिमुक्तक — इन तथा ऐसे ही अन्य वृक्षों से घिरी उस शिला पर।

श्लोक 7 (1.240.7)

पुनःपुनश्चिन्तयानः सुभद्रां भद्रभाषिणीम् । यदृच्छया चोपपन्नान्वृष्णिवीरान्ददर्श सः ॥

punaḥpunaścintayānaḥ subhadrāṃ bhadrabhāṣiṇīm | yadṛcchayā copapannānvṛṣṇivīrāndadarśa saḥ

बार-बार मधुरभाषिणी सुभद्रा का चिन्तन करते हुए उन्होंने संयोग से वहाँ आ पहुँचे वृष्णि वीरों को देखा —

श्लोक 8 (1.240.8)

बलदेवं च हार्दिक्यं साम्बं सारणमेव च । प्रद्युम्नं च गदं चैव चारुदेष्णं विदूरथम् ॥

baladevaṃ ca hārdikyaṃ sāmbaṃ sāraṇameva ca | pradyumnaṃ ca gadaṃ caiva cārudeṣṇaṃ vidūratham

बलदेव और हार्दिक्य, साम्ब और सारण, प्रद्युम्न और गद, चारुदेष्ण और विदूरथ,

श्लोक 9 (1.240.9)

भानुं च हरितं चैव विपृथुं पृथुमेव च । तथान्यांश्च बहून्पश्यन्हृदि शोकमधारयत् ॥

bhānuṃ ca haritaṃ caiva vipṛthuṃ pṛthumeva ca | tathānyāṃśca bahūnpaśyanhṛdi śokamadhārayat

भानु और हरित, विपृथु और पृथु, तथा और भी बहुत-से; उन्हें देखकर उन्होंने अपने मन की व्यथा भीतर ही दबा ली।

श्लोक 10 (1.240.10)

ततस्ते सहिताः सर्वे यतिं दृष्ट्वा समुत्सुकाः । वृष्णयो विनयोपेताः परिवार्योपतस्थिरे ॥

tataste sahitāḥ sarve yatiṃ dṛṣṭvā samutsukāḥ | vṛṣṇayo vinayopetāḥ parivāryopatasthire

तब सब वृष्णि एक साथ उस यति को देखकर उत्सुक हो उठे और विनयपूर्वक उन्हें घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 11 (1.240.11)

ततोऽर्जुनः प्रीतमनाः स्वागतं व्याजहार सः । आस्यतामास्यतां सर्वै रमणीये शिलातले ॥

tato'rjunaḥ prītamanāḥ svāgataṃ vyājahāra saḥ | āsyatāmāsyatāṃ sarvai ramaṇīye śilātale

तब अर्जुन ने प्रसन्न मन से उनका स्वागत किया — "आप सब इस रमणीय शिला पर बैठिए, बैठिए।"

श्लोक 12 (1.240.12)

इत्येवमुक्ता यतिना प्रीतास्ते यादवर्षभाः । उपोपविविशुः सर्वे ते स्वागतमिति ब्रुवन् ॥

ityevamuktā yatinā prītāste yādavarṣabhāḥ | upopaviviśuḥ sarve te svāgatamiti bruvan

यति के ऐसा कहने पर वे यदुश्रेष्ठ प्रसन्न हुए और "आपका स्वागत है" कहते हुए सब उनके पास बैठ गए।

श्लोक 13 (1.240.13)

परितः सन्निविष्टेषु वृष्णिवीरेषु पाण्डवः । आकारं गूहमानस्तु कुशलप्रश्नमब्रवीत् ॥

paritaḥ sanniviṣṭeṣu vṛṣṇivīreṣu pāṇḍavaḥ | ākāraṃ gūhamānastu kuśalapraśnamabravīt

वृष्णि वीरों के चारों ओर बैठ जाने पर पाण्डव ने अपना असली रूप छिपाते हुए उनका कुशल-समाचार पूछा।

श्लोक 14 (1.240.14)

सर्वत्र कुशलं चोक्त्वा बलदेवोऽब्रवीदिदम् । प्रसादं कुरु मे विप्र कुतस्त्वं चागतो ह्यसि ॥

sarvatra kuśalaṃ coktvā baladevo'bravīdidam | prasādaṃ kuru me vipra kutastvaṃ cāgato hyasi

सब ओर कुशल बताकर बलदेव ने यह कहा — "हे विप्र, मुझ पर कृपा कीजिए; आप कहाँ से आए हैं?

बलदेव उवाच

श्लोक 15 (1.240.15)

त्वया दृष्टानि पुण्यानि वद त्वं वदतांवर । पर्वतांश्चैव तीर्थानि वनान्यायतनानि च ॥

tvayā dṛṣṭāni puṇyāni vada tvaṃ vadatāṃvara | parvatāṃścaiva tīrthāni vanānyāyatanāni ca

"हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आपने जो पवित्र स्थान देखे हैं — पर्वत, तीर्थ, वन और देवालय — उनका वर्णन कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.240.16)

तीर्थानां दर्शनं चैव पर्वतानां च भारत । आपगानां वनानां च कथयामास ताः कथाः ॥

tīrthānāṃ darśanaṃ caiva parvatānāṃ ca bhārata | āpagānāṃ vanānāṃ ca kathayāmāsa tāḥ kathāḥ

तब उन्होंने, हे भारत, तीर्थों, पर्वतों, नदियों और वनों के दर्शन की वे कथाएँ सुनाईं।

श्लोक 17 (1.240.17)

श्रुत्वा धर्मकथाः पुण्या वृष्णिवीरा मुदान्विताः । अपूजयंस्तदा भिक्षुं कथान्ते जनमेजय ॥

śrutvā dharmakathāḥ puṇyā vṛṣṇivīrā mudānvitāḥ | apūjayaṃstadā bhikṣuṃ kathānte janamejaya

वे पुण्यमयी धर्म-कथाएँ सुनकर वृष्णि वीर आनन्दित हुए, और कथा के अन्त में, हे जनमेजय, उन्होंने उस भिक्षु का पूजन किया।

श्लोक 18 (1.240.18)

ततस्तु यादवाः सर्वे मन्त्रयन्ति स्म भारत । अयं देशातिथिः श्रीमान्यतिलिङ्गधरो द्विजः ॥

tatastu yādavāḥ sarve mantrayanti sma bhārata | ayaṃ deśātithiḥ śrīmānyatiliṅgadharo dvijaḥ

तब, हे भारत, सब यादव आपस में विचार करने लगे — "यह श्रीमान् परदेशी अतिथि, यति के चिह्न धारण करने वाला ब्राह्मण —

श्लोक 19 (1.240.19)

आवासं कमुपाश्रित्य वसेत निरुपद्रवः । इत्येवं प्रब्रुवन्तस्तु रौहिणेयं च यादवाः ॥

āvāsaṃ kamupāśritya vaseta nirupadravaḥ | ityevaṃ prabruvantastu rauhiṇeyaṃ ca yādavāḥ

किस निवास का आश्रय लेकर निर्विघ्न रहे?" यादव जब रोहिणीनन्दन (बलराम) से इस प्रकार कह रहे थे,

श्लोक 20 (1.240.20)

ददृशुः कृष्णमायान्तं सर्वे यादवनन्दनम् । एहि केशव तातेति रौहिणेयो वचोऽब्रवीत् ॥

dadṛśuḥ kṛṣṇamāyāntaṃ sarve yādavanandanam | ehi keśava tāteti rauhiṇeyo vaco'bravīt

तभी सबने यादवों को आनन्द देने वाले कृष्ण को आते देखा। रोहिणीनन्दन ने उनसे कहा — "आओ केशव, तात!"

बलदेव उवाच

श्लोक 21 (1.240.21)

यतिलिङ्गधरो विद्वान्देशातिथिरयं द्विजः । वर्षमासनिवासार्थमागतो नः पुरं प्रति । स्थाने यस्मिन्निवसतु तन्मे ब्रूहि जनार्दन ॥

yatiliṅgadharo vidvāndeśātithirayaṃ dvijaḥ | varṣamāsanivāsārthamāgato naḥ puraṃ prati | sthāne yasminnivasatu tanme brūhi janārdana

"यह विद्वान् ब्राह्मण, यति के चिह्न धारण किए परदेशी अतिथि, वर्षा के महीनों में निवास के लिए हमारे नगर में आया है। हे जनार्दन, मुझे बताओ कि यह किस स्थान पर रहे।"

श्रीकृष्ण उवाच

श्लोक 22 (1.240.22)

त्वयि स्थिते महाभाग परवानस्मि धर्मतः । स्वयं तु रुचिरे स्थाने वासयेर्यदुनन्दन ॥

tvayi sthite mahābhāga paravānasmi dharmataḥ | svayaṃ tu rucire sthāne vāsayeryadunandana

"हे महाभाग, आपके रहते मैं धर्म के अनुसार आपके अधीन हूँ। हे यदुनन्दन, आप स्वयं ही उन्हें किसी सुन्दर स्थान पर ठहराइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (1.240.23)

प्रीतः स तेन वाक्येन परिष्वज्य जनार्दनम् । बलदेवोऽब्रवीद्वाक्यं चिन्तयित्वा महाबलः ॥

prītaḥ sa tena vākyena pariṣvajya janārdanam | baladevo'bravīdvākyaṃ cintayitvā mahābalaḥ

उस वचन से प्रसन्न होकर महाबली बलदेव ने जनार्दन को गले लगाया और कुछ सोचकर यह बात कही —

बलदेव उवाच

श्लोक 24 (1.240.24)

आरामे तु वसेद्धीमांश्चतुरो वर्षमासकान् । कन्यागृहे सुभद्राया भुक्त्वा भोजनमिच्छया ॥

ārāme tu vaseddhīmāṃścaturo varṣamāsakān | kanyāgṛhe subhadrāyā bhuktvā bhojanamicchayā

"यह बुद्धिमान् यति वर्षा के चारों महीने उद्यान में रहें, और सुभद्रा के कन्या-भवन में इच्छानुसार भोजन करें;

श्लोक 25 (1.240.25)

लतागृहेषु वसतामिति मे धीयते मतिः । लब्धानुज्ञास्त्वया तात मन्यन्ते सर्वयादवाः ॥

latāgṛheṣu vasatāmiti me dhīyate matiḥ | labdhānujñāstvayā tāta manyante sarvayādavāḥ

और लता-भवनों में निवास करें — ऐसा मेरा विचार है। तात, तुम्हारी अनुमति मिल जाए तो सब यादव इसे स्वीकार कर लेंगे।"

श्रीकृष्ण उवाच

श्लोक 26 (1.240.26)

बलवान्दर्शनीयश्च वाग्मी श्रीमान्बहुश्रुतः । कन्यापुरसमीपे तु न युक्तमिति मे मतिः ॥

balavāndarśanīyaśca vāgmī śrīmānbahuśrutaḥ | kanyāpurasamīpe tu na yuktamiti me matiḥ

"यह बलवान्, रूपवान्, वाक्पटु, तेजस्वी और बहुश्रुत है। कन्याओं के भवन के पास इसका रहना उचित नहीं, ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 27 (1.240.27)

गुरुः शास्ता च नेता च शास्त्रज्ञो धर्मवित्तमः । त्वयोक्तं न विरुध्येहं करिष्यामि वचस्तव ॥

guruḥ śāstā ca netā ca śāstrajño dharmavittamaḥ | tvayoktaṃ na virudhyehaṃ kariṣyāmi vacastava

"पर आप मेरे गुरु, शासक और नायक हैं, शास्त्रों के ज्ञाता और धर्म के सर्वश्रेष्ठ जानकार हैं। आपकी कही बात का मैं विरोध नहीं करूँगा; आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।

श्लोक 28 (1.240.28)

शुभाशुभस्य विज्ञाता नान्योऽस्ति भुवि कश्चन ॥

śubhāśubhasya vijñātā nānyo'sti bhuvi kaścana

"शुभ और अशुभ को जानने वाला आपके सिवा पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है।"

बलदेव उवाच

श्लोक 29 (1.240.29)

अयं देशातिथिः श्रीमान्सर्वधर्मभृतां वरः । धृतिमान्विनयोपेतः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥

ayaṃ deśātithiḥ śrīmānsarvadharmabhṛtāṃ varaḥ | dhṛtimānvinayopetaḥ satyavādī jitendriyaḥ

"यह श्रीमान् परदेशी अतिथि सब धर्मपालकों में श्रेष्ठ है — धैर्यवान्, विनयी, सत्यवादी और जितेन्द्रिय।

श्लोक 30 (1.240.30)

यतिलिङ्गधरो ह्येष को विजानाति मानसम् । त्वमिमं पुण्डरीकाक्ष नीत्वा कन्यापुरं शुभम् ॥

yatiliṅgadharo hyeṣa ko vijānāti mānasam | tvamimaṃ puṇḍarīkākṣa nītvā kanyāpuraṃ śubham

"यह यति के चिह्न धारण करता है — इसके मन को कौन जान सकता है? हे कमलनयन, तुम इसे सुन्दर कन्या-भवन में ले जाओ,

श्लोक 31 (1.240.31)

निवेदय सुभद्रायै मद्वाक्यपरिचोदितः । भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पानैश्च अन्नैरिष्टैश्च पूजय ॥

nivedaya subhadrāyai madvākyaparicoditaḥ | bhakṣyairbhojyaiśca pānaiśca annairiṣṭaiśca pūjaya

"और मेरे कहने पर सुभद्रा को इसकी देखभाल सौंपो; भक्ष्य, भोज्य, पेय और मनचाहे अन्न से इसका सत्कार करो।"

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