आदि पर्व · अध्याय 241
अर्जुन का सुभद्रा के सामने स्वयं को प्रकट करना
कृष्ण छद्मवेशी अर्जुन को द्वारका ले आते हैं और उन्हें कन्या-अन्तःपुर में ठहराकर अपनी बहन सुभद्रा को यति की सेवा का भार सौंपते हैं। अर्जुन सुभद्रा पर मोहित हो जाते हैं, और सुभद्रा, जो उनके बारे में सुन-सुनकर बहुत पहले से उन्हें चाहती थी, उन्हें पहचान लेती है; जब वह यति से पाण्डवों का समाचार पूछती है, तब वे प्रकट करते हैं कि वे ही अर्जुन हैं और उसका पति बनने का वचन देते हैं। रुक्मिणी और देवकी के माध्यम से बात वसुदेव तक पहुँचती है, बड़े लोग विवाह निश्चित करते हैं, और कृष्ण बलराम और उद्धव से यह छिपाकर अन्तर्द्वीप में महादेव के लिए चौंतीस दिन के उत्सव की घोषणा करते हैं; यादव वहाँ उत्सव मनाते हैं और सुभद्रा यति की सेवा के लिए पीछे रह जाती है। कृष्ण के चले जाने पर अर्जुन समझते हैं कि सुभद्रा को ले जाने का समय आ गया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.241.1)
स तथेति प्रतिज्ञाय सहितो यतिना हरिः । कृत्वा तु संविदं तेन प्रहृष्टः केशवोऽभवत् ॥
sa tatheti pratijñāya sahito yatinā hariḥ | kṛtvā tu saṃvidaṃ tena prahṛṣṭaḥ keśavo'bhavat
"ऐसा ही हो" कहकर हरि ने स्वीकार किया और यति के साथ हो लिए; उससे गुप्त समझौता करके केशव अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 2 (1.241.2)
पर्वते तौ विहृत्यैव यथेष्टं कृष्णपाण्डवौ । तां पुरीं प्रविवेशाथ गृह्य हस्तेन पाण्डवम् । प्रविश्य च गृहं रम्यं सर्वभोगसमन्वितम् ॥
parvate tau vihṛtyaiva yatheṣṭaṃ kṛṣṇapāṇḍavau | tāṃ purīṃ praviveśātha gṛhya hastena pāṇḍavam | praviśya ca gṛhaṃ ramyaṃ sarvabhogasamanvitam
कृष्ण और पाण्डव ने पर्वत पर इच्छानुसार विहार किया; फिर कृष्ण पाण्डव का हाथ पकड़कर उस नगरी में प्रविष्ट हुए। सब प्रकार के भोगों से सम्पन्न अपने रमणीय भवन में प्रवेश करके
श्लोक 3 (1.241.3)
पार्थमावेदयामास रुक्मिणीसत्यभामयोः । हृषीकेशवचः श्रुत्वा ते उभे चोचतुर्भृशम् ॥
pārthamāvedayāmāsa rukmiṇīsatyabhāmayoḥ | hṛṣīkeśavacaḥ śrutvā te ubhe cocaturbhṛśam
उन्होंने रुक्मिणी और सत्यभामा को पार्थ के विषय में बताया। हृषीकेश की बात सुनकर वे दोनों उत्साह से बोलीं:
श्लोक 4 (1.241.4)
मनोरथो महानेष हृदि नौ परिवर्तते । कदा द्रक्षाव बीभत्सुं पाण्डवं पुरमागतम् ॥
manoratho mahāneṣa hṛdi nau parivartate | kadā drakṣāva bībhatsuṃ pāṇḍavaṃ puramāgatam
"हमारे हृदय में यह बड़ी अभिलाषा बार-बार उठती है कि हम बीभत्सु पाण्डव को अपने नगर में आया हुआ कब देखेंगी?"
श्लोक 5 (1.241.5)
इत्येवं हर्षमाणे ते वदन्त्यौ सुभृशं प्रियम् । रुक्मिणीसत्यभामे वै दृष्ट्वा प्रीतोऽभवद्यतिः ॥
ityevaṃ harṣamāṇe te vadantyau subhṛśaṃ priyam | rukmiṇīsatyabhāme vai dṛṣṭvā prīto'bhavadyatiḥ
इस प्रकार हर्ष से भरी, अत्यन्त प्रिय वचन कहती रुक्मिणी और सत्यभामा को देखकर यति प्रसन्न हुआ।
श्लोक 6 (1.241.6)
सर्वेषां हर्षमाणानां पार्थो हर्षमुपागमत् । प्राप्तमज्ञातरूपेण चागतं चार्जुनं हरिः ॥
sarveṣāṃ harṣamāṇānāṃ pārtho harṣamupāgamat | prāptamajñātarūpeṇa cāgataṃ cārjunaṃ hariḥ
सबको हर्षित देखकर पार्थ भी आनन्दित हुए। अर्जुन को छिपे वेष में आया देखकर हरि ने
श्लोक 7 (1.241.7)
सत्कृत्य पूज्यमानं तु प्रीत्या चैव ह्यपूजयत् । स तं प्रियातिथिं श्रेष्ठं समीक्ष्य यतिमागतम् ॥
satkṛtya pūjyamānaṃ tu prītyā caiva hyapūjayat | sa taṃ priyātithiṃ śreṣṭhaṃ samīkṣya yatimāgatam
उनका सत्कार किया और प्रेमपूर्वक उनकी यथोचित पूजा की। फिर उस श्रेष्ठ और प्रिय अतिथि, आए हुए यति को देखकर
श्लोक 8 (1.241.8)
सोदर्यां भगिनीं कृष्णः सुभद्रामिदमब्रवीत् । अयं देशातिथिर्भद्रे संशितव्रतवानृषिः ॥
sodaryāṃ bhaginīṃ kṛṣṇaḥ subhadrāmidamabravīt | ayaṃ deśātithirbhadre saṃśitavratavānṛṣiḥ
कृष्ण ने अपनी सगी बहन सुभद्रा से यह कहा: "भद्रे, यह परदेश से आया अतिथि कठोर व्रतों का पालन करने वाला ऋषि है।
कृष्ण उवाच
श्लोक 9 (1.241.9)
प्राप्नोतु सततं पूजां तव कन्यापुरे वसन् । आर्येण च परिज्ञातः पूजनीयो यतिस्त्वया ॥
prāpnotu satataṃ pūjāṃ tava kanyāpure vasan | āryeṇa ca parijñātaḥ pūjanīyo yatistvayā
तुम्हारे कन्या-अन्तःपुर में रहते हुए इन्हें निरन्तर सम्मान मिले। आर्य (बड़े भैया) भी इन्हें भली-भाँति जानते हैं; तुम्हें इस यति की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 10 (1.241.10)
रागाद्भरस्व वार्ष्णेयि भक्ष्यैर्भोज्यैर्यतिं सदा । एष यद्यदृषिर्ब्रूयात्कार्यमेव न संशयः ॥
rāgādbharasva vārṣṇeyi bhakṣyairbhojyairyatiṃ sadā | eṣa yadyadṛṣirbrūyātkāryameva na saṃśayaḥ
हे वार्ष्णेयी, प्रेम से सदा इस यति का भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से भरण-पोषण करना। यह ऋषि जो-जो कहें, वह निःसन्देह करना ही है।
श्लोक 11 (1.241.11)
सखीभिः सहिता भद्रे भवास्य वशवर्तिनी । पुरा हि यतयो भद्रे ये भैक्षार्थमनुव्रताः ॥
sakhībhiḥ sahitā bhadre bhavāsya vaśavartinī | purā hi yatayo bhadre ye bhaikṣārthamanuvratāḥ
भद्रे, अपनी सखियों के साथ तुम इनकी आज्ञा में रहना। क्योंकि भद्रे, पहले भी जो यति श्रद्धापूर्वक भिक्षा के लिए आते थे,
श्लोक 12 (1.241.12)
ते बभूवुर्दशार्हाणां कन्यापुरनिवासिनः । तेभ्यो भोज्यानि भक्ष्याणि यथाकालमतन्द्रिताः । कन्यापुरगताः कन्याः प्रयच्छन्ति यशस्विनि ॥
te babhūvurdaśārhāṇāṃ kanyāpuranivāsinaḥ | tebhyo bhojyāni bhakṣyāṇi yathākālamatandritāḥ | kanyāpuragatāḥ kanyāḥ prayacchanti yaśasvini
वे दाशार्हों के कन्या-अन्तःपुर में निवास करते थे, और हे यशस्विनी, वहाँ रहने वाली कन्याएँ बिना आलस्य के समय पर उन्हें भक्ष्य-भोज्य पदार्थ देती थीं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (1.241.13)
सा तथेत्यब्रवीत्कृष्णं करिष्यामि यथाऽऽथ माम् । तोषयिष्यामि वृत्तेन कर्मणा च द्विजर्षभम् ॥
sā tathetyabravītkṛṣṇaṃ kariṣyāmi yathā''tha mām | toṣayiṣyāmi vṛttena karmaṇā ca dvijarṣabham
उसने कृष्ण से कहा, "ऐसा ही होगा; आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूँगी। अपने आचरण और सेवा से मैं इन श्रेष्ठ ब्राह्मण को संतुष्ट रखूँगी।"
श्लोक 14 (1.241.14)
एवमेतेन रूपेण कंचित्कालं धनञ्जयः । उवास भक्ष्यैर्भोज्यैश्च भद्रया परमार्चितः ॥
evametena rūpeṇa kaṃcitkālaṃ dhanañjayaḥ | uvāsa bhakṣyairbhojyaiśca bhadrayā paramārcitaḥ
इस प्रकार उसी वेष में धनञ्जय कुछ समय तक वहाँ रहे, और भद्रा ने भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से उनका बड़ा आदर-सत्कार किया।
श्लोक 15 (1.241.15)
तस्य सर्वगुणोपेतां वासुदेवसहोदरीम् । पश्यतः सततं भद्रां प्रादुरासीन्मनोभवः ॥
tasya sarvaguṇopetāṃ vāsudevasahodarīm | paśyataḥ satataṃ bhadrāṃ prādurāsīnmanobhavaḥ
सब गुणों से सम्पन्न, वासुदेव की बहन भद्रा को निरन्तर देखते रहने से उनके मन में काम का उदय हुआ।
श्लोक 16 (1.241.16)
गूहयन्निव चाकारमालोक्य वरवर्णिनीम् । दीर्घमुष्णं विनिश्वस्य पार्थः कामवशं गतः ॥
gūhayanniva cākāramālokya varavarṇinīm | dīrghamuṣṇaṃ viniśvasya pārthaḥ kāmavaśaṃ gataḥ
मानो अपने भाव को छिपाते हुए, उस सुन्दरी को देखकर पार्थ ने लम्बी, गरम साँस ली और काम के वश हो गए।
श्लोक 17 (1.241.17)
स कृष्णां द्रौपदीं मेने न रूपे भद्रया समाम् । प्राप्तां भूमाविन्द्रसेनां साक्षाद्वा वरुणात्मजाम् ॥
sa kṛṣṇāṃ draupadīṃ mene na rūpe bhadrayā samām | prāptāṃ bhūmāvindrasenāṃ sākṣādvā varuṇātmajām
उन्होंने रूप में कृष्णा द्रौपदी को भी भद्रा के समान नहीं माना, न पृथ्वी पर उतरी इन्द्रसेना को, न स्वयं वरुण की पुत्री को।
श्लोक 18 (1.241.18)
अतीतकाले संप्राप्ते सर्वास्तापि सुरस्त्रियः । न समा भद्रया लोके इत्येवं मन्यतेऽर्जुनः ॥
atītakāle saṃprāpte sarvāstāpi surastriyaḥ | na samā bhadrayā loke ityevaṃ manyate'rjunaḥ
अर्जुन यही मानते थे कि बीते या वर्तमान समय की सारी देवांगनाएँ भी इस संसार में भद्रा के समान नहीं हैं।
श्लोक 19 (1.241.19)
अतीतसमये काले सोदर्याणां धनञ्जयः । न सस्मार सुभद्रायां कामाङ्कुशनिवारितः ॥
atītasamaye kāle sodaryāṇāṃ dhanañjayaḥ | na sasmāra subhadrāyāṃ kāmāṅkuśanivāritaḥ
यद्यपि नियम की अवधि बीत चुकी थी, फिर भी सुभद्रा के प्रति काम के अंकुश से रुके धनञ्जय को अपने भाइयों की सुध न रही।
श्लोक 20 (1.241.20)
क्रीडारतिपरां भद्रां सखीगणसमावृताम् । प्रीयते स्मार्जुनः पश्यन्स्वाहामिव विभावसुः ॥
krīḍāratiparāṃ bhadrāṃ sakhīgaṇasamāvṛtām | prīyate smārjunaḥ paśyansvāhāmiva vibhāvasuḥ
क्रीडा और आमोद में मग्न, सखियों से घिरी भद्रा को देखकर अर्जुन वैसे ही प्रसन्न होते थे जैसे अग्निदेव स्वाहा को देखकर।
श्लोक 21 (1.241.21)
पाण्डवस्य सुभद्रायाः सकाशे तु यशस्विनः । समुत्पत्तिः प्रभावश्च गदेन कथितः पुरा ॥
pāṇḍavasya subhadrāyāḥ sakāśe tu yaśasvinaḥ | samutpattiḥ prabhāvaśca gadena kathitaḥ purā
पहले ही गद ने सुभद्रा के सामने उस यशस्वी पाण्डव के जन्म और प्रभाव का वर्णन किया था।
श्लोक 22 (1.241.22)
श्रुत्वा चाशनिनिर्घोषं केशवेनापि धीमता । उपमामर्जुनं कृत्वा विस्तरः कथितः पुरा ॥
śrutvā cāśaninirghoṣaṃ keśavenāpi dhīmatā | upamāmarjunaṃ kṛtvā vistaraḥ kathitaḥ purā
बुद्धिमान केशव ने भी उनके धनुष की वज्र-सी गर्जना की बात सुनकर, अर्जुन को आदर्श मानकर, पहले विस्तार से उनका वर्णन किया था।
श्लोक 23 (1.241.23)
क्रुद्धमानप्रलापश्च वृष्णीनामर्जुनं प्रति । पौरुषं चोपमां कृत्वा प्रावर्तत धनुष्मताम् ॥
kruddhamānapralāpaśca vṛṣṇīnāmarjunaṃ prati | pauruṣaṃ copamāṃ kṛtvā prāvartata dhanuṣmatām
वृष्णिवंशी धनुर्धरों में भी अर्जुन को लेकर, उनके पौरुष को कसौटी बनाकर, क्रोध और अभिमान भरी बातें चलती रहती थीं।
श्लोक 24 (1.241.24)
अन्योन्यकलहे चापि विवादे चापि वृष्णयः । अर्जुनोऽपि न मे तुल्यः कुतस्त्वमिति चाब्रुवन् ॥
anyonyakalahe cāpi vivāde cāpi vṛṣṇayaḥ | arjuno'pi na me tulyaḥ kutastvamiti cābruvan
आपसी कलह और विवाद में वृष्णि कहा करते थे, "अर्जुन भी मेरी बराबरी के नहीं, फिर तुम्हारी क्या बिसात!"
श्लोक 25 (1.241.25)
जातांश्च पुत्रान्गृह्णन्त आशिषो वृष्णयोऽब्रवन् । अर्जुनस्य समो वीर्ये भव तात धनुर्धरः ॥
jātāṃśca putrāngṛhṇanta āśiṣo vṛṣṇayo'bravan | arjunasya samo vīrye bhava tāta dhanurdharaḥ
और नवजात पुत्रों को गोद में लेकर वृष्णि आशीर्वाद देते थे, "तात, तुम पराक्रम में अर्जुन के समान धनुर्धर बनो।"
श्लोक 26 (1.241.26)
तस्मात्सुभद्रा चकमे पौरुषाद्भरतर्षभम् । सत्यसन्धस्य रूपेण चातुर्येण च मोहिता ॥
tasmātsubhadrā cakame pauruṣādbharatarṣabham | satyasandhasya rūpeṇa cāturyeṇa ca mohitā
इसलिए सुभद्रा उनके पौरुष के कारण भरतश्रेष्ठ अर्जुन को चाहने लगी; उस सत्यप्रतिज्ञ के रूप और चातुर्य से वह मोहित थी।
श्लोक 27 (1.241.27)
चारणातिथिसंघानां गदस्य च निशम्य सा । अदृष्टे कृतभावाभूत्सुभद्रा भरतर्षभे ॥
cāraṇātithisaṃghānāṃ gadasya ca niśamya sā | adṛṣṭe kṛtabhāvābhūtsubhadrā bharatarṣabhe
चारणों और अतिथियों के समूहों से तथा गद से उनके विषय में सुनकर सुभद्रा ने बिना देखे ही भरतश्रेष्ठ पर अपना मन लगा दिया था।
श्लोक 28 (1.241.28)
कीर्तयन्ददृशे यो यः कथंचित्कुरुजाङ्गलम् । तं तमेव तदा भद्रा बीभत्सुं स्म हि पृच्छति ॥
kīrtayandadṛśe yo yaḥ kathaṃcitkurujāṅgalam | taṃ tameva tadā bhadrā bībhatsuṃ sma hi pṛcchati
जो कोई कभी कुरुजांगल देख आया होता और उसकी चर्चा करता, भद्रा उसी-उसी से बीभत्सु के बारे में पूछती थी।
श्लोक 29 (1.241.29)
अभीक्ष्णश्रवणादेवमभीक्ष्णपरिपृच्छनात् । प्रत्यक्ष इव भद्रायाः पाण्डवः प्रत्यपद्यत ॥
abhīkṣṇaśravaṇādevamabhīkṣṇaparipṛcchanāt | pratyakṣa iva bhadrāyāḥ pāṇḍavaḥ pratyapadyata
बार-बार सुनने और बार-बार पूछने से पाण्डव भद्रा के लिए मानो प्रत्यक्ष हो गए।
श्लोक 30 (1.241.30)
भुजौ भुजगसङ्काशौ ज्याघातेन किणीकृतौ । पार्थोऽयमिति पश्यन्त्या निःसंशयमजायत ॥
bhujau bhujagasaṅkāśau jyāghātena kiṇīkṛtau | pārtho'yamiti paśyantyā niḥsaṃśayamajāyata
साँपों के समान उनकी भुजाएँ, जिन पर प्रत्यंचा की चोट से घट्टे पड़ गए थे, देखकर उसे निःसन्देह निश्चय हो गया कि "यही पार्थ हैं।"
श्लोक 31 (1.241.31)
यथारूपं हि शुश्राव सुभद्रा भरतर्षभम् । तथारूपमवेक्ष्यैनं परां प्रीतिमवाप सा ॥
yathārūpaṃ hi śuśrāva subhadrā bharatarṣabham | tathārūpamavekṣyainaṃ parāṃ prītimavāpa sā
भरतश्रेष्ठ का जैसा रूप सुभद्रा ने सुना था, वैसा ही उन्हें देखकर वह अत्यन्त प्रसन्न हुई।
श्लोक 32 (1.241.32)
सा कदाचिदुपासीनं पप्रच्छ कुरुनन्दनम् । कथं देशाश्च चरिता नानाजनपदाः कथम् ॥
sā kadācidupāsīnaṃ papraccha kurunandanam | kathaṃ deśāśca caritā nānājanapadāḥ katham
एक बार पास बैठे कुरुनन्दन से उसने पूछा: "आपने किस प्रकार देशों में और अनेक जनपदों में भ्रमण किया?
सुभद्रोवाच
श्लोक 33 (1.241.33)
सरांसि सरितश्चैव वनानि च कथं यते । दिशः काश्च कथं प्राप्ताश्चरता भवता सदा ॥
sarāṃsi saritaścaiva vanāni ca kathaṃ yate | diśaḥ kāśca kathaṃ prāptāścaratā bhavatā sadā
हे यति, सरोवरों, नदियों और वनों में आप कैसे गए? सदा विचरते हुए आप किन-किन दिशाओं में और कैसे पहुँचे?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (1.241.34)
स तथोक्तस्तदा भद्रां बहुनर्मामृतं ब्रुवन् । उवाच परमप्रीतस्तथा बहुविधाः कथाः ॥
sa tathoktastadā bhadrāṃ bahunarmāmṛtaṃ bruvan | uvāca paramaprītastathā bahuvidhāḥ kathāḥ
ऐसा पूछे जाने पर वे अत्यन्त प्रसन्न होकर भद्रा से अमृत-सी मधुर विनोदभरी बातें करते हुए अनेक प्रकार की कथाएँ सुनाने लगे।
श्लोक 35 (1.241.35)
निशम्य विविधं तस्य लोके चरितमात्मनः । तथा परिगतो भावः कन्यायाः समपद्यत ॥
niśamya vividhaṃ tasya loke caritamātmanaḥ | tathā parigato bhāvaḥ kanyāyāḥ samapadyata
संसार में उनके विविध भ्रमण का वृत्तान्त सुनकर कन्या का मन पूरी तरह उन्हीं में रम गया।
श्लोक 36 (1.241.36)
पर्वसन्धौ तु कस्मिंश्चित्सुभद्रा भरतर्षभम् । रहस्येकान्तमासाद्य हर्षमाणाऽभ्यभाषत ॥
parvasandhau tu kasmiṃścitsubhadrā bharatarṣabham | rahasyekāntamāsādya harṣamāṇā'bhyabhāṣata
किसी पर्व-सन्धि के दिन सुभद्रा ने भरतश्रेष्ठ को एकान्त में पाकर हर्ष से कहा:
सुभद्रोवाच
श्लोक 37 (1.241.37)
यतिना चरता देशान्खाण्डवप्रस्थवासिनी । कश्चिद्भगवता दृष्टा पृथाऽस्माकं पितृष्वसा ॥
yatinā caratā deśānkhāṇḍavaprasthavāsinī | kaścidbhagavatā dṛṣṭā pṛthā'smākaṃ pitṛṣvasā
"भगवन्, देशों में विचरते हुए क्या आपने खाण्डवप्रस्थ में रहने वाली हमारी बुआ पृथा को देखा?
श्लोक 38 (1.241.38)
भ्रातृभिः प्रीयते सर्वैर्दृष्टः कच्चिद्युधिष्ठिरः । कच्चिद्धर्मपरो भीमो धर्मराजस्य धीमतः ॥
bhrātṛbhiḥ prīyate sarvairdṛṣṭaḥ kaccidyudhiṣṭhiraḥ | kacciddharmaparo bhīmo dharmarājasya dhīmataḥ
क्या आपने सब भाइयों के साथ प्रसन्न युधिष्ठिर को देखा? क्या बुद्धिमान धर्मराज के भाई भीम धर्मपरायण हैं?
श्लोक 39 (1.241.39)
निवृत्तसमयः कच्चिदपराधाद्धनञ्जयः । नियमे कामभोगानां वर्तमानः प्रिये रतः ॥
nivṛttasamayaḥ kaccidaparādhāddhanañjayaḥ | niyame kāmabhogānāṃ vartamānaḥ priye rataḥ
क्या अपराध के कारण धनञ्जय ने जो नियम लिया था, वह पूरा हो गया? भोग-विलास से संयम का पालन करते हुए क्या वे अपने प्रियजनों में अनुरक्त हैं?
श्लोक 40 (1.241.40)
क्व नु पार्थश्चरत्यद्य बहिः स वसतीर्वसन् । सुखोचितो ह्यदुःखार्हो दीर्घबाहुररिन्दमः ॥
kva nu pārthaścaratyadya bahiḥ sa vasatīrvasan | sukhocito hyaduḥkhārho dīrghabāhurarindamaḥ
सुख के योग्य और दुःख के अयोग्य महाबाहु शत्रुदमन पार्थ आज कहाँ विचर रहे हैं, घर से बाहर कहाँ-कहाँ डेरा डाले रहते हैं?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 41 (1.241.41)
कच्चिच्छ्रुतो वा दृष्टो वा पार्थो भगवताऽर्जुनः । निशम्य वचनं तस्यास्तामुवाच हसन्निव ॥
kaccicchruto vā dṛṣṭo vā pārtho bhagavatā'rjunaḥ | niśamya vacanaṃ tasyāstāmuvāca hasanniva
भगवन्, क्या आपने पार्थ अर्जुन के विषय में सुना या उन्हें देखा है?" उसकी बात सुनकर वे मानो मुस्कुराते हुए उससे बोले:
अर्जुन उवाच
श्लोक 42 (1.241.42)
आर्या कुशलिनी कुन्ती सहपुत्रा सहस्नुषा । प्रीयते पश्यती पुत्रान्खाण्डवप्रस्थ आसते ॥
āryā kuśalinī kuntī sahaputrā sahasnuṣā | prīyate paśyatī putrānkhāṇḍavaprastha āsate
"आर्या कुन्ती अपने पुत्रों और पुत्रवधू के साथ सकुशल हैं। खाण्डवप्रस्थ में रहने वाले अपने पुत्रों को देखकर वे प्रसन्न रहती हैं।
श्लोक 43 (1.241.43)
अनुज्ञातश्च मात्रा च सोदरैश्च धनञ्जयः । द्वारकामावसत्येको यतिलिङ्गेन पाण्डवः ॥
anujñātaśca mātrā ca sodaraiśca dhanañjayaḥ | dvārakāmāvasatyeko yatiliṅgena pāṇḍavaḥ
माता और भाइयों की अनुमति लेकर पाण्डव धनञ्जय यति के वेष में अकेले द्वारका में रह रहे हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 44 (1.241.44)
पश्यन्ती सततं कस्मान्नाभिजानासि माधवि । निशम्य वचनं तस्य वासुदेवसहोदरी ॥
paśyantī satataṃ kasmānnābhijānāsi mādhavi | niśamya vacanaṃ tasya vāsudevasahodarī
माधवी, उन्हें निरन्तर देखती हुई भी तुम पहचानती क्यों नहीं?" उनकी यह बात सुनकर वासुदेव की बहन
श्लोक 45 (1.241.45)
निश्वासबहुला तस्थौ क्षितिं विलिखती तदा । ततः परमसंहृष्टः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥
niśvāsabahulā tasthau kṣitiṃ vilikhatī tadā | tataḥ paramasaṃhṛṣṭaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ
बार-बार लम्बी साँसें लेती हुई, धरती कुरेदती हुई खड़ी रह गई। तब सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, अत्यन्त हर्षित
श्लोक 46 (1.241.46)
अर्जुनोऽहमिति प्रीतस्तामुवाच धनञ्जयः । यथा तव गतो भावः श्रवणान्मयि भामिनि ॥
arjuno'hamiti prītastāmuvāca dhanañjayaḥ | yathā tava gato bhāvaḥ śravaṇānmayi bhāmini
धनञ्जय ने प्रेम से उससे कहा, "मैं अर्जुन हूँ। हे भामिनी, जैसे सुनने भर से तुम्हारा मन मुझ पर लगा है,
अर्जुन उवाच
श्लोक 47 (1.241.47)
त्वद्गतः सततं भावस्तथा तव गुणैर्मम । प्रशस्तेऽहनि धर्मेण भद्रे स्वयमहं वृतः ॥
tvadgataḥ satataṃ bhāvastathā tava guṇairmama | praśaste'hani dharmeṇa bhadre svayamahaṃ vṛtaḥ
वैसे ही तुम्हारे गुणों के कारण मेरा मन सदा तुम्हीं में लगा रहता है। भद्रे, किसी शुभ दिन धर्मपूर्वक तुम स्वयं मेरा वरण करोगी,
श्लोक 48 (1.241.48)
सत्यवानिव सावित्र्या भविष्यामि पतिस्तव ॥
satyavāniva sāvitryā bhaviṣyāmi patistava
और जैसे सावित्री के पति सत्यवान हुए, वैसे ही मैं तुम्हारा पति बनूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 49 (1.241.49)
एवमुक्त्वा ततः पार्थः प्रविवेश लतागृहम् । ततः सुभद्रा ललिता लज्जाभावसमन्विता ॥
evamuktvā tataḥ pārthaḥ praviveśa latāgṛham | tataḥ subhadrā lalitā lajjābhāvasamanvitā
ऐसा कहकर पार्थ लतागृह में चले गए। तब लज्जा से भरी सुकुमारी सुभद्रा
श्लोक 50 (1.241.50)
मुमोह शयने दिव्ये शयाना न तथोचिता । नाकरोद्यतिपूजां सा लज्जाभावमुपेयुषी ॥
mumoha śayane divye śayānā na tathocitā | nākarodyatipūjāṃ sā lajjābhāvamupeyuṣī
अपने दिव्य पलंग पर अचेत-सी पड़ी रही, जैसा उसका स्वभाव नहीं था; लज्जा में डूबी उसने यति की सेवा-पूजा नहीं की।
श्लोक 51 (1.241.51)
कन्यापुरे तु यद्वृत्तं ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा । शशास रुक्मिणीं कृष्णो भोजनादि तदार्जुने ॥
kanyāpure tu yadvṛttaṃ jñātvā divyena cakṣuṣā | śaśāsa rukmiṇīṃ kṛṣṇo bhojanādi tadārjune
कन्या-अन्तःपुर में जो हुआ था, उसे दिव्य दृष्टि से जानकर कृष्ण ने तब रुक्मिणी को आदेश दिया कि वे अर्जुन के भोजन आदि की व्यवस्था करें।
श्लोक 52 (1.241.52)
तदाप्रभृति तां भद्रां चिन्तयन्वै धनञ्जयः । आस्ते स्म स तदाऽऽरामे कामेन भृशपीडितः ॥
tadāprabhṛti tāṃ bhadrāṃ cintayanvai dhanañjayaḥ | āste sma sa tadā''rāme kāmena bhṛśapīḍitaḥ
तब से धनञ्जय भद्रा का ही चिन्तन करते हुए, काम से अत्यन्त पीड़ित होकर उद्यान में रहने लगे।
श्लोक 53 (1.241.53)
सुभद्रा चापि न स्वस्था पार्थं प्रति बभूव सा । कृशा विवर्णवदना चिन्ताशोकपरायणा ॥
subhadrā cāpi na svasthā pārthaṃ prati babhūva sā | kṛśā vivarṇavadanā cintāśokaparāyaṇā
सुभद्रा भी पार्थ के लिए बेचैन रहने लगी; वह दुबली हो गई, उसका मुख फीका पड़ गया और वह चिन्ता व शोक में डूबी रहती।
श्लोक 54 (1.241.54)
निश्वासपरमा भद्रा मानसेन मनस्विनी । न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति केनचित् ॥
niśvāsaparamā bhadrā mānasena manasvinī | na śayyāsanabhogeṣu ratiṃ vindati kenacit
निरन्तर आहें भरती हुई वह मनस्विनी भद्रा मन से किसी भी शय्या, आसन या भोग में सुख नहीं पाती थी।
श्लोक 55 (1.241.55)
न नक्तं न दिवा शेते बभूवोन्मत्तदर्शना । एवं शोकपरां भद्रां देवी वाक्यमथाब्रवीत् । मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि धृतिमालम्ब्य शोभने ॥
na naktaṃ na divā śete babhūvonmattadarśanā | evaṃ śokaparāṃ bhadrāṃ devī vākyamathābravīt | mā śokaṃ kuru vārṣṇeyi dhṛtimālambya śobhane
वह न रात को सोती, न दिन को, और उन्मत्त-सी दिखने लगी। भद्रा को इस प्रकार शोक में डूबी देखकर देवी ने उससे कहा: "वार्ष्णेयी, शोक मत करो; हे शोभने, धैर्य धारण करो।"
श्लोक 56 (1.241.56)
रुक्मिण्येवं सुभद्रां तां कृष्णस्यानुमते तदा । रहोगत्य तदा श्वश्रूं देवकीं वाक्यमब्रवीत् ॥
rukmiṇyevaṃ subhadrāṃ tāṃ kṛṣṇasyānumate tadā | rahogatya tadā śvaśrūṃ devakīṃ vākyamabravīt
कृष्ण की अनुमति से रुक्मिणी ने तब एकान्त में अपनी सास देवकी के पास जाकर सुभद्रा के विषय में यह बात कही:
रुक्मिण्युवाच
श्लोक 57 (1.241.57)
अर्जुनो यतिरूपेण ह्यागतः सुसमाहितः । कन्यापुरमथाविश्य पूजितो भद्रया मुदा ॥
arjuno yatirūpeṇa hyāgataḥ susamāhitaḥ | kanyāpuramathāviśya pūjito bhadrayā mudā
"अर्जुन पूरी सावधानी से यति के वेष में यहाँ आए हैं। कन्या-अन्तःपुर में प्रवेश करके वे भद्रा द्वारा प्रसन्नतापूर्वक पूजित हुए हैं।
श्लोक 58 (1.241.58)
तं विदित्वा सुभद्रापि लज्जया परिमोहिता । दिवानिशं शयाना सा नाकरोद्भोजनादिकम् ॥
taṃ viditvā subhadrāpi lajjayā parimohitā | divāniśaṃ śayānā sā nākarodbhojanādikam
उन्हें पहचान लेने के बाद से सुभद्रा भी लज्जा से व्याकुल होकर दिन-रात लेटी रहती है और भोजन आदि कुछ नहीं करती।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 59 (1.241.59)
एवमुक्ता तया देवी भद्रां शोकपरायणाम् । तत्समीपं समागत्य श्लक्ष्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥
evamuktā tayā devī bhadrāṃ śokaparāyaṇām | tatsamīpaṃ samāgatya ślakṣṇaṃ vākyamathābravīt
रुक्मिणी के ऐसा कहने पर देवी देवकी शोक में डूबी भद्रा के पास आईं और कोमल वाणी में बोलीं:
देवक्युवाच
श्लोक 60 (1.241.60)
मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि धृतिमालम्ब्य शोभने । राज्ञे निवेदयित्वापि वसुदेवाय धीमते ॥
mā śokaṃ kuru vārṣṇeyi dhṛtimālambya śobhane | rājñe nivedayitvāpi vasudevāya dhīmate
"वार्ष्णेयी, शोक मत करो; हे शोभने, धैर्य धारण करो। बुद्धिमान राजा वसुदेव को बताकर
श्लोक 61 (1.241.61)
कृष्णायापि तथा भद्रे प्रहर्षं कारयामि ते । पश्चाज्जानामि ते वार्तां मा शोकं कुरु भामिनि ॥
kṛṣṇāyāpi tathā bhadre praharṣaṃ kārayāmi te | paścājjānāmi te vārtāṃ mā śokaṃ kuru bhāmini
और कृष्ण को भी बताकर, भद्रे, मैं तुम्हें प्रसन्न कर दूँगी। उसके बाद मैं तुम्हारी बात सँभाल लूँगी; हे भामिनी, शोक मत करो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 62 (1.241.62)
एवमुक्त्वा तु सा माता भद्रायाः प्रियकारिणी । निवेदयामास तदा भद्रामानकदुन्दुभेः ॥
evamuktvā tu sā mātā bhadrāyāḥ priyakāriṇī | nivedayāmāsa tadā bhadrāmānakadundubheḥ
ऐसा कहकर भद्रा का प्रिय करने वाली वह माता तब आनकदुन्दुभि (वसुदेव) को भद्रा के विषय में बताने लगीं।
श्लोक 63 (1.241.63)
रहस्येकासना तत्र भद्राऽस्वस्थेति चाब्रवीत् । आरामे तु यतिः श्रीमानर्जुनश्चेति नः श्रुतम् ॥
rahasyekāsanā tatra bhadrā'svastheti cābravīt | ārāme tu yatiḥ śrīmānarjunaśceti naḥ śrutam
वहाँ एकान्त में उनके साथ एक ही आसन पर बैठकर उन्होंने कहा, "भद्रा अस्वस्थ है," और यह भी कि "हमने सुना है कि उद्यान में ठहरे श्रीमान यति अर्जुन ही हैं।"
देवक्युवाच
श्लोक 64 (1.241.64)
अक्रूराय च कृष्णाय आहुकाय च सात्यकेः । निवेद्यतां महाप्राज्ञ श्रोतव्यं यदि बान्धवैः ॥
akrūrāya ca kṛṣṇāya āhukāya ca sātyakeḥ | nivedyatāṃ mahāprājña śrotavyaṃ yadi bāndhavaiḥ
"हे महाप्राज्ञ, यदि बन्धु-बान्धवों को यह बात सुनानी हो तो अक्रूर, कृष्ण, आहुक और सात्यकि को इसकी सूचना दी जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 65 (1.241.65)
वसुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा अक्रूराहुकयोस्तथा । निवेदयित्वा कृष्णेन मन्त्रयामास तैस्तदा ॥
vasudevastu tacchrutvā akrūrāhukayostathā | nivedayitvā kṛṣṇena mantrayāmāsa taistadā
यह सुनकर वसुदेव ने अक्रूर और आहुक को बताया, और फिर कृष्ण के साथ उन सबसे मन्त्रणा की।
श्लोक 66 (1.241.66)
इदं कार्यमिदं कृत्यमिदमेवेति निश्चितः । अक्रूरश्चोग्रसेनश्च सात्यकिश्च गदस्तथा ॥
idaṃ kāryamidaṃ kṛtyamidameveti niścitaḥ | akrūraścograsenaśca sātyakiśca gadastathā
"यही करना है, यही कर्तव्य है, बस यही," ऐसा निश्चय करके अक्रूर, उग्रसेन, सात्यकि और गद,
श्लोक 67 (1.241.67)
पृथुश्रवाश्च कृष्णश्च सहिताः शिनिना मुहुः । रुक्मिणी सत्यभामा च देवकी रोहिणी तथा ॥
pṛthuśravāśca kṛṣṇaśca sahitāḥ śininā muhuḥ | rukmiṇī satyabhāmā ca devakī rohiṇī tathā
पृथुश्रवा और कृष्ण, जिन्होंने शिनि के साथ बार-बार विचार किया, तथा रुक्मिणी, सत्यभामा, देवकी और रोहिणी,
श्लोक 68 (1.241.68)
वसुदेवेन सहिताः पुरोहितमते स्थिताः । विवाहं मन्त्रयामासुर्द्वादशेऽहनि भारत ॥
vasudevena sahitāḥ purohitamate sthitāḥ | vivāhaṃ mantrayāmāsurdvādaśe'hani bhārata
इन सबने वसुदेव के साथ, पुरोहित की सम्मति पर चलते हुए, हे भारत, बारहवें दिन विवाह करने की मन्त्रणा की।
श्लोक 69 (1.241.69)
अज्ञातं रौहिणेयस्य उद्धवस्य च भारत । विवाहं तु सुभद्रायाः कर्तुकामो गदाग्रजः ॥
ajñātaṃ rauhiṇeyasya uddhavasya ca bhārata | vivāhaṃ tu subhadrāyāḥ kartukāmo gadāgrajaḥ
हे भारत, रोहिणीनन्दन (बलराम) और उद्धव को बताए बिना, सुभद्रा का विवाह करने की इच्छा से गद के बड़े भाई (कृष्ण) ने
श्लोक 70 (1.241.70)
महादेवस्य पूजार्थं महोत्सव इति ब्रुवन् । चतुस्त्रिंशदहोरात्रं सुभद्रार्तिप्रशान्तये ॥
mahādevasya pūjārthaṃ mahotsava iti bruvan | catustriṃśadahorātraṃ subhadrārtipraśāntaye
यह कहते हुए कि सुभद्रा का कष्ट शान्त करने के लिए महादेव की पूजा हेतु चौंतीस दिन-रात का महोत्सव होगा,
श्लोक 71 (1.241.71)
नगरे घोषयामास हितार्थं सव्यसाचिनः । इतश्चतुर्थे त्वहनि अन्तर्द्वीपं तु गम्यताम् ॥
nagare ghoṣayāmāsa hitārthaṃ savyasācinaḥ | itaścaturthe tvahani antardvīpaṃ tu gamyatām
सव्यसाची के हित के लिए नगर में घोषणा करवाई: "आज से चौथे दिन सबको अन्तर्द्वीप चलना है।
श्लोक 72 (1.241.72)
सदारैः सानुयात्रैश्च सपुत्रैः सहबान्धवैः । गन्तव्यं सर्ववर्णैश्च गन्तव्यं सर्वयादवैः ॥
sadāraiḥ sānuyātraiśca saputraiḥ sahabāndhavaiḥ | gantavyaṃ sarvavarṇaiśca gantavyaṃ sarvayādavaiḥ
स्त्रियों, अनुचरों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ जाना है; सभी वर्णों के लोगों को जाना है, सभी यादवों को जाना है।"
श्लोक 73 (1.241.73)
एवमुक्तास्तु ते सर्वे तथा चक्रुश्च सर्वशः । ततः सर्वदशार्हाणामन्तर्द्वीपे च भारत ॥
evamuktāstu te sarve tathā cakruśca sarvaśaḥ | tataḥ sarvadaśārhāṇāmantardvīpe ca bhārata
ऐसा कहे जाने पर सबने वैसा ही किया। तब, हे भारत, अन्तर्द्वीप में सभी दाशार्हों का
श्लोक 74 (1.241.74)
चतुस्त्रिंशदहोरात्रं बभूव परमोत्सवः । कृष्णरामाहुकाक्रूरप्रद्युम्नशिनिसत्यकाः ॥
catustriṃśadahorātraṃ babhūva paramotsavaḥ | kṛṣṇarāmāhukākrūrapradyumnaśinisatyakāḥ
चौंतीस दिन-रात तक भारी उत्सव हुआ। कृष्ण, बलराम, आहुक, अक्रूर, प्रद्युम्न, शिनि और सत्यक,
श्लोक 75 (1.241.75)
समुद्रं प्रययुर्हृष्टाः कुकुरान्धकवृष्णयः । युक्तयन्त्रपताकाभिर्वृष्णयो ब्राह्मणैः सह ॥
samudraṃ prayayurhṛṣṭāḥ kukurāndhakavṛṣṇayaḥ | yuktayantrapatākābhirvṛṣṇayo brāhmaṇaiḥ saha
तथा कुकुर, अन्धक और वृष्णि हर्षपूर्वक समुद्र की ओर चल पड़े। यन्त्रों और पताकाओं से सजी नौकाओं में ब्राह्मणों के साथ वृष्णि
श्लोक 76 (1.241.76)
समुद्रं प्रययुर्नौभिः सर्वे पुरनिवासिनः । ततस्त्वरितमागत्य दाशार्हगणपूजितम् ॥
samudraṃ prayayurnaubhiḥ sarve puranivāsinaḥ | tatastvaritamāgatya dāśārhagaṇapūjitam
और नगर के सब निवासी समुद्र-यात्रा पर निकले। तब दाशार्हों के समूह से पूजित कमलनयन (कृष्ण) के पास शीघ्रता से आकर
श्लोक 77 (1.241.77)
सुभद्रा पुण्डरीकाक्षमब्रवीद्यतिशासनात् । कृत्यवान्द्वादशाहानि स्थाता स भगवानिह ॥
subhadrā puṇḍarīkākṣamabravīdyatiśāsanāt | kṛtyavāndvādaśāhāni sthātā sa bhagavāniha
सुभद्रा ने यति के कहने पर कहा: "वे भगवान यति अपने कृत्यों के कारण बारह दिन यहीं ठहरेंगे।
श्लोक 78 (1.241.78)
तिष्ठतस्तस्य कः कुर्यादुपस्थानविधिं सदा । तमुवाच हृषीकेशः कस्त्वदन्यो विशेषतः ॥
tiṣṭhatastasya kaḥ kuryādupasthānavidhiṃ sadā | tamuvāca hṛṣīkeśaḥ kastvadanyo viśeṣataḥ
उनके ठहरने पर सदा उनकी सेवा-टहल कौन करेगा?" हृषीकेश ने उससे कहा, "विशेषकर तुम्हारे सिवा और कौन?
कृष्ण उवाच
श्लोक 79 (1.241.79)
तमृषिं प्रत्युपस्थातुमितो नार्हति माधवि । त्वमेवास्मन्मतेनाद्य महर्षेर्वशवर्तिनी ॥
tamṛṣiṃ pratyupasthātumito nārhati mādhavi | tvamevāsmanmatenādya maharṣervaśavartinī
माधवी, यहाँ से कोई और उस ऋषि की सेवा के योग्य नहीं है। मेरी सम्मति से अब तुम ही उस महर्षि की आज्ञा में रहकर
श्लोक 80 (1.241.80)
कुरु सर्वाणि कार्याणि कीर्तिं धर्ममवेक्ष्य च । तस्य चातिथिमुख्यस्य सर्वेषां च तपस्विनाम् ॥
kuru sarvāṇi kāryāṇi kīrtiṃ dharmamavekṣya ca | tasya cātithimukhyasya sarveṣāṃ ca tapasvinām
कीर्ति और धर्म का ध्यान रखते हुए सब कार्य करो। उस प्रधान अतिथि के लिए और सभी तपस्वियों के लिए
श्लोक 81 (1.241.81)
संविधानपरा भद्रे भव त्वं वशवर्तिनी ॥
saṃvidhānaparā bhadre bhava tvaṃ vaśavartinī
भद्रे, सारी व्यवस्था करने में तत्पर रहो और उनकी आज्ञा में रहो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 82 (1.241.82)
एवमादिश्य भिक्षां च भद्रां च मधुसूदनः । ययौ शङ्खप्रणादेन भेरीणां निस्वनेन च ॥
evamādiśya bhikṣāṃ ca bhadrāṃ ca madhusūdanaḥ | yayau śaṅkhapraṇādena bherīṇāṃ nisvanena ca
इस प्रकार भिक्षा के विषय में और भद्रा को आदेश देकर मधुसूदन शंखों के नाद और भेरियों की ध्वनि के साथ चले गए।
श्लोक 83 (1.241.83)
ततस्तु द्वीपमासाद्य दानधर्मपरायणाः । उग्रसेनमुखाश्चान्ये विजहुः कुकुरान्धकाः ॥
tatastu dvīpamāsādya dānadharmaparāyaṇāḥ | ugrasenamukhāścānye vijahuḥ kukurāndhakāḥ
तब द्वीप पर पहुँचकर दान और धर्म में तत्पर उग्रसेन आदि कुकुर और अन्धक आमोद-प्रमोद करने लगे,
श्लोक 84 (1.241.84)
पटहानां प्रणादैश्च भेरीणां निस्वनेन च । सप्तयोजनविस्तार आयतो दशयोजनम् ॥
paṭahānāṃ praṇādaiśca bherīṇāṃ nisvanena ca | saptayojanavistāra āyato daśayojanam
पटहों के नाद और भेरियों की ध्वनि के बीच। सात योजन चौड़ा और दस योजन लम्बा
श्लोक 85 (1.241.85)
बभूव स महाद्वीपः सपर्वतमहावनः । सेतुपुष्करिणीजालैराक्रीडः सर्वसात्वताम् ॥
babhūva sa mahādvīpaḥ saparvatamahāvanaḥ | setupuṣkariṇījālairākrīḍaḥ sarvasātvatām
वह महाद्वीप पर्वतों और विशाल वनों से युक्त था; सेतुओं और पुष्करिणियों के समूहों से वह सब सात्वतों का क्रीडास्थल था।
श्लोक 86 (1.241.86)
वापीपल्वलसङ्घैश्च काननैश्च मनोरमैः । वासुदेवस्य क्रीडार्थं योग्यः सर्वप्रहर्षतः ॥
vāpīpalvalasaṅghaiśca kānanaiśca manoramaiḥ | vāsudevasya krīḍārthaṃ yogyaḥ sarvapraharṣataḥ
बावड़ियों, तालाबों और मनोरम काननों से भरा वह द्वीप वासुदेव की क्रीडा के योग्य और सबको आनन्द देने वाला था।
श्लोक 87 (1.241.87)
कुकुरान्धकवृष्णीनां तथा प्रियकरस्तदा । बभूव परमोपेतस्त्रिविष्टप इवापरः ॥
kukurāndhakavṛṣṇīnāṃ tathā priyakarastadā | babhūva paramopetastriviṣṭapa ivāparaḥ
वह कुकुर, अन्धक और वृष्णियों को भी प्रिय लगता था; सब प्रकार से सम्पन्न वह दूसरे स्वर्ग के समान था।
श्लोक 88 (1.241.88)
चतुस्त्रिंशदहोरात्रं दानधर्मपरायणाः । उग्रसेनमुखाः सर्वे विजहुः कुकुरान्धकाः ॥
catustriṃśadahorātraṃ dānadharmaparāyaṇāḥ | ugrasenamukhāḥ sarve vijahuḥ kukurāndhakāḥ
चौंतीस दिन-रात तक उग्रसेन आदि सभी कुकुर और अन्धक दान-धर्म में तत्पर रहकर विहार करते रहे।
श्लोक 89 (1.241.89)
विचित्रमाल्याभरणाश्चित्रगन्धानुलेपनाः । विहाराभिगताः सर्वे यादवा हर्षसंयुताः ॥
vicitramālyābharaṇāścitragandhānulepanāḥ | vihārābhigatāḥ sarve yādavā harṣasaṃyutāḥ
रंग-बिरंगी मालाएँ और आभूषण पहने, भाँति-भाँति के सुगन्धित लेप लगाए, सभी यादव हर्ष से भरकर विहार के लिए निकले,
श्लोक 90 (1.241.90)
सुनृत्तगीतवादित्रै रममाणास्तदाऽभवन् । प्रतियाते दशार्हाणामृषभे शार्ङ्गधन्वनि । सुभद्रोद्वाहनं पार्थः प्राप्तकालममन्यत ॥
sunṛttagītavāditrai ramamāṇāstadā'bhavan | pratiyāte daśārhāṇāmṛṣabhe śārṅgadhanvani | subhadrodvāhanaṃ pārthaḥ prāptakālamamanyata
और सुन्दर नृत्य, गीत और वाद्यों से आनन्द मनाने लगे। दाशार्हों में श्रेष्ठ शार्ङ्गधन्वा (कृष्ण) के चले जाने पर पार्थ ने समझा कि सुभद्रा को ब्याह ले जाने का समय आ गया है।