आदि पर्व · अध्याय 242
अर्जुन और सुभद्रा का विवाह
यादवों के अन्तर्द्वीप के उत्सव में चले जाने पर अर्जुन सुभद्रा को पत्नियों के प्रकार और विवाह की विधियाँ समझाते हैं, गान्धर्व विवाह का प्रस्ताव रखते हैं और उसी रात को शुभ मुहूर्त बताते हैं। सुभद्रा के मौन आँसू देखकर अर्जुन अपने पिता इन्द्र का स्मरण करते हैं, जो शची, नारद, वसिष्ठ और अरुन्धती के साथ द्वारका आते हैं; उधर श्रीकृष्ण सोते हुए बलराम को छोड़कर बड़ों के साथ रात में लौट आते हैं। इन्द्र विधिपूर्वक विवाह सम्पन्न कराते हैं और अर्जुन का अभिषेक कर उन्हें अलंकृत करते हैं; फिर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे बाईस दिन संन्यासी वेष में रुक्मिणी के भवन में रहें और फिर उनके रथ से खाण्डवप्रस्थ चले जाएँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.242.1)
कुकुरान्धकवृष्णीनामपयानं च पाण्डवः । विनिश्चित्य ततः पार्थः सुभद्रामिदमब्रवीत् ॥
kukurāndhakavṛṣṇīnāmapayānaṃ ca pāṇḍavaḥ | viniścitya tataḥ pārthaḥ subhadrāmidamabravīt
कुकुर, अन्धक और वृष्णियों के नगर से चले जाने की बात भली-भाँति जानकर पाण्डुपुत्र पार्थ ने तब सुभद्रा से यह कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (1.242.2)
शृणु भद्रे यथाशास्त्रं हितार्थं मुनिभिः कृतम् । विवाहं बहुधा सत्सु वर्णानां धर्मसंयुतम् ॥
śṛṇu bhadre yathāśāstraṃ hitārthaṃ munibhiḥ kṛtam | vivāhaṃ bahudhā satsu varṇānāṃ dharmasaṃyutam
"हे भद्रे, सुनो। मुनियों ने लोकहित के लिए शास्त्र के अनुसार विवाह का विधान किया है; सज्जनों में वर्णों के लिए यह धर्मसम्मत विवाह अनेक प्रकार का होता है।
श्लोक 3 (1.242.3)
कन्यायास्तु पिता भ्राता माता मातुल एव वा । पितुः पिता पितुर्भ्राता दाने तु प्रभुतां गतः ॥
kanyāyāstu pitā bhrātā mātā mātula eva vā | pituḥ pitā piturbhrātā dāne tu prabhutāṃ gataḥ
कन्या का दान करने का अधिकार उसके पिता, भाई, माता या मामा, दादा अथवा चाचा को होता है।
श्लोक 4 (1.242.4)
महोत्सवं पशुपतेर्द्रष्टुकामः पिता तव । अन्तर्द्वीपं गतो भद्रे पुत्रैः पौत्रैः सबान्धवैः ॥
mahotsavaṃ paśupaterdraṣṭukāmaḥ pitā tava | antardvīpaṃ gato bhadre putraiḥ pautraiḥ sabāndhavaiḥ
हे भद्रे, तुम्हारे पिता पशुपति का महोत्सव देखने की इच्छा से अपने पुत्रों, पौत्रों और बन्धुओं के साथ अन्तर्द्वीप गए हुए हैं।
श्लोक 5 (1.242.5)
मम चैव विशालाक्षि विदेशस्था हि बान्धवाः । तस्मात्सुभद्रे गान्धर्वो विवाहः पञ्चमः स्मृतः ॥
mama caiva viśālākṣi videśasthā hi bāndhavāḥ | tasmātsubhadre gāndharvo vivāhaḥ pañcamaḥ smṛtaḥ
और हे विशालाक्षी, मेरे बन्धु-बान्धव भी परदेश में हैं। इसलिए, सुभद्रे, हमारे लिए वही गान्धर्व विवाह उचित है, जिसे पाँचवाँ कहा गया है।
श्लोक 6 (1.242.6)
समागमे तु कन्यायाः क्रियाः प्रोक्ताश्चतुर्विधाः । तेषां प्रवृत्तिं साधूनां शृणु माधवि तद्यथा ॥
samāgame tu kanyāyāḥ kriyāḥ proktāścaturvidhāḥ | teṣāṃ pravṛttiṃ sādhūnāṃ śṛṇu mādhavi tadyathā
कन्या के विवाह-सम्बन्ध में चार प्रकार की विधियाँ बताई गई हैं। हे माधवी, सज्जन उनका पालन किस प्रकार करते हैं, यह सुनो।
श्लोक 7 (1.242.7)
वरमाहूय विधिना पित्रा दत्ता तथार्थिने । सा पत्नी तु परैरुक्ता सा वश्या तु पतिव्रता ॥
varamāhūya vidhinā pitrā dattā tathārthine | sā patnī tu parairuktā sā vaśyā tu pativratā
जिस कन्या को पिता वर को बुलाकर, उसकी याचना पर, विधिपूर्वक दान कर देता है, उसे लोग "पत्नी" कहते हैं; वह पति के अनुकूल रहने वाली पतिव्रता होती है।
श्लोक 8 (1.242.8)
भृत्यानां भरणार्थाय आत्मनः पोषणाय च । दाने गृहीता या नारी सा भार्येति स्मृता बुधैः ॥
bhṛtyānāṃ bharaṇārthāya ātmanaḥ poṣaṇāya ca | dāne gṛhītā yā nārī sā bhāryeti smṛtā budhaiḥ
आश्रितजनों के भरण और अपने पालन-पोषण के लिए जिस नारी को दान में ग्रहण किया जाता है, उसे विद्वान् "भार्या" कहते हैं।
श्लोक 9 (1.242.9)
धर्मतो वरयित्वा तु आनीय स्वं निवेशनम् । न्यायेन दत्तातारुण्ये दाराः पितृकृताः स्मृताः ॥
dharmato varayitvā tu ānīya svaṃ niveśanam | nyāyena dattātāruṇye dārāḥ pitṛkṛtāḥ smṛtāḥ
जिसका धर्मपूर्वक वरण करके पुरुष उसे अपने घर लाता है और जो यौवन में न्यायपूर्वक दी जाती है, वह पितरों द्वारा कराया गया सम्बन्ध "दारा" कहलाती है।
श्लोक 10 (1.242.10)
गान्धर्वेण विवाहेन रागात्पुत्रार्थकारणात् । आत्मनाऽनुगृहीता या वश्या सा तु प्रजावती ॥
gāndharveṇa vivāhena rāgātputrārthakāraṇāt | ātmanā'nugṛhītā yā vaśyā sā tu prajāvatī
जिस स्त्री को पुरुष स्वयं गान्धर्व विवाह द्वारा प्रेमवश और पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अपनाता है, वह अनुकूल रहने वाली और सन्तानवती होती है।
श्लोक 11 (1.242.11)
जनयेद्या तु भर्तारं जाया इत्येव नामतः । पत्नी भार्या च दाराश्च जाया चेति चतुर्विधाः ॥
janayedyā tu bhartāraṃ jāyā ityeva nāmataḥ | patnī bhāryā ca dārāśca jāyā ceti caturvidhāḥ
जो पति को ही पुनः जन्म देती है, वह नाम से "जाया" है। इस प्रकार पत्नी, भार्या, दारा और जाया, ये चार प्रकार की स्त्रियाँ हैं।
श्लोक 12 (1.242.12)
चतस्र एवाग्निसाक्ष्याः क्रियायुक्ताश्च धर्मतः । गान्धर्वस्तु क्रियाहीनो रागादेव प्रवर्तते ॥
catasra evāgnisākṣyāḥ kriyāyuktāśca dharmataḥ | gāndharvastu kriyāhīno rāgādeva pravartate
ये चारों अग्नि को साक्षी बनाकर, धर्म के अनुसार विधियों के साथ होते हैं। परन्तु गान्धर्व विवाह विधियों से रहित होता है और केवल प्रेम से ही सम्पन्न होता है।
श्लोक 13 (1.242.13)
सकामायाः सकामेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः । मयोक्तमक्रियं चापि कर्तव्यं माधवि त्वया ॥
sakāmāyāḥ sakāmena nirmantro rahasi smṛtaḥ | mayoktamakriyaṃ cāpi kartavyaṃ mādhavi tvayā
यह कामना करने वाली स्त्री और कामना करने वाले पुरुष के बीच एकान्त में, बिना मन्त्रों के होता है। हे माधवी, मेरे बताए इस विधिहीन विवाह को भी तुम्हें स्वीकार करना चाहिए।
श्लोक 14 (1.242.14)
अयनं चैव मासश्च ऋतुः पक्षस्तथा तिथिः । करणं च मुहूर्तं च लग्नसंपत्तथैव च ॥
ayanaṃ caiva māsaśca ṛtuḥ pakṣastathā tithiḥ | karaṇaṃ ca muhūrtaṃ ca lagnasaṃpattathaiva ca
अयन, मास, ऋतु, पक्ष और तिथि, करण, मुहूर्त और शुभ लग्न भी (विवाह में देखे जाते हैं)।
श्लोक 15 (1.242.15)
विवाहस्य विशालाक्षि प्रशस्तं चोत्तरायणम् । वैशाखश्चैव मासानां पक्षाणां शुक्ल एव च ॥
vivāhasya viśālākṣi praśastaṃ cottarāyaṇam | vaiśākhaścaiva māsānāṃ pakṣāṇāṃ śukla eva ca
हे विशालाक्षी, विवाह के लिए उत्तरायण प्रशस्त है; महीनों में वैशाख और पक्षों में शुक्ल पक्ष;
श्लोक 16 (1.242.16)
नक्षत्राणां तथा हस्तस्तृतीया च तिथिष्वपि । लग्नो हि मकरः श्रेष्ठः करणानां बवस्तथा ॥
nakṣatrāṇāṃ tathā hastastṛtīyā ca tithiṣvapi | lagno hi makaraḥ śreṣṭhaḥ karaṇānāṃ bavastathā
नक्षत्रों में हस्त, तिथियों में तृतीया, लग्नों में मकर श्रेष्ठ है और करणों में बव;
श्लोक 17 (1.242.17)
मैत्रो मुहूर्तो वैवाह्य आवयोः शुभकर्मणि । सर्वसंपदियं भद्रे अद्य रात्रौ भविष्यति ॥
maitro muhūrto vaivāhya āvayoḥ śubhakarmaṇi | sarvasaṃpadiyaṃ bhadre adya rātrau bhaviṣyati
और विवाह का मुहूर्त मैत्र है। हे भद्रे, हमारे इस शुभ कार्य के लिए ये सारे शुभ योग आज रात एक साथ बनेंगे।
श्लोक 18 (1.242.18)
भगवानस्तमभ्येति आदित्यस्तपतां वरः । रात्रौ विवाहकालोऽयं भविष्यति न संशयः ॥
bhagavānastamabhyeti ādityastapatāṃ varaḥ | rātrau vivāhakālo'yaṃ bhaviṣyati na saṃśayaḥ
तपने वालों में श्रेष्ठ भगवान् सूर्य अस्त हो रहे हैं। निःसन्देह आज रात ही विवाह का समय होगा।
श्लोक 19 (1.242.19)
नारायणोऽपि सर्वज्ञो नावबुध्येत विश्वकृत् । धर्मसङ्कटमापन्ने किं नु कृत्वा सुखं भवेत् ॥
nārāyaṇo'pi sarvajño nāvabudhyeta viśvakṛt | dharmasaṅkaṭamāpanne kiṃ nu kṛtvā sukhaṃ bhavet
सर्वज्ञ, विश्व के रचयिता नारायण को भी इसका पता न चलेगा। धर्मसंकट आ पड़ने पर ऐसा क्या किया जाए जिससे सुख मिले?
श्लोक 20 (1.242.20)
मनोभवेन कामेन मोहितं मां प्रलापिनम् । प्रतिवाक्यं च मे देवि किं न वक्ष्यसि माधवि ॥
manobhavena kāmena mohitaṃ māṃ pralāpinam | prativākyaṃ ca me devi kiṃ na vakṣyasi mādhavi
मन से उत्पन्न कामदेव ने मुझे मोहित कर दिया है और मैं प्रलाप कर रहा हूँ। हे देवी, हे माधवी, तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देतीं?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (1.242.21)
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा चिन्तयन्ती जनार्दनम् । नोवाच किंचिद्वचनं बाष्पदूषितलोचना ॥
arjunasya vacaḥ śrutvā cintayantī janārdanam | novāca kiṃcidvacanaṃ bāṣpadūṣitalocanā
अर्जुन की बात सुनकर सुभद्रा ने जनार्दन का स्मरण किया और कुछ भी नहीं बोली; उसकी आँखें आँसुओं से भर आई थीं।
श्लोक 22 (1.242.22)
रागोन्मादप्रलापी सन्नर्जुनो जयतां वरः । चिन्तयामास पितरं प्रविश्य च लतागृहम् ॥
rāgonmādapralāpī sannarjuno jayatāṃ varaḥ | cintayāmāsa pitaraṃ praviśya ca latāgṛham
तब विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन, प्रेम के उन्माद में प्रलाप करते हुए, एक लताकुंज में गए और अपने पिता का स्मरण करने लगे।
श्लोक 23 (1.242.23)
चिन्तयानं तु कौन्तेयं मत्वा शच्या शचीपतिः । सहितो नारदाद्यैश्च मुनिभिश्च महामनाः ॥
cintayānaṃ tu kaunteyaṃ matvā śacyā śacīpatiḥ | sahito nāradādyaiśca munibhiśca mahāmanāḥ
कुन्तीपुत्र को अपना स्मरण करते जानकर महामना शचीपति इन्द्र शची के साथ, नारद आदि मुनियों के साथ,
श्लोक 24 (1.242.24)
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च चारणैश्चापि गुह्यकैः । अरुन्धत्या वसिष्ठेन ह्याजगाम कुशस्थलीम् ॥
gandharvairapsarobhiśca cāraṇaiścāpi guhyakaiḥ | arundhatyā vasiṣṭhena hyājagāma kuśasthalīm
गन्धर्वों और अप्सराओं, चारणों और गुह्यकों तथा अरुन्धती और वसिष्ठ के साथ कुशस्थली आ पहुँचे।
श्लोक 25 (1.242.25)
चिन्तितं च सुभद्रायाश्चिन्तयित्वा जनार्दनः । निद्रयापहृतज्ञानं रौहिणेयं विना तदा ॥
cintitaṃ ca subhadrāyāścintayitvā janārdanaḥ | nidrayāpahṛtajñānaṃ rauhiṇeyaṃ vinā tadā
जनार्दन ने भी सुभद्रा के मन की बात जान ली और नींद में अचेत पड़े रोहिणीपुत्र (बलराम) को छोड़कर,
श्लोक 26 (1.242.26)
सहाक्रूरेण शिनिना सत्यकेन गदेन च । वसुदेवेन देवक्या आहूकेन च धीमता ॥
sahākrūreṇa śininā satyakena gadena ca | vasudevena devakyā āhūkena ca dhīmatā
अक्रूर, शिनि, सत्यक और गद के साथ, वसुदेव और देवकी तथा बुद्धिमान आहुक के साथ,
श्लोक 27 (1.242.27)
आजगाम पुरीं रात्रौ द्वारकां स्वजनैर्वृतः । पूजयित्वा तु देवेशो नारदादीन्महायशाः ॥
ājagāma purīṃ rātrau dvārakāṃ svajanairvṛtaḥ | pūjayitvā tu deveśo nāradādīnmahāyaśāḥ
अपने स्वजनों से घिरे हुए रात में द्वारकापुरी आ गए। उन महायशस्वी देवेश्वर ने नारद आदि का पूजन किया,
श्लोक 28 (1.242.28)
कुशलप्रश्नमुक्त्वा तु देवेन्द्रेणाभियाचितः । वैवाहिकीं क्रियां कृष्णः स तथेत्येवमुक्तवान् ॥
kuśalapraśnamuktvā tu devendreṇābhiyācitaḥ | vaivāhikīṃ kriyāṃ kṛṣṇaḥ sa tathetyevamuktavān
उनका कुशल-समाचार पूछा, और जब देवराज इन्द्र ने विवाह-संस्कार के लिए अनुरोध किया, तो श्रीकृष्ण ने कहा, "ऐसा ही हो।"
श्लोक 29 (1.242.29)
आहुको वसुदेवश्च सहाक्रूरः ससात्यकिः । अभिप्रणम्य शिरसा पाकशासनमब्रुवन् । देवदेव नमस्तेऽस्तु लोकनाथ जगत्पते ॥
āhuko vasudevaśca sahākrūraḥ sasātyakiḥ | abhipraṇamya śirasā pākaśāsanamabruvan | devadeva namaste'stu lokanātha jagatpate
आहुक और वसुदेव ने अक्रूर और सात्यकि के साथ पाकशासन इन्द्र को सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहा, "हे देवों के देव, लोकनाथ, जगत्पति, आपको नमस्कार है!
यादवा ऊचुः
श्लोक 30 (1.242.30)
वयं धन्याः स्म सहितैर्बान्धवैः सहिताः प्रभो । कृतप्रसादास्तु वयं तव वाक्येन विश्वजित् ॥
vayaṃ dhanyāḥ sma sahitairbāndhavaiḥ sahitāḥ prabho | kṛtaprasādāstu vayaṃ tava vākyena viśvajit
हे प्रभो, हम अपने सब बन्धुओं सहित धन्य हो गए हैं; हे विश्वविजयी, आपके वचन से हम पर आपकी कृपा हुई है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (1.242.31)
एवमुक्त्वा प्रसाद्यैनं पूजयित्वा प्रयत्नतः । महेन्द्रशासनात्सर्वे सहिता ऋषिभिस्तदा ॥
evamuktvā prasādyainaṃ pūjayitvā prayatnataḥ | mahendraśāsanātsarve sahitā ṛṣibhistadā
ऐसा कहकर, उन्हें प्रसन्न करके और यत्नपूर्वक उनका पूजन करके, वे सब महेन्द्र की आज्ञा से ऋषियों के साथ मिलकर
श्लोक 32 (1.242.32)
विवाहं कारयामासुः शक्रपुत्रस्य शास्त्रतः । अरुन्धती शची देवी रुग्मिणी देवकी तथा ॥
vivāhaṃ kārayāmāsuḥ śakraputrasya śāstrataḥ | arundhatī śacī devī rugmiṇī devakī tathā
शास्त्रविधि से इन्द्रपुत्र अर्जुन का विवाह कराने लगे। अरुन्धती, देवी शची, रुक्मिणी और देवकी ने
श्लोक 33 (1.242.33)
दिव्यस्त्रीभिश्च सहिताः सुभद्रायाः शुभाः क्रियाः । अर्जुनेऽपि तथा सर्वाः क्रिया भद्राः प्रयोजयन् ॥
divyastrībhiśca sahitāḥ subhadrāyāḥ śubhāḥ kriyāḥ | arjune'pi tathā sarvāḥ kriyā bhadrāḥ prayojayan
दिव्य स्त्रियों के साथ मिलकर सुभद्रा के सब मंगल-संस्कार किए, और उसी प्रकार अर्जुन के भी सब शुभ संस्कार सम्पन्न कराए।
श्लोक 34 (1.242.34)
महर्षिः काश्यपो होता सदस्या नारदादयः । पुण्याशिषः प्रयोक्तारः सर्वे ते हि तदार्जुने ॥
maharṣiḥ kāśyapo hotā sadasyā nāradādayaḥ | puṇyāśiṣaḥ prayoktāraḥ sarve te hi tadārjune
महर्षि कश्यप होता बने और नारद आदि सदस्य; उन सबने तब अर्जुन को पुण्य आशीर्वाद दिए।
श्लोक 35 (1.242.35)
अभिषेकं तदा कृत्वा महेन्द्रः पाकशासनिम् । लोकपालैस्तु सहितः सर्वदेवैरभिष्टुतः ॥
abhiṣekaṃ tadā kṛtvā mahendraḥ pākaśāsanim | lokapālaistu sahitaḥ sarvadevairabhiṣṭutaḥ
तब लोकपालों के साथ और सब देवताओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए पाकशासन महेन्द्र ने अपने पुत्र का अभिषेक किया,
श्लोक 36 (1.242.36)
किरीटाङ्गदहाराद्यैर्हस्ताभरणकुण्डलैः । भूषयित्वा तदा पार्थं द्वितीयमिव वासवम् ॥
kirīṭāṅgadahārādyairhastābharaṇakuṇḍalaiḥ | bhūṣayitvā tadā pārthaṃ dvitīyamiva vāsavam
और किरीट, बाजूबन्द, हार आदि, कंगन और कुण्डलों से पार्थ को ऐसा सजाया कि वे दूसरे इन्द्र जैसे लगने लगे।
श्लोक 37 (1.242.37)
पुत्रं परिष्वज्य तदा प्रीतिमाप पुरन्दरः । शची देवी तदा भद्रामरुन्धत्यादिभिस्तथा ॥
putraṃ pariṣvajya tadā prītimāpa purandaraḥ | śacī devī tadā bhadrāmarundhatyādibhistathā
पुत्र को गले लगाकर पुरन्दर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हुए। तब देवी शची ने अरुन्धती आदि के साथ भद्रा (सुभद्रा) के लिए
श्लोक 38 (1.242.38)
कारयामास वैवाह्यमङ्गलान्यादवस्त्रियः । सहाप्सरोभिर्मुदिता भूषयित्वा स्वभूषणैः ॥
kārayāmāsa vaivāhyamaṅgalānyādavastriyaḥ | sahāpsarobhirmuditā bhūṣayitvā svabhūṣaṇaiḥ
विवाह के मंगल-कार्य कराए; और यादवकुल की स्त्रियों ने प्रसन्न होकर अप्सराओं के साथ उसे अपने आभूषणों से सजाया।
श्लोक 39 (1.242.39)
पौलोमीमिव मन्यन्ते सुभद्रां तत्र योषितः । ततो विवाहो ववृधे कृतः सर्वगुणान्वितः ॥
paulomīmiva manyante subhadrāṃ tatra yoṣitaḥ | tato vivāho vavṛdhe kṛtaḥ sarvaguṇānvitaḥ
वहाँ की स्त्रियाँ सुभद्रा को साक्षात् पुलोमपुत्री शची ही समझने लगीं। तब सब गुणों से युक्त वह विवाह विधिपूर्वक आगे बढ़ा।
श्लोक 40 (1.242.40)
तस्याः पाणिं गृहीत्वा तु मन्त्रैर्होमपुरस्कृतम् । सुभद्रया बभौ जिष्णुः शच्या इव शचीपतिः ॥
tasyāḥ pāṇiṃ gṛhītvā tu mantrairhomapuraskṛtam | subhadrayā babhau jiṣṇuḥ śacyā iva śacīpatiḥ
होम करके मन्त्रों के साथ उसका पाणिग्रहण करने के बाद जिष्णु अर्जुन सुभद्रा के साथ वैसे ही शोभित हुए जैसे शची के साथ शचीपति।
श्लोक 41 (1.242.41)
सा जिष्णुमधिकं भेजे सुभद्रा चारुदर्शना । पार्थस्य सदृशी भद्रा रूपेण वयसा तथा ॥
sā jiṣṇumadhikaṃ bheje subhadrā cārudarśanā | pārthasya sadṛśī bhadrā rūpeṇa vayasā tathā
सुन्दरी सुभद्रा जिष्णु के प्रति और भी अधिक अनुरक्त हो गई; भद्रा रूप और आयु में पार्थ के योग्य थी,
श्लोक 42 (1.242.42)
सुभद्रायाश्च पार्थोऽपि सदृशो रूपलक्षणैः । इत्यूचुश्च तदा देवाः प्रीताः सेन्द्रपुरोगमाः ॥
subhadrāyāśca pārtho'pi sadṛśo rūpalakṣaṇaiḥ | ityūcuśca tadā devāḥ prītāḥ sendrapurogamāḥ
और पार्थ भी रूप और लक्षणों में सुभद्रा के योग्य थे; इन्द्र को आगे करके प्रसन्न देवताओं ने तब यही कहा।
श्लोक 43 (1.242.43)
एवं निवेश्य देवास्ते गन्धर्वैः साप्सरोगणैः । आमन्त्र्य यादवाः सर्वे विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥
evaṃ niveśya devāste gandharvaiḥ sāpsarogaṇaiḥ | āmantrya yādavāḥ sarve viprajagmuryathāgatam
इस प्रकार दम्पती को स्थापित करके देवता गन्धर्वों और अप्सराओं के समूहों के साथ सब यादवों से विदा लेकर जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 44 (1.242.44)
यादवाः पार्थमामन्त्र्य अन्तर्द्वीपं गतास्तदा । वासुदेवस्तदा पार्थमुवाच यदुनन्दनः ॥
yādavāḥ pārthamāmantrya antardvīpaṃ gatāstadā | vāsudevastadā pārthamuvāca yadunandanaḥ
यादव भी पार्थ से विदा लेकर तब अन्तर्द्वीप चले गए। तब यदुनन्दन वासुदेव ने पार्थ से कहा—
वासुदेव उवाच
श्लोक 45 (1.242.45)
द्वाविंशद्दिवसान्पार्थ इहोष्य भरतर्षभ । मामकं रथमारुह्य शैब्यसुग्रीवयोजितम् ॥
dvāviṃśaddivasānpārtha ihoṣya bharatarṣabha | māmakaṃ rathamāruhya śaibyasugrīvayojitam
"हे भरतश्रेष्ठ पार्थ, यहाँ बाईस दिन रहकर, शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से जुते मेरे रथ पर चढ़कर,
श्लोक 46 (1.242.46)
सुभद्रया सुखं पार्थ खाण्डवप्रस्थमाविश । यादवैः सहितः पश्चादागमिष्यामि भारत । यतिवेषेण नियतो वस त्वं रुक्मिणीगृहे ॥
subhadrayā sukhaṃ pārtha khāṇḍavaprasthamāviśa | yādavaiḥ sahitaḥ paścādāgamiṣyāmi bhārata | yativeṣeṇa niyato vasa tvaṃ rukmiṇīgṛhe
हे पार्थ, सुभद्रा के साथ सुखपूर्वक खाण्डवप्रस्थ चले जाना। हे भारत, मैं बाद में यादवों के साथ आऊँगा। तब तक तुम संन्यासी के वेष में संयम से रुक्मिणी के भवन में रहो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (1.242.47)
एवमुक्त्वा प्रचक्राम अन्तर्द्वीपं जनार्दनः । कृतोद्वाहस्ततः पार्थः कृतकार्योऽभवत्तदा ॥
evamuktvā pracakrāma antardvīpaṃ janārdanaḥ | kṛtodvāhastataḥ pārthaḥ kṛtakāryo'bhavattadā
ऐसा कहकर जनार्दन अन्तर्द्वीप की ओर चल दिए। विवाह हो जाने से पार्थ तब कृतार्थ हो गए।
श्लोक 48 (1.242.48)
तस्यां चोपगतो भावः पार्थस्य सुमहात्मनः । तस्मिन्भावः सुभद्राया अन्योन्यं समवर्धत ॥
tasyāṃ copagato bhāvaḥ pārthasya sumahātmanaḥ | tasminbhāvaḥ subhadrāyā anyonyaṃ samavardhata
महात्मा पार्थ के मन में सुभद्रा के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ और सुभद्रा के मन में उनके प्रति; दोनों का परस्पर प्रेम बढ़ता गया।
श्लोक 49 (1.242.49)
स तथा युयुजे वीरो भद्रया भरतर्षभः । अभिनिष्पन्नया रामः सीतयेव समन्वितः ॥
sa tathā yuyuje vīro bhadrayā bharatarṣabhaḥ | abhiniṣpannayā rāmaḥ sītayeva samanvitaḥ
वह भरतश्रेष्ठ वीर अपनी सर्वथा योग्य भद्रा के साथ वैसे ही जुड़ गए जैसे राम सीता के साथ।
श्लोक 50 (1.242.50)
अपि जिष्णुर्विजज्ञे तां ह्रीं श्रियं सन्नतिक्रियाम् । देवतानां वरस्त्रीणां रूपेण सदृशीं सतीम् ॥
api jiṣṇurvijajñe tāṃ hrīṃ śriyaṃ sannatikriyām | devatānāṃ varastrīṇāṃ rūpeṇa sadṛśīṃ satīm
जिष्णु ने उसे लज्जा और लक्ष्मी का रूप, विनम्र आचरण वाली, सती और रूप में देवताओं की श्रेष्ठ स्त्रियों के समान जाना।
श्लोक 51 (1.242.51)
स प्रकृत्या श्रिया दीप्त्या संदिदीपे तयाऽधिकम् । उद्यत्सहस्रदीप्तांशुः शरदीव दिवाकरः ॥
sa prakṛtyā śriyā dīptyā saṃdidīpe tayā'dhikam | udyatsahasradīptāṃśuḥ śaradīva divākaraḥ
स्वभाव से ही कान्ति और तेज से दीप्त अर्जुन उसके कारण और भी अधिक चमक उठे, जैसे शरद् ऋतु में उदय होता सहस्र किरणों वाला सूर्य।
श्लोक 52 (1.242.52)
सा तु तं मनुजव्याघ्रमनुरक्ता यशस्विनी । कन्यापुरगता भूत्वा तत्परा समपद्यत ॥
sā tu taṃ manujavyāghramanuraktā yaśasvinī | kanyāpuragatā bhūtvā tatparā samapadyata
और वह यशस्विनी उस पुरुषसिंह में अनुरक्त होकर कन्याओं के अन्तःपुर में लौट गई और पूरी तरह उन्हीं में मन लगाए रही।