आदि पर्व · अध्याय 243
सुभद्रा का रथ हाँककर अर्जुन के साथ द्वारका से प्रस्थान
अर्जुन सुभद्रा से कहते हैं कि वह ब्राह्मणों को भोजन कराए और व्रत पूरा करने के बहाने राजभवन से श्रीकृष्ण का शस्त्रों से सजा रथ ले आए। सुभद्रा वैसा ही करती है, ब्राह्मणों को धन और भोजन देती है, और लगाम पकड़ने में अपने समान किसी को न जानकर स्वयं सारथि बनती है; अर्जुन संन्यासी वेष त्यागकर कवच और इन्द्र का दिया मुकुट धारण कर रथ पर चढ़ते हैं। कन्याएँ सुभद्रा को ऐसे पति के लिए बधाई देती हैं; रथ की गर्जना सुनकर नगरवासियों में कुछ प्रशंसा करते हैं तो कुछ क्रोध से शस्त्र लेकर टूट पड़ते हैं, और अर्जुन किसी को हानि पहुँचाए बिना महलों पर बाण बरसाते हुए रैवतक द्वार से निकल जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.243.1)
वृष्ण्यन्धकपुरात्तस्मादपयातुं धनञ्जयः । विनिश्चित्य तया सार्धं सुभद्रामिदमब्रवीत् ॥
vṛṣṇyandhakapurāttasmādapayātuṃ dhanañjayaḥ | viniścitya tayā sārdhaṃ subhadrāmidamabravīt
उसके साथ वृष्णि और अन्धकों की उस नगरी से निकल जाने का निश्चय करके धनंजय ने सुभद्रा से यह कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 2 (1.243.2)
द्विजानां गुणमुख्यानां यथार्हं प्रतिपादय । भोज्यैर्भक्ष्यैश्च कामैश्च स्वपुरीं प्रतियास्यताम् ॥
dvijānāṃ guṇamukhyānāṃ yathārhaṃ pratipādaya | bhojyairbhakṣyaiśca kāmaiśca svapurīṃ pratiyāsyatām
"अपने-अपने नगर लौटने वाले श्रेष्ठ गुणों वाले ब्राह्मणों को भोजन, पकवान और उनकी मनचाही वस्तुएँ देकर यथायोग्य सत्कार करो।
श्लोक 3 (1.243.3)
आत्मनश्च समुद्दिश्य महाव्रतसमापनम् । गच्छ भद्रे स्वयं तूर्णं महाराजनिवेशनम् ॥
ātmanaśca samuddiśya mahāvratasamāpanam | gaccha bhadre svayaṃ tūrṇaṃ mahārājaniveśanam
फिर हे भद्रे, अपने महाव्रत की समाप्ति का बहाना करके स्वयं शीघ्र महाराज के भवन जाओ।
श्लोक 4 (1.243.4)
तेजोबलजवोपेतैः शुक्लैर्हयवरोत्तमैः । वाजिभिः शैव्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः ॥
tejobalajavopetaiḥ śuklairhayavarottamaiḥ | vājibhiḥ śaivyasugrīvameghapuṣpabalāhakaiḥ
तेज, बल और वेग से युक्त श्रेष्ठ श्वेत घोड़ों, शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक से
श्लोक 5 (1.243.5)
युक्तं रथवरं तूर्णमिहानय सुसत्कृतम् । व्रतार्थमिति भाषित्वा सखीभिः सुभगे सह ॥
yuktaṃ rathavaraṃ tūrṇamihānaya susatkṛtam | vratārthamiti bhāṣitvā sakhībhiḥ subhage saha
जुते और भली-भाँति सजे उत्तम रथ को शीघ्र यहाँ ले आओ। हे सुभगे, सखियों के साथ जाकर कहना कि यह व्रत के लिए है;
श्लोक 6 (1.243.6)
क्षिप्रमादाय पर्येहि सह सर्वायुधेन च । अनुकर्षान्पताकाश्च तूणीरांश्च धनूंषि च ॥
kṣipramādāya paryehi saha sarvāyudhena ca | anukarṣānpatākāśca tūṇīrāṃśca dhanūṃṣi ca
उसे सब अस्त्र-शस्त्रों सहित शीघ्र लेकर लौट आओ, और अनुकर्ष, पताकाएँ, तरकश और धनुष भी;
श्लोक 7 (1.243.7)
सर्वान्रथवरे स्थाप्य सोत्सेधाश्च महागदाः ॥
sarvānrathavare sthāpya sotsedhāśca mahāgadāḥ
इन सबको उस उत्तम रथ पर रखवा लेना, और ऊँची-ऊँची बड़ी गदाएँ भी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (1.243.8)
अर्जुनेनैवमुक्ता सा सुभद्रा भद्रभाषिणी । जगाम नृपतेर्वेश्म सखीभिः सहिता तदा ॥
arjunenaivamuktā sā subhadrā bhadrabhāṣiṇī | jagāma nṛpaterveśma sakhībhiḥ sahitā tadā
अर्जुन के ऐसा कहने पर मधुरभाषिणी सुभद्रा अपनी सखियों के साथ तब राजभवन गई।
श्लोक 9 (1.243.9)
व्रतार्थमिति तत्रस्थान्रक्षिणो वाक्यमब्रवीत् । रथेनानेन यास्यामि महाव्रतसमापनम् ॥
vratārthamiti tatrasthānrakṣiṇo vākyamabravīt | rathenānena yāsyāmi mahāvratasamāpanam
वहाँ तैनात रक्षकों से उसने कहा, "यह व्रत के लिए है। मैं महाव्रत की समाप्ति के लिए इसी रथ से जाऊँगी।
सुभद्रोवाच
श्लोक 10 (1.243.10)
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन सायुधेनैव शार्ङ्गिणः । रथेन रमणीयेन प्रयास्यामि व्रतार्थिनी ॥
śaibyasugrīvayuktena sāyudhenaiva śārṅgiṇaḥ | rathena ramaṇīyena prayāsyāmi vratārthinī
शार्ङ्गधारी श्रीकृष्ण के इसी सुन्दर रथ से, जो शैब्य और सुग्रीव से जुता है और शस्त्रों से सज्जित है, मैं व्रत पूरा करने निकलूँगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (1.243.11)
सुभद्रयैवमुक्ते तु जनाः प्राञ्जलयोऽभवन् । योजयित्वा रथवरं कल्याणैरभिभाष्य ताम् ॥
subhadrayaivamukte tu janāḥ prāñjalayo'bhavan | yojayitvā rathavaraṃ kalyāṇairabhibhāṣya tām
सुभद्रा के ऐसा कहने पर लोगों ने हाथ जोड़ लिए; उन्होंने उत्तम रथ जोत दिया और उससे मंगल वचन कहे।
श्लोक 12 (1.243.12)
यथोक्तं सर्वमारोप्य आयुधानि च भामिनी । क्षिप्रमादाय कल्याणी सुभद्राऽर्जुनमब्रवीत् ॥
yathoktaṃ sarvamāropya āyudhāni ca bhāminī | kṣipramādāya kalyāṇī subhadrā'rjunamabravīt
कहे अनुसार सब कुछ और अस्त्र-शस्त्र भी रथ पर रखवाकर वह सुन्दरी, कल्याणी सुभद्रा शीघ्र रथ लेकर आई और अर्जुन से बोली—
सुभद्रोवाच
श्लोक 13 (1.243.13)
रथोऽयं रथिनां श्रेष्ठ आनीतस्तव शासनात् । स त्वं याहि यथाकामं कुरून्कौरवनन्दन ॥
ratho'yaṃ rathināṃ śreṣṭha ānītastava śāsanāt | sa tvaṃ yāhi yathākāmaṃ kurūnkauravanandana
"हे रथियों में श्रेष्ठ, आपकी आज्ञा से यह रथ ले आई हूँ। हे कौरवनन्दन, अब आप अपनी इच्छा के अनुसार कुरुदेश चलिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (1.243.14)
निवेद्य तु रथं भर्तुः सुभद्रा भद्रसंमता । ब्राह्मणानां तदा हृष्टा ददौ सा विविधं वसु ॥
nivedya tu rathaṃ bhartuḥ subhadrā bhadrasaṃmatā | brāhmaṇānāṃ tadā hṛṣṭā dadau sā vividhaṃ vasu
पति को रथ सौंपकर सबकी आदरणीया सुभद्रा ने तब प्रसन्न होकर ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का धन दिया।
श्लोक 15 (1.243.15)
स्नेहवन्ति च भोज्यानि प्रददावीप्सितानि च । यथाकामं यथाश्रद्धं वस्त्राणि विविधानि च ॥
snehavanti ca bhojyāni pradadāvīpsitāni ca | yathākāmaṃ yathāśraddhaṃ vastrāṇi vividhāni ca
उसने उन्हें घी से बने मनचाहे भोजन दिए और उनकी इच्छा तथा अपनी श्रद्धा के अनुसार अनेक प्रकार के वस्त्र भी दिए।
श्लोक 16 (1.243.16)
तर्पिता विविधैर्भोज्यैस्तान्यवाप्य वसूनि च । ब्राह्मणाः स्वगृहं जग्मुः प्रयुज्य परमाशिषः ॥
tarpitā vividhairbhojyaistānyavāpya vasūni ca | brāhmaṇāḥ svagṛhaṃ jagmuḥ prayujya paramāśiṣaḥ
तरह-तरह के भोजन से तृप्त होकर और वह धन पाकर ब्राह्मण उत्तम आशीर्वाद देते हुए अपने घर चले गए।
श्लोक 17 (1.243.17)
सुभद्रया तु विज्ञप्तः पूर्वमेव धनञ्जयः । अभीशुग्रहणे पार्थ न मेऽस्ति सदृशो भुवि ॥
subhadrayā tu vijñaptaḥ pūrvameva dhanañjayaḥ | abhīśugrahaṇe pārtha na me'sti sadṛśo bhuvi
धनंजय से सुभद्रा पहले ही कह चुकी थी, "हे पार्थ, लगाम पकड़ने में पृथ्वी पर मेरे समान कोई नहीं है।"
श्लोक 18 (1.243.18)
तस्मात्सा पूर्वमारुह्य रश्मीञ्जग्राह माधवी । सोदरा वासुदेवस्य कृतस्वस्त्ययना हयान् ॥
tasmātsā pūrvamāruhya raśmīñjagrāha mādhavī | sodarā vāsudevasya kṛtasvastyayanā hayān
इसलिए वासुदेव की बहन माधवी ने, जिसका स्वस्तिवाचन हो चुका था, पहले रथ पर चढ़कर घोड़ों की लगाम थाम ली।
श्लोक 19 (1.243.19)
व्यत्ययित्वा तु तल्लिङ्गं यतिवेषं धनञ्जयः । आमुच्य कवचं वीरः समुच्छ्रितमहद्धनुः ॥
vyatyayitvā tu talliṅgaṃ yativeṣaṃ dhanañjayaḥ | āmucya kavacaṃ vīraḥ samucchritamahaddhanuḥ
धनंजय ने अपना वह चिह्न, संन्यासी का वेष, उतार दिया; उस वीर ने कवच पहना और अपना विशाल धनुष उठाया,
श्लोक 20 (1.243.20)
आरुरोह रथश्रेष्ठं शुक्लवासा धनञ्जयः । महेन्द्रदत्तं मुकुटं तथैवाभरणानि च ॥
āruroha rathaśreṣṭhaṃ śuklavāsā dhanañjayaḥ | mahendradattaṃ mukuṭaṃ tathaivābharaṇāni ca
और श्वेत वस्त्र धारण किए धनंजय उस श्रेष्ठ रथ पर चढ़ गए। महेन्द्र के दिए मुकुट और आभूषणों को भी धारण करके
श्लोक 21 (1.243.21)
अलङ्कृत्य तु कौन्तेयः प्रयातुमुपचक्रमे । ततः कन्यापुरे घोषस्तुमुलः समपद्यत ॥
alaṅkṛtya tu kaunteyaḥ prayātumupacakrame | tataḥ kanyāpure ghoṣastumulaḥ samapadyata
अलंकृत कुन्तीपुत्र चलने को तैयार हुए। तभी कन्याओं के अन्तःपुर में भारी कोलाहल मच गया।
श्लोक 22 (1.243.22)
दृष्ट्वा नववरं पार्थं बाणखड्गधनुर्धरम् । अभीशुहस्तां सुश्रोणीमर्जुनेन रथे स्थिताम् ॥
dṛṣṭvā navavaraṃ pārthaṃ bāṇakhaḍgadhanurdharam | abhīśuhastāṃ suśroṇīmarjunena rathe sthitām
बाण, खड्ग और धनुष धारण किए नए वर पार्थ को, और हाथ में लगाम लिए अर्जुन के साथ रथ पर खड़ी उस सुन्दरी को देखकर
श्लोक 23 (1.243.23)
ऊचुः कन्यास्तदा यान्तीं वासुदेवसहोदराम् । सर्वकामसमृद्धा त्वं सुभद्रे भद्रभाषिणि ॥
ūcuḥ kanyāstadā yāntīṃ vāsudevasahodarām | sarvakāmasamṛddhā tvaṃ subhadre bhadrabhāṣiṇi
कन्याओं ने तब जाती हुई वासुदेव की बहन से कहा, "हे मधुरभाषिणी सुभद्रे, तुम्हारी सारी कामनाएँ पूरी हो गईं,
कन्या ऊचुः
श्लोक 24 (1.243.24)
वासुदेवप्रियं लब्ध्वा भर्तारं वीरमर्जुनम् । सर्वसीमन्तिनीनां त्वां श्रेष्ठां कृष्णसहोदरीम् ॥
vāsudevapriyaṃ labdhvā bhartāraṃ vīramarjunam | sarvasīmantinīnāṃ tvāṃ śreṣṭhāṃ kṛṣṇasahodarīm
क्योंकि तुमने वासुदेव के प्रिय वीर अर्जुन को पति के रूप में पाया है। हे कृष्ण की बहन, हम तुम्हें सब सौभाग्यवती स्त्रियों में श्रेष्ठ मानती हैं,
श्लोक 25 (1.243.25)
मन्यामहे महाभागे सुभद्रे भद्रभाषिणि । यस्मात्सर्वमनुष्याणां श्रेष्ठो भर्ता तवार्जुनः ॥
manyāmahe mahābhāge subhadre bhadrabhāṣiṇi | yasmātsarvamanuṣyāṇāṃ śreṣṭho bhartā tavārjunaḥ
हे महाभागा, मधुरभाषिणी सुभद्रे, क्योंकि तुम्हारे पति अर्जुन सब मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 26 (1.243.26)
उपपन्नस्त्वया वीरः सर्वलोकमहारथः । हे प्रयाहि गृहान्भद्रे सुहृद्भिः संगमोऽस्तु ते ॥
upapannastvayā vīraḥ sarvalokamahārathaḥ | he prayāhi gṛhānbhadre suhṛdbhiḥ saṃgamo'stu te
तुम्हें सारे संसार का महारथी वीर मिला है। हे भद्रे, अब घर जाओ; अपने प्रियजनों से तुम्हारा मिलन हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (1.243.27)
एवमुक्ता प्रहृष्टाभिः सखीभिः प्रतिनन्दिता । भद्रा भद्रजवोपेतानश्वान्पुनरचोदयत् ॥
evamuktā prahṛṣṭābhiḥ sakhībhiḥ pratinanditā | bhadrā bhadrajavopetānaśvānpunaracodayat
प्रसन्न सखियों के ऐसा कहकर अभिनन्दन करने पर भद्रा ने उत्तम वेग वाले घोड़ों को फिर से हाँका।
श्लोक 28 (1.243.28)
पार्श्वे चामरहस्ता सा सखी तस्याङ्गनाऽभवत् । ततः कन्यापुरद्वारात्सघोषादभिनिःसृतम् ॥
pārśve cāmarahastā sā sakhī tasyāṅganā'bhavat | tataḥ kanyāpuradvārātsaghoṣādabhiniḥsṛtam
उसके बगल में उसकी एक सखी हाथ में चँवर लिए खड़ी थी। तब कन्याओं के अन्तःपुर के द्वार से गर्जना करता हुआ निकला
श्लोक 29 (1.243.29)
ददृशुस्तं रथश्रेष्ठं जना जीमूतनिस्वनम् । सुभद्रासङ्गृहीतस्य रथस्य महतः स्वनम् ॥
dadṛśustaṃ rathaśreṣṭhaṃ janā jīmūtanisvanam | subhadrāsaṅgṛhītasya rathasya mahataḥ svanam
वह श्रेष्ठ रथ लोगों ने देखा, जो मेघ के समान गरज रहा था; और सुभद्रा द्वारा हाँके जा रहे उस विशाल रथ की ध्वनि
श्लोक 30 (1.243.30)
मेघस्वनमिवाकाशे शुश्रुवुः पुरवासिनः । सुभद्रया तु संपन्ने तिष्ठन्रथवरेऽर्जुनः ॥
meghasvanamivākāśe śuśruvuḥ puravāsinaḥ | subhadrayā tu saṃpanne tiṣṭhanrathavare'rjunaḥ
नगरवासियों ने आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट की तरह सुनी। सुभद्रा से सुशोभित उस उत्तम रथ पर खड़े अर्जुन
श्लोक 31 (1.243.31)
प्रबभौ च तयोपेतः कैलास इव गङ्गया । पार्थः सुभद्रासहितो विरराज महारथः ॥
prababhau ca tayopetaḥ kailāsa iva gaṅgayā | pārthaḥ subhadrāsahito virarāja mahārathaḥ
उसके साथ ऐसे शोभित हुए जैसे गंगा के साथ कैलास। सुभद्रा के साथ महारथी पार्थ ऐसे विराजमान थे
श्लोक 32 (1.243.32)
विराजते यथा शक्रो राजञ्शच्या समन्वितः । सुभद्रां प्रेक्ष्य पार्थेन ह्रियमाणां यशस्विनीम् ॥
virājate yathā śakro rājañśacyā samanvitaḥ | subhadrāṃ prekṣya pārthena hriyamāṇāṃ yaśasvinīm
जैसे हे राजन्, शची के साथ इन्द्र विराजते हैं। पार्थ द्वारा ले जाई जा रही यशस्विनी सुभद्रा को देखकर
श्लोक 33 (1.243.33)
चक्रुः किलकिलाशब्दानासाद्य बहवो जनाः । दाशार्हाणां कुलस्य श्रीः सुभद्रा भद्रभाषिणी ॥
cakruḥ kilakilāśabdānāsādya bahavo janāḥ | dāśārhāṇāṃ kulasya śrīḥ subhadrā bhadrabhāṣiṇī
बहुत-से लोग पास आकर किलकारियाँ भरने लगे: "दाशार्हकुल की शोभा, मधुरभाषिणी सुभद्रा
श्लोक 34 (1.243.34)
अभिकामा सकामेन पार्थेन सह गच्छति । अथापरे तु संक्रुद्धा गृह्णीत घ्नत माचिरम् ॥
abhikāmā sakāmena pārthena saha gacchati | athāpare tu saṃkruddhā gṛhṇīta ghnata māciram
अपनी इच्छा से, उसे चाहने वाले पार्थ के साथ जा रही है!" परन्तु दूसरे लोग क्रोधित होकर बोले, "पकड़ो! मारो! देर मत करो!"
श्लोक 35 (1.243.35)
इति संवार्य शस्त्राणि ववर्षुरभितो दिशम् । इति संभाषमाणानां स नादः सुमहानभूत् ॥
iti saṃvārya śastrāṇi vavarṣurabhito diśam | iti saṃbhāṣamāṇānāṃ sa nādaḥ sumahānabhūt
ऐसा कहकर वे शस्त्र लेकर चारों ओर बरसाने लगे। उनके इस प्रकार चिल्लाने से भारी कोलाहल मच गया।
श्लोक 36 (1.243.36)
स तेन जनघोषेण वीरो गज इवार्दितः । ववर्ष शरवर्षाणि न तु कंचन रोषयत् ॥
sa tena janaghoṣeṇa vīro gaja ivārditaḥ | vavarṣa śaravarṣāṇi na tu kaṃcana roṣayat
लोगों के उस कोलाहल से पीड़ित हाथी की तरह उस वीर ने बाणों की वर्षा की, परन्तु किसी को चोट नहीं पहुँचाई।
श्लोक 37 (1.243.37)
मुमोच निशितान्बाणान्दीप्यमानान्स्वतेजसा । प्रासादवरसङ्घेषु हर्म्येषु भवनेषु च ॥
mumoca niśitānbāṇāndīpyamānānsvatejasā | prāsādavarasaṅgheṣu harmyeṣu bhavaneṣu ca
उन्होंने अपने तेज से दमकते तीखे बाण श्रेष्ठ प्रासादों के समूहों, हवेलियों और भवनों पर छोड़े,
श्लोक 38 (1.243.38)
क्षोभयित्वा पुरश्रेष्ठं गरुत्मानिव सागरम् । प्रेक्षन्रैवतकद्वारं निर्ययौ भरतर्षभः ॥
kṣobhayitvā puraśreṣṭhaṃ garutmāniva sāgaram | prekṣanraivatakadvāraṃ niryayau bharatarṣabhaḥ
और जैसे गरुड़ समुद्र को क्षुब्ध कर देते हैं, वैसे ही उस श्रेष्ठ नगरी को क्षुब्ध करके भरतश्रेष्ठ अर्जुन रैवतक द्वार की ओर देखते हुए बाहर निकल गए।