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आदि पर्व · अध्याय 244

अर्जुन द्वारा सुभद्रा-हरण और बलराम का क्रोध

सुभद्रा के सारथ्य में अर्जुन द्वारका से निकलते हैं, तब कृष्ण की अनुपस्थिति में नगर के रक्षक विपृथु सेना लेकर उनका सामना करते हैं; अर्जुन किसी का वध किए बिना यादव योद्धाओं को निरस्त्र कर देते हैं, और कृष्ण की योजना जानने वाले विपृथु उन्हें गले लगाकर कृष्ण के रथ पर विदा करते हैं। सैनिक सुधर्मा सभा में जाकर सूचना देते हैं और वृष्णि, भोज तथा अन्धक क्रोध में शस्त्र उठा लेते हैं। बलराम उन्हें कृष्ण के बोलने तक रोकते हैं, फिर अर्जुन की कृतघ्नता की निन्दा करके पृथ्वी को कौरवों से रहित करने की प्रतिज्ञा करते हैं।

अध्याय 243अध्याय-सूचीअध्याय 245

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.244.1)

शासनात्पुरुषेन्द्रस्य बलेन महता बली । गिरौ रैवतके नित्यं बभूव विपृथुश्रवाः ॥

śāsanātpuruṣendrasya balena mahatā balī | girau raivatake nityaṃ babhūva vipṛthuśravāḥ

नरश्रेष्ठ (श्रीकृष्ण) की आज्ञा से बलवान विपृथुश्रवा विशाल सेना के साथ सदा रैवतक पर्वत पर तैनात रहते थे।

श्लोक 2 (1.244.2)

प्रवासे वासुदेवस्य तस्मिन्हलधरोपमः । संबभूव तदा गोप्ता पुरस्य पुरवर्धनः ॥

pravāse vāsudevasya tasminhaladharopamaḥ | saṃbabhūva tadā goptā purasya puravardhanaḥ

वासुदेव के प्रवास में रहते हुए हलधर के समान वही उस समय नगर के रक्षक और उसकी समृद्धि बढ़ाने वाले थे।

श्लोक 3 (1.244.3)

प्राप्य पाण्डवनिर्याणं निर्ययौ विपृथुश्रवाः । निशम्य पुरनिर्घोषं स्वमनीकमचोदयत् ॥

prāpya pāṇḍavaniryāṇaṃ niryayau vipṛthuśravāḥ | niśamya puranirghoṣaṃ svamanīkamacodayat

पाण्डुपुत्र के निकल जाने का समाचार पाकर विपृथुश्रवा भी निकल पड़े; नगर का कोलाहल सुनकर उन्होंने अपनी सेना को आगे बढ़ाया।

श्लोक 4 (1.244.4)

सोऽभिपत्य तदाध्वानं ददर्श पुरुषर्षभम् । निःसृतं द्वारकाद्वारादंशुमन्तमिवाम्बरात् ॥

so'bhipatya tadādhvānaṃ dadarśa puruṣarṣabham | niḥsṛtaṃ dvārakādvārādaṃśumantamivāmbarāt

मार्ग पर दौड़ते हुए उन्होंने उस नरश्रेष्ठ को द्वारका के द्वार से ऐसे निकलते देखा जैसे आकाश से सूर्य निकलता है,

श्लोक 5 (1.244.5)

सविद्युतमिवाम्भोदं प्रेक्षतां तं धनुर्धरम् । पार्थमानर्तयोधानां विस्मयः समपद्यत ॥

savidyutamivāmbhodaṃ prekṣatāṃ taṃ dhanurdharam | pārthamānartayodhānāṃ vismayaḥ samapadyata

मानो बिजली से युक्त मेघ हो। उस धनुर्धर पार्थ को देखते हुए आनर्त के योद्धा विस्मय में पड़ गए।

श्लोक 6 (1.244.6)

उदीर्णरथनागाश्वमनीकमभिवीक्ष्य तत् । उवाच परमप्रीता सुभद्रा भद्रभाषिणी ॥

udīrṇarathanāgāśvamanīkamabhivīkṣya tat | uvāca paramaprītā subhadrā bhadrabhāṣiṇī

रथों, हाथियों और घोड़ों से उमड़ती उस सेना को देखकर मधुरभाषिणी सुभद्रा अत्यन्त प्रसन्न होकर बोलीं —

सुभद्रोवाच

श्लोक 7 (1.244.7)

संग्रहीतुमभिप्रायो दीर्घकालकृतो मम । युध्यमानस्य सङ्ग्रामे रथं तव नरर्षभ ॥

saṃgrahītumabhiprāyo dīrghakālakṛto mama | yudhyamānasya saṅgrāme rathaṃ tava nararṣabha

"हे नरश्रेष्ठ, बहुत दिनों से मेरी इच्छा रही है कि युद्ध में लड़ते समय मैं आपका रथ हाँकूँ।

श्लोक 8 (1.244.8)

ओजस्तेजोद्युतिबलैरन्वितस्य महात्मनः । पार्थ ते सारथित्वेन भविता शिक्षितास्म्यहम् ॥

ojastejodyutibalairanvitasya mahātmanaḥ | pārtha te sārathitvena bhavitā śikṣitāsmyaham

हे पार्थ, ओज, तेज, कान्ति और बल से सम्पन्न आप जैसे महात्मा की सारथी बनकर मैं दिखा दूँगी कि मैं भली-भाँति सीखी हुई हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (1.244.9)

एवमुक्तः प्रियां प्रीतः प्रत्युवाच नरर्षभः । चोदयाश्वानसंसक्तान्विशतु विपृथोर्बलम् ॥

evamuktaḥ priyāṃ prītaḥ pratyuvāca nararṣabhaḥ | codayāśvānasaṃsaktānviśatu vipṛthorbalam

ऐसा कहे जाने पर उस नरश्रेष्ठ ने प्रसन्न होकर अपनी प्रिया को उत्तर दिया — "घोड़ों को बिना रुके हाँको; रथ विपृथु की सेना में प्रवेश करे।

अर्जुन उवाच

श्लोक 10 (1.244.10)

बहुभिर्युध्यमानस्य तावकान्विजिघांसतः । पश्य बाहुबलं भद्रे शरान्विक्षिपतो मम ॥

bahubhiryudhyamānasya tāvakānvijighāṃsataḥ | paśya bāhubalaṃ bhadre śarānvikṣipato mama

हे भद्रे, अनेक योद्धाओं से लड़ते और बाण बरसाते हुए मेरी भुजाओं का बल देखो, यद्यपि मैं तुम्हारे स्वजनों का वध नहीं चाहता।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (1.244.11)

एवमुक्ता तदा भद्रा पार्थेन भरतर्षभ । चुचोद साश्वान्संहृष्टा ते ततो विविशुर्बलम् ॥

evamuktā tadā bhadrā pārthena bharatarṣabha | cucoda sāśvānsaṃhṛṣṭā te tato viviśurbalam

हे भरतश्रेष्ठ, पार्थ के ऐसा कहने पर भद्रा ने हर्षपूर्वक घोड़ों को हाँका और वे सेना में घुस गए।

श्लोक 12 (1.244.12)

तदाहतमहावाद्यं समुदग्रध्वजायुतम् । अनीकं विपृथोर्हृष्टं पार्थमेवान्ववर्तत ॥

tadāhatamahāvādyaṃ samudagradhvajāyutam | anīkaṃ vipṛthorhṛṣṭaṃ pārthamevānvavartata

तब बड़े-बड़े वाद्य बजाती और ऊँची ध्वजाएँ फहराती विपृथु की सेना उत्साह से पार्थ की ओर ही मुड़ी।

श्लोक 13 (1.244.13)

रथैर्बहुविधाकारैः सदश्वैश्च महाजवैः । किरन्तः शरवर्षाणि परिवव्रुर्धनञ्जयम् ॥

rathairbahuvidhākāraiḥ sadaśvaiśca mahājavaiḥ | kirantaḥ śaravarṣāṇi parivavrurdhanañjayam

अनेक प्रकार के रथों और अत्यन्त वेगवान उत्तम घोड़ों के साथ बाणों की वर्षा करते हुए उन्होंने धनञ्जय को घेर लिया।

श्लोक 14 (1.244.14)

तेषामस्त्राणि संवार्य दिव्यास्त्रेण महास्त्रवित् । आवृणोन्महदाकाशं शरैः परपुरञ्जयः ॥

teṣāmastrāṇi saṃvārya divyāstreṇa mahāstravit | āvṛṇonmahadākāśaṃ śaraiḥ parapurañjayaḥ

दिव्य अस्त्र से उनके अस्त्रों को रोककर महान अस्त्रों के ज्ञाता, शत्रुनगरविजयी अर्जुन ने अपने बाणों से विशाल आकाश को ढक दिया।

श्लोक 15 (1.244.15)

तेषां बाणान्महाबाहुर्मुकुटान्यङ्गदानि च । चिच्छेद निशितैर्बाणैः शरांश्चैव धनूंषि च ॥

teṣāṃ bāṇānmahābāhurmukuṭānyaṅgadāni ca | ciccheda niśitairbāṇaiḥ śarāṃścaiva dhanūṃṣi ca

उस महाबाहु ने तीखे बाणों से उनके बाण, मुकुट और बाजूबंद तथा उनके शर और धनुष भी काट डाले।

श्लोक 16 (1.244.16)

युगानीषान्वरूथानि यन्त्राणि विविधानि च । अजिघांसन्परान्पार्थश्चिच्छेद निशितैः शरैः ॥

yugānīṣānvarūthāni yantrāṇi vividhāni ca | ajighāṃsanparānpārthaściccheda niśitaiḥ śaraiḥ

विरोधियों को मारने की इच्छा न रखते हुए पार्थ ने तीखे बाणों से उनके जुए, ईषादण्ड, रथ-रक्षक आवरण और अनेक प्रकार के यन्त्र काट डाले।

श्लोक 17 (1.244.17)

विधनुष्कान्विकवचान्विरथांश्च महारथान् । कृत्वा पार्थः प्रियां प्रीतः प्रेक्ष्यतामित्यदर्शयत् ॥

vidhanuṣkānvikavacānvirathāṃśca mahārathān | kṛtvā pārthaḥ priyāṃ prītaḥ prekṣyatāmityadarśayat

उन महारथियों को धनुषहीन, कवचहीन और रथहीन करके पार्थ ने प्रसन्न होकर अपनी प्रिया को दिखाया — "देखो!"

श्लोक 18 (1.244.18)

सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सुभद्रा पार्थमब्रवीत् । अवाप्तार्थाऽस्मि भद्रं ते याहि पार्थ यथासुखम् ॥

sā dṛṣṭvā mahadāścaryaṃ subhadrā pārthamabravīt | avāptārthā'smi bhadraṃ te yāhi pārtha yathāsukham

यह महान आश्चर्य देखकर सुभद्रा ने पार्थ से कहा — "मेरी इच्छा पूरी हुई। आपका कल्याण हो; हे पार्थ, अब सुखपूर्वक चलिए।"

श्लोक 19 (1.244.19)

स सक्तं पाण्डुपुत्रेण समीक्ष्य विपृथुर्बलम् । त्वरमाणोऽभिसंक्रम्य स्थीयतामित्यभाषत ॥

sa saktaṃ pāṇḍuputreṇa samīkṣya vipṛthurbalam | tvaramāṇo'bhisaṃkramya sthīyatāmityabhāṣata

अपनी सेना को पाण्डुपुत्र से उलझी देखकर विपृथु शीघ्रता से आगे बढ़े और बोले — "रुक जाओ!"

श्लोक 20 (1.244.20)

ततः सेनापतेर्वाक्यं नात्यवर्तन्त यादवाः । सागरे मारुतोद्धूता वेलामिव महोर्मयः ॥

tataḥ senāpatervākyaṃ nātyavartanta yādavāḥ | sāgare mārutoddhūtā velāmiva mahormayaḥ

यादवों ने अपने सेनापति की बात का उल्लंघन नहीं किया, जैसे वायु से उठी समुद्र की बड़ी लहरें तट को नहीं लाँघतीं।

श्लोक 21 (1.244.21)

ततो रथवरात्तूर्णमवरुह्य नरर्षभः । अभिगम्य नरव्याघ्रं प्रहृष्टः परिषस्वजे ॥

tato rathavarāttūrṇamavaruhya nararṣabhaḥ | abhigamya naravyāghraṃ prahṛṣṭaḥ pariṣasvaje

तब वह नरश्रेष्ठ शीघ्र अपने श्रेष्ठ रथ से उतरा और उस नरव्याघ्र के पास जाकर प्रसन्नता से उन्हें गले लगा लिया।

श्लोक 22 (1.244.22)

सोऽब्रवीत्पार्थमासाद्य दीर्घकालमिदं तव । निवासमभिजानामि शङ्खचक्रगदाधरात् ॥

so'bravītpārthamāsādya dīrghakālamidaṃ tava | nivāsamabhijānāmi śaṅkhacakragadādharāt

पार्थ के पास आकर उसने कहा — "शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले से मुझे आपके यहाँ लम्बे समय तक रहने की बात ज्ञात है।

विपृथुरुवाच

श्लोक 23 (1.244.23)

न मेऽस्त्यविदितं किंचिद्यद्यदाचरितं त्वया । सुभद्रार्थं प्रलोभेन प्रीतस्तव जनार्दनः ॥

na me'styaviditaṃ kiṃcidyadyadācaritaṃ tvayā | subhadrārthaṃ pralobhena prītastava janārdanaḥ

आपने जो कुछ भी किया है, उसमें से कुछ भी मुझसे छिपा नहीं है। सुभद्रा के प्रति आपकी लालसा से जनार्दन आप पर प्रसन्न हैं।

श्लोक 24 (1.244.24)

प्राप्तस्य यतिलिङ्गेन वासितस्य धनञ्जय । बन्धुमानसि रामेण महेन्द्रावरजेन च ॥

prāptasya yatiliṅgena vāsitasya dhanañjaya | bandhumānasi rāmeṇa mahendrāvarajena ca

हे धनञ्जय, आप संन्यासी के वेश में यहाँ आए और ठहराए गए; बलराम और उपेन्द्र (श्रीकृष्ण) के रूप में आपके पास बन्धु-बान्धवों की कमी नहीं है।

श्लोक 25 (1.244.25)

मामेव च सदाकाङ्क्षी मन्त्रिणं मधुसूदनः । अन्तरेण सुभद्रां च त्वां च तात धनञ्जय ॥

māmeva ca sadākāṅkṣī mantriṇaṃ madhusūdanaḥ | antareṇa subhadrāṃ ca tvāṃ ca tāta dhanañjaya

हे तात धनञ्जय, मधुसूदन सदा से मुझे ही सुभद्रा और आपके बीच का मध्यस्थ बनाना चाहते थे।

श्लोक 26 (1.244.26)

इमं रथवरं दिव्यं सर्वशस्त्रसमन्वितम् । इदमेवानुयात्रं च निर्दिश्य गदपूर्वजः ॥

imaṃ rathavaraṃ divyaṃ sarvaśastrasamanvitam | idamevānuyātraṃ ca nirdiśya gadapūrvajaḥ

सब शस्त्रों से युक्त यह श्रेष्ठ दिव्य रथ और यही अनुचर-दल आपके लिए निर्दिष्ट करके गद के बड़े भाई,

श्लोक 27 (1.244.27)

अन्तर्द्वीपं तदा वीर गतो वृष्णिसुखावहः । दीर्घकालावरुद्धं त्वां संप्राप्तं प्रियया सह ॥

antardvīpaṃ tadā vīra gato vṛṣṇisukhāvahaḥ | dīrghakālāvaruddhaṃ tvāṃ saṃprāptaṃ priyayā saha

वृष्णियों को सुख देने वाले श्रीकृष्ण, हे वीर, अन्तर्द्वीप चले गए। आप बहुत समय से घर से दूर रहे हैं; अब अपनी प्रिया के साथ लौटते हुए

श्लोक 28 (1.244.28)

पश्यन्तु भ्रातरः सर्वे वज्रपाणिमिवामराः । आयाते तु दशार्हाणामृषभे शार्ङ्गधन्वनि ॥

paśyantu bhrātaraḥ sarve vajrapāṇimivāmarāḥ | āyāte tu daśārhāṇāmṛṣabhe śārṅgadhanvani

आपके सब भाई आपको वैसे ही देखें जैसे देवता वज्रधारी इन्द्र को देखते हैं। और जब दशार्हों में श्रेष्ठ शार्ङ्गधनुषधारी आएँगे,

श्लोक 29 (1.244.29)

भद्रामनुगमिष्यन्ति रत्नानि च वसूनि च । अरिष्टं याहि पन्थानं सुखी भव धनञ्जय ॥

bhadrāmanugamiṣyanti ratnāni ca vasūni ca | ariṣṭaṃ yāhi panthānaṃ sukhī bhava dhanañjaya

तब रत्न और धन भद्रा के पीछे-पीछे आएँगे। हे धनञ्जय, सकुशल अपने मार्ग पर जाइए और सुखी रहिए।

श्लोक 30 (1.244.30)

नष्टशोकैर्विशोकस्य सुहृद्भिः संगमोऽस्तु ते ॥

naṣṭaśokairviśokasya suhṛdbhiḥ saṃgamo'stu te

आप शोकरहित होकर उन सुहृदों से मिलें जिनका शोक मिट चुका है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (1.244.31)

ततो विपृथुमामन्त्र्य पार्थः प्रीतोऽभिवाद्य च । कृष्णस्य मतमास्थाय कृष्णस्य रथमास्थितः ॥

tato vipṛthumāmantrya pārthaḥ prīto'bhivādya ca | kṛṣṇasya matamāsthāya kṛṣṇasya rathamāsthitaḥ

तब पार्थ ने प्रसन्न होकर विपृथु से विदा ली और उन्हें प्रणाम किया; श्रीकृष्ण की सम्मति मानकर वे श्रीकृष्ण के रथ पर आरूढ़ हुए,

श्लोक 32 (1.244.32)

पूर्वमेव तु पार्थाय कृष्णेन विनियोजितम् । सर्वरत्नसुसंपूर्णं सर्वभोगसमन्वितम् ॥

pūrvameva tu pārthāya kṛṣṇena viniyojitam | sarvaratnasusaṃpūrṇaṃ sarvabhogasamanvitam

जिसे श्रीकृष्ण ने पहले ही पार्थ के लिए नियुक्त कर दिया था, जो सब प्रकार के रत्नों से भरा और सब भोग-सामग्री से युक्त था।

श्लोक 33 (1.244.33)

रथेन काञ्चनाङ्गेन कल्पितेन यथाविधि । शैब्यसुग्रीवयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ॥

rathena kāñcanāṅgena kalpitena yathāvidhi | śaibyasugrīvayuktena kiṅkiṇījālamālinā

उस रथ से, जिसका ढाँचा स्वर्ण का था, जो विधिपूर्वक सजा था, जिसमें शैब्य और सुग्रीव जुते थे और जो घुँघरुओं की जालियों से सुशोभित था,

श्लोक 34 (1.244.34)

सर्वशस्त्रोपपन्नेन जीमूतरवनादिना । ज्वलनार्चिःप्रकाशेन द्विषतां हर्षनाशिना ॥

sarvaśastropapannena jīmūtaravanādinā | jvalanārciḥprakāśena dviṣatāṃ harṣanāśinā

जो सब शस्त्रों से सम्पन्न था, मेघ-गर्जना के समान घोष करता था, अग्नि की ज्वाला-सा प्रकाशमान था और शत्रुओं का हर्ष नष्ट करने वाला था,

श्लोक 35 (1.244.35)

सन्नद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । युक्तः सेनानुयात्रेण रथमारोप्य माधवीम् । रथेनाकाशगेनैव पययौ स्वपुरं प्रति ॥

sannaddhaḥ kavacī khaḍgī baddhagodhāṅgulitravān | yuktaḥ senānuyātreṇa rathamāropya mādhavīm | rathenākāśagenaiva payayau svapuraṃ prati

कवच पहने, खड्ग धारण किए, गोह-चर्म के अंगुलित्र बाँधे और सैनिक अनुचरों के साथ उन्होंने माधवी को रथ पर बिठाया और मानो आकाश में उड़ते रथ से अपने नगर की ओर चल पड़े।

श्लोक 36 (1.244.36)

ह्रियमाणां तु तां दृष्ट्वा सुभद्रां सैनिका जनाः । विक्रोशन्तोऽद्रवन्सर्वे द्वारकामभितः पुरीम् ॥

hriyamāṇāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā subhadrāṃ sainikā janāḥ | vikrośanto'dravansarve dvārakāmabhitaḥ purīm

सुभद्रा को हरी जाती देखकर सब सैनिक चिल्लाते हुए द्वारकापुरी की ओर दौड़े।

श्लोक 37 (1.244.37)

ते समासाद्य सहिताः सुधर्मामभितः सभाम् । सभापालस्य तत्सर्वमाचख्युः पार्थविक्रमम् ॥

te samāsādya sahitāḥ sudharmāmabhitaḥ sabhām | sabhāpālasya tatsarvamācakhyuḥ pārthavikramam

सुधर्मा सभा में एकत्र होकर उन्होंने सभापाल को पार्थ का सारा पराक्रम कह सुनाया।

श्लोक 38 (1.244.38)

तेषां श्रुत्वा सभापालो भेरीं सान्नाहिकीं ततः । समाजघ्ने महाघोषां जाम्बूनदपरिष्कृताम् ॥

teṣāṃ śrutvā sabhāpālo bherīṃ sānnāhikīṃ tataḥ | samājaghne mahāghoṣāṃ jāmbūnadapariṣkṛtām

उनकी बात सुनकर सभापाल ने स्वर्ण से मढ़ी, भारी घोष वाली युद्ध-भेरी बजा दी।

श्लोक 39 (1.244.39)

क्षुब्धास्तेनाथ शब्देन भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा । अन्तर्द्वीपात्समुत्पेतुः सहसा सहितास्तदा । अन्नपानमपास्याथ समापेतुः समन्ततः ॥

kṣubdhāstenātha śabdena bhojavṛṣṇyandhakāstadā | antardvīpātsamutpetuḥ sahasā sahitāstadā | annapānamapāsyātha samāpetuḥ samantataḥ

उस शब्द से क्षुब्ध होकर भोज, वृष्णि और अन्धक अन्तर्द्वीप से एक साथ सहसा निकल पड़े; खाना-पीना छोड़कर वे चारों ओर से दौड़ आए।

श्लोक 40 (1.244.40)

तत्र जाम्बूनदाङ्गानि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च । मणिविद्रुमचित्राणि ज्वलिताग्निप्रभाणि च ॥

tatra jāmbūnadāṅgāni spardhyāstaraṇavanti ca | maṇividrumacitrāṇi jvalitāgniprabhāṇi ca

वहाँ सैकड़ों सिंहासन थे, जिनके ढाँचे स्वर्ण के थे, बहुमूल्य बिछौने थे, जो मणि और मूँगे से जड़े थे और प्रज्वलित अग्नि-से चमकते थे;

श्लोक 41 (1.244.41)

भेजिरे पुरुषव्याघ्रा वृष्ण्यन्धकमहारथाः । सिंहासनानि शतशो धिष्ण्यानीव हुताशनाः ॥

bhejire puruṣavyāghrā vṛṣṇyandhakamahārathāḥ | siṃhāsanāni śataśo dhiṣṇyānīva hutāśanāḥ

वृष्णि और अन्धक वंश के नरव्याघ्र महारथी उन पर ऐसे बैठे जैसे अग्नियाँ अपनी वेदियों पर विराजती हैं।

श्लोक 42 (1.244.42)

तेषां समुपविष्टानां देवानामिव सन्नये । आचख्यौ चेष्टितं जिष्णोः सभापालः सहानुगः ॥

teṣāṃ samupaviṣṭānāṃ devānāmiva sannaye | ācakhyau ceṣṭitaṃ jiṣṇoḥ sabhāpālaḥ sahānugaḥ

जब वे देवताओं की सभा की भाँति बैठ गए, तब सभापाल ने अपने सहायकों के साथ उन्हें जिष्णु का कृत्य कह सुनाया।

श्लोक 43 (1.244.43)

तच्छ्रुत्वा वृष्णिवीरास्ते मदसंरक्तलोचनाः । अमृष्यमाणाः पार्थस्य समुत्पेतुरहङ्कृताः ॥

tacchrutvā vṛṣṇivīrāste madasaṃraktalocanāḥ | amṛṣyamāṇāḥ pārthasya samutpeturahaṅkṛtāḥ

यह सुनकर मद से लाल आँखों वाले वृष्णि वीर पार्थ के कृत्य को सहन न कर सके और अहंकार से उछल पड़े।

श्लोक 44 (1.244.44)

योजयध्वं रथानाशु प्रासानाहरतेति च । धनूंषि च महार्हाणि कवचानि बृहन्ति च ॥

yojayadhvaṃ rathānāśu prāsānāharateti ca | dhanūṃṣi ca mahārhāṇi kavacāni bṛhanti ca

"शीघ्र रथ जोतो! भाले लाओ! और बहुमूल्य धनुष तथा बड़े-बड़े कवच भी!" — वे चिल्लाए।

श्लोक 45 (1.244.45)

सूतानुच्चुक्रुशुः केचिद्रथान्योजयतेति च । स्वयं च तुरगान्केचिदयुञ्जन्हेमभूषितान् ॥

sūtānuccukruśuḥ kecidrathānyojayateti ca | svayaṃ ca turagānkecidayuñjanhemabhūṣitān

कुछ अपने सारथियों से चिल्लाकर बोले — "रथ जोतो!", और कुछ ने स्वयं ही सोने से सजे घोड़े जोत लिए।

श्लोक 46 (1.244.46)

रथेष्वानीयमानेषु कवचेषु ध्वजेषु च । अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत्तुमुलं महत् ॥

ratheṣvānīyamāneṣu kavaceṣu dhvajeṣu ca | abhikrande nṛvīrāṇāṃ tadāsīttumulaṃ mahat

जब रथ, कवच और ध्वजाएँ लाई जा रही थीं, तब उन वीरों के ललकारने से बड़ा भारी कोलाहल मच गया।

श्लोक 47 (1.244.47)

वनमाली ततः क्षीबः कैलासशिखरोपमः । नीलवासा मदोत्सिक्त इदं वचनमब्रवीत् ॥

vanamālī tataḥ kṣībaḥ kailāsaśikharopamaḥ | nīlavāsā madotsikta idaṃ vacanamabravīt

तब वनमाला धारण करने वाले, मद से मत्त, कैलास-शिखर के समान ऊँचे, नीलवस्त्रधारी और गर्व से भरे बलराम ने यह वचन कहा —

बलराम उवाच

श्लोक 48 (1.244.48)

किमिदं कुरुथाप्रज्ञास्तूष्णींभूते जनार्दने । अस्य भावमविज्ञाय संक्रुद्धा मोघगर्जिताः ॥

kimidaṃ kuruthāprajñāstūṣṇīṃbhūte janārdane | asya bhāvamavijñāya saṃkruddhā moghagarjitāḥ

"हे मूर्खो, जनार्दन के चुप रहते तुम यह क्या कर रहे हो? उनका अभिप्राय जाने बिना तुम व्यर्थ क्रोध में गरज रहे हो।

श्लोक 49 (1.244.49)

एष तावदभिप्रायमाख्यातु स्वं महामतिः । यदस्य रुचिरं कर्तुं तत्कुरुध्वमतन्द्रिताः ॥

eṣa tāvadabhiprāyamākhyātu svaṃ mahāmatiḥ | yadasya ruciraṃ kartuṃ tatkurudhvamatandritāḥ

पहले ये महाबुद्धिमान अपना अभिप्राय बताएँ; जो इन्हें करना उचित लगे, वही तुम बिना आलस्य के करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 50 (1.244.50)

ततस्ते तद्वचः श्रुत्वा ग्राह्यरूपं हलायुधात् । तूष्णींभूतास्ततः सर्वे साधुसाध्विति चाब्रुवन् ॥

tataste tadvacaḥ śrutvā grāhyarūpaṃ halāyudhāt | tūṣṇīṃbhūtāstataḥ sarve sādhusādhviti cābruvan

हलायुध के ये मानने योग्य वचन सुनकर वे सब चुप हो गए और बोले — "ठीक है, ठीक है।"

श्लोक 51 (1.244.51)

समं वचो निशम्यैव बलदेवस्य धीमतः । पुनरेव सभामध्ये सर्वे ते समुपाविशन् ॥

samaṃ vaco niśamyaiva baladevasya dhīmataḥ | punareva sabhāmadhye sarve te samupāviśan

बुद्धिमान बलदेव के सन्तुलित वचन सुनकर वे सब फिर सभा के बीच बैठ गए।

श्लोक 52 (1.244.52)

ततोऽब्रवीद्वासुदेवं वचो रामः परन्तपः । त्रैलोक्यनाथ हे कृष्ण भूतभव्यभविष्यकृत् । किमवागुपविष्टोऽसि प्रेक्षमाणो जनार्दन ॥

tato'bravīdvāsudevaṃ vaco rāmaḥ parantapaḥ | trailokyanātha he kṛṣṇa bhūtabhavyabhaviṣyakṛt | kimavāgupaviṣṭo'si prekṣamāṇo janārdana

तब शत्रुओं को तपाने वाले बलराम ने वासुदेव से कहा — "हे त्रिलोकीनाथ कृष्ण, भूत, भविष्य और वर्तमान के कर्ता, हे जनार्दन, तुम चुपचाप बैठे क्यों देख रहे हो?

बलराम उवाच

श्लोक 53 (1.244.53)

सत्कृतस्त्वत्कृते पार्थः सर्वैरस्माभिरच्युत । न च सोऽर्हति तां पूजां दुर्बुद्धिः कुलपांसनः ॥

satkṛtastvatkṛte pārthaḥ sarvairasmābhiracyuta | na ca so'rhati tāṃ pūjāṃ durbuddhiḥ kulapāṃsanaḥ

हे अच्युत, तुम्हारे कारण हम सबने पार्थ का सत्कार किया; पर वह दुर्बुद्धि, कुलकलंक उस सम्मान के योग्य नहीं था।

श्लोक 54 (1.244.54)

को हि तत्रैव भुक्त्वान्नं भाजनं भेत्तुमर्हति । मन्यमानः कुले जातमात्मानं पुरुषः क्वचित् ॥

ko hi tatraiva bhuktvānnaṃ bhājanaṃ bhettumarhati | manyamānaḥ kule jātamātmānaṃ puruṣaḥ kvacit

अपने को कुलीन मानने वाला कौन पुरुष कहीं भोजन करके उसी पात्र को तोड़ना चाहेगा?

श्लोक 55 (1.244.55)

इच्छन्नेव हि संबन्धं कृतं पूर्वं च मानयन् । को हि नाम भवेनार्थी साहसेन समाचरेत् ॥

icchanneva hi saṃbandhaṃ kṛtaṃ pūrvaṃ ca mānayan | ko hi nāma bhavenārthī sāhasena samācaret

जो सचमुच सम्बन्ध चाहता हो और पहले से बने नाते का आदर करता हो, ऐसा कौन व्यक्ति बलपूर्वक काम करेगा?

श्लोक 56 (1.244.56)

सोऽवमन्य तथाऽस्माकमनादृत्य च केशवम् । प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ॥

so'vamanya tathā'smākamanādṛtya ca keśavam | prasahya hṛtavānadya subhadrāṃ mṛtyumātmanaḥ

इस प्रकार हमारा अपमान करके और केशव की उपेक्षा करके उसने आज बलपूर्वक सुभद्रा का हरण किया है — मानो अपनी ही मृत्यु को हर ले गया है।

श्लोक 57 (1.244.57)

कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम । मर्षयिष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरगः ॥

kathaṃ hi śiraso madhye kṛtaṃ tena padaṃ mama | marṣayiṣyāmi govinda pādasparśamivoragaḥ

उसने मानो मेरे सिर के बीचोंबीच पैर रख दिया है; हे गोविन्द, मैं इसे कैसे सहूँ, जैसे साँप पैर का स्पर्श नहीं सहता?

श्लोक 58 (1.244.58)

अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुन्धराम् । न हि मे मर्षणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः ॥

adya niṣkauravāmekaḥ kariṣyāmi vasundharām | na hi me marṣaṇīyo'yamarjunasya vyatikramaḥ

आज मैं अकेला ही पृथ्वी को कौरवों से रहित कर दूँगा; अर्जुन का यह अपराध मेरे लिए सहने योग्य नहीं है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 59 (1.244.59)

तं तथा गर्जमानं तु मेघदुन्दुभिनिःस्वनम् । अन्वपद्यन्त ते सर्वे भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ॥

taṃ tathā garjamānaṃ tu meghadundubhiniḥsvanam | anvapadyanta te sarve bhojavṛṣṇyandhakāstadā

मेघ और दुन्दुभि के समान स्वर में उन्हें इस प्रकार गरजते देखकर सभी भोज, वृष्णि और अन्धक उनके साथ हो लिए।

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