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आदि पर्व · अध्याय 245

श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन का पक्ष और सुभद्रा के सारथ्य में घर-वापसी

श्रीकृष्ण क्रुद्ध वृष्णियों से कहते हैं कि अर्जुन ने उनके कुल का सम्मान ही किया है, क्योंकि स्वयंवर अनिश्चित होता है और कन्या को पशु की तरह देना या बेचना अनुचित है, तथा क्षत्रियों में बलपूर्वक हरण प्रशंसनीय माना गया है; शिव के सिवा कोई उन्हें जीत नहीं सकता, इसलिए उन्हें मनाकर लौटा लाना चाहिए। यादव भेरी बजाकर निकलते हैं तो अर्जुन लड़ने को मुड़ते हैं, पर सुभद्रा उनके चरणों में गिरकर अपने स्वजनों को बचाने की विनती करती हैं। वे रथ आगे बढ़ाती हैं, पीछा करने वाले नगर में जगह-जगह धँसे अर्जुन के बाण देखकर लौट जाते हैं, और दोनों आनर्त तथा अनेक देशों को पार करके कुरु-प्रदेश पहुँचते हैं, जहाँ अर्जुन दूर से अपने भाइयों का नगर देखते हैं।

अध्याय 244अध्याय-सूचीअध्याय 246

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.245.1)

उक्तवन्तो यथावीर्यमसकृत्सर्ववृष्णयः । ततोऽब्रवीद्वासुदेवो वाक्यं धर्मार्थसंयुतम् ॥

uktavanto yathāvīryamasakṛtsarvavṛṣṇayaḥ | tato'bravīdvāsudevo vākyaṃ dharmārthasaṃyutam

जब सब वृष्णि अपने-अपने पराक्रम के अनुसार बार-बार बोल चुके, तब वासुदेव ने धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहा —

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (1.245.2)

मयोक्तं न श्रुतं पूर्वं सहितैः सर्वयादवैः । अतिक्रान्तमतिक्रान्तं न निवर्तेत कर्हिचित् । शृणुध्वं सहिताः सर्वे मम वाक्यं सहेतुकम् ॥

mayoktaṃ na śrutaṃ pūrvaṃ sahitaiḥ sarvayādavaiḥ | atikrāntamatikrāntaṃ na nivarteta karhicit | śṛṇudhvaṃ sahitāḥ sarve mama vākyaṃ sahetukam

"मैंने पहले जो कहा था, उसे तुम सब यादवों ने मिलकर नहीं सुना। जो बीत गया सो बीत गया, वह कभी लौटता नहीं। अब तुम सब मिलकर कारणों सहित मेरी बात सुनो।

श्लोक 3 (1.245.3)

नावमानं कुलस्यास्य गुडाकेशः प्रयुक्तवान् । संमानोऽभ्यधिकस्तेन प्रयुक्तोऽयं न संशयः ॥

nāvamānaṃ kulasyāsya guḍākeśaḥ prayuktavān | saṃmāno'bhyadhikastena prayukto'yaṃ na saṃśayaḥ

गुडाकेश ने इस कुल का कोई अपमान नहीं किया; उलटे उन्होंने इसे और अधिक सम्मान दिया है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 4 (1.245.4)

अर्थलुब्धान्न वः पार्थो मन्यते सात्वतान्सदा । स्वयंवरमनाधृष्यं मन्यते चापि पाण्डवः ॥

arthalubdhānna vaḥ pārtho manyate sātvatānsadā | svayaṃvaramanādhṛṣyaṃ manyate cāpi pāṇḍavaḥ

पार्थ तुम सात्वतों को कभी धन का लोभी नहीं मानते; और पाण्डुपुत्र यह भी मानते हैं कि स्वयंवर से कन्या पाना निश्चित नहीं होता।

श्लोक 5 (1.245.5)

प्रदानमपि कन्यायाः पशुवत्को नु मन्यते । विक्रयं चाप्यपत्यस्य कः कुर्यात्पुरुषो भुवि ॥

pradānamapi kanyāyāḥ paśuvatko nu manyate | vikrayaṃ cāpyapatyasya kaḥ kuryātpuruṣo bhuvi

कन्या को पशु की तरह दान कर देना कौन उचित मानेगा? और पृथ्वी पर कौन पुरुष अपनी सन्तान को बेचेगा?

श्लोक 6 (1.245.6)

एतान्दोषांस्तु कौन्तेयो दृष्टवानिति मे मतिः । क्षत्रियाणां तु वीर्येण प्रशस्तं हरणं बलात् । अतः प्रसह्य हृतवान्कन्यां धर्मेण पाण्डवः ॥

etāndoṣāṃstu kaunteyo dṛṣṭavāniti me matiḥ | kṣatriyāṇāṃ tu vīryeṇa praśastaṃ haraṇaṃ balāt | ataḥ prasahya hṛtavānkanyāṃ dharmeṇa pāṇḍavaḥ

मेरा विचार है कि कुन्तीपुत्र ने इन दोषों को देखा। क्षत्रियों में पराक्रम से बलपूर्वक हरण प्रशंसनीय माना गया है; इसलिए पाण्डुपुत्र ने धर्म के अनुसार कन्या का बलपूर्वक हरण किया।

श्लोक 7 (1.245.7)

उचितश्चैव संबन्धः सुभद्रा च यशस्विनी । एष चापीदृशः पार्थः प्रसह्य हृतवानतः ॥

ucitaścaiva saṃbandhaḥ subhadrā ca yaśasvinī | eṣa cāpīdṛśaḥ pārthaḥ prasahya hṛtavānataḥ

यह सम्बन्ध उचित है, सुभद्रा यशस्विनी हैं और पार्थ भी ऐसे ही (योग्य) पुरुष हैं; इसीलिए उन्होंने उसका बलपूर्वक हरण किया।

श्लोक 8 (1.245.8)

भरतस्यान्वये जातं शान्तनोश्च यशस्विनः । कुन्तिभोजात्मजापुत्रं का बुभूषेत नार्जुनम् ॥

bharatasyānvaye jātaṃ śāntanośca yaśasvinaḥ | kuntibhojātmajāputraṃ kā bubhūṣeta nārjunam

भरत के वंश में और यशस्वी शान्तनु के कुल में जन्मे, कुन्तिभोज की पुत्री के पुत्र अर्जुन को कौन स्त्री नहीं चाहेगी?

श्लोक 9 (1.245.9)

न तं पश्यामि यः पार्थं विजयेत रणे बलात् । वर्जयित्वा विरूपाक्षं भगनेत्रहरं हरम् ॥

na taṃ paśyāmi yaḥ pārthaṃ vijayeta raṇe balāt | varjayitvā virūpākṣaṃ bhaganetraharaṃ haram

मैं ऐसा कोई नहीं देखता जो युद्ध में बलपूर्वक पार्थ को जीत सके, सिवाय विरूपाक्ष हर के, जिन्होंने भग के नेत्र नष्ट किए थे —

श्लोक 10 (1.245.10)

अपि सर्वेषु लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष । स च नाम रथस्तादृङ्मदीयास्ते च वाजिनः ॥

api sarveṣu lokeṣu sendrarudreṣu māriṣa | sa ca nāma rathastādṛṅmadīyāste ca vājinaḥ

हे मान्यवर, इन्द्र और रुद्र सहित समस्त लोकों में भी कोई नहीं। फिर उनका वह रथ वैसा ही है, और घोड़े मेरे हैं,

श्लोक 11 (1.245.11)

मम शस्त्रं विशेषेण तूणौ चाक्षयसायकौ । योद्धा पार्थश्च शीघ्रास्त्रः को नु तेन समो भवेत् । तमभिद्रुत्य सान्त्वेन परमेण धनञ्जयम् ॥

mama śastraṃ viśeṣeṇa tūṇau cākṣayasāyakau | yoddhā pārthaśca śīghrāstraḥ ko nu tena samo bhavet | tamabhidrutya sāntvena parameṇa dhanañjayam

और विशेषकर शस्त्र भी मेरे हैं तथा अक्षय बाणों वाले दो तरकश भी; फिर पार्थ शीघ्रता से अस्त्र चलाने वाले योद्धा हैं — उनकी बराबरी कौन कर सकता है? धनञ्जय के पीछे जाकर अत्यन्त मधुर व्यवहार से

श्लोक 12 (1.245.12)

निवर्तयत संहृष्टा ममैषा परमा मतिः । यदि निर्जित्य वः पार्थो बलाद्गच्छेत्स्वकं पुरं ॥

nivartayata saṃhṛṣṭā mamaiṣā paramā matiḥ | yadi nirjitya vaḥ pārtho balādgacchetsvakaṃ puraṃ

प्रसन्नतापूर्वक उन्हें लौटा लाओ — यही मेरा निश्चित मत है। यदि पार्थ तुम्हें जीतकर बलपूर्वक अपने नगर चले गए,

श्लोक 13 (1.245.13)

प्रणश्येद्वो यशः सद्यो न तु सान्त्वे पराजयः । पितृष्वसायाः पुत्रो मे संबन्धं नार्हति द्विषाम् । तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथा कर्तुं जनाधिप ॥

praṇaśyedvo yaśaḥ sadyo na tu sāntve parājayaḥ | pitṛṣvasāyāḥ putro me saṃbandhaṃ nārhati dviṣām | tacchrutvā vāsudevasya tathā kartuṃ janādhipa

तो तुम्हारा यश तुरन्त नष्ट हो जाएगा; पर समझौते में कोई पराजय नहीं। मेरी बुआ का पुत्र शत्रु जैसा व्यवहार पाने योग्य नहीं है।" हे राजन्, वासुदेव की यह बात सुनकर उसके अनुसार करने के लिए

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (1.245.14)

उद्योगं कृतवन्तस्ते भेरीं सन्नाद्य यादवाः । अर्जुनस्तु तदा श्रुत्वा भेरीसन्नादनं महत् ॥

udyogaṃ kṛtavantaste bherīṃ sannādya yādavāḥ | arjunastu tadā śrutvā bherīsannādanaṃ mahat

यादवों ने भेरी बजाकर तैयारी की। अर्जुन ने भेरी का वह भारी नाद सुना,

श्लोक 15 (1.245.15)

कौन्तेयस्त्वरमाणस्तु सुभद्रामभ्यभाषत । आयान्ति वृष्णयः सर्वे ससुहृज्जनबान्धवाः ॥

kaunteyastvaramāṇastu subhadrāmabhyabhāṣata | āyānti vṛṣṇayaḥ sarve sasuhṛjjanabāndhavāḥ

तब कुन्तीपुत्र ने शीघ्रता से सुभद्रा से कहा — "सब वृष्णि अपने मित्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ आ रहे हैं,

अर्जुन उवाच

श्लोक 16 (1.245.16)

त्वदर्थं योद्धुकामास्ते मदरक्तान्तलोचनाः । प्रमत्तानशुचीन्मूढान्सुरामत्तान्नराधमान् ॥

tvadarthaṃ yoddhukāmāste madaraktāntalocanāḥ | pramattānaśucīnmūḍhānsurāmattānnarādhamān

तुम्हारे लिए लड़ने को उत्सुक, मद से लाल आँखों वाले। वे प्रमादी, अपवित्र, मूढ़, मदिरा में मत्त अधम मनुष्य,

श्लोक 17 (1.245.17)

वमनं पानशीलांस्तान्करिष्यामि शरोत्तमैः । उताहो वा मदोन्मत्तान्नयिष्यामि यमक्षयम् ॥

vamanaṃ pānaśīlāṃstānkariṣyāmi śarottamaiḥ | utāho vā madonmattānnayiṣyāmi yamakṣayam

वे मद्यप — उन्हें मैं अपने श्रेष्ठ बाणों से वमन करा दूँगा, अथवा मद से उन्मत्त उन लोगों को यमलोक पहुँचा दूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (1.245.18)

एवमुक्त्वा प्रियां पार्थो न्यवर्तत महाबलः । निवर्तमानं दृष्ट्वैव सुभद्रा त्रस्ततां गता ॥

evamuktvā priyāṃ pārtho nyavartata mahābalaḥ | nivartamānaṃ dṛṣṭvaiva subhadrā trastatāṃ gatā

अपनी प्रिया से ऐसा कहकर महाबली पार्थ लौट पड़े; उन्हें लौटते देखकर सुभद्रा भयभीत हो गईं।

सुभद्रोवाच

श्लोक 19 (1.245.19)

एवं मा वद पार्थेति पादयोः पतिता तदा । सुभद्रा तु कलिर्जाता वृष्णीनां निधनाय च ॥

evaṃ mā vada pārtheti pādayoḥ patitā tadā | subhadrā tu kalirjātā vṛṣṇīnāṃ nidhanāya ca

"हे पार्थ, ऐसा मत कहिए," — यह कहते हुए वे उनके चरणों में गिर पड़ीं — "'सुभद्रा तो वृष्णियों के लिए कलह और विनाश बनकर जन्मी है' —

श्लोक 20 (1.245.20)

एवं ब्रुवन्तः पौरास्ते ह्यपवादरताः प्रभो । मम शोकं वर्धयन्ति तस्मान्नाशं न चिन्तये । परिवादभयान्मुक्ता त्वत्प्रसादाद्भवाम्यहम् ॥

evaṃ bruvantaḥ paurāste hyapavādaratāḥ prabho | mama śokaṃ vardhayanti tasmānnāśaṃ na cintaye | parivādabhayānmuktā tvatprasādādbhavāmyaham

ऐसा कहकर निन्दा में रुचि रखने वाले नगरवासी, हे स्वामी, मेरा शोक बढ़ाएँगे; इसलिए मैं उनके विनाश की बात सोच भी नहीं सकती। आपकी कृपा से मुझे लोकनिन्दा के भय से मुक्ति मिले।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (1.245.21)

एवमुक्तस्ततः पार्थः प्रियया भद्रया तदा । गमनाय मतिं चक्रे पार्थः सत्यपराक्रमः ॥

evamuktastataḥ pārthaḥ priyayā bhadrayā tadā | gamanāya matiṃ cakre pārthaḥ satyaparākramaḥ

अपनी प्रिया भद्रा के ऐसा कहने पर सत्यपराक्रमी पार्थ ने आगे जाने का निश्चय किया।

श्लोक 22 (1.245.22)

स्मितपूर्वं तदाऽऽभाष्य परिष्वज्य प्रियां तदा । उत्थाप्य च पुनः पार्थो याहि याहीति चाब्रवीत् ॥

smitapūrvaṃ tadā''bhāṣya pariṣvajya priyāṃ tadā | utthāpya ca punaḥ pārtho yāhi yāhīti cābravīt

मुस्कराते हुए उनसे बात करके पार्थ ने अपनी प्रिया को गले लगाया, उन्हें उठाया और कहा — "चलो, चलो!"

श्लोक 23 (1.245.23)

ततः सुभद्रा त्वरिता रश्मीन्संगृह्य पाणिना । चोदयामास जवनाञ्शीघ्रमश्वान्कृतत्वरा ॥

tataḥ subhadrā tvaritā raśmīnsaṃgṛhya pāṇinā | codayāmāsa javanāñśīghramaśvānkṛtatvarā

तब सुभद्रा ने तुरन्त हाथ में रासें सँभालीं और शीघ्रता से वेगवान घोड़ों को तेज़ी से हाँक दिया।

श्लोक 24 (1.245.24)

ततस्तु कृतसन्नाहा वृष्णिवीराः समाहिताः । प्रत्यानयार्थं पार्थस्य जवनैस्तुरगोत्तमैः ॥

tatastu kṛtasannāhā vṛṣṇivīrāḥ samāhitāḥ | pratyānayārthaṃ pārthasya javanaisturagottamaiḥ

तब कवच आदि से सज्जित, सावधान वृष्णि वीर पार्थ को लौटा लाने के लिए वेगवान उत्तम घोड़ों पर चल पड़े।

श्लोक 25 (1.245.25)

राजमार्गमनुप्राप्ता दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम् । प्रासादपङ्क्तिस्तम्भेषु वेदिकासु ध्वजेषु च ॥

rājamārgamanuprāptā dṛṣṭvā pārthasya vikramam | prāsādapaṅktistambheṣu vedikāsu dhvajeṣu ca

राजमार्ग पर पहुँचकर उन्होंने पार्थ का पराक्रम देखा — महलों की पंक्तियों, खम्भों, वेदिकाओं और ध्वजाओं पर

श्लोक 26 (1.245.26)

अर्जुनस्य शरान्दृष्ट्वा विस्मयं परमं गताः । केशवस्य वचस्तथ्यं मन्यमानास्तु यादवाः ॥

arjunasya śarāndṛṣṭvā vismayaṃ paramaṃ gatāḥ | keśavasya vacastathyaṃ manyamānāstu yādavāḥ

अर्जुन के बाण देखकर वे अत्यन्त विस्मित हुए, और यादवों ने केशव की बात को सत्य माना।

श्लोक 27 (1.245.27)

अतीत्य तं रैवतकं श्रुत्वा तु विपृथोर्वचः । अर्जुनेन कृतं श्रुत्वा गन्तुकामास्तु वृष्णयः ॥

atītya taṃ raivatakaṃ śrutvā tu vipṛthorvacaḥ | arjunena kṛtaṃ śrutvā gantukāmāstu vṛṣṇayaḥ

रैवतक को पार करके उन्होंने विपृथु से अर्जुन का किया हुआ सब सुना; वृष्णि आगे जाना चाहते थे,

श्लोक 28 (1.245.28)

श्रुत्वा दीर्घं गतं पार्थं न्यवर्तन्त महारथाः । पुरोद्यानमतिक्रम्य विशालं च गिरिव्रजम् ॥

śrutvā dīrghaṃ gataṃ pārthaṃ nyavartanta mahārathāḥ | purodyānamatikramya viśālaṃ ca girivrajam

पर यह सुनकर कि पार्थ दूर निकल गए हैं, वे महारथी लौट आए। पार्थ नगर के उद्यानों और विशाल गिरिव्रज को पार करके,

श्लोक 29 (1.245.29)

सानुमुज्जयिनीं चैव वनान्युपवनानि च । पुण्येष्वानर्तराष्ट्रेषु वापीपद्मसरांसि च ॥

sānumujjayinīṃ caiva vanānyupavanāni ca | puṇyeṣvānartarāṣṭreṣu vāpīpadmasarāṃsi ca

पर्वतीय ढलानों और उज्जयिनी को, वनों और उपवनों को, तथा पवित्र आनर्त देशों की बावड़ियों, कमल-सरोवरों और झीलों को पार करते हुए,

श्लोक 30 (1.245.30)

प्राप्य धेनुमतीतीर्थमश्वरोधसरः प्रति । प्रेक्षावर्तं ततः शैलमम्बुदं च नगोत्तमम् ॥

prāpya dhenumatītīrthamaśvarodhasaraḥ prati | prekṣāvartaṃ tataḥ śailamambudaṃ ca nagottamam

धेनुमती तीर्थ पहुँचे, फिर अश्वरोध सरोवर की ओर गए, और फिर प्रेक्षावर्त पर्वत तथा श्रेष्ठ पर्वत अम्बुद तक पहुँचे;

श्लोक 31 (1.245.31)

आराच्छृङ्गमथासाद्य तीर्णः करवतीं नदीम् । प्राप्य साल्वेयराष्ट्राणि निषधानप्यतीत्य च ॥

ārācchṛṅgamathāsādya tīrṇaḥ karavatīṃ nadīm | prāpya sālveyarāṣṭrāṇi niṣadhānapyatītya ca

फिर आराच्छृङ्ग पहुँचकर उन्होंने करवती नदी पार की; साल्वेय राज्यों में पहुँचकर निषधों को भी पार किया,

श्लोक 32 (1.245.32)

देवापृथुपुरं पश्यन् सर्वतः सुसमाहितः । तमतीत्य महाबाहुर्देवारण्यमपश्यत ॥

devāpṛthupuraṃ paśyan sarvataḥ susamāhitaḥ | tamatītya mahābāhurdevāraṇyamapaśyata

और चारों ओर से सावधान रहते हुए देवापृथुपुर को देखा; उसे पार करके उस महाबाहु ने देवारण्य को देखा।

श्लोक 33 (1.245.33)

पूजयामासुरायान्तं देवारण्ये महर्षयः । स वनानि नदीः शैलान् गिरिप्रस्रवणानि च ॥

pūjayāmāsurāyāntaṃ devāraṇye maharṣayaḥ | sa vanāni nadīḥ śailān giriprasravaṇāni ca

देवारण्य में महर्षियों ने आते हुए उनका सत्कार किया। वनों, नदियों, पर्वतों और पहाड़ी झरनों को पार करके

श्लोक 34 (1.245.34)

अतीत्य च तदा पार्थः सुभद्रासारथिस्तदा । कौरवं विषयं प्राप्य विशोकः समपद्यत ॥

atītya ca tadā pārthaḥ subhadrāsārathistadā | kauravaṃ viṣayaṃ prāpya viśokaḥ samapadyata

सुभद्रा जिनकी सारथी थीं, वे पार्थ कुरुदेश पहुँचे और शोकरहित हो गए।

श्लोक 35 (1.245.35)

सोदर्याणां महाबाहुः सिंहाशयमिवाशयम् । दूरादुपवनोपेतं समन्तात्सलिलावृतम् ॥

sodaryāṇāṃ mahābāhuḥ siṃhāśayamivāśayam | dūrādupavanopetaṃ samantātsalilāvṛtam

दूर से उस महाबाहु को अपने सहोदर भाइयों का निवास दिखाई दिया, जो सिंह की माँद के समान था, उपवनों से घिरा और चारों ओर जल से आवृत;

श्लोक 36 (1.245.36)

भद्रया मुदितो जिष्णुर्ददर्श वृजिनं पुरम् ॥

bhadrayā mudito jiṣṇurdadarśa vṛjinaṃ puram

भद्रा के साथ आनन्दित जिष्णु ने वह वृजिन नगर देखा।

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