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आदि पर्व · अध्याय 247

सुभद्रा का दहेज और अभिमन्यु का जन्म

द्वारका में यह बात फैलती है कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण की सहमति से ही सुभद्रा का हरण किया था। वृष्णि-वृद्धों से अनुमति लेकर श्रीकृष्ण वृष्णि, अन्धक और भोज वंश के लोगों के साथ बहुमूल्य उपहार लेकर खाण्डवप्रस्थ पहुँचते हैं। युधिष्ठिर उनका स्वागत करते हैं, सात रातों तक विवाहोत्सव चलता है, और श्रीकृष्ण तथा बलराम रथों, गौओं, घोड़ों, खच्चरियों, हाथियों, सोने और दासियों का विशाल दहेज देते हैं। बलराम और यादव लौट जाते हैं, पर श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ रुक जाते हैं; सुभद्रा अभिमन्यु को जन्म देती है, और द्रौपदी पाँचों पाण्डवों से एक-एक पुत्र पाती है, जो वेद और शस्त्रविद्या में शिक्षित होते हैं।

अध्याय 246अध्याय-सूचीअध्याय 248

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.247.1)

अथ शुश्राव निर्वृत्ते वृष्णीनां परमोत्सवे । अर्जुनेन हृतां भद्रां शङ्खचक्रगदाधरः ॥

atha śuśrāva nirvṛtte vṛṣṇīnāṃ paramotsave | arjunena hṛtāṃ bhadrāṃ śaṅkhacakragadādharaḥ

फिर जब वृष्णियों का महान उत्सव समाप्त हुआ, तब शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले श्रीकृष्ण ने सुना कि अर्जुन भद्रा (सुभद्रा) को हर ले गए हैं।

श्लोक 2 (1.247.2)

पुरस्तादेव पौराणां संशयः समजायत । जानता वासुदेवेन वासितो भरतर्षभः ॥

purastādeva paurāṇāṃ saṃśayaḥ samajāyata | jānatā vāsudevena vāsito bharatarṣabhaḥ

नगरवासियों के मन में पहले से ही यह सन्देह उठ खड़ा हुआ था कि भरतश्रेष्ठ अर्जुन को वासुदेव की जानकारी में ही ठहराया गया था।

पौरजना ऊचुः

श्लोक 3 (1.247.3)

लोकस्य विदितं ह्यद्य पूर्वं विपृथुना यथा । सान्त्वयित्वाभ्यनुज्ञातो भद्रया सह सङ्गतः ॥

lokasya viditaṃ hyadya pūrvaṃ vipṛthunā yathā | sāntvayitvābhyanujñāto bhadrayā saha saṅgataḥ

अब यह सारे जगत् को विदित है, जैसा विपृथु को पहले से ज्ञात था — उन्हें मनाकर और अनुमति देकर ही भद्रा से उनका मिलन कराया गया।

श्लोक 4 (1.247.4)

दित्सता सोदरां तस्मै पतत्त्रिवरकेतुना । अर्हते पार्थिवेन्द्राय पार्थायायतलोचनाम् ॥

ditsatā sodarāṃ tasmai patattrivaraketunā | arhate pārthivendrāya pārthāyāyatalocanām

क्योंकि पक्षिराज (गरुड़) की ध्वजा वाले श्रीकृष्ण अपनी सगी बहन, उस विशाल नेत्रों वाली कन्या को, सुयोग्य राजाधिराज पार्थ को देना चाहते थे।

श्लोक 5 (1.247.5)

सत्कृत्य पाण्डवश्रेष्ठं प्रेषयामास चार्जुनम् । भद्रया सह बीभत्सुः प्रापितो वृजिनं पुरम् ॥

satkṛtya pāṇḍavaśreṣṭhaṃ preṣayāmāsa cārjunam | bhadrayā saha bībhatsuḥ prāpito vṛjinaṃ puram

उन्होंने पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन का सत्कार करके उन्हें विदा किया, और बीभत्सु भद्रा के साथ वृजिन नगर पहुँचाए गए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 6 (1.247.6)

इति पौरजनाः सर्वे वदन्ति च समन्ततः । श्रुत्वा तु पुण्डरीकाक्षः संप्राप्तं स्वपुरोत्तमम् ॥

iti paurajanāḥ sarve vadanti ca samantataḥ | śrutvā tu puṇḍarīkākṣaḥ saṃprāptaṃ svapurottamam

सारे नगरवासी चारों ओर यही कह रहे थे। कमलनयन श्रीकृष्ण ने जब सुना कि अर्जुन अपने उत्तम नगर में पहुँच गए हैं,

श्लोक 7 (1.247.7)

अर्जुनं पाण्डवश्रेष्ठमिन्द्रप्रस्थगतं तथा । यियासुः खाण्डवप्रस्थममन्त्रयत केशवः ॥

arjunaṃ pāṇḍavaśreṣṭhamindraprasthagataṃ tathā | yiyāsuḥ khāṇḍavaprasthamamantrayata keśavaḥ

कि पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन इन्द्रप्रस्थ पहुँच गए हैं, तब खाण्डवप्रस्थ जाने की इच्छा से केशव ने मन्त्रणा की।

श्लोक 8 (1.247.8)

पूर्वं सत्कृत्य राजानमाहुकं मधुसूदनः । तथा विपृथुमक्रूरं संकर्षणविडूरथौ ॥

pūrvaṃ satkṛtya rājānamāhukaṃ madhusūdanaḥ | tathā vipṛthumakrūraṃ saṃkarṣaṇaviḍūrathau

मधुसूदन ने पहले राजा आहुक का सत्कार किया, और उसी प्रकार विपृथु, अक्रूर, संकर्षण (बलराम) और विडूरथ का भी।

श्लोक 9 (1.247.9)

मन्त्रयामास तैः सार्धं पुरस्तादभिमानितैः । संकर्षणेन संमन्त्र्य ह्यनुज्ञातो महामनाः ॥

mantrayāmāsa taiḥ sārdhaṃ purastādabhimānitaiḥ | saṃkarṣaṇena saṃmantrya hyanujñāto mahāmanāḥ

पहले उन्हें सम्मान देकर उन्होंने उनके साथ मन्त्रणा की। संकर्षण से परामर्श करने पर उन महामना को अनुमति मिल गई।

श्लोक 10 (1.247.10)

संप्रीतः प्रीयमाणेन वृष्णिराज्ञा जनार्दनः । अभिमन्त्र्याभ्यनुज्ञातो योजयामास वाहिनीम् ॥

saṃprītaḥ prīyamāṇena vṛṣṇirājñā janārdanaḥ | abhimantryābhyanujñāto yojayāmāsa vāhinīm

प्रसन्न वृष्णिराज के स्नेहपूर्ण व्यवहार से प्रसन्न जनार्दन ने विदा ली और अनुमति पाकर सेना को तैयार कराया।

श्लोक 11 (1.247.11)

ततस्तु यानान्यासाद्य दाशार्हाणां यशस्विनाम् । सिंहनादः प्रहृष्टानां क्षणेन समपद्यत ॥

tatastu yānānyāsādya dāśārhāṇāṃ yaśasvinām | siṃhanādaḥ prahṛṣṭānāṃ kṣaṇena samapadyata

तब यशस्वी दाशार्ह जब अपने-अपने वाहनों के पास पहुँचे, तो हर्ष से भरे उन लोगों का सिंहनाद क्षण भर में गूँज उठा।

श्लोक 12 (1.247.12)

योजयन्तः सदश्वांस्तु यानयुग्यं रथांस्तथा । गजांश्च परमप्रीताः समपद्यन्त वृष्णयः ॥

yojayantaḥ sadaśvāṃstu yānayugyaṃ rathāṃstathā | gajāṃśca paramaprītāḥ samapadyanta vṛṣṇayaḥ

उत्तम घोड़ों, वाहनों और भारवाही पशुओं, रथों तथा हाथियों को जोतते हुए वृष्णिवंशी अत्यन्त प्रसन्न होकर तैयार हो गए।

श्लोक 13 (1.247.13)

वृष्ण्यन्धकमहामात्रैः सह वीरैर्महारथैः । भ्रातृभिश्च कुमारैश्च योधैश्च शतशो वृतः ॥

vṛṣṇyandhakamahāmātraiḥ saha vīrairmahārathaiḥ | bhrātṛbhiśca kumāraiśca yodhaiśca śataśo vṛtaḥ

वृष्णि और अन्धक वंश के प्रधान मन्त्रियों, वीर महारथियों, भाइयों, कुमारों और सैकड़ों योद्धाओं से घिरे हुए,

श्लोक 14 (1.247.14)

सैन्येन महता शौरिरभिगुप्तः समन्ततः । तत्र दानपतिः श्रीमाञ्जगाम स महायशाः ॥

sainyena mahatā śaurirabhiguptaḥ samantataḥ | tatra dānapatiḥ śrīmāñjagāma sa mahāyaśāḥ

और विशाल सेना से चारों ओर से सुरक्षित शौरि (श्रीकृष्ण) चल पड़े। उनके साथ महायशस्वी, श्रीमान दानपति भी गए —

श्लोक 15 (1.247.15)

अक्रूरो वृष्णिवीराणां सेनापतिररिन्दमः । अनाधृष्टिर्महातेजा उद्धवश्च महायशाः ॥

akrūro vṛṣṇivīrāṇāṃ senāpatirarindamaḥ | anādhṛṣṭirmahātejā uddhavaśca mahāyaśāḥ

वृष्णिवीरों के सेनापति, शत्रुदमन अक्रूर; महातेजस्वी अनाधृष्टि; और महायशस्वी उद्धव,

श्लोक 16 (1.247.16)

साक्षाद्बृहस्पतेः शिष्यो महाबुद्धिर्महामनाः । सत्यकः सात्यकिश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥

sākṣādbṛhaspateḥ śiṣyo mahābuddhirmahāmanāḥ | satyakaḥ sātyakiścaiva kṛtavarmā ca sātvataḥ

जो साक्षात् बृहस्पति के शिष्य, महाबुद्धिमान और महामना थे; सत्यक, सात्यकि और सात्वतवंशी कृतवर्मा;

श्लोक 17 (1.247.17)

प्रद्युम्नश्चैव साम्बश्च निशठः शङ्कुरेव च । चारुदेष्णश्च विक्रान्तो झिल्ली विपृथुरेव च ॥

pradyumnaścaiva sāmbaśca niśaṭhaḥ śaṅkureva ca | cārudeṣṇaśca vikrānto jhillī vipṛthureva ca

प्रद्युम्न और साम्ब, निशठ और शंकु, पराक्रमी चारुदेष्ण, झिल्ली और विपृथु;

श्लोक 18 (1.247.18)

सारणश्च महाबाहुर्गदश्च विदुषां वरः । एते चान्ये च बहवो वृष्णिभोजान्धकास्तथा ॥

sāraṇaśca mahābāhurgadaśca viduṣāṃ varaḥ | ete cānye ca bahavo vṛṣṇibhojāndhakāstathā

महाबाहु सारण और विद्वानों में श्रेष्ठ गद। ये तथा वृष्णि, भोज और अन्धक वंशों के और भी बहुत-से लोग

श्लोक 19 (1.247.19)

आजग्मुः खाण्डवप्रस्थमादाय हरणं बहु । उपहारं समादाय पृथुवृष्णिपुरोगमाः ॥

ājagmuḥ khāṇḍavaprasthamādāya haraṇaṃ bahu | upahāraṃ samādāya pṛthuvṛṣṇipurogamāḥ

बहुत-से विवाह-उपहार लेकर खाण्डवप्रस्थ आए। भेंटें लेकर, पृथु और वृष्णियों को आगे किए हुए,

श्लोक 20 (1.247.20)

प्रययुः सिंहनादेन सुभद्रामवलोककाः । ते त्वदीर्घेण कालेन कृष्णेन सह यादवाः । पुरमासाद्य पार्थानां परां प्रीतिमवाप्नुवन् ॥

prayayuḥ siṃhanādena subhadrāmavalokakāḥ | te tvadīrgheṇa kālena kṛṣṇena saha yādavāḥ | puramāsādya pārthānāṃ parāṃ prītimavāpnuvan

वे सुभद्रा को देखने की उत्सुकता में सिंहनाद करते हुए चल पड़े। थोड़े ही समय में श्रीकृष्ण के साथ वे यादव पार्थों के नगर में पहुँचकर परम प्रसन्न हुए।

श्लोक 21 (1.247.21)

ततो युधिष्ठिरो राजा श्रुत्वा माधवमागतम् । प्रतिग्रहार्थं कृष्णस्य यमौ प्रास्थापयत्तदा ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā śrutvā mādhavamāgatam | pratigrahārthaṃ kṛṣṇasya yamau prāsthāpayattadā

तब राजा युधिष्ठिर ने माधव के आने का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण की अगवानी के लिए नकुल और सहदेव को भेजा।

श्लोक 22 (1.247.22)

ताभ्यां प्रतिगृहीतं तु वृष्णिचक्रं महर्द्धिमत् । विवेश खाण्डवप्रस्थं पताकाध्वजशोभितम् ॥

tābhyāṃ pratigṛhītaṃ tu vṛṣṇicakraṃ maharddhimat | viveśa khāṇḍavaprasthaṃ patākādhvajaśobhitam

उन दोनों के द्वारा स्वागत किए जाने पर वृष्णियों का वह समृद्ध दल ध्वजा-पताकाओं से सजे खाण्डवप्रस्थ में प्रविष्ट हुआ,

श्लोक 23 (1.247.23)

संमृष्टसिक्तपन्थानं पुष्पप्रकरशोभितम् । चन्दनस्य रसैः शीतैः पुण्यगन्धैर्निषेवितम् ॥

saṃmṛṣṭasiktapanthānaṃ puṣpaprakaraśobhitam | candanasya rasaiḥ śītaiḥ puṇyagandhairniṣevitam

जिसकी सड़कें बुहारकर सींची गई थीं, जो फूलों के ढेरों से सजा था और शीतल चन्दन-रस तथा पवित्र सुगन्धों से महक रहा था,

श्लोक 24 (1.247.24)

दह्यताऽगुरुणा चैव देशे देशे सुगन्धिना । हृष्टपुष्टजनाकीर्णं वणिग्भिरुपशोभितम् ॥

dahyatā'guruṇā caiva deśe deśe sugandhinā | hṛṣṭapuṣṭajanākīrṇaṃ vaṇigbhirupaśobhitam

जहाँ स्थान-स्थान पर सुगन्धित अगुरु जल रहा था, जो हृष्ट-पुष्ट लोगों से भरा था और व्यापारियों से शोभित था।

श्लोक 25 (1.247.25)

प्रतिपेदे महाबाहुः सह रामेण केशवः । वृष्ण्यन्धकैस्तथा भोजैः समेतः पुरुषोत्तमः ॥

pratipede mahābāhuḥ saha rāmeṇa keśavaḥ | vṛṣṇyandhakaistathā bhojaiḥ sametaḥ puruṣottamaḥ

महाबाहु पुरुषोत्तम केशव बलराम के साथ, वृष्णि, अन्धक और भोजों से घिरे हुए वहाँ पहुँचे।

श्लोक 26 (1.247.26)

संपूज्यमानः पौरैश्च ब्राह्मणैश्च सहस्रशः । विवेश भवनं राज्ञः पुरन्दरगृहोपमम् ॥

saṃpūjyamānaḥ pauraiśca brāhmaṇaiśca sahasraśaḥ | viveśa bhavanaṃ rājñaḥ purandaragṛhopamam

नगरवासियों और सहस्रों ब्राह्मणों से पूजित होकर उन्होंने इन्द्र के भवन के समान राजमहल में प्रवेश किया।

श्लोक 27 (1.247.27)

युधिष्ठिरस्तु रामेण समागच्छद्यथाविधि । मूर्ध्नि केशवमाघ्राय बाहुभ्यां परिषस्वजे ॥

yudhiṣṭhirastu rāmeṇa samāgacchadyathāvidhi | mūrdhni keśavamāghrāya bāhubhyāṃ pariṣasvaje

युधिष्ठिर विधिपूर्वक बलराम से मिले; उन्होंने केशव का मस्तक सूँघा और दोनों भुजाओं से उन्हें हृदय से लगा लिया।

श्लोक 28 (1.247.28)

तं प्रीयमाणो गोविन्दो विनयेनाभिपूजयन् । भीमं च पुरुषव्याघ्रं विधिवत्प्रत्यपूजयत् ॥

taṃ prīyamāṇo govindo vinayenābhipūjayan | bhīmaṃ ca puruṣavyāghraṃ vidhivatpratyapūjayat

प्रसन्न गोविन्द ने विनयपूर्वक उनका सम्मान किया और पुरुषसिंह भीम का भी यथाविधि आदर किया।

श्लोक 29 (1.247.29)

तांश्च वृष्ण्यन्धकश्रेष्ठान्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । प्रतिजग्राह सत्कारैर्यथाविधि यथागतम् ॥

tāṃśca vṛṣṇyandhakaśreṣṭhānkuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | pratijagrāha satkārairyathāvidhi yathāgatam

कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने वृष्णि और अन्धक वंश के उन श्रेष्ठ पुरुषों का, जैसे-जैसे वे आए, विधिपूर्वक सत्कार के साथ स्वागत किया।

श्लोक 30 (1.247.30)

गुरुवत्पूजयामास कांश्चित्कांश्चिद्वयस्यवत् । कांश्चिदभ्यवदत्प्रेम्णा कैश्चिदप्यभिवादितः ॥

guruvatpūjayāmāsa kāṃścitkāṃścidvayasyavat | kāṃścidabhyavadatpremṇā kaiścidapyabhivāditaḥ

कुछ का उन्होंने गुरुजनों की भाँति पूजन किया, कुछ का मित्रों की भाँति; कुछ से वे प्रेमपूर्वक बोले, और कुछ ने स्वयं उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 31 (1.247.31)

ततः पृथा च पार्थाश्च मुदिताः कृष्णया सह । पुण्डरीकाक्षमासाद्य बभूवुर्मुदितेन्द्रियाः ॥

tataḥ pṛthā ca pārthāśca muditāḥ kṛṣṇayā saha | puṇḍarīkākṣamāsādya babhūvurmuditendriyāḥ

तब पृथा और पाण्डव द्रौपदी के साथ आनन्दित होकर कमलनयन श्रीकृष्ण के पास आए; उनके हृदय प्रसन्नता से भर गए।

श्लोक 32 (1.247.32)

हर्षादभिगतौ दृष्ट्वा संकर्षणजनार्दनौ । बन्धुमन्तं पृथा पार्थं युधिष्ठिरममन्यत ॥

harṣādabhigatau dṛṣṭvā saṃkarṣaṇajanārdanau | bandhumantaṃ pṛthā pārthaṃ yudhiṣṭhiramamanyata

संकर्षण और जनार्दन को हर्षपूर्वक आया देखकर पृथा ने अपने पुत्र युधिष्ठिर को बन्धु-बान्धवों से सम्पन्न माना।

श्लोक 33 (1.247.33)

ततः सङ्कर्षणाक्रूरावप्रमेयावदीनवत् । भद्रवत्यै सुभद्रायै धनौघमुपजह्रतुः ॥

tataḥ saṅkarṣaṇākrūrāvaprameyāvadīnavat | bhadravatyai subhadrāyai dhanaughamupajahratuḥ

तब अप्रमेय और उदार संकर्षण तथा अक्रूर ने कल्याणी सुभद्रा को धन का भण्डार भेंट किया —

श्लोक 34 (1.247.34)

प्रवालानि च हाराणि भूषणानि सहस्रशः । कुथास्तरपरिस्तोमान्व्याघ्राजिनपुरस्कृतान् ॥

pravālāni ca hārāṇi bhūṣaṇāni sahasraśaḥ | kuthāstaraparistomānvyāghrājinapuraskṛtān

मूँगे, हार और सहस्रों आभूषण, हाथियों के झूल, बिछावन और कालीन, जिनमें व्याघ्रचर्म सबसे आगे थे।

श्लोक 35 (1.247.35)

विविधैश्चैव रत्नौघैर्दीप्तप्रभमजायत । शयनासनयानैश्च युधिष्ठिरनिवेशनम् ॥

vividhaiścaiva ratnaughairdīptaprabhamajāyata | śayanāsanayānaiśca yudhiṣṭhiraniveśanam

अनेक प्रकार के रत्नों के ढेरों तथा शय्याओं, आसनों और वाहनों से युधिष्ठिर का भवन जगमगा उठा।

श्लोक 36 (1.247.36)

ततः प्रीतिकरो यूनां विवाहपरमोत्सवः । भद्रवत्यै सुभद्रायै सप्तरात्रमवर्तत ॥

tataḥ prītikaro yūnāṃ vivāhaparamotsavaḥ | bhadravatyai subhadrāyai saptarātramavartata

तब कल्याणी सुभद्रा का, युवाओं को आनन्द देने वाला, विवाह का महान उत्सव सात रातों तक चलता रहा।

श्लोक 37 (1.247.37)

तेषां ददौ हृषीकेशो जन्यार्थे धनमुत्तमम् । हरणं वै सुभद्राया ज्ञातिदेयं महायशाः ॥

teṣāṃ dadau hṛṣīkeśo janyārthe dhanamuttamam | haraṇaṃ vai subhadrāyā jñātideyaṃ mahāyaśāḥ

महायशस्वी हृषीकेश ने उन्हें विवाह-पक्ष के लिए उत्तम धन दिया — सुभद्रा का दहेज, जो कुटुम्बियों की ओर से दिया जाता है।

श्लोक 38 (1.247.38)

रथानां काञ्चनाङ्गानां किङ्किणीजालमालिनाम् । चतुर्युजामुपेतानां सूतैः कुशलशिक्षितैः ॥

rathānāṃ kāñcanāṅgānāṃ kiṅkiṇījālamālinām | caturyujāmupetānāṃ sūtaiḥ kuśalaśikṣitaiḥ

स्वर्णमय अंगों वाले, छोटी घण्टियों की जालियों से सजे, चार-चार घोड़ों से जुते और कुशल, सुशिक्षित सारथियों से युक्त रथ —

श्लोक 39 (1.247.39)

सहस्रं प्रददौ कृष्णो गवामयुतमेव च । श्रीमान्माथुरदेश्यानां दोग्ध्रीणां पुण्यवर्चसाम् ॥

sahasraṃ pradadau kṛṣṇo gavāmayutameva ca | śrīmānmāthuradeśyānāṃ dogdhrīṇāṃ puṇyavarcasām

ऐसे एक सहस्र रथ श्रीकृष्ण ने दिए, और दस हज़ार गौएँ भी; उन श्रीमान ने मथुरा प्रदेश की पवित्र कान्ति वाली दुधारू गौएँ प्रदान कीं।

श्लोक 40 (1.247.40)

बडवानां च शुद्धानां चन्द्रांशुसमवर्चसाम् । ददौ जनार्दनः प्रीत्या सहस्रं हेमभूषितम् ॥

baḍavānāṃ ca śuddhānāṃ candrāṃśusamavarcasām | dadau janārdanaḥ prītyā sahasraṃ hemabhūṣitam

और जनार्दन ने प्रसन्न होकर चन्द्रकिरणों-सी कान्ति वाली, सुवर्ण से विभूषित एक सहस्र शुद्ध घोड़ियाँ दीं।

श्लोक 41 (1.247.41)

तथैवाश्वतरीणां च दान्तानां वातरंहसाम् । शतान्यञ्जनकेशीनां श्वेतानां पञ्चपञ्च च ॥

tathaivāśvatarīṇāṃ ca dāntānāṃ vātaraṃhasām | śatānyañjanakeśīnāṃ śvetānāṃ pañcapañca ca

उसी प्रकार उन्होंने सधी हुई, वायु के समान वेगवाली खच्चरियाँ दीं — पाँच सौ काले अयाल वाली और पाँच सौ श्वेत।

श्लोक 42 (1.247.42)

स्नानपानोत्सवे चैव प्रयुक्तं वयसान्वितम् । स्त्रीणां सहस्रं गौरीणां सुवेषाणां सुवर्चसाम् ॥

snānapānotsave caiva prayuktaṃ vayasānvitam | strīṇāṃ sahasraṃ gaurīṇāṃ suveṣāṇāṃ suvarcasām

स्नान, पान और उत्सवों में सेवा के योग्य, युवा, सुन्दर वेशभूषा वाली, कान्तिमती एक सहस्र गोरी स्त्रियाँ,

श्लोक 43 (1.247.43)

सुवर्णशतकण्ठीनामरोमाणां स्वलङ्कृताम् । परिचर्यासु दक्षाणां प्रददौ पुष्करेक्षणः ॥

suvarṇaśatakaṇṭhīnāmaromāṇāṃ svalaṅkṛtām | paricaryāsu dakṣāṇāṃ pradadau puṣkarekṣaṇaḥ

जिनके गले में सौ-सौ स्वर्णमुद्राओं के हार थे, जो चिकने अंगों वाली, भली-भाँति अलंकृत और सेवा में निपुण थीं — इन्हें कमलनयन श्रीकृष्ण ने प्रदान किया।

श्लोक 44 (1.247.44)

पृष्ठ्यानामपि चाश्वानां बाह्लिकानां जनार्दनः । ददौ शतसहस्राख्यं कन्याधनमनुत्तमम् ॥

pṛṣṭhyānāmapi cāśvānāṃ bāhlikānāṃ janārdanaḥ | dadau śatasahasrākhyaṃ kanyādhanamanuttamam

जनार्दन ने बाह्लीक देश के एक लाख सवारी के घोड़े भी अनुपम कन्याधन के रूप में दिए।

श्लोक 45 (1.247.45)

कृताकृतस्य मुख्यस्य कनकस्याग्निवर्चसः । मनुष्यभारान्दाशार्हो ददौ दश जनार्दनः ॥

kṛtākṛtasya mukhyasya kanakasyāgnivarcasaḥ | manuṣyabhārāndāśārho dadau daśa janārdanaḥ

दाशार्ह जनार्दन ने अग्नि के समान दमकते उत्तम सोने के, गढ़े हुए और बिना गढ़े, दस मनुष्य-भार दिए।

श्लोक 46 (1.247.46)

गजानां तु प्रभिन्नानां त्रिधा प्रस्रवतां मदम् । गिरिकूटनिकाशानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥

gajānāṃ tu prabhinnānāṃ tridhā prasravatāṃ madam | girikūṭanikāśānāṃ samareṣvanivartinām

मद से उन्मत्त, तीन स्थानों से मद बहाते, पर्वत-शिखरों के समान विशाल और युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले हाथियों में से,

श्लोक 47 (1.247.47)

क्लृप्तानां पटुघण्टानां चारूणां हेममालिनाम् । हस्त्यारोहैरुपेतानां सहस्रं साहसप्रियः ॥

klṛptānāṃ paṭughaṇṭānāṃ cārūṇāṃ hemamālinām | hastyārohairupetānāṃ sahasraṃ sāhasapriyaḥ

पूरे साज़ से सजे, ऊँचे स्वर वाले घण्टों से युक्त, सुन्दर, स्वर्णमालाओं से विभूषित और महावतों सहित, एक सहस्र हाथी उस साहसप्रिय ने दिए।

श्लोक 48 (1.247.48)

रामः पाणिग्रहणिकं ददौ पार्थाय लाङ्गली । प्रीयमाणो हलधरः संबन्धं प्रति मानयन् ॥

rāmaḥ pāṇigrahaṇikaṃ dadau pārthāya lāṅgalī | prīyamāṇo haladharaḥ saṃbandhaṃ prati mānayan

हलधारी बलराम ने प्रसन्न होकर, इस नये सम्बन्ध का मान रखते हुए, पार्थ को पाणिग्रहण की भेंट दी।

श्लोक 49 (1.247.49)

स महाधनरत्नौघो वस्त्रकम्बलफेनवान् । महागजमहाग्राहः पताकाशैवलाकुलः ॥

sa mahādhanaratnaugho vastrakambalaphenavān | mahāgajamahāgrāhaḥ patākāśaivalākulaḥ

धन का वह महान प्रवाह — रत्नों के ढेर जिसका जल थे, वस्त्र और कम्बल जिसका फेन, बड़े-बड़े हाथी जिसके मगर, और पताकाएँ जिसकी शैवाल थीं —

श्लोक 50 (1.247.50)

पाण्डुसागरमाविद्धः प्रविवेश महाधनः । पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् ॥

pāṇḍusāgaramāviddhaḥ praviveśa mahādhanaḥ | pūrṇamāpūrayaṃsteṣāṃ dviṣacchokāvaho'bhavat

पाण्डवों रूपी सागर में वेग से जा मिला; वह विशाल धनराशि उन्हें भरपूर भरती हुई उनके शत्रुओं के लिए शोक का कारण बनी।

श्लोक 51 (1.247.51)

प्रतिजग्राह तत्सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिरः । पूजयामास तांश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथान् ॥

pratijagrāha tatsarvaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | pūjayāmāsa tāṃścaiva vṛṣṇyandhakamahārathān

धर्मराज युधिष्ठिर ने वह सब स्वीकार किया और वृष्णि तथा अन्धक वंश के उन महारथियों का सम्मान किया।

श्लोक 52 (1.247.52)

ते समेता महात्मानः कुरुवृष्ण्यन्धकोत्तमाः । विजह्रुरमरावासे नराः सुकृतिनो यथा ॥

te sametā mahātmānaḥ kuruvṛṣṇyandhakottamāḥ | vijahruramarāvāse narāḥ sukṛtino yathā

कुरु, वृष्णि और अन्धक वंश के वे श्रेष्ठ महात्मा एकत्र होकर वैसे ही आनन्द-विहार करने लगे जैसे पुण्यात्मा मनुष्य देवलोक में करते हैं।

श्लोक 53 (1.247.53)

तत्रतत्र महानादैरुत्कृष्टतलनादितैः । यथायोगं यथाप्रीति विजह्रुः कुरुवृष्णयः ॥

tatratatra mahānādairutkṛṣṭatalanāditaiḥ | yathāyogaṃ yathāprīti vijahruḥ kuruvṛṣṇayaḥ

जगह-जगह ऊँचे नाद और तालियों की गूँज के बीच कुरु और वृष्णि अपनी-अपनी रुचि और प्रसन्नता के अनुसार आमोद-प्रमोद करते रहे।

श्लोक 54 (1.247.54)

एवमुत्तमवीर्यास्ते विहृत्य दिवसान्बहून् । पूजिताः कुरुभिर्जग्मुः पुनर्द्वारवतीं प्रति ॥

evamuttamavīryāste vihṛtya divasānbahūn | pūjitāḥ kurubhirjagmuḥ punardvāravatīṃ prati

इस प्रकार वे परम पराक्रमी पुरुष बहुत दिनों तक विहार करके कुरुओं से सम्मानित हो फिर द्वारका की ओर चल पड़े।

श्लोक 55 (1.247.55)

रामं पुरस्कृत्य ययुर्वृष्ण्यन्धकमहारथाः । रत्नान्यादाय शुभ्राणि दत्तानि कुरुसत्तमैः ॥

rāmaṃ puraskṛtya yayurvṛṣṇyandhakamahārathāḥ | ratnānyādāya śubhrāṇi dattāni kurusattamaiḥ

बलराम को आगे करके वृष्णि और अन्धक वंश के महारथी कुरुश्रेष्ठों द्वारा दिए गए उज्ज्वल रत्न लेकर लौट चले।

श्लोक 56 (1.247.56)

रामः सुभद्रां संपूज्य परिष्वज्य स्वसां तदा । न्यासेति द्रौपदीमुक्त्वा परिदाय महाबलः ॥

rāmaḥ subhadrāṃ saṃpūjya pariṣvajya svasāṃ tadā | nyāseti draupadīmuktvā paridāya mahābalaḥ

बलराम ने सुभद्रा का आदर करके अपनी बहन को गले लगाया, और उन महाबली ने द्रौपदी से "यह तुम्हारे पास धरोहर है" कहकर उसे उनकी देखरेख में सौंप दिया।

श्लोक 57 (1.247.57)

पितृष्वसायाश्चरणावभिवाद्य ययौ तदा । तस्मिन्काले पृथा प्रीता पूजयामास तं तथा ॥

pitṛṣvasāyāścaraṇāvabhivādya yayau tadā | tasminkāle pṛthā prītā pūjayāmāsa taṃ tathā

फिर अपनी बुआ (कुन्ती) के चरणों में प्रणाम करके वे चल पड़े। उस समय प्रसन्न पृथा ने भी उनका सत्कार किया।

श्लोक 58 (1.247.58)

स वृष्णिवीरः पार्थैश्च पौरैश्च परमार्चितः । ययौ द्वारवतीं रामो वृष्णिभिः सह संयुतः ॥

sa vṛṣṇivīraḥ pārthaiśca pauraiśca paramārcitaḥ | yayau dvāravatīṃ rāmo vṛṣṇibhiḥ saha saṃyutaḥ

पार्थों और नगरवासियों से अत्यन्त सम्मानित वृष्णिवीर बलराम वृष्णियों के साथ द्वारका चले गए।

श्लोक 59 (1.247.59)

वासुदेवस्तु पार्थेन तत्रैव सह भारत । चतुस्त्रिंशदहोरात्रं रममाणो महाबलः । उवास नगरे रम्ये शक्रप्रस्थे महात्मना ॥

vāsudevastu pārthena tatraiva saha bhārata | catustriṃśadahorātraṃ ramamāṇo mahābalaḥ | uvāsa nagare ramye śakraprasthe mahātmanā

परन्तु हे भारत, महाबली वासुदेव वहीं पार्थ के साथ रमणीय शक्रप्रस्थ नगर में रहे, और उन महात्मा के साथ चौंतीस दिन-रात आनन्द करते रहे।

श्लोक 60 (1.247.60)

व्यचरद्यमुनातीरे मृगयां स महायशाः । मृगान्विध्यन्वराहांश्च रेमे सार्धं किरीटिना ॥

vyacaradyamunātīre mṛgayāṃ sa mahāyaśāḥ | mṛgānvidhyanvarāhāṃśca reme sārdhaṃ kirīṭinā

वे महायशस्वी यमुना के तट पर शिकार खेलते हुए घूमते रहे, और किरीटधारी अर्जुन के साथ हिरणों और सूअरों को बींधते हुए आनन्द करते रहे।

श्लोक 61 (1.247.61)

ततः सुभद्रा सौभद्रं केशवस्य प्रिया स्वसा । जयन्तमिव पौलोमी ख्यातिमन्तमजीजनत् ॥

tataḥ subhadrā saubhadraṃ keśavasya priyā svasā | jayantamiva paulomī khyātimantamajījanat

तदनन्तर केशव की प्रिय बहन सुभद्रा ने यशस्वी पुत्र सौभद्र को जन्म दिया, जैसे पुलोमा की पुत्री शची ने जयन्त को जन्म दिया था।

श्लोक 62 (1.247.62)

दीर्घबाहुं महोरस्कं वृषभाक्षमरिन्दमम् । सुभद्रा सुषुवे वीरमभिमन्युं नरर्षभम् ॥

dīrghabāhuṃ mahoraskaṃ vṛṣabhākṣamarindamam | subhadrā suṣuve vīramabhimanyuṃ nararṣabham

लम्बी भुजाओं वाले, चौड़ी छाती वाले, वृषभ जैसे नेत्रों वाले, शत्रुदमन, नरश्रेष्ठ वीर अभिमन्यु को सुभद्रा ने जन्म दिया।

श्लोक 63 (1.247.63)

अभीश्च मन्युमांश्चैव ततस्तमरिमर्दनम् । अभिमन्युरिति प्राहुरार्जुनिं पुरुषर्षभम् ॥

abhīśca manyumāṃścaiva tatastamarimardanam | abhimanyuriti prāhurārjuniṃ puruṣarṣabham

वह निर्भय (अभी) और तेजस्वी रोष (मन्यु) से युक्त था, इसलिए उस शत्रुमर्दन, पुरुषश्रेष्ठ अर्जुनपुत्र को लोग अभिमन्यु कहने लगे।

श्लोक 64 (1.247.64)

स सात्वत्यामतिरथः संबभूव धनञ्जयात् । मखे निर्मथनेनेव शमीगर्भाद्धुताशनः ॥

sa sātvatyāmatirathaḥ saṃbabhūva dhanañjayāt | makhe nirmathaneneva śamīgarbhāddhutāśanaḥ

वह अतिरथी धनञ्जय से सात्वतकुल की सुभद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुआ, जैसे यज्ञ में मन्थन से शमी के गर्भ से अग्नि प्रकट होती है।

श्लोक 65 (1.247.65)

यस्मिञ्जाते महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अयुतं गा द्विजातिभ्यः प्रादान्निष्कांश्च भारत ॥

yasmiñjāte mahātejāḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | ayutaṃ gā dvijātibhyaḥ prādānniṣkāṃśca bhārata

हे भारत, उसके जन्म पर महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को दस हज़ार गौएँ और स्वर्णमुद्राएँ दान कीं।

श्लोक 66 (1.247.66)

दयितो वासुदेवस्य बाल्यात्प्रभृति चाभवत् । पितॄणां चैव सर्वेषां प्रजानामिव चन्द्रमाः ॥

dayito vāsudevasya bālyātprabhṛti cābhavat | pitṝṇāṃ caiva sarveṣāṃ prajānāmiva candramāḥ

बचपन से ही वह वासुदेव का और अपने सभी पितृजनों का वैसे ही प्रिय था, जैसे प्रजा को चन्द्रमा प्रिय होता है।

श्लोक 67 (1.247.67)

जन्मप्रभृति कृष्णश्च चक्रे तस्य क्रियाः शुभाः । स चापि ववृधे बालः शुक्लपक्षे यथा शशी ॥

janmaprabhṛti kṛṣṇaśca cakre tasya kriyāḥ śubhāḥ | sa cāpi vavṛdhe bālaḥ śuklapakṣe yathā śaśī

जन्म से ही श्रीकृष्ण ने उसके सब शुभ संस्कार कराए, और वह बालक शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ने लगा।

श्लोक 68 (1.247.68)

चतुष्पादं दशविधं धनुर्वेदमरिन्दमः । अर्जुनाद्वेद वेदज्ञः सकलं दिव्यमानुषम् ॥

catuṣpādaṃ daśavidhaṃ dhanurvedamarindamaḥ | arjunādveda vedajñaḥ sakalaṃ divyamānuṣam

उस वेदज्ञ, शत्रुदमन बालक ने अर्जुन से चार पादों और दस अंगों वाला सम्पूर्ण धनुर्वेद, दिव्य और मानुष दोनों, सीख लिया।

श्लोक 69 (1.247.69)

विज्ञानेष्वपि चास्त्राणां सौष्ठवे च महाबलः । क्रियास्वपि च सर्वासु विशेषानभ्यशिक्षयत् ॥

vijñāneṣvapi cāstrāṇāṃ sauṣṭhave ca mahābalaḥ | kriyāsvapi ca sarvāsu viśeṣānabhyaśikṣayat

महाबली अर्जुन ने उसे अस्त्रों के ज्ञान में, उनके कौशलपूर्ण संचालन में और सभी प्रयोगों में विशेष बातें सिखाईं।

श्लोक 70 (1.247.70)

आगमे च प्रयोगे च चक्रे तुल्यमिवात्मना । तुतोष पुत्रं सौभद्रं प्रेक्षमाणो धनञ्जयः ॥

āgame ca prayoge ca cakre tulyamivātmanā | tutoṣa putraṃ saubhadraṃ prekṣamāṇo dhanañjayaḥ

शास्त्र-ज्ञान और प्रयोग दोनों में उन्होंने उसे मानो अपने ही समान बना दिया; अपने पुत्र सौभद्र को देखकर धनञ्जय अत्यन्त सन्तुष्ट होते थे।

श्लोक 71 (1.247.71)

सर्वसंहननोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् । दुर्धर्षमृषभस्कन्धं व्यात्ताननमिवोरगम् ॥

sarvasaṃhananopetaṃ sarvalakṣaṇalakṣitam | durdharṣamṛṣabhaskandhaṃ vyāttānanamivoragam

सभी शारीरिक गुणों से सम्पन्न, सब शुभ लक्षणों से युक्त, दुर्जेय, वृषभ जैसे कन्धों वाला, मुँह फैलाए सर्प के समान,

श्लोक 72 (1.247.72)

सिंहदर्पं महेष्वासं मत्तमातङ्गविक्रमम् । मेघदुन्दुभिनिर्घोषं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ॥

siṃhadarpaṃ maheṣvāsaṃ mattamātaṅgavikramam | meghadundubhinirghoṣaṃ pūrṇacandranibhānanam

सिंह के समान दर्प वाला, महान धनुर्धर, मतवाले हाथी जैसे पराक्रम वाला, मेघ और दुन्दुभि के समान गम्भीर स्वर वाला और पूर्ण चन्द्रमा जैसे मुख वाला,

श्लोक 73 (1.247.73)

कृष्णस्य सदृशं शौर्ये वीर्ये रूपे तथाऽऽकृतौ । ददर्श पुत्रं बीभत्सुर्मघवानिव तं यथा ॥

kṛṣṇasya sadṛśaṃ śaurye vīrye rūpe tathā''kṛtau | dadarśa putraṃ bībhatsurmaghavāniva taṃ yathā

शौर्य, बल, रूप और आकृति में श्रीकृष्ण के समान — ऐसे पुत्र को बीभत्सु उसी प्रकार देखते थे जैसे इन्द्र स्वयं अर्जुन को देखते थे।

श्लोक 74 (1.247.74)

पाञ्चाल्यपि तु पञ्चभ्यः पतिभ्यः शुभलक्षणा । लेभे पञ्च सुतान्वीराञ्श्रेष्ठान्पञ्चाचलानिव ॥

pāñcālyapi tu pañcabhyaḥ patibhyaḥ śubhalakṣaṇā | lebhe pañca sutānvīrāñśreṣṭhānpañcācalāniva

शुभ लक्षणों वाली पाञ्चाली ने भी अपने पाँच पतियों से पाँच वीर और श्रेष्ठ पुत्र पाए, जो पाँच पर्वतों के समान थे।

श्लोक 75 (1.247.75)

युधिष्ठिरात्प्रतिविन्ध्यं सुतसोमं वृकोदरात् । अर्जुनाच्छ्रुतकर्माणं शतानीकं च नाकुलिम् ॥

yudhiṣṭhirātprativindhyaṃ sutasomaṃ vṛkodarāt | arjunācchrutakarmāṇaṃ śatānīkaṃ ca nākulim

युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, वृकोदर से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक,

श्लोक 76 (1.247.76)

सहदेवाच्छ्रुतसेनमेतान्पञ्च महारथान् । पाञ्चाली सुषुवे वीरानादित्यानदितिर्यथा ॥

sahadevācchrutasenametānpañca mahārathān | pāñcālī suṣuve vīrānādityānaditiryathā

और सहदेव से श्रुतसेन — इन पाँच वीर महारथियों को पाञ्चाली ने वैसे ही जन्म दिया जैसे अदिति ने आदित्यों को।

श्लोक 77 (1.247.77)

शास्त्रतः प्रतिविन्ध्यन्तमूचुर्विप्रायुधिष्ठिरम् । परप्रहरणज्ञाने प्रतिविन्ध्यो भवत्वयम् ॥

śāstrataḥ prativindhyantamūcurviprāyudhiṣṭhiram | parapraharaṇajñāne prativindhyo bhavatvayam

शास्त्र के अनुसार ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर से उस बालक का नाम प्रतिविन्ध्य बताते हुए कहा — "शत्रु के प्रहारों को सहने में यह विन्ध्य पर्वत के समान अडिग हो।"

श्लोक 78 (1.247.78)

सुतेसोमसहस्रे तु सोमार्कसमतेजसम् । सुतसोमं महेष्वासं सुषुवे भीमसेनतः ॥

sutesomasahasre tu somārkasamatejasam | sutasomaṃ maheṣvāsaṃ suṣuve bhīmasenataḥ

एक सहस्र सोमयाग सम्पन्न होने पर उसने भीमसेन से चन्द्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी महाधनुर्धर सुतसोम को जन्म दिया।

श्लोक 79 (1.247.79)

श्रुतं कर्म महत्कृत्वा निवृत्तेन किरीटिना । जातः पुत्रस्तथेत्येवं श्रुतकर्मा ततोऽभवत् ॥

śrutaṃ karma mahatkṛtvā nivṛttena kirīṭinā | jātaḥ putrastathetyevaṃ śrutakarmā tato'bhavat

किरीटधारी अर्जुन के एक महान और विख्यात कर्म करके लौटने पर पुत्र उत्पन्न हुआ, इसलिए उसका नाम श्रुतकर्मा पड़ा।

श्लोक 80 (1.247.80)

शतानीकस्य राजर्षेः कौरव्यस्य महात्मनः । चक्रे पुत्रं सनामानं नकुलः कीर्तिवर्धनम् ॥

śatānīkasya rājarṣeḥ kauravyasya mahātmanaḥ | cakre putraṃ sanāmānaṃ nakulaḥ kīrtivardhanam

कीर्ति बढ़ाने वाले नकुल ने अपने पुत्र का नाम कुरुवंश के महात्मा राजर्षि शतानीक के नाम पर रखा।

श्लोक 81 (1.247.81)

ततस्त्वजीजनत्कृष्णा नक्षत्रे वह्निदैवते । सहदेवात्सुतं तस्माच्छ्रुतसेनेति तं विदुः ॥

tatastvajījanatkṛṣṇā nakṣatre vahnidaivate | sahadevātsutaṃ tasmācchrutaseneti taṃ viduḥ

फिर कृष्णा (द्रौपदी) ने अग्नि-देवता वाले नक्षत्र (कृत्तिका) में सहदेव से पुत्र को जन्म दिया; इसी कारण उसे श्रुतसेन के नाम से जाना जाता है।

श्लोक 82 (1.247.82)

एकवर्षान्तरास्त्वेते द्रौपदेया यशस्विनः । अन्वजायन्त राजेन्द्र परस्परहितैषिणः ॥

ekavarṣāntarāstvete draupadeyā yaśasvinaḥ | anvajāyanta rājendra parasparahitaiṣiṇaḥ

हे राजेन्द्र, द्रौपदी के ये यशस्वी पुत्र एक-एक वर्ष के अन्तर से उत्पन्न हुए और एक-दूसरे का हित चाहने वाले थे।

श्लोक 83 (1.247.83)

जातकर्माण्यानुपूर्व्याच्चूडोपनयनानि च । चकार विधिवद्धौम्यस्तेषां भरतसत्तम ॥

jātakarmāṇyānupūrvyāccūḍopanayanāni ca | cakāra vidhivaddhaumyasteṣāṃ bharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ, धौम्य ने क्रम से विधिपूर्वक उनके जातकर्म, चूडाकर्म और उपनयन संस्कार कराए।

श्लोक 84 (1.247.84)

कृत्वा च वेदाध्ययनं ततः सुचरितव्रताः । जगृहुः सर्वमिष्वस्त्रमर्जुनाद्दिव्यमानुषम् ॥

kṛtvā ca vedādhyayanaṃ tataḥ sucaritavratāḥ | jagṛhuḥ sarvamiṣvastramarjunāddivyamānuṣam

वेदाध्ययन करके और व्रतों का भली-भाँति पालन करके उन्होंने अर्जुन से दिव्य और मानुष, सम्पूर्ण धनुर्विद्या ग्रहण की।

श्लोक 85 (1.247.85)

दिव्यगर्भोपमैः पुत्रैर्व्यूढोरस्कैर्महारथैः । अन्विता राजशार्दूल पाण्डवा मुदमाप्नुवन् ॥

divyagarbhopamaiḥ putrairvyūḍhoraskairmahārathaiḥ | anvitā rājaśārdūla pāṇḍavā mudamāpnuvan

हे राजसिंह, देवपुत्रों के समान, चौड़ी छाती वाले महारथी पुत्रों से युक्त होकर पाण्डव आनन्दित हुए।

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