आदि पर्व · अध्याय 248
यमुना-तट पर विहार और खाण्डव में ब्राह्मण का आगमन
इन्द्रप्रस्थ में रहते हुए पाण्डव अन्य राजाओं को परास्त करते हैं, और युधिष्ठिर ऐसे न्याय और मधुर वाणी से शासन करते हैं कि प्रजा उन्हें अपने शरीर के समान प्रिय मानती है; वे धर्म, अर्थ और काम में सन्तुलन रखते हैं। गर्मी के दिनों में अर्जुन यमुना-विहार का प्रस्ताव रखते हैं; श्रीकृष्ण सहमत होते हैं, और नदी-तट के घने खाण्डव वन में, जो तक्षक और असंख्य प्राणियों का निवास है, विचरते हुए श्रीकृष्ण उसके विनाश को पहले ही देख लेते हैं। जब साथ आई स्त्रियाँ नाचती-गाती और मधुपान करती हैं, तब कृष्ण और अर्जुन अलग बैठकर पुरानी बातें करते हैं, और खाण्डव वन को जलाने की इच्छा रखने वाला एक ऊँचा, पिंगलवर्ण, तेजस्वी ब्राह्मण उनके पास आता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.248.1)
इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्नुरन्यान्नराधिपान् । शासनाद्धृतराष्ट्रस्य राज्ञः शान्तनवस्य च ॥
indraprasthe vasantaste jaghnuranyānnarādhipān | śāsanāddhṛtarāṣṭrasya rājñaḥ śāntanavasya ca
इन्द्रप्रस्थ में रहते हुए उन्होंने राजा धृतराष्ट्र और शान्तनुनन्दन भीष्म की आज्ञा से दूसरे राजाओं को परास्त किया।
श्लोक 2 (1.248.2)
आश्रित्य धर्मराजानं सर्वलोकोऽवसत्सुखम् । पुण्यलक्षणकर्माणं स्वदेहमिव देहिनः ॥
āśritya dharmarājānaṃ sarvaloko'vasatsukham | puṇyalakṣaṇakarmāṇaṃ svadehamiva dehinaḥ
पुण्य के लक्षणों से युक्त कर्म करने वाले धर्मराज का आश्रय लेकर सारी प्रजा वैसे ही सुख से रहती थी जैसे देहधारी अपने शरीर के सहारे रहते हैं।
श्लोक 3 (1.248.3)
स समं धर्मकामार्थान्सिषेवे भरतर्षभ । त्रीनिवात्मसमान्बन्धून्नीतिमानिव मानयन् ॥
sa samaṃ dharmakāmārthānsiṣeve bharatarṣabha | trīnivātmasamānbandhūnnītimāniva mānayan
वे भरतश्रेष्ठ धर्म, काम और अर्थ का समान भाव से सेवन करते थे, जैसे कोई नीतिमान पुरुष अपने ही समान तीन बन्धुओं का आदर करता है।
श्लोक 4 (1.248.4)
तेषां समविभक्तानां क्षितौ देहवतामिव । बभौ धर्मार्थकामानां चतुर्थ इव पार्थिवः ॥
teṣāṃ samavibhaktānāṃ kṣitau dehavatāmiva | babhau dharmārthakāmānāṃ caturtha iva pārthivaḥ
पृथ्वी पर मानो देह धारण करके समान रूप से बँटे हुए धर्म, अर्थ और काम के बीच राजा चौथे के समान शोभा पाते थे।
श्लोक 5 (1.248.5)
अध्येतारं परं वेदान्प्रयोक्तारं महाध्वरे । रक्षितारं शुभाँल्लोकाँल्लेभिरे तं जनाधिपम् ॥
adhyetāraṃ paraṃ vedānprayoktāraṃ mahādhvare | rakṣitāraṃ śubhām̐llokām̐llebhire taṃ janādhipam
शुभ लोकों ने उस नरपति को वेदों के श्रेष्ठ अध्येता, महायज्ञों के अनुष्ठाता और रक्षक के रूप में पाया।
श्लोक 6 (1.248.6)
अधिष्ठानवती लक्ष्मीः परायणवती मतिः । वर्धमानोऽखिलो धर्मस्तेनासीत्पृथिवीक्षिताम् ॥
adhiṣṭhānavatī lakṣmīḥ parāyaṇavatī matiḥ | vardhamāno'khilo dharmastenāsītpṛthivīkṣitām
उनके कारण राजाओं के बीच लक्ष्मी को स्थिर आधार मिला, बुद्धि को परम आश्रय मिला, और सम्पूर्ण धर्म निरन्तर बढ़ता गया।
श्लोक 7 (1.248.7)
भ्रातृभिः सहितो राजा चतुर्भिरधिकं बभौ । प्रयुज्यमानैर्विततो वेदैरिव महाध्वरः ॥
bhrātṛbhiḥ sahito rājā caturbhiradhikaṃ babhau | prayujyamānairvitato vedairiva mahādhvaraḥ
अपने चार भाइयों के साथ राजा और भी अधिक शोभा पाते थे, जैसे प्रयोग में लाए जा रहे वेदों से विस्तृत महायज्ञ शोभित होता है।
श्लोक 8 (1.248.8)
तं तु धौम्यादयो विप्राः परिवार्योपतस्थिरे । बृहस्पतिसमा मुख्याः प्रजापतिमिवामराः ॥
taṃ tu dhaumyādayo viprāḥ parivāryopatasthire | bṛhaspatisamā mukhyāḥ prajāpatimivāmarāḥ
धौम्य आदि ब्राह्मण, जिनमें प्रमुख बृहस्पति के समान थे, उन्हें घेरकर उनकी सेवा में उपस्थित रहते थे, जैसे देवता प्रजापति की सेवा करते हैं।
श्लोक 9 (1.248.9)
धर्मराजे ह्यतिप्रीत्या पूर्णचन्द्र इवामले । प्रजानां रेमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदयानि च ॥
dharmarāje hyatiprītyā pūrṇacandra ivāmale | prajānāṃ remire tulyaṃ netrāṇi hṛdayāni ca
पूर्ण चन्द्रमा के समान निर्मल धर्मराज के प्रति अत्यन्त प्रेम के कारण प्रजा के नेत्र और हृदय समान रूप से उनमें रमते थे।
श्लोक 10 (1.248.10)
न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे । यद्बभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ॥
na tu kevaladaivena prajā bhāvena remire | yadbabhūva manaḥkāntaṃ karmaṇā sa cakāra tat
प्रजा केवल भाग्यवश नहीं, बल्कि हृदय के भाव से उनमें अनुरक्त थी; क्योंकि जो कुछ उनके मन को प्रिय होता, उसे वे कर्म से पूरा कर देते थे।
श्लोक 11 (1.248.11)
न ह्ययुक्तं न चासत्यं नासह्यं न च वाऽप्रियम् । भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य धीमतः ॥
na hyayuktaṃ na cāsatyaṃ nāsahyaṃ na ca vā'priyam | bhāṣitaṃ cārubhāṣasya jajñe pārthasya dhīmataḥ
मधुरभाषी, बुद्धिमान पार्थ के मुख से कभी कोई अनुचित, असत्य, असह्य या अप्रिय बात नहीं निकलती थी।
श्लोक 12 (1.248.12)
स हि सर्वस्य लोकस्य हितमात्मन एव च । चिकीर्षन्सुमहातेजा रेमे भरतसत्तम ॥
sa hi sarvasya lokasya hitamātmana eva ca | cikīrṣansumahātejā reme bharatasattama
हे भरतश्रेष्ठ, सारे जगत् का और अपना भी हित चाहते हुए वे महातेजस्वी आनन्दपूर्वक रहते थे।
श्लोक 13 (1.248.13)
तथा तु मुदिताः सर्वे पाण्डवा विगतज्वराः । अवसन्पृथिवीपालाँस्तापयन्तः स्वतेजसा ॥
tathā tu muditāḥ sarve pāṇḍavā vigatajvarāḥ | avasanpṛthivīpālām̐stāpayantaḥ svatejasā
इस प्रकार सभी पाण्डव निश्चिन्त और प्रसन्न होकर अपने तेज से राजाओं को सन्तप्त करते हुए रहने लगे।
श्लोक 14 (1.248.14)
ततः कतिपयाहस्य बीभत्सुः कृष्णमब्रवीत् । उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छावो यमुनां प्रति ॥
tataḥ katipayāhasya bībhatsuḥ kṛṣṇamabravīt | uṣṇāni kṛṣṇa vartante gacchāvo yamunāṃ prati
कुछ दिनों के बाद बीभत्सु ने श्रीकृष्ण से कहा — "कृष्ण, गर्मी के दिन चल रहे हैं; चलो, हम दोनों यमुना चलें।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 15 (1.248.15)
सुहृज्जनवृतौ तत्र विहृत्य मधुसूदन । सायाह्ने पुनरेष्यावो रोचतां ते जनार्दन ॥
suhṛjjanavṛtau tatra vihṛtya madhusūdana | sāyāhne punareṣyāvo rocatāṃ te janārdana
हे मधुसूदन, वहाँ मित्रजनों के साथ विहार करके हम सन्ध्या को लौट आएँगे — हे जनार्दन, यदि तुम्हें यह अच्छा लगे।
वासुदेव उवाच
श्लोक 16 (1.248.16)
कुन्तीमातर्ममाप्येतद्रोचते यद्वयं जले । सुहृज्जनवृताः पार्थ विहरेम यथासुखम् ॥
kuntīmātarmamāpyetadrocate yadvayaṃ jale | suhṛjjanavṛtāḥ pārtha viharema yathāsukham
हे कुन्तीनन्दन, मुझे भी यह अच्छा लगता है कि हम मित्रजनों के साथ जल में इच्छानुसार विहार करें, पार्थ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (1.248.17)
आमन्त्र्य तौ धर्मराजमनुज्ञाप्य च भारत । जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुहृज्जनवृतौ ततः ॥
āmantrya tau dharmarājamanujñāpya ca bhārata | jagmatuḥ pārthagovindau suhṛjjanavṛtau tataḥ
हे भारत, धर्मराज से विदा लेकर और उनकी अनुमति पाकर पार्थ और गोविन्द मित्रजनों से घिरे हुए चल पड़े।
श्लोक 18 (1.248.18)
विहरन्खाण्डवप्रस्थे काननेषु च माधवः । पुष्पितोपवनां दिव्यां ददर्श यमुनां नदीम् ॥
viharankhāṇḍavaprasthe kānaneṣu ca mādhavaḥ | puṣpitopavanāṃ divyāṃ dadarśa yamunāṃ nadīm
खाण्डवप्रस्थ के वनों में विचरते हुए माधव ने फूलों से भरे उपवनों वाली दिव्य यमुना नदी को देखा।
श्लोक 19 (1.248.19)
तस्यास्तीरे वनं दिव्यं सर्वर्तुसुमनोहरम् । आलयं सर्वभूतानां खाण्डवं खड्गचर्मभृत् ॥
tasyāstīre vanaṃ divyaṃ sarvartusumanoharam | ālayaṃ sarvabhūtānāṃ khāṇḍavaṃ khaḍgacarmabhṛt
उसके तट पर सब ऋतुओं में मनोहर एक दिव्य वन था — सब प्राणियों का निवासस्थान खाण्डव। खड्ग और ढाल धारण करने वाले माधव ने
श्लोक 20 (1.248.20)
ददर्श कृत्स्नं तं देशं सहितः सव्यसाचिना । ऋक्षगोमायुशार्दूलवृककृष्णमृगान्वितम् ॥
dadarśa kṛtsnaṃ taṃ deśaṃ sahitaḥ savyasācinā | ṛkṣagomāyuśārdūlavṛkakṛṣṇamṛgānvitam
सव्यसाची अर्जुन के साथ उस सारे प्रदेश को देखा — जो रीछों, सियारों, बाघों, भेड़ियों और काले हिरणों से भरा था,
श्लोक 21 (1.248.21)
शाखामृगगणैर्जुष्टं गजद्वीपिनिषेवितम् । शुकबर्हिणदात्यूहहंससारसनादितम् ॥
śākhāmṛgagaṇairjuṣṭaṃ gajadvīpiniṣevitam | śukabarhiṇadātyūhahaṃsasārasanāditam
वानरों के झुण्डों से सेवित, हाथियों और चीतों से भरा, तोतों, मोरों, दात्यूहों, हंसों और सारसों के कलरव से गूँजता हुआ,
श्लोक 22 (1.248.22)
नानामृगसहस्रैश्च पक्षिभिश्च समावृतम् । मानार्हं तच्च सर्वेषां देवदानवरक्षसाम् ॥
nānāmṛgasahasraiśca pakṣibhiśca samāvṛtam | mānārhaṃ tacca sarveṣāṃ devadānavarakṣasām
अनेक प्रकार के सहस्रों पशुओं और पक्षियों से भरा, तथा सब देवताओं, दानवों और राक्षसों के लिए आदरणीय;
श्लोक 23 (1.248.23)
आलयं पन्नगेन्द्रस्य तक्षकस्य महात्मनः । वेणुशाल्मलिबिल्वातिमुक्तजंब्वाम्रचम्पकैः ॥
ālayaṃ pannagendrasya takṣakasya mahātmanaḥ | veṇuśālmalibilvātimuktajaṃbvāmracampakaiḥ
महात्मा नागराज तक्षक का निवास; बाँस, सेमल, बेल, अतिमुक्त, जामुन, आम और चम्पा,
श्लोक 24 (1.248.24)
अङ्कोलपनसाश्वत्थतालजम्बीरवञ्जुलैः । शाकपद्मकतालैश्च शतशश्चैव रौहिणैः ॥
aṅkolapanasāśvatthatālajambīravañjulaiḥ | śākapadmakatālaiśca śataśaścaiva rauhiṇaiḥ
अंकोल, कटहल, पीपल, ताड़, जम्बीर और वंजुल के वृक्षों से, सागौन, पद्मक और ताल से तथा सैकड़ों रोहिण वृक्षों से युक्त;
श्लोक 25 (1.248.25)
नानावृक्षैः समायुक्तं नानागुल्मसमावृतम् । वेत्रकीचकसंयुक्तमाशीविषनिषेवितम् ॥
nānāvṛkṣaiḥ samāyuktaṃ nānāgulmasamāvṛtam | vetrakīcakasaṃyuktamāśīviṣaniṣevitam
अनेक वृक्षों से युक्त, अनेक झाड़ियों से ढका, बेंत और कीचक बाँसों से भरा और विषधर सर्पों का निवास;
श्लोक 26 (1.248.26)
विगतार्कं महाभोगविततद्रुमसङ्कटम् । व्यालदंष्ट्रिगणाकीर्णं वर्जितं सर्वमानुषैः ॥
vigatārkaṃ mahābhogavitatadrumasaṅkaṭam | vyāladaṃṣṭrigaṇākīrṇaṃ varjitaṃ sarvamānuṣaiḥ
जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता था, जो विशाल और फैले हुए वृक्षों से घना था, हिंसक और दाढ़ों वाले जन्तुओं से भरा और सब मनुष्यों से रहित था;
श्लोक 27 (1.248.27)
रक्षसां भुजगेन्द्राणां पक्षिणां च महालयम् । खाण्डवं सुमहाप्राज्ञः सर्वलोकविभागवित् ॥
rakṣasāṃ bhujagendrāṇāṃ pakṣiṇāṃ ca mahālayam | khāṇḍavaṃ sumahāprājñaḥ sarvalokavibhāgavit
राक्षसों, नागराजों और पक्षियों का विशाल निवास — उस खाण्डव को सब लोकों के विभाग जानने वाले परम ज्ञानी,
श्लोक 28 (1.248.28)
दृष्टवान्सर्वलोकेश अर्जुनेन समन्वितः । पीताम्बरधरो देवस्तद्वनं बहुधा चरन् ॥
dṛṣṭavānsarvalokeśa arjunena samanvitaḥ | pītāmbaradharo devastadvanaṃ bahudhā caran
सब लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ देखा; और उस वन में अनेक ओर विचरते हुए पीताम्बरधारी भगवान्
श्लोक 29 (1.248.29)
सद्रुमस्य सयक्षस्य सभूतगणपक्षिणः । खाण्डवस्य विनाशं तं ददर्श मधुसूदनः ॥
sadrumasya sayakṣasya sabhūtagaṇapakṣiṇaḥ | khāṇḍavasya vināśaṃ taṃ dadarśa madhusūdanaḥ
मधुसूदन ने वृक्षों, यक्षों, भूतगणों और पक्षियों सहित खाण्डव वन के उस विनाश को पहले ही देख लिया।
श्लोक 30 (1.248.30)
विहारदेशं संप्राप्य नानाद्रुममनुत्तमम् । गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरन्दरपुरोपमम् ॥
vihāradeśaṃ saṃprāpya nānādrumamanuttamam | gṛhairuccāvacairyuktaṃ purandarapuropamam
अनेक वृक्षों से युक्त, अनुपम, छोटे-बड़े भवनों से सुशोभित और इन्द्रपुरी के समान उस विहार-स्थल पर पहुँचकर,
श्लोक 31 (1.248.31)
भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च रसवद्भिर्महाधनैः । माल्यैश्च विविधैर्गन्धैस्तथा वार्ष्णेयपाण्डवौ ॥
bhakṣyairbhojyaiśca peyaiśca rasavadbhirmahādhanaiḥ | mālyaiśca vividhairgandhaistathā vārṣṇeyapāṇḍavau
स्वादिष्ट भक्ष्य, भोज्य और बहुमूल्य पेय पदार्थों, मालाओं और भाँति-भाँति की सुगन्धियों से युक्त उस स्थान में वार्ष्णेय और पाण्डव ने
श्लोक 32 (1.248.32)
तदा विविशतुः पूर्णं रत्नैरुच्चावचैः शुभैः । यथोपजोषं सर्वश्च जनश्चिक्रीड भारत ॥
tadā viviśatuḥ pūrṇaṃ ratnairuccāvacaiḥ śubhaiḥ | yathopajoṣaṃ sarvaśca janaścikrīḍa bhārata
छोटे-बड़े सुन्दर रत्नों से भरे उस स्थान में प्रवेश किया; और हे भारत, सब लोग इच्छानुसार क्रीडा करने लगे।
श्लोक 33 (1.248.33)
स्त्रियश्च विपुलश्रोण्यश्चारुपीनपयोधराः । मदस्खलितगामिन्यश्चिक्रीडुर्वामलोचनाः ॥
striyaśca vipulaśroṇyaścārupīnapayodharāḥ | madaskhalitagāminyaścikrīḍurvāmalocanāḥ
और विशाल नितम्बों तथा सुन्दर, उन्नत स्तनों वाली, मद से लड़खड़ाती चाल वाली सुनयनी स्त्रियाँ क्रीडा करने लगीं।
श्लोक 34 (1.248.34)
वने काश्चिज्जले काश्चित्काश्चिद्वेश्मसु चाङ्गनाः । यथादेशं यथाप्रीति चिक्रीडुः पार्थकृष्णयोः ॥
vane kāścijjale kāścitkāścidveśmasu cāṅganāḥ | yathādeśaṃ yathāprīti cikrīḍuḥ pārthakṛṣṇayoḥ
पार्थ और कृष्ण की प्रसन्नता के लिए कुछ स्त्रियाँ वन में, कुछ जल में और कुछ भवनों में, जहाँ और जैसा मन हुआ, क्रीडा करने लगीं।
श्लोक 35 (1.248.35)
वासुदेवप्रिया नित्यं सत्यभामा च भामिनी । द्रौपदी च सुभद्रा च वासांस्याभरणानि च । प्रायच्छन्त महाराज स्त्रीणां ताः स्म मदोत्कटाः ॥
vāsudevapriyā nityaṃ satyabhāmā ca bhāminī | draupadī ca subhadrā ca vāsāṃsyābharaṇāni ca | prāyacchanta mahārāja strīṇāṃ tāḥ sma madotkaṭāḥ
हे महाराज, वासुदेव की सदा प्रिय मानिनी सत्यभामा, तथा द्रौपदी और सुभद्रा ने मद से उल्लसित होकर उन स्त्रियों को वस्त्र और आभूषण दिए।
श्लोक 36 (1.248.36)
काश्चित्प्रहृष्टा ननृतुश्चुक्रुशुश्च तथा पराः । जहसुश्च परा नार्यः पपुश्चान्या वरासवम् ॥
kāścitprahṛṣṭā nanṛtuścukruśuśca tathā parāḥ | jahasuśca parā nāryaḥ papuścānyā varāsavam
कुछ स्त्रियाँ हर्ष से नाचने लगीं, कुछ ज़ोर से पुकारने लगीं; कुछ हँसने लगीं और कुछ उत्तम आसव पीने लगीं।
श्लोक 37 (1.248.37)
रुरुधुश्चापरास्तत्र प्रजघ्नुश्च परस्परम् । मन्त्रयामासुरन्याश्च रहस्यानि परस्परम् ॥
rurudhuścāparāstatra prajaghnuśca parasparam | mantrayāmāsuranyāśca rahasyāni parasparam
कुछ वहाँ एक-दूसरे को रोकने लगीं और आपस में धौल-धप्पा करने लगीं, और कुछ आपस में गुप्त बातें करने लगीं।
श्लोक 38 (1.248.38)
वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः । शब्देन पूर्यते हर्म्यं तद्वनं सुमहर्द्धिमत् ॥
veṇuvīṇāmṛdaṅgānāṃ manojñānāṃ ca sarvaśaḥ | śabdena pūryate harmyaṃ tadvanaṃ sumaharddhimat
बाँसुरी, वीणा और मृदंग की मनोहर ध्वनि से वह भवन और अत्यन्त समृद्ध वन सब ओर से गूँज उठा।
श्लोक 39 (1.248.39)
तस्मिंस्तदा वर्तमाने कुरुदाशार्हनन्दनौ । समीपं जग्मतुः कंचिदुद्देशं सुमनोहरम् ॥
tasmiṃstadā vartamāne kurudāśārhanandanau | samīpaṃ jagmatuḥ kaṃciduddeśaṃ sumanoharam
जब यह सब चल रहा था, तब कुरुनन्दन और दाशार्हनन्दन दोनों पास ही के एक अत्यन्त मनोहर स्थान पर गए।
श्लोक 40 (1.248.40)
तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णौ परपुरञ्जयौ । महार्हासनयो राजंस्ततस्तौ सन्निषीदतुः ॥
tatra gatvā mahātmānau kṛṣṇau parapurañjayau | mahārhāsanayo rājaṃstatastau sanniṣīdatuḥ
हे राजन्, वहाँ जाकर शत्रुनगरों को जीतने वाले वे दोनों महात्मा कृष्ण बहुमूल्य आसनों पर बैठ गए।
श्लोक 41 (1.248.41)
तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानीतराणि च । बहूनि कथयित्वा तौ रेमाते पार्थमाधवौ ॥
tatra pūrvavyatītāni vikrāntānītarāṇi ca | bahūni kathayitvā tau remāte pārthamādhavau
वहाँ पार्थ और माधव बीते हुए पराक्रमों और अन्य अनेक बातों की चर्चा करते हुए आनन्द करने लगे।
श्लोक 42 (1.248.42)
तत्रोपविष्टौ मुदितौ नाकपृष्ठेऽश्विनाविव । अभ्यागच्छत्तदा विप्रो वासुदेवधनञ्जयौ ॥
tatropaviṣṭau muditau nākapṛṣṭhe'śvināviva | abhyāgacchattadā vipro vāsudevadhanañjayau
स्वर्ग के शिखर पर बैठे अश्विनीकुमारों की भाँति वासुदेव और धनञ्जय जब वहाँ प्रसन्नता से बैठे थे, तभी एक ब्राह्मण उनके पास आया।
श्लोक 43 (1.248.43)
बृहच्छालप्रतीकाशः प्रतप्तकनकप्रभः । हरिपिङ्गोज्ज्वलश्मश्रुः प्रमाणायामतः समः ॥
bṛhacchālapratīkāśaḥ prataptakanakaprabhaḥ | haripiṅgojjvalaśmaśruḥ pramāṇāyāmataḥ samaḥ
वह विशाल शाल वृक्ष के समान ऊँचा, तपाए हुए सोने के समान कान्तिमान, हरित-पिंगल वर्ण का, ज्वाला-सी दमकती दाढ़ी वाला और लम्बाई-चौड़ाई में सुडौल था।
श्लोक 44 (1.248.44)
तरुणादित्यसङ्काशश्चीरवासा जटाधरः । पद्मपत्राननः पिङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥
taruṇādityasaṅkāśaścīravāsā jaṭādharaḥ | padmapatrānanaḥ piṅgastejasā prajvalanniva
वह उगते सूर्य के समान था, वल्कल वस्त्र पहने और जटाएँ धारण किए हुए; उसका मुख कमलदल-सा और वर्ण पिंगल था, और वह अपने तेज से मानो प्रज्वलित हो रहा था।
श्लोक 45 (1.248.45)
जगाम तौ कृष्णपार्थौ दिधक्षुः खाण्डवं वनम् । उपसृष्टं तु तं कृष्णौ भ्राजमानं द्विजोत्तमम् । अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतुः ॥
jagāma tau kṛṣṇapārthau didhakṣuḥ khāṇḍavaṃ vanam | upasṛṣṭaṃ tu taṃ kṛṣṇau bhrājamānaṃ dvijottamam | arjuno vāsudevaśca tūrṇamutpatya tasthatuḥ
खाण्डव वन को जलाने की इच्छा से वह कृष्ण और पार्थ के पास आया। उस दीप्तिमान श्रेष्ठ ब्राह्मण को निकट आया देख दोनों कृष्ण — अर्जुन और वासुदेव — तुरन्त उठकर खड़े हो गए।