आदि पर्व · अध्याय 249
अग्नि की याचना और राजा श्वेतकि की कथा
खाण्डव वन के समीप एक अत्यधिक खाने वाला ब्राह्मण श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास आकर स्वयं को अग्नि बताता है: वह भोजन के रूप में वही वन चाहता है, जिसकी रक्षा इन्द्र तक्षक नाग के लिए करते हैं और वर्षा से अग्नि को बुझा देते हैं। जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायन राजा श्वेतकि की कथा सुनाते हैं, जिनके निरन्तर यज्ञों से उनके ऋत्विज थक गए थे; उनके तप से प्रसन्न शिव ने उनसे बारह वर्ष तक घी की अविरल धाराओं से अग्नि को तृप्त करवाया और फिर दुर्वासा से उनका महायज्ञ करवाया। इतनी हवि से तृप्त होकर रोगी हुए अग्नि ब्रह्मा के पास गए, जिन्होंने उन्हें खाण्डव के प्राणियों का भक्षण करके स्वस्थ होने को कहा; किन्तु वहाँ के हाथियों, नागों और अन्य प्राणियों ने सात बार आग बुझा दी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.249.1)
सोऽब्रवीदर्जुनं चैव वासुदेवं च सात्वतम् । लोकप्रवीरौ तिष्ठन्तौ खाण्डवस्य समीपतः ॥
so'bravīdarjunaṃ caiva vāsudevaṃ ca sātvatam | lokapravīrau tiṣṭhantau khāṇḍavasya samīpataḥ
उसने खाण्डव वन के समीप खड़े, संसार के अग्रणी वीर अर्जुन और सात्वतवंशी वासुदेव से कहा —
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 2 (1.249.2)
ब्राह्मणो बहुभोक्ताऽस्मि भुञ्जेऽपरिमितं सदा । भिक्षे वार्ष्णेयपार्थौ वामेकां तृप्तिं प्रयच्छतम् ॥
brāhmaṇo bahubhoktā'smi bhuñje'parimitaṃ sadā | bhikṣe vārṣṇeyapārthau vāmekāṃ tṛptiṃ prayacchatam
"मैं बहुत खाने वाला ब्राह्मण हूँ, सदा अपरिमित भोजन करता हूँ। हे वार्ष्णेय, हे पार्थ, मैं तुम दोनों से भिक्षा माँगता हूँ — मुझे एक बार भरपूर तृप्ति दो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (1.249.3)
एवमुक्तौ तमब्रूतां ततस्तौ कृष्णपाण्डवौ । केनान्नेन भवांस्तृप्येत्तस्यान्नस्य यतावहे ॥
evamuktau tamabrūtāṃ tatastau kṛṣṇapāṇḍavau | kenānnena bhavāṃstṛpyettasyānnasya yatāvahe
यह सुनकर श्रीकृष्ण और पाण्डव अर्जुन ने उससे कहा — "किस अन्न से आपकी तृप्ति होगी? हम उसी अन्न को जुटाने का प्रयत्न करेंगे।"
श्लोक 4 (1.249.4)
एवमुक्तः स भगवानब्रवीत्तावुभौ ततः । भाषमाणौ तदा वीरौ किमन्नं क्रियतामिति ॥
evamuktaḥ sa bhagavānabravīttāvubhau tataḥ | bhāṣamāṇau tadā vīrau kimannaṃ kriyatāmiti
जब उन दोनों वीरों ने पूछा कि "कौन-सा अन्न तैयार किया जाए?", तब उन भगवान ने दोनों से कहा —
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 5 (1.249.5)
नाहमन्नं बुभुक्षे वै पावकं मां निबोधतम् । यदन्नमनुरूपं मे तद्युवां संप्रयच्छतम् ॥
nāhamannaṃ bubhukṣe vai pāvakaṃ māṃ nibodhatam | yadannamanurūpaṃ me tadyuvāṃ saṃprayacchatam
"मैं साधारण अन्न का भूखा नहीं हूँ। मुझे अग्नि जानो। जो अन्न मेरे योग्य हो, वही तुम दोनों मुझे दो।
श्लोक 6 (1.249.6)
इदमिन्द्रः सदा दावं खाण्डवं परिरक्षति । न च शक्नोम्यहं दग्धुं रक्ष्यमाणं महात्मना ॥
idamindraḥ sadā dāvaṃ khāṇḍavaṃ parirakṣati | na ca śaknomyahaṃ dagdhuṃ rakṣyamāṇaṃ mahātmanā
इन्द्र इस खाण्डव वन की सदा रक्षा करते हैं; उन महात्मा के रक्षा करते रहने से मैं इसे जला नहीं पाता।
श्लोक 7 (1.249.7)
वसत्यत्र सखा तस्य तक्षकः पन्नगः सदा । सगणस्तत्कृते दावं परिरक्षति वज्रभृत् ॥
vasatyatra sakhā tasya takṣakaḥ pannagaḥ sadā | sagaṇastatkṛte dāvaṃ parirakṣati vajrabhṛt
उनका मित्र नाग तक्षक अपने परिवार सहित यहाँ सदा रहता है; उसी के कारण वज्रधारी इन्द्र इस वन की रक्षा करते हैं।
श्लोक 8 (1.249.8)
तत्र भूतान्यनेकानि रक्ष्यन्तेऽस्य प्रसङ्गतः । तं दिधक्षुर्न शक्नोमि दग्धुं शक्रस्य तेजसा ॥
tatra bhūtānyanekāni rakṣyante'sya prasaṅgataḥ | taṃ didhakṣurna śaknomi dagdhuṃ śakrasya tejasā
उसके साथ-साथ वहाँ अनेक दूसरे प्राणियों की भी रक्षा होती है। मैं उसे जलाना चाहता हूँ, पर इन्द्र के तेज के कारण जला नहीं पाता।
श्लोक 9 (1.249.9)
स मां प्रज्वलितं दृष्ट्वा मेघाम्भोभिः प्रवर्षति । ततो दग्धुं न शक्नोमि दिधक्षुर्दावमीप्सितम् ॥
sa māṃ prajvalitaṃ dṛṣṭvā meghāmbhobhiḥ pravarṣati | tato dagdhuṃ na śaknomi didhakṣurdāvamīpsitam
मुझे प्रज्वलित देखते ही वे मेघों से जल बरसा देते हैं; इसी से मैं उस वन को, जिसे जलाने की मेरी इच्छा है, जला नहीं पाता।
श्लोक 10 (1.249.10)
स युवाभ्यां सहायाभ्यामस्त्रविद्भ्यां समागतः । दहेयं खाण्डवं दावमेतदन्नं वृतं मया ॥
sa yuvābhyāṃ sahāyābhyāmastravidbhyāṃ samāgataḥ | daheyaṃ khāṇḍavaṃ dāvametadannaṃ vṛtaṃ mayā
अब अस्त्रविद्या में निपुण तुम दोनों से मेरी भेंट हुई है; तुम्हारी सहायता से मैं खाण्डव वन को जला सकूँगा। यही वह अन्न है जिसे मैंने चुना है।
श्लोक 11 (1.249.11)
युवां ह्युदकधारास्ता भूतानि च समन्ततः । उत्तमास्त्रविदौ सम्यक्सर्वतो वारयिष्यथः ॥
yuvāṃ hyudakadhārāstā bhūtāni ca samantataḥ | uttamāstravidau samyaksarvato vārayiṣyathaḥ
क्योंकि उत्तम अस्त्रों के भली-भाँति ज्ञाता तुम दोनों उन जलधाराओं को और प्राणियों को भी चारों ओर से रोक दोगे।"
जनमेजय उवाच
श्लोक 12 (1.249.12)
किमर्थं भगवानग्निः खाण्डवं दग्धुमिच्छति । रक्ष्यमाणं महेन्द्रेण नानासत्वसमायुतम् ॥
kimarthaṃ bhagavānagniḥ khāṇḍavaṃ dagdhumicchati | rakṣyamāṇaṃ mahendreṇa nānāsatvasamāyutam
जनमेजय ने कहा — भगवान अग्नि उस खाण्डव वन को क्यों जलाना चाहते थे, जिसकी रक्षा महेन्द्र करते थे और जो नाना प्रकार के प्राणियों से भरा था?
श्लोक 13 (1.249.13)
न ह्येतत्कारणं ब्रह्मन्नल्पं संप्रतिभाति मे । यद्ददाह सुसंक्रुद्धः खाण्डवं हव्यवाहनः ॥
na hyetatkāraṇaṃ brahmannalpaṃ saṃpratibhāti me | yaddadāha susaṃkruddhaḥ khāṇḍavaṃ havyavāhanaḥ
हे ब्रह्मन्, हव्यवाहन अग्नि ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर जो खाण्डव को जलाया, उसका कारण मुझे छोटा नहीं जान पड़ता।
श्लोक 14 (1.249.14)
एतद्विस्तरशो ब्रह्मन्श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । खाण्डवस्य पुरा दाहो यथा समभवन्मुने ॥
etadvistaraśo brahmanśrotumicchāmi tattvataḥ | khāṇḍavasya purā dāho yathā samabhavanmune
हे ब्रह्मन्, हे मुनि, मैं इसे विस्तार से और यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ कि प्राचीन काल में खाण्डव का दाह किस प्रकार हुआ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (1.249.15)
शृणु मे ब्रुवतो राजन्सर्वमेतद्यथातथम् । यन्निमित्तं ददाहाग्निः खाण्डवं पृथिवीपते ॥
śṛṇu me bruvato rājansarvametadyathātatham | yannimittaṃ dadāhāgniḥ khāṇḍavaṃ pṛthivīpate
वैशम्पायन ने कहा — हे राजन्, हे पृथ्वीपति, अग्नि ने जिस कारण खाण्डव को जलाया, वह सब मैं ठीक-ठीक कहता हूँ; सुनो।
श्लोक 16 (1.249.16)
हन्त ते कथयिष्यामि पौराणीमृषिसंस्तुताम् । कथामिमां नरश्रेष्ठ खाण्डवस्य विनाशिनीम् ॥
hanta te kathayiṣyāmi paurāṇīmṛṣisaṃstutām | kathāmimāṃ naraśreṣṭha khāṇḍavasya vināśinīm
हे नरश्रेष्ठ, मैं तुम्हें ऋषियों द्वारा प्रशंसित यह प्राचीन कथा सुनाता हूँ — खाण्डव के विनाश की कथा।
श्लोक 17 (1.249.17)
पौराणः श्रूयते राजन्राजा हरिहयोपमः । श्वेतकिर्नाम विख्यातो बलविक्रमसंयुतः ॥
paurāṇaḥ śrūyate rājanrājā harihayopamaḥ | śvetakirnāma vikhyāto balavikramasaṃyutaḥ
हे राजन्, सुना जाता है कि प्राचीन काल में श्वेतकि नाम के एक विख्यात राजा थे, जो बल और पराक्रम से युक्त तथा इन्द्र के समान थे।
श्लोक 18 (1.249.18)
यज्वा दानपतिर्धीमान्यथा नान्योऽस्ति कश्चन । जग्राह दीक्षां स नृपः तदा द्वादशवार्षिकीम् ॥
yajvā dānapatirdhīmānyathā nānyo'sti kaścana | jagrāha dīkṣāṃ sa nṛpaḥ tadā dvādaśavārṣikīm
वे ऐसे यज्ञकर्ता, दानी और बुद्धिमान थे कि उनके समान दूसरा कोई न था। उन राजा ने तब बारह वर्ष के यज्ञ की दीक्षा ली।
श्लोक 19 (1.249.19)
तस्य सत्रे सदा तस्मिन्समागच्छन्महर्षयः । वेदवेदाङ्गविद्वांसो ब्राह्मणाश्च सहस्रशः ॥
tasya satre sadā tasminsamāgacchanmaharṣayaḥ | vedavedāṅgavidvāṃso brāhmaṇāśca sahasraśaḥ
उनके उस सत्र में सदा महर्षि और वेद-वेदांगों के ज्ञाता सहस्रों ब्राह्मण आया करते थे।
श्लोक 20 (1.249.20)
ईजे च स महायज्ञैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ॥
īje ca sa mahāyajñaiḥ kratubhiścāptadakṣiṇaiḥ
उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञों और प्रचुर दक्षिणा वाले क्रतुओं से यजन किया।
श्लोक 21 (1.249.21)
तस्य नान्याऽभवद्बुद्धिर्दिवसे दिवसे नृप । सत्रे क्रियासमारम्भे दानेषु विविधेषु च ॥
tasya nānyā'bhavadbuddhirdivase divase nṛpa | satre kriyāsamārambhe dāneṣu vividheṣu ca
हे राजन्, दिन-प्रतिदिन उनके मन में सत्र, कर्मों के आरम्भ और नाना प्रकार के दानों के सिवा और कोई विचार नहीं रहता था।
श्लोक 22 (1.249.22)
ऋत्विग्भिः सहितो धीमानेवमीजे स भूमिपः । ततस्तु ऋत्विजश्चास्य धूमव्याकुललोचनाः ॥
ṛtvigbhiḥ sahito dhīmānevamīje sa bhūmipaḥ | tatastu ṛtvijaścāsya dhūmavyākulalocanāḥ
इस प्रकार वे बुद्धिमान भूपाल ऋत्विजों के साथ यजन करते रहे। तब उनके ऋत्विज, जिनकी आँखें धुएँ से व्याकुल हो गई थीं,
श्लोक 23 (1.249.23)
कालेन महता खिन्नास्तत्यजुस्ते नराधिपम् । ततः प्रसादयामास ऋत्विजस्तान्महीपतिः ॥
kālena mahatā khinnāstatyajuste narādhipam | tataḥ prasādayāmāsa ṛtvijastānmahīpatiḥ
बहुत समय बीतने से थककर राजा को छोड़ गए। तब राजा ने उन ऋत्विजों को मनाने का प्रयत्न किया।
श्लोक 24 (1.249.24)
चक्षुर्विकलतां प्राप्ता न प्रपेदुश्च ते क्रतुम् । ततस्तेषामनुमते तद्विप्रैस्तु नराधिपः ॥
cakṣurvikalatāṃ prāptā na prapeduśca te kratum | tatasteṣāmanumate tadvipraistu narādhipaḥ
किन्तु दृष्टि क्षीण हो जाने के कारण वे फिर यज्ञ में नहीं आए। तब उनकी अनुमति से राजा ने
श्लोक 25 (1.249.25)
सत्रं समापयामास ऋत्विग्भिरपरैः सह । तस्यैवंवर्तमानस्य कदाचित्कालपर्यये ॥
satraṃ samāpayāmāsa ṛtvigbhiraparaiḥ saha | tasyaivaṃvartamānasya kadācitkālaparyaye
दूसरे ऋत्विजों के साथ वह सत्र पूरा किया। इस प्रकार चलते-चलते, समय के फेर में एक बार,
श्लोक 26 (1.249.26)
सत्रमाहर्तुकामस्य संवत्सरशतं किल । ऋत्विजो नाभ्यपद्यन्त समाहर्तुं महात्मनः ॥
satramāhartukāmasya saṃvatsaraśataṃ kila | ṛtvijo nābhyapadyanta samāhartuṃ mahātmanaḥ
कहते हैं, उन्होंने सौ वर्ष का सत्र करना चाहा; परन्तु उन महात्मा का वह सत्र सम्पन्न करने को कोई ऋत्विज आगे नहीं आया।
श्लोक 27 (1.249.27)
स च राजाऽकरोद्यत्नं महान्तं ससुहृज्जनः । प्रणिपातेन सान्त्वेन दानेन च महायशाः ॥
sa ca rājā'karodyatnaṃ mahāntaṃ sasuhṛjjanaḥ | praṇipātena sāntvena dānena ca mahāyaśāḥ
उन महायशस्वी राजा ने अपने सुहृदों के साथ बड़ा प्रयत्न किया — प्रणाम से, मीठे वचनों से और दान से
श्लोक 28 (1.249.28)
ऋत्विजोऽनुनयामास भूयो भूयस्त्वतन्द्रितः । ते चास्य तमभिप्रायं न चक्रुरमितौजसः ॥
ṛtvijo'nunayāmāsa bhūyo bhūyastvatandritaḥ | te cāsya tamabhiprāyaṃ na cakruramitaujasaḥ
वे बिना थके बार-बार ऋत्विजों से अनुनय करते रहे; किन्तु उन अमित तेजस्वी ब्राह्मणों ने उनकी इच्छा पूरी नहीं की।
श्लोक 29 (1.249.29)
स चाश्रमस्थान्राजर्षिस्तानुवाच रुषान्वितः । यद्यहं पतितो विप्राः शुश्रूषायां न च स्थितः ॥
sa cāśramasthānrājarṣistānuvāca ruṣānvitaḥ | yadyahaṃ patito viprāḥ śuśrūṣāyāṃ na ca sthitaḥ
तब उन राजर्षि ने क्रोध में भरकर आश्रमों में बैठे उन ब्राह्मणों से कहा — "हे विप्रो, यदि मैं पतित होता या आपकी सेवा में न लगा रहता,
श्वेतकिरुवाच
श्लोक 30 (1.249.30)
आशु त्याज्योऽस्मि युष्माभिर्ब्राह्मणैश्च जुगुप्सितः । तन्नार्हथ क्रतुश्रद्धां व्याघातयितुमद्य ताम् ॥
āśu tyājyo'smi yuṣmābhirbrāhmaṇaiśca jugupsitaḥ | tannārhatha kratuśraddhāṃ vyāghātayitumadya tām
तो आप और ब्राह्मण मुझे निन्दित मानकर तुरन्त त्याग देते। किन्तु अभी यज्ञ के प्रति मेरी उस श्रद्धा को भंग करना आपको उचित नहीं है,
श्लोक 31 (1.249.31)
अस्थाने वा परित्यागं कर्तुं मे द्विजसत्तमाः । प्रपन्न एव वो विप्राः प्रसादं कर्तुमर्हथ ॥
asthāne vā parityāgaṃ kartuṃ me dvijasattamāḥ | prapanna eva vo viprāḥ prasādaṃ kartumarhatha
और न ही हे द्विजश्रेष्ठो, बिना कारण मेरा परित्याग करना। हे विप्रो, मैं आपकी शरण में आया हूँ; मुझ पर कृपा कीजिए।
श्लोक 32 (1.249.32)
सान्त्वदानादिभिर्वाक्यैस्तत्त्वतः कार्यवत्तया । प्रसादयित्वा वक्ष्यामि यन्नः कार्यं द्विजोत्तमाः ॥
sāntvadānādibhirvākyaistattvataḥ kāryavattayā | prasādayitvā vakṣyāmi yannaḥ kāryaṃ dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, सान्त्वना और दान आदि से युक्त वचनों द्वारा, सच्चे मन से और कार्य की आवश्यकता के अनुसार आपको प्रसन्न करके मैं बताऊँगा कि हमें क्या करना है।
श्लोक 33 (1.249.33)
अथवाऽहं परित्यक्तो भवद्भिर्द्वेषकारणात् । ऋत्विजोऽन्यान्गमिष्यामि याजनार्थं द्विजोत्तमाः ॥
athavā'haṃ parityakto bhavadbhirdveṣakāraṇāt | ṛtvijo'nyāngamiṣyāmi yājanārthaṃ dvijottamāḥ
अथवा यदि आपने द्वेष के कारण मुझे त्याग दिया है, तो हे द्विजोत्तमो, मैं यज्ञ कराने के लिए दूसरे ऋत्विजों के पास जाऊँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (1.249.34)
एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स पार्थिवः । यदा न शेकू राजानं याजनार्थं परन्तप ॥
etāvaduktvā vacanaṃ virarāma sa pārthivaḥ | yadā na śekū rājānaṃ yājanārthaṃ parantapa
इतना कहकर राजा चुप हो गए। हे परन्तप, जब वे ब्राह्मण राजा का यज्ञ कराने को तैयार न हो सके,
श्लोक 35 (1.249.35)
ततस्ते याजकाः क्रुद्धास्तमूचुर्नृपसत्तमम् । तव कर्माण्यजस्रं वै वर्तन्ते पार्थिवोत्तम ॥
tataste yājakāḥ kruddhāstamūcurnṛpasattamam | tava karmāṇyajasraṃ vai vartante pārthivottama
तब वे याजक क्रुद्ध होकर उन श्रेष्ठ राजा से बोले — "हे पार्थिवश्रेष्ठ, आपके कर्म निरन्तर चलते ही रहते हैं।
ऋत्विज ऊचुः
श्लोक 36 (1.249.36)
ततो वयं परिश्रान्ताः सततं कर्मवाहिनः । श्रमादस्मात्परिश्रान्तान्स त्वं नस्त्यक्तुमर्हसि ॥
tato vayaṃ pariśrāntāḥ satataṃ karmavāhinaḥ | śramādasmātpariśrāntānsa tvaṃ nastyaktumarhasi
इसलिए निरन्तर कर्मों का भार ढोते-ढोते हम थक गए हैं। इस परिश्रम से थके हुए हमें आपको छोड़ देना चाहिए।
श्लोक 37 (1.249.37)
बुद्धिमोहं समास्थाय त्वरासंभावितोऽनघ । गच्छ रुद्रसकाशं त्वं सहि त्वां याजयिष्यति ॥
buddhimohaṃ samāsthāya tvarāsaṃbhāvito'nagha | gaccha rudrasakāśaṃ tvaṃ sahi tvāṃ yājayiṣyati
हे निष्पाप, बुद्धि के मोह में पड़कर और उतावली से भरकर आप रुद्र के पास जाइए; वही आपका यज्ञ कराएँगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (1.249.38)
साधिक्षेपं वचः श्रुत्वा संक्रुद्धः श्वेतकिर्नृपः । कैलासं पर्वतं गत्वा तप उग्रं समास्थितः ॥
sādhikṣepaṃ vacaḥ śrutvā saṃkruddhaḥ śvetakirnṛpaḥ | kailāsaṃ parvataṃ gatvā tapa ugraṃ samāsthitaḥ
यह तिरस्कारभरी बात सुनकर राजा श्वेतकि अत्यन्त क्रुद्ध हुए। वे कैलास पर्वत पर गए और उग्र तप में लग गए।
श्लोक 39 (1.249.39)
आराधयन्महादेवं नियतः संशितव्रतः । उपवासपरो राजन्दीर्घकालमतिष्ठत ॥
ārādhayanmahādevaṃ niyataḥ saṃśitavrataḥ | upavāsaparo rājandīrghakālamatiṣṭhata
हे राजन्, महादेव की आराधना करते हुए, संयमी और कठोर व्रत धारण किए, उपवास में लगे वे दीर्घकाल तक वहाँ रहे।
श्लोक 40 (1.249.40)
कदाचिद्द्वादशे काले कदाचिदपि षोडशे । आहारमकरोद्राजा मूलानि च फलानि च ॥
kadāciddvādaśe kāle kadācidapi ṣoḍaśe | āhāramakarodrājā mūlāni ca phalāni ca
कभी बारहवें भोजनकाल पर और कभी सोलहवें पर राजा आहार करते थे — वह भी केवल कन्द-मूल और फल।
श्लोक 41 (1.249.41)
ऊर्ध्वबाहुस्त्वनिमिषस्तिष्ठन्स्थाणुरिवाचलः । षण्मासानभवद्राजा श्वेतकिः सुसमाहितः ॥
ūrdhvabāhustvanimiṣastiṣṭhansthāṇurivācalaḥ | ṣaṇmāsānabhavadrājā śvetakiḥ susamāhitaḥ
भुजाएँ ऊपर उठाए, बिना पलक झपकाए, ठूँठ की भाँति अचल खड़े राजा श्वेतकि छह महीने तक पूर्ण एकाग्रता में रहे।
श्लोक 42 (1.249.42)
तं तथा नृपशार्दूलं तप्यमानं महत्तपः । शङ्करः परमप्रीत्या दर्शयामास भारत ॥
taṃ tathā nṛpaśārdūlaṃ tapyamānaṃ mahattapaḥ | śaṅkaraḥ paramaprītyā darśayāmāsa bhārata
हे भारत, उन नृपश्रेष्ठ को इस प्रकार महान तप करते देखकर शंकर ने परम प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया।
श्लोक 43 (1.249.43)
उवाच चैनं भगवान्स्निग्धगम्भीरया गिरा । प्रीतोऽस्मि नरशार्दूल तपसा ते परन्तप ॥
uvāca cainaṃ bhagavānsnigdhagambhīrayā girā | prīto'smi naraśārdūla tapasā te parantapa
और भगवान ने स्नेहभरी गम्भीर वाणी में उनसे कहा — "हे नरश्रेष्ठ, हे परन्तप, मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ।
श्लोक 44 (1.249.44)
वरं वृणीष्व भद्रं ते यं त्वमिच्छसि पार्थिव । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रस्यामिततेजसः ॥
varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te yaṃ tvamicchasi pārthiva | etacchrutvā tu vacanaṃ rudrasyāmitatejasaḥ
हे राजन्, तुम्हारा कल्याण हो; जो वर चाहो, माँग लो।" अमित तेजस्वी रुद्र के ये वचन सुनकर
श्लोक 45 (1.249.45)
प्रणिपत्य महात्मानं राजर्षिः प्रत्यभाषत । यदि मे भगवान्प्रीतः सर्वलोकनमस्कृतः ॥
praṇipatya mahātmānaṃ rājarṣiḥ pratyabhāṣata | yadi me bhagavānprītaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ
राजर्षि ने उन महात्मा को प्रणाम करके उत्तर दिया — "हे भगवन्, सब लोकों द्वारा वन्दित आप यदि मुझ पर प्रसन्न हैं,
श्लोक 46 (1.249.46)
स्वयं मां देवदेवेश याजयस्व सुरेश्वर । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राज्ञा तेन प्रभाषितम् ॥
svayaṃ māṃ devadeveśa yājayasva sureśvara | etacchrutvā tu vacanaṃ rājñā tena prabhāṣitam
तो हे देवदेवेश, हे सुरेश्वर, आप स्वयं मेरा यज्ञ कराइए।" राजा के कहे ये वचन सुनकर
श्लोक 47 (1.249.47)
उवाच भगवान्प्रीतः स्मितपूर्वमिदं वचः । नास्माकमेतद्विषये वर्तते याजनं प्रति ॥
uvāca bhagavānprītaḥ smitapūrvamidaṃ vacaḥ | nāsmākametadviṣaye vartate yājanaṃ prati
प्रसन्न भगवान ने मुस्कराकर यह बात कही — "यज्ञ कराना मेरे अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता।
रुद्र उवाच
श्लोक 48 (1.249.48)
त्वया च सुमहत्तप्तं तपो राजन्वरार्थिना । याजयिष्यामि राजंस्त्वां समयेन परन्तप ॥
tvayā ca sumahattaptaṃ tapo rājanvarārthinā | yājayiṣyāmi rājaṃstvāṃ samayena parantapa
परन्तु हे राजन्, वर की इच्छा से तुमने बहुत बड़ा तप किया है। हे परन्तप, मैं एक शर्त पर तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा।
श्लोक 49 (1.249.49)
समा द्वादश राजेन्द्र ब्रह्मचारी समाहितः । सततं त्वाज्यधाराभिर्यदि तर्पयसेऽनलम् ॥
samā dvādaśa rājendra brahmacārī samāhitaḥ | satataṃ tvājyadhārābhiryadi tarpayase'nalam
हे राजेन्द्र, यदि तुम बारह वर्ष तक ब्रह्मचारी और एकाग्र रहकर घी की अविरल धाराओं से निरन्तर अग्नि को तृप्त करो,
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 50 (1.249.50)
कामं प्रार्थयसे यं त्वं मत्तः प्राप्स्यसि तं नृप । एवमुक्तश्च रुद्रेण श्वेतकिर्मनुजाधिपः ॥
kāmaṃ prārthayase yaṃ tvaṃ mattaḥ prāpsyasi taṃ nṛpa | evamuktaśca rudreṇa śvetakirmanujādhipaḥ
तो हे नृप, जो कामना करोगे, वह मुझसे पा लोगे।" रुद्र के ऐसा कहने पर मनुष्यों के स्वामी श्वेतकि ने
श्लोक 51 (1.249.51)
तथा चकार तत्सर्वं यथोक्तं शूलपाणिना । पूर्णे तु द्वादशे वर्षे पुनरायान्महेश्वरः ॥
tathā cakāra tatsarvaṃ yathoktaṃ śūlapāṇinā | pūrṇe tu dvādaśe varṣe punarāyānmaheśvaraḥ
त्रिशूलधारी के कहे अनुसार वह सब कुछ किया। बारहवाँ वर्ष पूरा होने पर महेश्वर फिर आए।
श्लोक 52 (1.249.52)
दृष्ट्वैव च स राजानं शङ्करो लोकभावनः । उवाच परमप्रीतः श्वेतकिं नृपसत्तमम् ॥
dṛṣṭvaiva ca sa rājānaṃ śaṅkaro lokabhāvanaḥ | uvāca paramaprītaḥ śvetakiṃ nṛpasattamam
राजा को देखते ही लोकों का पालन करने वाले शंकर ने परम प्रसन्न होकर नृपश्रेष्ठ श्वेतकि से कहा —
रुद्र उवाच
श्लोक 53 (1.249.53)
तोषितोऽहं नृपश्रेष्ठ त्वयेहाद्येन कर्मणा । याजनं ब्राह्मणानां तु विधिदृष्टं परन्तप ॥
toṣito'haṃ nṛpaśreṣṭha tvayehādyena karmaṇā | yājanaṃ brāhmaṇānāṃ tu vidhidṛṣṭaṃ parantapa
"हे नृपश्रेष्ठ, तुम्हारे इस श्रेष्ठ कर्म से मैं सन्तुष्ट हूँ। किन्तु हे परन्तप, यज्ञ कराना शास्त्रविधि से ब्राह्मणों का ही कार्य है।
श्लोक 54 (1.249.54)
अतोऽहं त्वां स्वयं नाद्य याजयामि परन्तप । ममांशस्तु क्षितितले महाभागो द्विजोत्तमः ॥
ato'haṃ tvāṃ svayaṃ nādya yājayāmi parantapa | mamāṃśastu kṣititale mahābhāgo dvijottamaḥ
इसलिए मैं अब स्वयं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। किन्तु पृथ्वी पर मेरा अंश एक महाभाग्यशाली श्रेष्ठ ब्राह्मण है,
श्लोक 55 (1.249.55)
दुर्वासा इति विख्यातः स हि त्वां याजयिष्यति । मन्नियोगान्महातेजाः संभाराः संभ्रियन्तु ते ॥
durvāsā iti vikhyātaḥ sa hi tvāṃ yājayiṣyati | manniyogānmahātejāḥ saṃbhārāḥ saṃbhriyantu te
जो दुर्वासा नाम से विख्यात है; वह महातेजस्वी मेरी आज्ञा से तुम्हारा यज्ञ कराएगा। तुम यज्ञ की सामग्री जुटाओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 56 (1.249.56)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रेण समुदाहृतम् । स्वपुरं पुनरागम्य संभारान्पुनरार्जयत् ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ rudreṇa samudāhṛtam | svapuraṃ punarāgamya saṃbhārānpunarārjayat
रुद्र के कहे ये वचन सुनकर राजा अपने नगर लौटे और उन्होंने फिर से सामग्री एकत्र की।
श्लोक 57 (1.249.57)
ततः संभृतसंभारो भूयो रुद्रमुपागमत् । उवाच च महीपालः प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः । संभृता मम संभाराः सर्वोपकरणानि च ॥
tataḥ saṃbhṛtasaṃbhāro bhūyo rudramupāgamat | uvāca ca mahīpālaḥ prāñjaliḥ praṇataḥ sthitaḥ | saṃbhṛtā mama saṃbhārāḥ sarvopakaraṇāni ca
सामग्री जुटा लेने के बाद वे फिर रुद्र के पास गए। हाथ जोड़कर, झुककर खड़े हुए राजा ने कहा — "मेरी सामग्री और सारे उपकरण जुट गए हैं।
श्लोक 58 (1.249.58)
त्वत्प्रसादान्महादेव श्वो मे दीक्षा भवेदिति । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥
tvatprasādānmahādeva śvo me dīkṣā bhavediti | etacchrutvā tu vacanaṃ tasya rājño mahātmanaḥ
हे महादेव, आपकी कृपा से कल मेरी दीक्षा हो जाए।" उन महात्मा राजा के ये वचन सुनकर
श्लोक 59 (1.249.59)
दुर्वाससं समाहूय रुद्रो वचनमब्रवीत् । एष राजा महाभागः श्वेतकिर्द्विजसत्तम ॥
durvāsasaṃ samāhūya rudro vacanamabravīt | eṣa rājā mahābhāgaḥ śvetakirdvijasattama
रुद्र ने दुर्वासा को बुलाकर कहा — "हे द्विजश्रेष्ठ, ये महाभाग्यशाली राजा श्वेतकि हैं।
श्लोक 60 (1.249.60)
एनं याजय विप्रेन्द्र मन्नियोगेन भूमिपम् । बाढमित्येव वचनं रुद्रं त्वृषिरुवाच ह ॥
enaṃ yājaya viprendra manniyogena bhūmipam | bāḍhamityeva vacanaṃ rudraṃ tvṛṣiruvāca ha
हे विप्रेन्द्र, मेरी आज्ञा से इन राजा का यज्ञ कराओ।" ऋषि ने रुद्र से कहा — "बहुत अच्छा।"
श्लोक 61 (1.249.61)
ततः सत्रं समभवत्तस्य राज्ञो महात्मनः । यथाविधि यथाकालं यथोक्तं बहुदक्षिणम् ॥
tataḥ satraṃ samabhavattasya rājño mahātmanaḥ | yathāvidhi yathākālaṃ yathoktaṃ bahudakṣiṇam
तब उन महात्मा राजा का सत्र विधिपूर्वक, उचित समय पर, शास्त्रोक्त रीति से और प्रचुर दक्षिणा के साथ सम्पन्न हुआ।
श्लोक 62 (1.249.62)
तस्मिन्परिसमाप्ते तु राज्ञः सत्रे महात्मनः । दुर्वाससाऽभ्यनुज्ञाता विप्रतस्थुः स्म याजकाः ॥
tasminparisamāpte tu rājñaḥ satre mahātmanaḥ | durvāsasā'bhyanujñātā vipratasthuḥ sma yājakāḥ
उन महात्मा राजा का सत्र समाप्त होने पर दुर्वासा की अनुमति पाकर याजक विदा हो गए,
श्लोक 63 (1.249.63)
ये तत्र दीक्षिताः सर्वे सदस्याश्च महौजसः । सोऽपि राजन्महाभागः स्वपुरं प्राविशत्तदा ॥
ye tatra dīkṣitāḥ sarve sadasyāśca mahaujasaḥ | so'pi rājanmahābhāgaḥ svapuraṃ prāviśattadā
वहाँ दीक्षा लेने वाले सब लोग और महातेजस्वी सदस्य भी। हे राजन्, वे महाभाग्यशाली राजा भी तब अपने नगर में प्रविष्ट हुए,
श्लोक 64 (1.249.64)
पूज्यमानो महाभागैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । बन्दिभिः स्तूयमानश्च नागरैश्चाभिनन्दितः ॥
pūjyamāno mahābhāgairbrāhmaṇairvedapāragaiḥ | bandibhiḥ stūyamānaśca nāgaraiścābhinanditaḥ
वेदों के पारंगत महाभाग्यशाली ब्राह्मणों से पूजित, बन्दीजनों से स्तुत और नगरवासियों से अभिनन्दित होकर।
श्लोक 65 (1.249.65)
एवंवृत्तः स राजर्षिः श्वेतकिर्नृपसत्तमः । कालेन महता चापि ययौ स्वर्गमभिष्टुतः ॥
evaṃvṛttaḥ sa rājarṣiḥ śvetakirnṛpasattamaḥ | kālena mahatā cāpi yayau svargamabhiṣṭutaḥ
ऐसा था उन राजर्षि नृपश्रेष्ठ श्वेतकि का आचरण; और बहुत समय बीतने पर वे सबकी स्तुति पाते हुए स्वर्ग गए,
श्लोक 66 (1.249.66)
ऋत्विग्भिः सहितः सर्वैः सदस्यैश्च समन्वितः । तस्य सत्रे पपौ वह्निर्हविर्द्वादशवत्सरान् ॥
ṛtvigbhiḥ sahitaḥ sarvaiḥ sadasyaiśca samanvitaḥ | tasya satre papau vahnirhavirdvādaśavatsarān
अपने सब ऋत्विजों और सदस्यों के साथ। उनके सत्र में अग्नि ने बारह वर्ष तक हवि का पान किया था,
श्लोक 67 (1.249.67)
सततं चाज्यधाराभिरैकात्म्ये तत्र कर्मणि । हविषा च ततो वह्निः परां तृप्तिमगच्छत ॥
satataṃ cājyadhārābhiraikātmye tatra karmaṇi | haviṣā ca tato vahniḥ parāṃ tṛptimagacchata
उस एकनिष्ठ कर्म में घी की अविरल धाराओं के रूप में, निरन्तर। उस हवि से अग्नि को परम तृप्ति मिल गई।
श्लोक 68 (1.249.68)
न चैच्छत्पुनरादातुं हविरन्यस्य कस्यचित् । पाण्डुवर्णो विवर्णश्च न यथावत्प्रकाशते ॥
na caicchatpunarādātuṃ haviranyasya kasyacit | pāṇḍuvarṇo vivarṇaśca na yathāvatprakāśate
अब वे किसी और की हवि ग्रहण करना नहीं चाहते थे। वे पीले और फीके पड़ गए और पहले की भाँति प्रकाशित नहीं होते थे।
श्लोक 69 (1.249.69)
ततो भगवतो वह्नेर्विकारः समजायत । तेजसा विप्रहीणश्च ग्लानिश्चैनं समाविशत् ॥
tato bhagavato vahnervikāraḥ samajāyata | tejasā viprahīṇaśca glāniścainaṃ samāviśat
तब भगवान अग्नि में विकार उत्पन्न हो गया। वे तेज से हीन हो गए और उन पर ग्लानि छा गई।
श्लोक 70 (1.249.70)
स लक्षयित्वा चात्मानं तेजोहीनं हुताशनः । जगाम सदनं पुण्यं ब्रह्मणो लोकपूजितम् ॥
sa lakṣayitvā cātmānaṃ tejohīnaṃ hutāśanaḥ | jagāma sadanaṃ puṇyaṃ brahmaṇo lokapūjitam
स्वयं को तेजहीन देखकर हुताशन अग्नि ब्रह्मा के उस पवित्र धाम में गए, जिसकी सारे लोक पूजा करते हैं।
श्लोक 71 (1.249.71)
तत्र ब्रह्माणमासीनमिदं वचनमब्रवीत् । भगवन्परमा प्रीतिः कृता श्वेतकिना मम ॥
tatra brahmāṇamāsīnamidaṃ vacanamabravīt | bhagavanparamā prītiḥ kṛtā śvetakinā mama
वहाँ आसन पर विराजमान ब्रह्मा से उन्होंने यह कहा — "भगवन्, श्वेतकि ने मुझे परम तृप्ति दी है,
अग्निरुवाच
श्लोक 72 (1.249.72)
अरुचिश्चाभवत्तीव्रा तां न शक्नोम्यपोहितुम् । तेजसा विप्रहीणोऽस्मि बलेन च जगत्पते ॥
aruciścābhavattīvrā tāṃ na śaknomyapohitum | tejasā viprahīṇo'smi balena ca jagatpate
और मुझे तीव्र अरुचि हो गई है, जिसे मैं दूर नहीं कर पाता। हे जगत्पति, मैं तेज और बल दोनों से हीन हो गया हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 73 (1.249.73)
इच्छेयं त्वत्प्रसादेन स्वात्मनः प्रकृतिं स्थिराम् । एतच्छ्रुत्वा हुतवहाद्भगवान्सर्वलोककृत् ॥
iccheyaṃ tvatprasādena svātmanaḥ prakṛtiṃ sthirām | etacchrutvā hutavahādbhagavānsarvalokakṛt
आपकी कृपा से मैं अपनी स्वाभाविक स्थिर अवस्था फिर पाना चाहता हूँ।" हुतवह अग्नि की यह बात सुनकर सब लोकों के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने
श्लोक 74 (1.249.74)
हव्यवाहमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव । त्वया द्वादश वर्षाणि वसोर्धाराहुतं हविः ॥
havyavāhamidaṃ vākyamuvāca prahasanniva | tvayā dvādaśa varṣāṇi vasordhārāhutaṃ haviḥ
मानो हँसते हुए हव्यवाहन से यह वचन कहा — "तुमने बारह वर्ष तक वसोर्धारा से अर्पित, अविरल धारा वाली घी की हवि का सेवन किया है,
ब्रह्मोवाच
श्लोक 75 (1.249.75)
उपयुक्तं महाभाग तेन त्वां ग्लानिराविशत् । तेजसा विप्रहीणत्वात्सहसा हव्यवाहन ॥
upayuktaṃ mahābhāga tena tvāṃ glānirāviśat | tejasā viprahīṇatvātsahasā havyavāhana
हे महाभाग, इसी से तुम पर ग्लानि छा गई है और हे हव्यवाहन, तुम सहसा तेजहीन हो गए हो।
श्लोक 76 (1.249.76)
मागमस्त्वं व्यथां वह्ने प्रकृतिस्थो भविष्यसि । अरुचिं नाशयिष्येऽहं समयं प्रतिपद्य ते ॥
māgamastvaṃ vyathāṃ vahne prakṛtistho bhaviṣyasi | aruciṃ nāśayiṣye'haṃ samayaṃ pratipadya te
हे वह्नि, व्यथित मत हो; तुम फिर अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ जाओगे। मैं तुम्हारे लिए एक उपाय ठहराकर तुम्हारी अरुचि दूर कर दूँगा।
श्लोक 77 (1.249.77)
पुरा देवनियोगेन यत्त्वया भस्मसात्कृतम् । आलयं देवशत्रूणां सुघोरं खाण्डवं वनम् ॥
purā devaniyogena yattvayā bhasmasātkṛtam | ālayaṃ devaśatrūṇāṃ sughoraṃ khāṇḍavaṃ vanam
प्राचीन काल में देवताओं की आज्ञा से तुमने देवशत्रुओं के निवास उस भयंकर खाण्डव वन को भस्म किया था।
श्लोक 78 (1.249.78)
तत्र सर्वाणि सत्वानि निवसन्ति विभावसो । तेषां त्वं मेदसा तृप्तः प्रकृतिस्थो भविष्यसि ॥
tatra sarvāṇi satvāni nivasanti vibhāvaso | teṣāṃ tvaṃ medasā tṛptaḥ prakṛtistho bhaviṣyasi
हे विभावसु, अब वहाँ सब प्रकार के प्राणी रहते हैं। उनकी चर्बी से तृप्त होकर तुम अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ जाओगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 79 (1.249.79)
गच्छ शीघ्रं प्रदग्धुं त्वं ततो मोक्ष्यसि किल्विषात् । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं परमेष्ठिमुखाच्च्युतम् ॥
gaccha śīghraṃ pradagdhuṃ tvaṃ tato mokṣyasi kilviṣāt | etacchrutvā tu vacanaṃ parameṣṭhimukhāccyutam
शीघ्र जाकर उसे जलाओ; तब तुम इस दोष से मुक्त हो जाओगे।" परमेष्ठी ब्रह्मा के मुख से निकले ये वचन सुनकर
श्लोक 80 (1.249.80)
उत्तमं जवमास्थाय प्रदुद्राव हुताशनः । आगम्य खाण्डवं दावमुत्तमं वीर्यमास्थितः । सहसा प्राज्वलच्चाग्निः क्रुद्धो वायुसमीरितः ॥
uttamaṃ javamāsthāya pradudrāva hutāśanaḥ | āgamya khāṇḍavaṃ dāvamuttamaṃ vīryamāsthitaḥ | sahasā prājvalaccāgniḥ kruddho vāyusamīritaḥ
हुताशन अग्नि बड़े वेग से दौड़ पड़े। खाण्डव वन में पहुँचकर उन्होंने अपना पूरा पराक्रम लगाया, और क्रुद्ध अग्नि वायु से प्रेरित होकर सहसा धधक उठे।
श्लोक 81 (1.249.81)
प्रदीप्तं खाण्डवं दृष्ट्वा ये स्युस्तत्र निवासिनः । परमं यत्नमातिष्ठन्पावकस्य प्रशान्तये ॥
pradīptaṃ khāṇḍavaṃ dṛṣṭvā ye syustatra nivāsinaḥ | paramaṃ yatnamātiṣṭhanpāvakasya praśāntaye
खाण्डव को जलता देख वहाँ के निवासियों ने अग्नि को शान्त करने के लिए भरपूर प्रयत्न किया।
श्लोक 82 (1.249.82)
करैस्तु करिणः शीघ्रं जलमादाय सत्वराः । सिषिचुः पावकं क्रुद्धाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
karaistu kariṇaḥ śīghraṃ jalamādāya satvarāḥ | siṣicuḥ pāvakaṃ kruddhāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
सैकड़ों और हजारों हाथियों ने क्रुद्ध होकर, फुर्ती से सूँड़ों में जल भर-भरकर अग्नि पर छिड़का।
श्लोक 83 (1.249.83)
बहुशीर्षास्ततो नागाः शिरोभिर्जलसन्ततिम् । मुमुचुः पावकाभ्याशे सत्वराः क्रोधमूर्च्छिताः ॥
bahuśīrṣāstato nāgāḥ śirobhirjalasantatim | mumucuḥ pāvakābhyāśe satvarāḥ krodhamūrcchitāḥ
फिर अनेक सिरों वाले नागों ने क्रोध से विह्वल होकर, शीघ्रता से अग्नि के पास अपने सिरों से जल की धाराएँ छोड़ीं।
श्लोक 84 (1.249.84)
तथैवान्यानि सत्वानि नानाप्रहरणोद्यमैः । विलयं पावकं शीघ्रमनयन्भरतर्षभ ॥
tathaivānyāni satvāni nānāpraharaṇodyamaiḥ | vilayaṃ pāvakaṃ śīghramanayanbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, इसी प्रकार दूसरे प्राणियों ने भी तरह-तरह के प्रहार-साधनों से प्रयत्न करके शीघ्र ही अग्नि को बुझा दिया।
श्लोक 85 (1.249.85)
अनेन तु प्रकारेण भूयोभूयश्च प्रज्वलन् । सप्तकृत्वः प्रशमितः खाण्डवे हव्यवाहनः ॥
anena tu prakāreṇa bhūyobhūyaśca prajvalan | saptakṛtvaḥ praśamitaḥ khāṇḍave havyavāhanaḥ
इस प्रकार बार-बार प्रज्वलित होने पर भी हव्यवाहन अग्नि खाण्डव में सात बार बुझा दिए गए।