आदि पर्व · अध्याय 253
अर्जुन और कृष्ण का इन्द्र तथा देवताओं से युद्ध
अर्जुन बाणों का छत्र तानकर इन्द्र की वर्षा रोक देते हैं, जिससे कोई प्राणी वन से निकल नहीं पाता। तक्षक के पुत्र अश्वसेन को उसकी माता निगलकर ले भागती है; अर्जुन उसका सिर काट देते हैं, पर इन्द्र आँधी-वर्षा से उन्हें मोहित कर देते हैं और अश्वसेन बच निकलता है, तब अर्जुन, अग्नि और कृष्ण उस नाग को शाप देते हैं। फिर अर्जुन वायव्य अस्त्र से इन्द्र के अस्त्र को निष्फल करते हैं, आक्रमण करने वाले पक्षियों और नागों को काट गिराते हैं, और कृष्ण के साथ सब प्रकार के शस्त्र लेकर आए देवताओं को पीछे धकेल देते हैं; पुत्र के पराक्रम से प्रसन्न इन्द्र पत्थरों की वर्षा से उनकी परीक्षा लेते हैं और अन्त में मन्दराचल का शिखर फेंकते हैं, जिसे अर्जुन चूर-चूर कर देते हैं और जिसके गिरने से खाण्डव के प्राणी कुचलकर मर जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.253.1)
तस्याथ वर्षतो वारि पाण्डवः प्रत्यवारयत् । शरवर्षेण बीभत्सुरुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ॥
tasyātha varṣato vāri pāṇḍavaḥ pratyavārayat | śaravarṣeṇa bībhatsuruttamāstrāṇi darśayan
जब इन्द्र जल बरसा रहे थे, तब पाण्डुपुत्र बीभत्सु ने अपने उत्तम अस्त्रों का प्रदर्शन करते हुए बाणों की वर्षा से उसे रोक दिया।
श्लोक 2 (1.253.2)
खाण्डवं च वनं सर्वं पाण्डवो बहुभिः शरैः । प्राच्छादयदमेयात्मा नीहारेणेव चन्द्रमाः ॥
khāṇḍavaṃ ca vanaṃ sarvaṃ pāṇḍavo bahubhiḥ śaraiḥ | prācchādayadameyātmā nīhāreṇeva candramāḥ
अपार आत्मबल वाले पाण्डव ने बहुत-से बाणों से सारे खाण्डव वन को ऐसे ढक दिया, जैसे चन्द्रमा कुहरे से रात को ढक देता है।
श्लोक 3 (1.253.3)
न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः । संछाद्यमाने खे बाणैरस्यता सव्यसाचिना ॥
na ca sma kiṃcicchaknoti bhūtaṃ niścarituṃ tataḥ | saṃchādyamāne khe bāṇairasyatā savyasācinā
वहाँ से कोई भी प्राणी बाहर नहीं निकल सका, क्योंकि बाण छोड़ते हुए सव्यसाची ने आकाश को बाणों से ढक दिया था।
श्लोक 4 (1.253.4)
तक्षकस्तु न तत्रासीन्नागराजो महाबलः । दह्यमाने वने तस्मिन्कुरुक्षेत्रं गतो हि सः ॥
takṣakastu na tatrāsīnnāgarājo mahābalaḥ | dahyamāne vane tasminkurukṣetraṃ gato hi saḥ
महाबली नागराज तक्षक वहाँ नहीं था; वन के जलते समय वह कुरुक्षेत्र गया हुआ था।
श्लोक 5 (1.253.5)
अश्वसेनोऽभवत्तत्र तक्षकस्य सुतो बली । स यत्नमकरोत्तीव्रं मोक्षार्थं जातवेदसः ॥
aśvaseno'bhavattatra takṣakasya suto balī | sa yatnamakarottīvraṃ mokṣārthaṃ jātavedasaḥ
पर तक्षक का बलवान पुत्र अश्वसेन वहाँ था, और उसने अग्नि से छूटने के लिए बहुत यत्न किया।
श्लोक 6 (1.253.6)
न शशाक स निर्गन्तुं निरुद्धोऽर्जुनपत्रिभिः । मोक्षयामास तं माता निगीर्य भुजगात्मजा ॥
na śaśāka sa nirgantuṃ niruddho'rjunapatribhiḥ | mokṣayāmāsa taṃ mātā nigīrya bhujagātmajā
अर्जुन के बाणों से घिरा होने के कारण वह निकल न सका। तब नाग की पुत्री उसकी माता ने उसे निगलकर छुड़ाने का उपाय किया।
श्लोक 7 (1.253.7)
तस्य पूर्वं शिरो ग्रस्तं पुच्छमस्य निगीर्यते । निगीर्य सोर्ध्वमक्रामत्सुतं नागी मुमुक्षया ॥
tasya pūrvaṃ śiro grastaṃ pucchamasya nigīryate | nigīrya sordhvamakrāmatsutaṃ nāgī mumukṣayā
पहले उसने उसका सिर निगला; उसकी पूँछ अभी निगली ही जा रही थी कि पुत्र को निगलती हुई वह नागिन उसे छुड़ाने की इच्छा से ऊपर उठ चली।
श्लोक 8 (1.253.8)
तस्याः शरेण तीक्ष्णेन पृथुधारेण पाण्डवः । शिरश्चिच्छेद गच्छन्त्यास्तामपश्यच्छचीपतिः ॥
tasyāḥ śareṇa tīkṣṇena pṛthudhāreṇa pāṇḍavaḥ | śiraściccheda gacchantyāstāmapaśyacchacīpatiḥ
जाती हुई उस नागिन का सिर पाण्डव ने तीखे, चौड़ी धार वाले बाण से काट दिया। शचीपति इन्द्र ने उसे देखा।
श्लोक 9 (1.253.9)
तं मुमोचयिषुर्वज्री वातवर्षेण पाण्डवम् । मोहयामास तत्कालमश्वसेनस्त्वमुच्यत ॥
taṃ mumocayiṣurvajrī vātavarṣeṇa pāṇḍavam | mohayāmāsa tatkālamaśvasenastvamucyata
उसे छुड़ाने की इच्छा से वज्रधारी इन्द्र ने उसी समय आँधी और वर्षा से पाण्डव को मोहित कर दिया, और अश्वसेन छूट गया।
श्लोक 10 (1.253.10)
तां च मायां तदा दृष्ट्वा घोरां नागेन वञ्चितः । द्विधा त्रिधा च खगतान्प्राणिनः पाण्डवोऽच्छिनत् ॥
tāṃ ca māyāṃ tadā dṛṣṭvā ghorāṃ nāgena vañcitaḥ | dvidhā tridhā ca khagatānprāṇinaḥ pāṇḍavo'cchinat
उस भयंकर माया को देखकर और नाग से छले जाकर पाण्डव ने आकाश में चलते प्राणियों के दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर डाले।
श्लोक 11 (1.253.11)
शशाप तं च संक्रुद्धो बीभत्सुर्जिह्मगामिनम् । पावको वासुदेवश्चाप्यप्रतिष्ठो भविष्यसि ॥
śaśāpa taṃ ca saṃkruddho bībhatsurjihmagāminam | pāvako vāsudevaścāpyapratiṣṭho bhaviṣyasi
क्रोध से भरे बीभत्सु ने, और अग्नि तथा वासुदेव ने भी, उस टेढ़ी चाल वाले नाग को शाप दिया— "तुम्हें कहीं ठौर नहीं मिलेगा।"
श्लोक 12 (1.253.12)
ततो जिष्णुः सहस्राक्षं खं वितत्याशुगैः शरैः । योधयामास संक्रुद्धो वञ्चनां तामनुस्मरन् ॥
tato jiṣṇuḥ sahasrākṣaṃ khaṃ vitatyāśugaiḥ śaraiḥ | yodhayāmāsa saṃkruddho vañcanāṃ tāmanusmaran
तब जिष्णु ने उस छल को याद करते हुए तीव्रगामी बाणों से आकाश को भरकर क्रोधपूर्वक सहस्राक्ष इन्द्र से युद्ध किया।
श्लोक 13 (1.253.13)
देवराजोऽपि तं दृष्ट्वा संरब्धं समरेऽर्जुनम् । स्वमस्त्रमसृजत्तीव्रं छादयित्वाऽखिलं नभः ॥
devarājo'pi taṃ dṛṣṭvā saṃrabdhaṃ samare'rjunam | svamastramasṛjattīvraṃ chādayitvā'khilaṃ nabhaḥ
देवराज ने भी अर्जुन को युद्ध में क्रुद्ध देखकर सारे आकाश को ढकते हुए अपना प्रचण्ड अस्त्र छोड़ा।
श्लोक 14 (1.253.14)
ततो वायुर्महाघोषः क्षोभयन्सर्वसागरान् । वियत्स्थो जनयन्मेघाञ्जलधारासमाकुलान् ॥
tato vāyurmahāghoṣaḥ kṣobhayansarvasāgarān | viyatstho janayanmeghāñjaladhārāsamākulān
तब घोर गर्जन करती वायु सब समुद्रों को क्षुब्ध करती हुई आकाश में स्थित होकर जलधाराओं से भरे मेघ उत्पन्न करने लगी,
श्लोक 15 (1.253.15)
ततोऽशनिमुचो घोरांस्तडित्स्तनितनिःस्वनान् । तद्विघातार्थमसृजदर्जुनोऽप्यस्त्रमुत्तमम् ॥
tato'śanimuco ghorāṃstaḍitstanitaniḥsvanān | tadvighātārthamasṛjadarjuno'pyastramuttamam
वज्र गिराने वाले, बिजली की कड़क और गर्जन से गूँजते भयंकर मेघ। उन्हें नष्ट करने के लिए अर्जुन ने भी एक उत्तम अस्त्र छोड़ा,
श्लोक 16 (1.253.16)
वायव्यमभिमन्त्र्याथ प्रतिपत्तिविशारदः । तेनेन्द्राशनिमेघानां वीर्यौजस्तद्विनाशितम् ॥
vāyavyamabhimantryātha pratipattiviśāradaḥ | tenendrāśanimeghānāṃ vīryaujastadvināśitam
प्रतिकार में निपुण अर्जुन ने मन्त्र पढ़कर वायव्य अस्त्र चलाया। उससे इन्द्र के वज्रों और मेघों का बल और तेज नष्ट हो गया।
श्लोक 17 (1.253.17)
जलधाराश्च ताः शोषं जग्मुर्नेशुश्च विद्युतः । क्षणेन चाभवद्व्योम संप्रशान्तरजस्तमः ॥
jaladhārāśca tāḥ śoṣaṃ jagmurneśuśca vidyutaḥ | kṣaṇena cābhavadvyoma saṃpraśāntarajastamaḥ
वे जलधाराएँ सूख गईं और बिजलियाँ लुप्त हो गईं। क्षण भर में आकाश धूल और अँधेरे से रहित हो गया,
श्लोक 18 (1.253.18)
सुखशीतानिलवहं प्रकृतिस्थार्कमण्डलम् । निष्प्रतीकारहृष्टश्च हुतभुग्विविधाकृतिः ॥
sukhaśītānilavahaṃ prakṛtisthārkamaṇḍalam | niṣpratīkārahṛṣṭaśca hutabhugvividhākṛtiḥ
सुखद शीतल वायु बहने लगी और सूर्य-मण्डल फिर अपनी स्वाभाविक दशा में आ गया। बिना किसी रुकावट के प्रसन्न अग्नि ने अनेक रूप धारण किए;
श्लोक 19 (1.253.19)
सिच्यमानो वसौघैस्तैः प्राणिनां देहनिःसृतैः । प्रजज्वालाथ सोऽर्चिष्मान्स्वनादैः पूरयञ्जगत् ॥
sicyamāno vasaughaistaiḥ prāṇināṃ dehaniḥsṛtaiḥ | prajajvālātha so'rciṣmānsvanādaiḥ pūrayañjagat
प्राणियों के शरीरों से बहती चर्बी की धाराओं से सींचे जाकर वे ज्वालामय अग्निदेव अपने गर्जन से जगत को भरते हुए प्रज्वलित हो उठे।
श्लोक 20 (1.253.20)
कृष्णाभ्यां रक्षितं दृष्ट्वा तं च दावमहङ्कृताः । खमुत्पेतुर्महाराज सुपर्णाद्याः पतत्त्रिणः ॥
kṛṣṇābhyāṃ rakṣitaṃ dṛṣṭvā taṃ ca dāvamahaṅkṛtāḥ | khamutpeturmahārāja suparṇādyāḥ patattriṇaḥ
हे महाराज, उस वन को दोनों कृष्णों द्वारा रक्षित देखकर सुपर्ण आदि अभिमानी पक्षी आकाश में उड़ चले।
श्लोक 21 (1.253.21)
गरुत्मान्वज्रसदृशैः पक्षतुण्डनखैस्तथा । प्रहर्तुकामो न्यपतदाकाशात्कृष्णपाण्डवौ ॥
garutmānvajrasadṛśaiḥ pakṣatuṇḍanakhaistathā | prahartukāmo nyapatadākāśātkṛṣṇapāṇḍavau
वज्र जैसे पंखों, चोंच और नखों से कृष्ण और पाण्डव पर प्रहार करने की इच्छा से गरुत्मान आकाश से नीचे झपटे।
श्लोक 22 (1.253.22)
तथैवोरगसङ्घाताः पाण्डवस्य समीपतः । उत्सृजन्तो विषं घोरं निपेतुर्ज्वलिताननाः ॥
tathaivoragasaṅghātāḥ pāṇḍavasya samīpataḥ | utsṛjanto viṣaṃ ghoraṃ nipeturjvalitānanāḥ
इसी प्रकार नागों के झुंड भयंकर विष उगलते हुए, जलते मुखों के साथ पाण्डव के पास आ गिरे।
श्लोक 23 (1.253.23)
तांश्चकर्त शरैः पार्थः सरोषाग्निसमुक्षितैः । विविशुश्चापि तं दीप्तं देहाभावाय पावकम् ॥
tāṃścakarta śaraiḥ pārthaḥ saroṣāgnisamukṣitaiḥ | viviśuścāpi taṃ dīptaṃ dehābhāvāya pāvakam
पार्थ ने क्रोधाग्नि में मानो डुबोए हुए बाणों से उन्हें काट डाला, और वे देह-नाश के लिए उसी प्रज्वलित अग्नि में जा गिरे।
श्लोक 24 (1.253.24)
ततः सुराः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । उत्पेतुर्नादमतुलमुत्सृजन्तो रणार्थिनः ॥
tataḥ surāḥ sagandharvā yakṣarākṣasapannagāḥ | utpeturnādamatulamutsṛjanto raṇārthinaḥ
तब गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों और नागों सहित देवता युद्ध की इच्छा से अतुलनीय गर्जना करते हुए ऊपर उठे,
श्लोक 25 (1.253.25)
अयःकणपचक्राश्मभुशुण्ड्युद्यतबाहवः । कृष्णपार्थौ जिघांसन्तः क्रोधसंमूर्च्छितौजसः ॥
ayaḥkaṇapacakrāśmabhuśuṇḍyudyatabāhavaḥ | kṛṣṇapārthau jighāṃsantaḥ krodhasaṃmūrcchitaujasaḥ
उनकी भुजाओं में लोहे के गोले, कणप, चक्र, पत्थर और भुशुण्डियाँ उठी हुई थीं; क्रोध से उनका बल उमड़ रहा था और वे कृष्ण और पार्थ को मार डालना चाहते थे।
श्लोक 26 (1.253.26)
तेषामतिव्याहरतां शस्त्रवर्षं प्रमुञ्चताम् । प्रममाथोत्तमाङ्गानि बीभत्सुर्निशितैः शरैः ॥
teṣāmativyāharatāṃ śastravarṣaṃ pramuñcatām | pramamāthottamāṅgāni bībhatsurniśitaiḥ śaraiḥ
जब वे बढ़-चढ़कर ललकारते हुए शस्त्रों की वर्षा कर रहे थे, तब बीभत्सु ने तीखे बाणों से उनके सिर काट डाले।
श्लोक 27 (1.253.27)
कृष्णश्च सुमहातेजाश्चक्रेणारिविनाशनः । दैत्यदानवसङ्घानां चकार कदनं महत् ॥
kṛṣṇaśca sumahātejāścakreṇārivināśanaḥ | daityadānavasaṅghānāṃ cakāra kadanaṃ mahat
और महातेजस्वी, चक्र से शत्रुओं का नाश करने वाले कृष्ण ने दैत्यों और दानवों के समूहों का भारी संहार किया।
श्लोक 28 (1.253.28)
अथापरे शरैर्विद्धाश्चक्रवेगेरितास्तथा । वेलामिव समासाद्य व्यतिष्ठन्नमितौजसः ॥
athāpare śarairviddhāścakravegeritāstathā | velāmiva samāsādya vyatiṣṭhannamitaujasaḥ
अन्य अमित पराक्रमी योद्धा बाणों से बिंधकर और चक्र के वेग से धकेले जाकर तट पर पहुँचे समुद्र की भाँति वहीं ठहर गए।
श्लोक 29 (1.253.29)
ततः शक्रोऽतिसंक्रुद्धस्त्रिदशानां महेश्वरः । पाण्डुरं गजमास्थाय तावुभौ समुपाद्रवत् ॥
tataḥ śakro'tisaṃkruddhastridaśānāṃ maheśvaraḥ | pāṇḍuraṃ gajamāsthāya tāvubhau samupādravat
तब तीस देवताओं के महान स्वामी इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने श्वेत हाथी पर चढ़े और उन दोनों पर टूट पड़े।
श्लोक 30 (1.253.30)
वेगेनाशनिमादाय वज्रमस्त्रं च सोऽसृजत् । हतावेताविति प्राह सुरानसुरसूदनः ॥
vegenāśanimādāya vajramastraṃ ca so'sṛjat | hatāvetāviti prāha surānasurasūdanaḥ
उन्होंने वेग से अशनि उठाकर वज्र-अस्त्र छोड़ा और असुरों का संहार करने वाले इन्द्र ने देवताओं से कहा, "ये दोनों मारे गए।"
श्लोक 31 (1.253.31)
ततः समुद्यतां दृष्ट्वा देवेन्द्रेण महाशनिम् । जगृहुः सर्वशस्त्राणि स्वानि स्वानि सुरास्तथा ॥
tataḥ samudyatāṃ dṛṣṭvā devendreṇa mahāśanim | jagṛhuḥ sarvaśastrāṇi svāni svāni surāstathā
तब देवेन्द्र द्वारा उठाई गई उस महा-अशनि को देखकर सब देवताओं ने भी अपने-अपने सारे शस्त्र उठा लिए।
श्लोक 32 (1.253.32)
कालदण्डं यमो राजन् गदां चैव धनेश्वरः । पाशांश्च तत्र वरुणो विचित्रां च तथाऽशनिम् ॥
kāladaṇḍaṃ yamo rājan gadāṃ caiva dhaneśvaraḥ | pāśāṃśca tatra varuṇo vicitrāṃ ca tathā'śanim
हे राजन्, यम ने कालदण्ड उठाया और धनपति कुबेर ने गदा; वहाँ वरुण ने पाश और एक विचित्र अशनि ली।
श्लोक 33 (1.253.33)
स्कन्दः शक्तिं समादाय तस्थौ मेरुरिवाचलः । ओषधीर्दीप्यमानाश्च जगृहातेऽश्विनावपि ॥
skandaḥ śaktiṃ samādāya tasthau merurivācalaḥ | oṣadhīrdīpyamānāśca jagṛhāte'śvināvapi
स्कन्द शक्ति लेकर मेरु पर्वत के समान अचल खड़े हो गए; और दोनों अश्विनीकुमारों ने चमकती हुई ओषधियाँ ले लीं।
श्लोक 34 (1.253.34)
जगृहे च धनुर्धाता मुसलं तु जयस्तथा । पर्वतं चापि जग्राह क्रुद्धस्त्वष्टा महाबलः ॥
jagṛhe ca dhanurdhātā musalaṃ tu jayastathā | parvataṃ cāpi jagrāha kruddhastvaṣṭā mahābalaḥ
धाता ने धनुष उठाया और जय ने मूसल; और महाबली त्वष्टा ने क्रोध में भरकर एक पर्वत उठा लिया।
श्लोक 35 (1.253.35)
अंशस्तु शक्तिं जग्राह मृत्युर्देवः परश्वधम् । प्रगृह्य परिघं घोरं विचचारार्यमा अपि ॥
aṃśastu śaktiṃ jagrāha mṛtyurdevaḥ paraśvadham | pragṛhya parighaṃ ghoraṃ vicacārāryamā api
अंश ने शक्ति उठाई और मृत्युदेव ने फरसा; और अर्यमा भयंकर परिघ लेकर रणभूमि में विचरने लगे।
श्लोक 36 (1.253.36)
मित्रश्च क्षुरपर्यन्तं चक्रमादाय तस्थिवान् । पूषा भगश्च संक्रुद्धः सविता च विशांपते ॥
mitraśca kṣuraparyantaṃ cakramādāya tasthivān | pūṣā bhagaśca saṃkruddhaḥ savitā ca viśāṃpate
मित्र छुरे जैसी धार वाला चक्र लेकर खड़े हो गए; और हे प्रजानाथ, पूषा, भग और सविता भी क्रुद्ध होकर
श्लोक 37 (1.253.37)
आत्तकार्मुकनिस्त्रिंशाः कृष्णपार्थौ प्रदुद्रुवुः । रुद्राश्च वसवश्चैव मरुतश्च महाबलाः ॥
āttakārmukanistriṃśāḥ kṛṣṇapārthau pradudruvuḥ | rudrāśca vasavaścaiva marutaśca mahābalāḥ
धनुष और तलवारें लेकर कृष्ण और पार्थ पर दौड़ पड़े; रुद्र, वसु और महाबली मरुद्गण भी,
श्लोक 38 (1.253.38)
विश्वेदेवास्तथा साध्या दीप्यमानाः स्वतेजसा । एते चान्ये च बहवो देवास्तौ पुरुषोत्तमौ ॥
viśvedevāstathā sādhyā dīpyamānāḥ svatejasā | ete cānye ca bahavo devāstau puruṣottamau
और अपने तेज से दीप्त विश्वेदेव तथा साध्य भी। ये तथा अन्य बहुत-से देवता उन दोनों पुरुषोत्तमों,
श्लोक 39 (1.253.39)
कृष्णपार्थौ जिघांसन्तः प्रतीयुर्विविधायुधाः । तत्राद्भुतान्यदृश्यन्त निमित्तानि महाहवे ॥
kṛṣṇapārthau jighāṃsantaḥ pratīyurvividhāyudhāḥ | tatrādbhutānyadṛśyanta nimittāni mahāhave
कृष्ण और पार्थ को मारने की इच्छा से भाँति-भाँति के आयुध लेकर उनकी ओर बढ़े। उस महायुद्ध में वहाँ अद्भुत अपशकुन दिखाई दिए,
श्लोक 40 (1.253.40)
युगान्तसमरूपाणि भूतसंमोहनानि च । तथा दृष्ट्वा सुसंरब्धं शक्रं देवैः सहाच्युतौ ॥
yugāntasamarūpāṇi bhūtasaṃmohanāni ca | tathā dṛṣṭvā susaṃrabdhaṃ śakraṃ devaiḥ sahācyutau
जो युगान्त के समान थे और प्राणियों को मोहित कर देने वाले थे। देवताओं सहित इन्द्र को इतना क्रुद्ध देखकर वे दोनों अच्युत वीर
श्लोक 41 (1.253.41)
अभीतौ युधि दुर्धर्षौ तस्थतुः सज्जकार्मुकौ । आगच्छतस्ततो देवानुभौ युद्धविशारदौ ॥
abhītau yudhi durdharṣau tasthatuḥ sajjakārmukau | āgacchatastato devānubhau yuddhaviśāradau
निर्भय, युद्ध में दुर्जेय, धनुष चढ़ाए खड़े रहे। फिर युद्धकला में निपुण उन दोनों ने आते हुए देवताओं को
श्लोक 42 (1.253.42)
व्यताडयेतां संक्रुद्धौ शरैर्वज्रोपमैस्तदा । असकृद्भग्नसंकल्पाः सुराश्च बहुशः कृताः ॥
vyatāḍayetāṃ saṃkruddhau śarairvajropamaistadā | asakṛdbhagnasaṃkalpāḥ surāśca bahuśaḥ kṛtāḥ
क्रोधपूर्वक वज्र-समान बाणों से मारा। बार-बार, अनेक बार देवताओं के संकल्प भंग कर दिए गए,
श्लोक 43 (1.253.43)
भयाद्रणं परित्यज्य शक्रमेवाभिशिश्रियुः । दृष्ट्वा निवारितान्देवान्माधवेनार्जुनेन च ॥
bhayādraṇaṃ parityajya śakramevābhiśiśriyuḥ | dṛṣṭvā nivāritāndevānmādhavenārjunena ca
और वे भय से रणभूमि छोड़कर इन्द्र की ही शरण में चले गए। माधव और अर्जुन द्वारा देवताओं को रोका गया देखकर
श्लोक 44 (1.253.44)
आश्चर्यमगमंस्तत्र मुनयो नभसि स्थिताः । शक्रश्चापि तयोर्वीर्यमुपलभ्यासकृद्रणे ॥
āścaryamagamaṃstatra munayo nabhasi sthitāḥ | śakraścāpi tayorvīryamupalabhyāsakṛdraṇe
आकाश में स्थित मुनि आश्चर्यचकित हो गए। इन्द्र भी युद्ध में बार-बार उन दोनों का पराक्रम देखकर
श्लोक 45 (1.253.45)
बभूव परमप्रीतो भूयश्चैतावयोधयत् । ततोऽश्मवर्षं सुमहद्व्यसृजत्पाकशासनः ॥
babhūva paramaprīto bhūyaścaitāvayodhayat | tato'śmavarṣaṃ sumahadvyasṛjatpākaśāsanaḥ
अत्यन्त प्रसन्न हुए और फिर से उनसे युद्ध करने लगे। तब पाकशासन इन्द्र ने पत्थरों की भारी वर्षा की,
श्लोक 46 (1.253.46)
भूय एव तदा वीर्यं जिज्ञासुः सव्यसाचिनः । तच्छरैरर्जुनो वर्षं प्रतिजघ्नेऽत्यमर्षितः ॥
bhūya eva tadā vīryaṃ jijñāsuḥ savyasācinaḥ | taccharairarjuno varṣaṃ pratijaghne'tyamarṣitaḥ
सव्यसाची के पराक्रम को फिर से परखने की इच्छा से; और अर्जुन ने उसे सहन न करके बाणों से उस वर्षा को नष्ट कर दिया।
श्लोक 47 (1.253.47)
विफलं क्रियमाणं तत्समवेक्ष्य शतक्रतुः । भूयः संवर्धयामास तद्वर्षं पाकशासनः ॥
viphalaṃ kriyamāṇaṃ tatsamavekṣya śatakratuḥ | bhūyaḥ saṃvardhayāmāsa tadvarṣaṃ pākaśāsanaḥ
उस वर्षा को निष्फल होते देखकर शतक्रतु पाकशासन ने उसे और भी बढ़ा दिया।
श्लोक 48 (1.253.48)
सोऽश्मवर्षं महावेगैरिषुभिः पाकशासनिः । विलयं गमयामास हर्षयन्पितरं तथा ॥
so'śmavarṣaṃ mahāvegairiṣubhiḥ pākaśāsaniḥ | vilayaṃ gamayāmāsa harṣayanpitaraṃ tathā
पाकशासन के पुत्र अर्जुन ने अत्यन्त वेगवान बाणों से पत्थरों की उस वर्षा को विलीन कर दिया, जिससे उनके पिता हर्षित हुए।
श्लोक 49 (1.253.49)
तत उत्पाट्य पाणिभ्यां मन्दराच्छिखरं महत् । सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ॥
tata utpāṭya pāṇibhyāṃ mandarācchikharaṃ mahat | sadrumaṃ vyasṛjacchakro jighāṃsuḥ pāṇḍunandanam
तब इन्द्र ने दोनों हाथों से मन्दराचल का वृक्षों सहित एक विशाल शिखर उखाड़कर पाण्डुपुत्र को मारने की इच्छा से फेंका।
श्लोक 50 (1.253.50)
ततोऽर्जुनो वेगवद्भिर्ज्वलिताग्रैरजिह्मगैः । शरैर्विध्वंसयामास गिरेः शृङ्गं सहस्रधा ॥
tato'rjuno vegavadbhirjvalitāgrairajihmagaiḥ | śarairvidhvaṃsayāmāsa gireḥ śṛṅgaṃ sahasradhā
तब अर्जुन ने जलती नोकों वाले, वेगवान, सीधे जाने वाले बाणों से उस पर्वत-शिखर के हज़ार टुकड़े कर दिए।
श्लोक 51 (1.253.51)
गिरेर्विशीर्यमाणस्य तस्य रूपं तदा बभौ । सार्कचन्द्रग्रहस्येव नभसः परिशीर्यतः ॥
girerviśīryamāṇasya tasya rūpaṃ tadā babhau | sārkacandragrahasyeva nabhasaḥ pariśīryataḥ
बिखरते हुए उस पर्वत का रूप तब ऐसा लगता था मानो सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों सहित आकाश टूटकर गिर रहा हो।
श्लोक 52 (1.253.52)
तेनाभिपतता दावं शैलेन महता भृशम् । शृङ्गेण निहतास्तत्र प्राणिनः खाण्डवालयाः ॥
tenābhipatatā dāvaṃ śailena mahatā bhṛśam | śṛṅgeṇa nihatāstatra prāṇinaḥ khāṇḍavālayāḥ
उस विशाल पर्वत के वन पर भारी वेग से गिरने पर उस शिखर से खाण्डव में रहने वाले प्राणी वहीं मारे गए।