आदि पर्व · अध्याय 254
इन्द्र का लौटना और मय को अभयदान
जलते हुए खाण्डव वन से भागते प्राणियों को कृष्ण का चक्र और अर्जुन के बाण काट डालते हैं, और देवता युद्ध छोड़ देते हैं। एक अशरीरी वाणी इन्द्र से कहती है कि उसका मित्र तक्षक कुरुक्षेत्र गया हुआ है और कृष्ण तथा अर्जुन अजेय नर-नारायण हैं; तब इन्द्र स्वर्ग लौट जाते हैं। मारे गए प्राणियों की चर्बी से तृप्त अग्नि पन्द्रह दिनों तक वन को जलाते हैं। जब असुर मय भागता है और कृष्ण उस पर चक्र उठाते हैं, तब अर्जुन उसे अभय देते हैं। केवल छह प्राणी आग से बचते हैं — अश्वसेन, मय और चार शार्ङ्गक पक्षी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.254.1)
तथा शैलनिपातेन भीषिताः खाण्डवालयाः । दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्वृक्षवनौकसः ॥
tathā śailanipātena bhīṣitāḥ khāṇḍavālayāḥ | dānavā rākṣasā nāgāstarakṣvṛkṣavanaukasaḥ
तब पर्वत के गिरने से भयभीत खाण्डव वन के निवासी — दानव, राक्षस, नाग, लकड़बग्घे, रीछ और अन्य वनवासी प्राणी,
श्लोक 2 (1.254.2)
द्विपाः प्रभिन्नाः शार्दूलाः सिंहाः केसरिणस्तथा । मृगाश्च महिषाश्चैव शतशः पक्षिणस्तथा ॥
dvipāḥ prabhinnāḥ śārdūlāḥ siṃhāḥ kesariṇastathā | mṛgāśca mahiṣāścaiva śataśaḥ pakṣiṇastathā
मदमस्त हाथी, बाघ, सिंह और अयालधारी केसरी, मृग, भैंसे और सैकड़ों पक्षी,
श्लोक 3 (1.254.3)
समुद्विग्ना विससृपुस्तथान्या भूतजातयः । तं दावं समुदैक्षन्त कृष्णौ चाभ्युद्यतायुधौ ॥
samudvignā visasṛpustathānyā bhūtajātayaḥ | taṃ dāvaṃ samudaikṣanta kṛṣṇau cābhyudyatāyudhau
तथा अन्य जातियों के प्राणी अत्यन्त व्याकुल होकर भागने लगे। उन्होंने उस दावानल को और शस्त्र उठाए हुए दोनों कृष्णों (कृष्ण और अर्जुन) को देखा,
श्लोक 4 (1.254.4)
उत्पातनादशब्देन त्रासिता इव चाभवन् । ते वनं प्रसमीक्ष्याथ दह्यमानमनेकधा ॥
utpātanādaśabdena trāsitā iva cābhavan | te vanaṃ prasamīkṣyātha dahyamānamanekadhā
और उत्पात-सूचक गर्जना के शब्द से मानो भयभीत हो उठे। वन को अनेक स्थानों पर जलता हुआ देखकर
श्लोक 5 (1.254.5)
कृष्णमभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम् । तेन नादेन रौद्रेण नादेन च विभावसोः ॥
kṛṣṇamabhyudyatāstraṃ ca nādaṃ mumucurulbaṇam | tena nādena raudreṇa nādena ca vibhāvasoḥ
और कृष्ण को अस्त्र उठाए देखकर उन्होंने भयंकर चीत्कार किया। उस भीषण चीत्कार और अग्नि की गर्जना से
श्लोक 6 (1.254.6)
ररास गगनं कृत्स्नमुत्पातजलदैरिव । ततः कृष्णो महाबाहुः स्वतेजोभास्वरं महत् ॥
rarāsa gaganaṃ kṛtsnamutpātajaladairiva | tataḥ kṛṣṇo mahābāhuḥ svatejobhāsvaraṃ mahat
सारा आकाश ऐसे गूँज उठा मानो उत्पात के मेघ गरज रहे हों। तब महाबाहु केशव कृष्ण ने
श्लोक 7 (1.254.7)
चक्रं व्यसृजदत्युग्रं तेषां नाशाय केशवः । तेनार्ता जातयः क्षुद्राः सदानवनिशाचराः ॥
cakraṃ vyasṛjadatyugraṃ teṣāṃ nāśāya keśavaḥ | tenārtā jātayaḥ kṣudrāḥ sadānavaniśācarāḥ
उनके विनाश के लिए अपने तेज से दमकता हुआ अत्यन्त उग्र, विशाल चक्र छोड़ा। उससे पीड़ित होकर दानवों और निशाचरों सहित वे छोटे-छोटे प्राणी
श्लोक 8 (1.254.8)
निकृत्ताः शतशः सर्वा निपेतुरनलं क्षणात् । तत्रादृश्यन्त ते दैत्याः कृष्णचक्रविदारिताः ॥
nikṛttāḥ śataśaḥ sarvā nipeturanalaṃ kṣaṇāt | tatrādṛśyanta te daityāḥ kṛṣṇacakravidāritāḥ
सब-के-सब सैकड़ों की संख्या में कटकर क्षण भर में अग्नि में गिर पड़े। वहाँ कृष्ण के चक्र से चीरे गए दैत्य
श्लोक 9 (1.254.9)
वसारुधिरसंपृक्ताः सन्ध्यायामिव तोयदाः । पिशाचान्पक्षिणो नागान्पशूंश्चैव सहस्रशः ॥
vasārudhirasaṃpṛktāḥ sandhyāyāmiva toyadāḥ | piśācānpakṣiṇo nāgānpaśūṃścaiva sahasraśaḥ
चर्बी और रक्त से लथपथ होकर सन्ध्या के मेघों जैसे दिखाई देते थे। पिशाचों, पक्षियों, नागों और पशुओं को हज़ारों की संख्या में
श्लोक 10 (1.254.10)
निघ्नंश्चरति वार्ष्णेयः कालवत्तत्र भारत । क्षिप्तं क्षिप्तं पुनश्चक्रं कृष्णस्यामित्रघातिनः ॥
nighnaṃścarati vārṣṇeyaḥ kālavattatra bhārata | kṣiptaṃ kṣiptaṃ punaścakraṃ kṛṣṇasyāmitraghātinaḥ
मारते हुए वार्ष्णेय (कृष्ण) वहाँ काल के समान विचर रहे थे, हे भारत। शत्रुओं का संहार करने वाले कृष्ण का चक्र बार-बार फेंके जाने पर
श्लोक 11 (1.254.11)
छित्त्वानेकानि सत्त्वानि पाणिमेति पुनः पुनः । तथा तु निघ्नतस्तस्य पिशाचोरगराक्षसान् ॥
chittvānekāni sattvāni pāṇimeti punaḥ punaḥ | tathā tu nighnatastasya piśācoragarākṣasān
अनेक प्राणियों को काटकर बार-बार उनके हाथ में लौट आता था। इस प्रकार पिशाचों, सर्पों और राक्षसों का वध करते हुए
श्लोक 12 (1.254.12)
बभूव रूपमत्युग्रं सर्वभूतात्मनस्तदा । समेतानां च सर्वेषां दानवानां च सर्वशः ॥
babhūva rūpamatyugraṃ sarvabhūtātmanastadā | sametānāṃ ca sarveṣāṃ dānavānāṃ ca sarvaśaḥ
सब प्राणियों के आत्मस्वरूप उन श्रीकृष्ण का रूप उस समय अत्यन्त उग्र हो गया। वहाँ एकत्र हुए सब दानवों में से
श्लोक 13 (1.254.13)
विजेता नाभवत्कश्चित्कृष्णपाण्डवयोर्मृधे । तयोर्बलात्परित्रातुं तं च दावं यदा सुराः ॥
vijetā nābhavatkaścitkṛṣṇapāṇḍavayormṛdhe | tayorbalātparitrātuṃ taṃ ca dāvaṃ yadā surāḥ
कोई भी युद्ध में कृष्ण और पाण्डव अर्जुन को जीत न सका। जब देवता उन दोनों के बल से उस वन को बचा न सके
श्लोक 14 (1.254.14)
नाशक्नुवञ्शमयितुं तदाऽभूवन्पराङ्मुखाः । शतक्रतुस्तु संप्रेक्ष्य विमुखानमरांस्तथा ॥
nāśaknuvañśamayituṃ tadā'bhūvanparāṅmukhāḥ | śatakratustu saṃprekṣya vimukhānamarāṃstathā
और आग को बुझा न सके, तब वे विमुख होकर लौट गए। देवताओं को इस प्रकार विमुख देखकर शतक्रतु इन्द्र
श्लोक 15 (1.254.15)
बभूव मुदितो राजन्प्रशंसन्केशवार्जुनौ । निवृत्तेष्वथ देवेषु वागुवाचाशरीरिणी ॥
babhūva mudito rājanpraśaṃsankeśavārjunau | nivṛtteṣvatha deveṣu vāguvācāśarīriṇī
प्रसन्न हुए, हे राजन्, और केशव तथा अर्जुन की प्रशंसा करने लगे। देवताओं के लौट जाने पर एक अशरीरी वाणी
श्लोक 16 (1.254.16)
शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना । न ते सखा सन्निहितस्तक्षको भुजगोत्तमः ॥
śatakratuṃ samābhāṣya mahāgambhīraniḥsvanā | na te sakhā sannihitastakṣako bhujagottamaḥ
अत्यन्त गम्भीर स्वर में शतक्रतु को सम्बोधित करके बोली — "तुम्हारा मित्र, सर्पश्रेष्ठ तक्षक, यहाँ नहीं है;
अशरीरिणी वागुवाच
श्लोक 17 (1.254.17)
दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ । न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव ॥
dāhakāle khāṇḍavasya kurukṣetraṃ gato hyasau | na ca śakyau yudhā jetuṃ kathaṃcidapi vāsava
खाण्डव-दाह के समय वह कुरुक्षेत्र चला गया था। और हे वासव, ये दोनों — वासुदेव और अर्जुन — युद्ध में किसी प्रकार भी जीते नहीं जा सकते;
श्लोक 18 (1.254.18)
वासुदेवार्जुनावेतौ निबोध वचनान्मम । नरनारायणावेतौ पूर्वदेवौ दिवि श्रुतौ ॥
vāsudevārjunāvetau nibodha vacanānmama | naranārāyaṇāvetau pūrvadevau divi śrutau
मेरी बात से यह जान लो। ये दोनों नर और नारायण हैं, स्वर्ग में विख्यात प्राचीन देवता।
श्लोक 19 (1.254.19)
भवानप्यभिजानाति यद्वीर्यौ यत्पराक्रमौ । नैतौ शक्यौ दुराधर्षौ विजेतुमजितौ युधि ॥
bhavānapyabhijānāti yadvīryau yatparākramau | naitau śakyau durādharṣau vijetumajitau yudhi
इनका वीर्य और पराक्रम कैसा है, यह तुम स्वयं भी जानते हो। ये दुर्धर्ष और अजेय दोनों युद्ध में
श्लोक 20 (1.254.20)
अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ । पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः ॥
api sarveṣu lokeṣu purāṇāvṛṣisattamau | pūjanīyatamāvetāvapi sarvaiḥ surāsuraiḥ
किसी भी लोक में जीते नहीं जा सकते; ये प्राचीन श्रेष्ठ ऋषि हैं। सभी देवताओं और असुरों के लिए,
श्लोक 21 (1.254.21)
यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिन्नरपन्नगैः । तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव ॥
yakṣarākṣasagandharvanarakinnarapannagaiḥ | tasmāditaḥ suraiḥ sārdhaṃ gantumarhasi vāsava
यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों और नागों के लिए भी ये परम पूजनीय हैं। इसलिए हे वासव, तुम्हें देवताओं के साथ यहाँ से चले जाना चाहिए,
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (1.254.22)
दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत्खाण्डवस्य विनाशनम् । इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः ॥
diṣṭaṃ cāpyanupaśyaitatkhāṇḍavasya vināśanam | iti vākyamupaśrutya tathyamityamareśvaraḥ
और खाण्डव के इस विनाश को दैव का विधान समझो।" यह वाणी सुनकर देवराज ने उसे सत्य माना,
श्लोक 23 (1.254.23)
क्रोधामर्षौ समुत्सृज्य संप्रतस्थे दिवं तदा । तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः ॥
krodhāmarṣau samutsṛjya saṃpratasthe divaṃ tadā | taṃ prasthitaṃ mahātmānaṃ samavekṣya divaukasaḥ
क्रोध और असहिष्णुता त्याग दी और स्वर्ग की ओर चल पड़े। उन महात्मा को प्रस्थान करते देखकर स्वर्गवासी देवता
श्लोक 24 (1.254.24)
सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरन्दरम् । देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु ॥
sahitāḥ senayā rājannanujagmuḥ purandaram | devarājaṃ tadā yāntaṃ saha devairavekṣya tu
हे राजन्, अपनी सेना सहित पुरन्दर के पीछे-पीछे चले। देवराज को देवताओं के साथ जाते देखकर
श्लोक 25 (1.254.25)
वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः । देवराजे गते राजन्प्रहृष्टौ केशवार्जुनौ ॥
vāsudevārjunau vīrau siṃhanādaṃ vinedatuḥ | devarāje gate rājanprahṛṣṭau keśavārjunau
वीर वासुदेव और अर्जुन ने सिंहनाद किया। हे राजन्, देवराज के चले जाने पर हर्ष से भरे केशव और अर्जुन
श्लोक 26 (1.254.26)
निर्विशङ्कं वनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा । स मारुत इवाभ्राणि नाशयित्वाऽर्जुनः सुरान् ॥
nirviśaṅkaṃ vanaṃ vīrau dāhayāmāsatustadā | sa māruta ivābhrāṇi nāśayitvā'rjunaḥ surān
दोनों वीरों ने तब निःशंक होकर वन को जलवाया। जैसे वायु बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही देवताओं को भगाकर अर्जुन ने
श्लोक 27 (1.254.27)
व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान् । न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ॥
vyadhamaccharasaṅghātairdehinaḥ khāṇḍavālayān | na ca sma kiṃcicchaknoti bhūtaṃ niścarituṃ tataḥ
बाणों की बौछारों से खाण्डव में रहने वाले देहधारियों का संहार किया। कोई भी प्राणी वहाँ से निकल न सका,
श्लोक 28 (1.254.28)
संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना । नाशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् ॥
saṃchidyamānamiṣubhirasyatā savyasācinā | nāśaknuvaṃśca bhūtāni mahāntyapi raṇe'rjunam
क्योंकि बाण चलाते हुए सव्यसाची अर्जुन के बाण उसे काट डालते थे। बड़े-बड़े प्राणी भी रण में
श्लोक 29 (1.254.29)
निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धुं चापि कुतो रणे । शतं चैकेन विव्याध शतेनैकं पतत्रिणाम् ॥
nirīkṣitumamoghāstraṃ yoddhuṃ cāpi kuto raṇe | śataṃ caikena vivyādha śatenaikaṃ patatriṇām
अमोघ अस्त्रों वाले अर्जुन की ओर देख तक न सके, फिर युद्ध करना तो दूर रहा। वे एक बाण से सौ को बेधते और सौ बाणों से एक को;
श्लोक 30 (1.254.30)
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात्कालहता इव । न चालभन्त ते शर्म रोधःसु विषमेषु च ॥
vyasavaste'patannagnau sākṣātkālahatā iva | na cālabhanta te śarma rodhaḥsu viṣameṣu ca
वे प्राणहीन होकर अग्नि में ऐसे गिरते मानो साक्षात् काल ने उन्हें मार डाला हो। नदी-तटों पर और ऊबड़-खाबड़ स्थानों में भी उन्हें शरण न मिली,
श्लोक 31 (1.254.31)
पितृदेवनिवासेषु सन्तापश्चाप्यजायत । भूतसङ्घाश्च बहवो दीनाश्चक्रुर्महास्वनम् ॥
pitṛdevanivāseṣu santāpaścāpyajāyata | bhūtasaṅghāśca bahavo dīnāścakrurmahāsvanam
और पितरों तथा देवताओं के निवासों में भी ताप उत्पन्न हो गया। प्राणियों के बहुत-से समूह दीन होकर बड़ा कोलाहल करने लगे;
श्लोक 32 (1.254.32)
रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः । तेन शब्देन वित्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ॥
rurudurvāraṇāścaiva tathā mṛgatarakṣavaḥ | tena śabdena vitresurgaṅgodadhicarā jhaṣāḥ
हाथी रोने लगे, और वैसे ही मृग और लकड़बग्घे भी। उस शब्द से गंगा और समुद्र में रहने वाली मछलियाँ काँप उठीं,
श्लोक 33 (1.254.33)
विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनौकसः । न त्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम् ॥
vidyādharagaṇāścaiva ye ca tatra vanaukasaḥ | na tvarjunaṃ mahābāho nāpi kṛṣṇaṃ janārdanam
और विद्याधरों के गण तथा उस वन के निवासी भी। किन्तु हे महाबाहो, कोई भी अर्जुन को या जनार्दन कृष्ण को
श्लोक 34 (1.254.34)
निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद्योद्धुं कुतः पुनः । एकायनगता येऽपि निष्पेतुस्तत्र केचन ॥
nirīkṣituṃ vai śaknoti kaścidyoddhuṃ kutaḥ punaḥ | ekāyanagatā ye'pi niṣpetustatra kecana
देख तक नहीं सकता था, फिर युद्ध करना तो दूर की बात है। जो कुछ प्राणी एक ही मार्ग पर इकट्ठे होकर वहाँ से निकल भागे —
श्लोक 35 (1.254.35)
राक्षसा दानवा नागा जघ्ने चक्रेण तान्हरिः । ते तु भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद्गतासवः ॥
rākṣasā dānavā nāgā jaghne cakreṇa tānhariḥ | te tu bhinnaśirodehāścakravegādgatāsavaḥ
राक्षस, दानव और नाग — उन्हें हरि ने चक्र से मार डाला। चक्र के वेग से उनके सिर और शरीर कट गए और वे प्राणहीन होकर,
श्लोक 36 (1.254.36)
पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीप्ते वसुरेतसि । समांसरुधिरौघैश्च वसाभिश्चापि तर्पितः ॥
peturanye mahākāyāḥ pradīpte vasuretasi | samāṃsarudhiraughaiśca vasābhiścāpi tarpitaḥ
वे विशालकाय तथा अन्य प्राणी भी प्रज्वलित अग्नि में गिर पड़े। मांस और रक्त की धाराओं तथा चर्बी से तृप्त होकर
श्लोक 37 (1.254.37)
उपर्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत । दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च संप्रदीप्तमहाननः ॥
uparyākāśago bhūtvā vidhūmaḥ samapadyata | dīptākṣo dīptajihvaśca saṃpradīptamahānanaḥ
अग्नि ऊपर आकाश तक उठ गए और धूमरहित हो गए। उनकी आँखें दहक रही थीं, जीभ दहक रही थी, विशाल मुख प्रज्वलित था,
श्लोक 38 (1.254.38)
दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन्प्राणभृतां वसाम् । तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः ॥
dīptordhvakeśaḥ piṅgākṣaḥ pibanprāṇabhṛtāṃ vasām | tāṃ sa kṛṣṇārjunakṛtāṃ sudhāṃ prāpya hutāśanaḥ
केश ऊपर की ओर लपटों की तरह उठे थे, आँखें पिंगल थीं, और वे प्राणियों की चर्बी पी रहे थे। कृष्ण और अर्जुन द्वारा जुटाए गए उस अमृत को पाकर हुताशन
श्लोक 39 (1.254.39)
बभूव मुदितस्तृप्तः परां निर्वृतिमागतः । तथाऽसुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात् ॥
babhūva muditastṛptaḥ parāṃ nirvṛtimāgataḥ | tathā'suraṃ mayaṃ nāma takṣakasya niveśanāt
प्रसन्न और तृप्त हो गए तथा परम सन्तोष को प्राप्त हुए। तब तक्षक के निवास-स्थान से मय नामक असुर को
श्लोक 40 (1.254.40)
विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः । तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः ॥
vipradravantaṃ sahasā dadarśa madhusūdanaḥ | tamagniḥ prārthayāmāsa didhakṣurvātasārathiḥ
सहसा भागते हुए मधुसूदन ने देखा। वायु जिनका सारथि है, वे अग्नि उसे जला डालने की इच्छा से उसके पीछे पड़ गए,
श्लोक 41 (1.254.41)
शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः । विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् ॥
śarīravāñjaṭī bhūtvā nadanniva balāhakaḥ | vijñāya dānavendrāṇāṃ mayaṃ vai śilpināṃ varam
देह धारण करके, जटाधारी होकर, मेघ की भाँति गरजते हुए। मय को दानवराजों में श्रेष्ठ शिल्पी जानकर भी
श्लोक 42 (1.254.42)
जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य विष्ठितः । स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥
jighāṃsurvāsudevastaṃ cakramudyamya viṣṭhitaḥ | sa cakramudyataṃ dṛṣṭvā didhakṣantaṃ ca pāvakam
वासुदेव उसे मारने की इच्छा से चक्र उठाकर खड़े हो गए। उठे हुए चक्र को और जलाने को उद्यत अग्नि को देखकर
श्लोक 43 (1.254.43)
अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् । तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः ॥
abhidhāvārjunetyevaṃ mayastrāhīti cābravīt | tasya bhītasvanaṃ śrutvā mā bhairiti dhanaṃjayaḥ
मय ने पुकारा — "अर्जुन, दौड़ो! मेरी रक्षा करो!" उसकी भयभीत पुकार सुनकर धनंजय पार्थ ने मय को उत्तर दिया — "डरो मत!"
श्लोक 44 (1.254.44)
प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत । तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थो दयापरः ॥
pratyuvāca mayaṃ pārtho jīvayanniva bhārata | taṃ na bhetavyamityāha mayaṃ pārtho dayāparaḥ
हे भारत, मानो उसे जीवनदान दे रहे हों। दयालु पार्थ ने मय से कहा — "तुम्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं।"
श्लोक 45 (1.254.45)
तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम् । न हन्तुमैच्छद्दाशार्हः पावको न ददाह च ॥
taṃ pārthenābhaye datte namucerbhrātaraṃ mayam | na hantumaicchaddāśārhaḥ pāvako na dadāha ca
जब पार्थ ने नमुचि के भाई मय को अभय दे दिया, तब दाशार्ह (कृष्ण) ने उसे मारना नहीं चाहा और अग्नि ने भी उसे नहीं जलाया।
श्लोक 46 (1.254.46)
तद्वनं पावको धीमान्दिनानि दश पञ्च च । ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥
tadvanaṃ pāvako dhīmāndināni daśa pañca ca | dadāha kṛṣṇapārthābhyāṃ rakṣitaḥ pākaśāsanāt
पाकशासन इन्द्र से कृष्ण और पार्थ द्वारा रक्षित होकर बुद्धिमान अग्नि ने उस वन को पन्द्रह दिनों तक जलाया।
श्लोक 47 (1.254.47)
तस्मिन्वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च । अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा ॥
tasminvane dahyamāne ṣaḍagnirna dadāha ca | aśvasenaṃ mayaṃ caiva caturaḥ śārṅgakāṃstathā
उस वन के जलते समय अग्नि ने छह को नहीं जलाया — अश्वसेन को, मय को और चार शार्ङ्गक पक्षियों को।