आदि पर्व · अध्याय 255
मन्दपाल और शार्ङ्गक पक्षी
जनमेजय पूछते हैं कि अग्नि ने चार शार्ङ्गक पक्षियों को क्यों नहीं जलाया, और वैशम्पायन ब्रह्मचारी ऋषि मन्दपाल की कथा सुनाते हैं। पुत्रहीन होने के कारण पितृलोक में अपनी तपस्या का फल न पाकर मन्दपाल शार्ङ्गक पक्षी का रूप धारण करते हैं, जरिता से चार पुत्र उत्पन्न करते हैं और फिर उसे छोड़कर लपिता के पास चले जाते हैं। अग्नि को खाण्डव जलाने आते देख वे अग्नि की स्तुति करते हैं — उन्हें देवताओं का मुख और समस्त सृष्टि का मूल बताते हैं — और अग्नि उनके पुत्रों को छोड़ देने का वचन देते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (1.255.1)
किमर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथा गते । तस्मिन्वने दह्यमाने ब्रह्मन्नेतत्प्रचक्ष्व मे ॥
kimarthaṃ śārṅgakānagnirna dadāha tathā gate | tasminvane dahyamāne brahmannetatpracakṣva me
"हे ब्रह्मन्, जब वह वन जल रहा था और ऐसी स्थिति आ पड़ी थी, तब अग्नि ने शार्ङ्गकों को क्यों नहीं जलाया? यह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (1.255.2)
अदाहे ह्यश्वसेनस्य दानवस्य मयस्य च । कारणं कीर्तितं ब्रह्मञ्शार्ङ्गकाणां न कीर्तितम् ॥
adāhe hyaśvasenasya dānavasya mayasya ca | kāraṇaṃ kīrtitaṃ brahmañśārṅgakāṇāṃ na kīrtitam
हे ब्रह्मन्, अश्वसेन और दानव मय के न जलने का कारण आपने बता दिया, पर शार्ङ्गकों का कारण नहीं बताया।
श्लोक 3 (1.255.3)
तदेतदद्भुतं ब्रह्मञ्शार्ङ्गकाणामनामयम् । कीर्तयस्वाग्निसंमर्दे कथं ते न विनाशिताः ॥
tadetadadbhutaṃ brahmañśārṅgakāṇāmanāmayam | kīrtayasvāgnisaṃmarde kathaṃ te na vināśitāḥ
हे ब्रह्मन्, शार्ङ्गकों का सकुशल बच जाना एक आश्चर्य है। बताइए, अग्नि के उस प्रचण्ड प्रकोप में वे नष्ट क्यों नहीं हुए?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (1.255.4)
यदर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथा गते । तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि यथा भूतमरिन्दम ॥
yadarthaṃ śārṅgakānagnirna dadāha tathā gate | tatte sarvaṃ pravakṣyāmi yathā bhūtamarindama
"हे शत्रुदमन, ऐसी स्थिति में भी अग्नि ने शार्ङ्गकों को क्यों नहीं जलाया, यह सब मैं तुम्हें ठीक वैसा ही बताऊँगा जैसा घटित हुआ।
श्लोक 5 (1.255.5)
धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः । आसीन्महर्षिः श्रुतवान्मन्दपाल इति श्रुतः ॥
dharmajñānāṃ mukhyatamastapasvī saṃśitavrataḥ | āsīnmaharṣiḥ śrutavānmandapāla iti śrutaḥ
धर्म के ज्ञाताओं में सबसे श्रेष्ठ, कठोर व्रतों का पालन करने वाले, तपस्वी और विद्वान मन्दपाल नाम से विख्यात एक महर्षि थे।
श्लोक 6 (1.255.6)
स मार्गमाश्रितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम् । स्वाध्यायवान्धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रियः ॥
sa mārgamāśrito rājannṛṣīṇāmūrdhvaretasām | svādhyāyavāndharmaratastapasvī vijitendriyaḥ
हे राजन्, वे ऊर्ध्वरेता (आजीवन ब्रह्मचारी) ऋषियों के मार्ग पर चलते थे; स्वाध्याय में लगे, धर्मपरायण, तपस्वी और जितेन्द्रिय थे।
श्लोक 7 (1.255.7)
स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत । जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम् ॥
sa gatvā tapasaḥ pāraṃ dehamutsṛjya bhārata | jagāma pitṛlokāya na lebhe tatra tatphalam
हे भारत, तपस्या की पराकाष्ठा तक पहुँचकर उन्होंने देह त्याग दी और पितृलोक को गए, पर वहाँ उन्हें उस तप का फल नहीं मिला।
श्लोक 8 (1.255.8)
स लोकानफलान्दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि । पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान्दिवौकसः ॥
sa lokānaphalāndṛṣṭvā tapasā nirjitānapi | papraccha dharmarājasya samīpasthāndivaukasaḥ
तपस्या से जीते हुए उन लोकों को भी फलहीन देखकर उन्होंने धर्मराज के पास बैठे देवताओं से पूछा —
मन्दपाल उवाच
श्लोक 9 (1.255.9)
किमर्थमावृता लोका ममैते तपसाऽर्जिताः । किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत्कर्मणः फलम् ॥
kimarthamāvṛtā lokā mamaite tapasā'rjitāḥ | kiṃ mayā na kṛtaṃ tatra yasyaitatkarmaṇaḥ phalam
"तपस्या से अर्जित मेरे ये लोक मेरे लिए बंद क्यों हैं? मैंने वहाँ (पृथ्वी पर) क्या नहीं किया, जिसका यह फल मिला है?
श्लोक 10 (1.255.10)
तत्राहं तत्करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम् । फलमेतस्य तपसः कथयध्वं दिवौकसः ॥
tatrāhaṃ tatkariṣyāmi yadarthamidamāvṛtam | phalametasya tapasaḥ kathayadhvaṃ divaukasaḥ
जिस कारण यह ढका हुआ है, वह मैं वहाँ जाकर करूँगा। हे देवताओ, मुझे बताइए कि इस तपस्या का फल क्या है।"
देवा ऊचुः
श्लोक 11 (1.255.11)
ऋणिनो मानवा ब्रह्मञ्जायन्ते येन तच्छृणु । क्रियाभिर्ब्रह्मचर्येण प्रजया च न संशयः ॥
ṛṇino mānavā brahmañjāyante yena tacchṛṇu | kriyābhirbrahmacaryeṇa prajayā ca na saṃśayaḥ
"हे ब्रह्मन्, सुनिए — मनुष्य जन्म से ही ऋणी होते हैं: यज्ञ-कर्मों के, ब्रह्मचर्य (वेदाध्ययन) के और सन्तान के; इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 12 (1.255.12)
तदपाक्रियते सर्वं यज्ञेन तपसा सुतैः । तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा ॥
tadapākriyate sarvaṃ yajñena tapasā sutaiḥ | tapasvī yajñakṛccāsi na ca te vidyate prajā
ये सब ऋण यज्ञ से, तप से और पुत्रों से उतरते हैं। आप तपस्वी हैं और यज्ञ भी करते हैं, पर आपकी कोई सन्तान नहीं है।
श्लोक 13 (1.255.13)
त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोकाः समावृताः । प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान् ॥
ta ime prasavasyārthe tava lokāḥ samāvṛtāḥ | prajāyasva tato lokānupabhokṣyasi puṣkalān
सन्तान के अभाव में ही आपके ये लोक ढके हुए हैं। सन्तान उत्पन्न कीजिए, तब आप प्रचुर पुण्यलोकों का उपभोग करेंगे।
श्लोक 14 (1.255.14)
पुन्नाम्नो नरकात्पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः । तस्मादपत्यसन्ताने यतस्व ब्रह्मसत्तम ॥
punnāmno narakātputrastrāyate pitaraṃ śrutiḥ | tasmādapatyasantāne yatasva brahmasattama
श्रुति कहती है कि पुत्र पिता को 'पुत्' नामक नरक से बचाता है। इसलिए हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, सन्तान-परम्परा के लिए यत्न कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (1.255.15)
तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम् । क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद्बहुलं चेत्यचिन्तयत् ॥
tacchrutvā mandapālastu vacasteṣāṃ divaukasām | kva nu śīghramapatyaṃ syādbahulaṃ cetyacintayat
देवताओं के वे वचन सुनकर मन्दपाल ने सोचा — "मुझे शीघ्र और अधिक संख्या में सन्तान कहाँ मिल सकती है?"
श्लोक 16 (1.255.16)
स चिन्तयन्नभ्यगच्छत्सुबहुप्रसवान्खगान् । शार्ङ्गिकां शार्ङ्गको भूत्वा जरितां समुपेयिवान् ॥
sa cintayannabhyagacchatsubahuprasavānkhagān | śārṅgikāṃ śārṅgako bhūtvā jaritāṃ samupeyivān
यह सोचते हुए वे बहुत अधिक सन्तान उत्पन्न करने वाले पक्षियों के पास गए और स्वयं शार्ङ्गक पक्षी बनकर जरिता नामक शार्ङ्गिका से समागम किया।
श्लोक 17 (1.255.17)
तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः । तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति ॥
tasyāṃ putrānajanayaccaturo brahmavādinaḥ | tānapāsya sa tatraiva jagāma lapitāṃ prati
उससे उन्होंने वेदवेत्ता चार पुत्र उत्पन्न किए। उन्हें वहीं छोड़कर वे लपिता के पास चले गए;
श्लोक 18 (1.255.18)
बालान्स तानण्डगतान्सह मात्रा मुनिर्वने । तस्मिन्गते महाभागे लपितां प्रति भारत ॥
bālānsa tānaṇḍagatānsaha mātrā munirvane | tasmingate mahābhāge lapitāṃ prati bhārata
उन मुनि ने अण्डों में ही स्थित उन बच्चों को माता के साथ वन में छोड़ दिया। हे भारत, उन महाभाग के लपिता के पास चले जाने पर
श्लोक 19 (1.255.19)
अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्वचिन्तयत् । तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान्वने ॥
apatyasnehasaṃyuktā jaritā bahvacintayat | tena tyaktānasaṃtyājyānṛṣīnaṇḍagatānvane
सन्तान-स्नेह से भरी जरिता बहुत चिन्ता करने लगी। मन्दपाल ने जिन्हें वन में छोड़ दिया था, यद्यपि वे त्यागने योग्य नहीं थे, उन अण्डस्थ ऋषियों को
श्लोक 20 (1.255.20)
न जहौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान् । बभार चैतान्संजातान्स्ववृत्त्या स्नेहविक्लवा ॥
na jahau putraśokārtā jaritā khāṇḍave sutān | babhāra caitānsaṃjātānsvavṛttyā snehaviklavā
पुत्र-शोक से पीड़ित जरिता ने खाण्डव वन में नहीं छोड़ा; और जब वे अण्डों से निकल आए तब स्नेह से विह्वल होकर अपनी ही वृत्ति से उनका पालन-पोषण किया।
श्लोक 21 (1.255.21)
ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषिः । मन्दपालश्चरंस्तस्मिन्वने लपितया सह ॥
tato'gniṃ khāṇḍavaṃ dagdhumāyāntaṃ dṛṣṭavānṛṣiḥ | mandapālaścaraṃstasminvane lapitayā saha
तब लपिता के साथ उस वन में विचरते हुए मन्दपाल ऋषि ने अग्नि को खाण्डव वन जलाने के लिए आते देखा।
श्लोक 22 (1.255.22)
तं संकल्पं विदित्वाग्नेर्ज्ञात्वा पुत्रांश्च बालकान् । सोऽभितुष्टाव विप्रर्षिर्ब्राह्मणो जातवेदसम् ॥
taṃ saṃkalpaṃ viditvāgnerjñātvā putrāṃśca bālakān | so'bhituṣṭāva viprarṣirbrāhmaṇo jātavedasam
अग्नि का संकल्प जानकर और यह जानकर कि उनके पुत्र अभी छोटे हैं, उन ब्राह्मण विप्रर्षि ने जातवेदा अग्नि की स्तुति की,
श्लोक 23 (1.255.23)
पुत्रान्प्रतिवदन्भीतो लोकपालं महौजसम् ॥
putrānprativadanbhīto lokapālaṃ mahaujasam
भयभीत होकर, अपने पुत्रों के लिए उन महातेजस्वी लोकपाल से विनती करते हुए।
मन्दपाल उवाच
श्लोक 24 (1.255.24)
त्वमग्ने सर्वलोकानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् ॥
tvamagne sarvalokānāṃ mukhaṃ tvamasi havyavāṭ
"हे अग्ने, आप सब लोकों के मुख हैं; आप ही हव्य वहन करने वाले हैं।
श्लोक 25 (1.255.25)
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक । त्वामेकमाहुः कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः ॥
tvamantaḥ sarvabhūtānāṃ gūḍhaścarasi pāvaka | tvāmekamāhuḥ kavayastvāmāhustrividhaṃ punaḥ
हे पावक, आप सब प्राणियों के भीतर छिपे हुए विचरते हैं। कवि आपको एक कहते हैं और फिर त्रिविध भी कहते हैं।
श्लोक 26 (1.255.26)
त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन् । त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षयः ॥
tvāmaṣṭadhā kalpayitvā yajñavāhamakalpayan | tvayā viśvamidaṃ sṛṣṭaṃ vadanti paramarṣayaḥ
आपको आठ रूपों में कल्पित करके उन्होंने आपको यज्ञ का वाहक बनाया। परम ऋषि कहते हैं कि यह विश्व आपसे ही रचा गया है।
श्लोक 27 (1.255.27)
त्वदृते हि जगत्कृत्स्नं सद्यो नश्येद्धुताशन । तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् ॥
tvadṛte hi jagatkṛtsnaṃ sadyo naśyeddhutāśana | tubhyaṃ kṛtvā namo viprāḥ svakarmavijitāṃ gatim
हे हुताशन, आपके बिना सारा जगत् तत्काल नष्ट हो जाए। आपको नमस्कार करके ब्राह्मण अपने कर्मों से जीती हुई
श्लोक 28 (1.255.28)
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् । त्वामग्ने जलदानाहुः खेविषक्तान्सविद्युतः ॥
gacchanti saha patnībhiḥ sutairapi ca śāśvatīm | tvāmagne jaladānāhuḥ kheviṣaktānsavidyutaḥ
शाश्वत गति को अपनी पत्नियों और पुत्रों के साथ प्राप्त करते हैं। हे अग्ने, आकाश में टँगे हुए, बिजली से युक्त मेघों को भी आपका ही रूप कहा जाता है।
श्लोक 29 (1.255.29)
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः । जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते ॥
dahanti sarvabhūtāni tvatto niṣkramya hetayaḥ | jātavedastvayaivedaṃ viśvaṃ sṛṣṭaṃ mahādyute
आपसे निकलकर आपकी लपटें सब प्राणियों को जलाती हैं। हे महातेजस्वी जातवेदा, यह विश्व आपने ही रचा है।
श्लोक 30 (1.255.30)
तवैव कर्मविहितं भूतं सर्वं चराचरम् । त्वयापो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत् ॥
tavaiva karmavihitaṃ bhūtaṃ sarvaṃ carācaram | tvayāpo vihitāḥ pūrvaṃ tvayi sarvamidaṃ jagat
चर और अचर सब प्राणी आपके ही कर्म से विहित हैं। आपने ही आदि में जल की रचना की; यह सारा जगत् आपमें स्थित है।
श्लोक 31 (1.255.31)
त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत्संप्रतिष्ठितम् । त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः ॥
tvayi havyaṃ ca kavyaṃ ca yathāvatsaṃpratiṣṭhitam | tvameva dahano deva tvaṃ dhātā tvaṃ bṛhaspatiḥ
देवताओं का हव्य और पितरों का कव्य आपमें ही यथाविधि प्रतिष्ठित है। हे देव, आप ही दहन करने वाले हैं, आप ही धाता हैं, आप ही बृहस्पति हैं;
श्लोक 32 (1.255.32)
त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः ॥
tvamaśvinau yamau mitraḥ somastvamasi cānilaḥ
आप ही दोनों अश्विनीकुमार हैं, आप ही मित्र, सोम और अनिल (वायु) हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (1.255.33)
एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः ॥
evaṃ stutastadā tena mandapālena pāvakaḥ
मन्दपाल द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर अग्निदेव
श्लोक 34 (1.255.34)
तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः । उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते ॥
tutoṣa tasya nṛpate muneramitatejasaḥ | uvāca cainaṃ prītātmā kimiṣṭaṃ karavāṇi te
हे राजन्, उन अमित तेजस्वी मुनि पर प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले — "मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूरा करूँ?"
श्लोक 35 (1.255.35)
तमब्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम् । प्रदहन्खाण्डवं दावं मम पुत्रान्विसर्जय ॥
tamabravīnmandapālaḥ prāñjalirhavyavāhanam | pradahankhāṇḍavaṃ dāvaṃ mama putrānvisarjaya
मन्दपाल ने हाथ जोड़कर हव्यवाहन से कहा — "खाण्डव वन को जलाते समय मेरे पुत्रों को छोड़ देना।"
श्लोक 36 (1.255.36)
तथेति तत्प्रतिश्रुत्य भगवान्हव्यवाहनः । खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया ॥
tatheti tatpratiśrutya bhagavānhavyavāhanaḥ | khāṇḍave tena kālena prajajvāla didhakṣayā
भगवान् हव्यवाहन ने "ऐसा ही हो" कहकर वचन दिया और तब समय आने पर खाण्डव वन में उसे जला डालने की इच्छा से प्रज्वलित हो उठे।