आदि पर्व · अध्याय 256
जरिता का विलाप
आग के भड़क उठने पर जरिता विलाप करती है कि वह अपने चार पंखहीन पुत्रों को न तो सुरक्षित स्थान पर ले जा सकती है और न उन्हें छोड़ सकती है; वह उन आशाओं को याद करती है जो जाते समय उनके पिता मन्दपाल ने हर पुत्र से रखी थीं। बच्चे उससे कहते हैं कि वह उड़कर अपने प्राण बचा ले ताकि कुल आगे चले। जरिता सुझाव देती है कि वे चूहे के बिल में छिप जाएँ और वह उसका मुँह मिट्टी से बंद कर दे, पर बच्चे यह कहकर मना कर देते हैं कि चूहे का भोजन बनने से अग्नि में जलकर मरना श्रेष्ठ है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.256.1)
ततः प्रज्वलिते वह्नौ शार्ङ्गकास्ते सुदुःखिताः । व्यथिताः परमोद्विग्ना नाधिजग्मुः परायणम् ॥
tataḥ prajvalite vahnau śārṅgakāste suduḥkhitāḥ | vyathitāḥ paramodvignā nādhijagmuḥ parāyaṇam
तब अग्नि के प्रज्वलित होने पर वे शार्ङ्गक अत्यन्त दुःखी, व्यथित और बहुत घबराए हुए थे; उन्हें कहीं आश्रय नहीं मिला।
श्लोक 2 (1.256.2)
निशाम्य पुत्रकान्बालान्माता तेषां तपस्विनी । जरिता शोकदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता ॥
niśāmya putrakānbālānmātā teṣāṃ tapasvinī | jaritā śokaduḥkhārtā vilalāpa suduḥkhitā
अपने नन्हे बच्चों को देखकर उनकी माता, बेचारी जरिता, शोक और दुःख से व्याकुल होकर अत्यन्त दुःखी मन से विलाप करने लगी —
जरितोवाच
श्लोक 3 (1.256.3)
अयमग्निर्दहन्कक्षमित आयाति भीषणः । जगत्संदीपयन्भीमो मम दुःखविवर्धनः ॥
ayamagnirdahankakṣamita āyāti bhīṣaṇaḥ | jagatsaṃdīpayanbhīmo mama duḥkhavivardhanaḥ
"झाड़-झंखाड़ को जलाती हुई यह भयानक अग्नि इधर ही चली आ रही है; यह भीषण आग जगत् को प्रज्वलित करती हुई मेरा दुःख बढ़ा रही है।
श्लोक 4 (1.256.4)
इमे च मां कर्षयन्ति शिशवो मन्दचेतसः । अबर्हाश्चरणैर्हीनाः पूर्वेषां नः परायणाः ॥
ime ca māṃ karṣayanti śiśavo mandacetasaḥ | abarhāścaraṇairhīnāḥ pūrveṣāṃ naḥ parāyaṇāḥ
और ये नासमझ बच्चे मुझे खींच रहे हैं — बिना पंखों के, चलने में भी असमर्थ, जो हमारे पितरों का एकमात्र सहारा हैं।
श्लोक 5 (1.256.5)
त्रासयंश्चायमायाति लेलिहानो महीरुहान् । अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सरणे मम ॥
trāsayaṃścāyamāyāti lelihāno mahīruhān | ajātapakṣāśca sutā na śaktāḥ saraṇe mama
वृक्षों को चाटती हुई यह आग डराती हुई चली आ रही है। मेरे पुत्रों के पंख अभी उगे नहीं हैं; वे मेरे साथ भाग नहीं सकते।
श्लोक 6 (1.256.6)
आदाय च न शक्नोमि पुत्रांस्तरितुमात्मना । न च त्यक्तुमहं शक्ता हृदयं दूयतीव मे ॥
ādāya ca na śaknomi putrāṃstaritumātmanā | na ca tyaktumahaṃ śaktā hṛdayaṃ dūyatīva me
मैं अपने पुत्रों को लेकर स्वयं पार भी नहीं निकल सकती, और उन्हें छोड़ भी नहीं सकती; मेरा हृदय मानो जल रहा है।
श्लोक 7 (1.256.7)
कं तु जह्यामहं पुत्रं कमादाय व्रजाम्यहम् । किंनु मे स्यात्कृतं कृत्वा मन्यध्वं पुत्रकाः कथम् ॥
kaṃ tu jahyāmahaṃ putraṃ kamādāya vrajāmyaham | kiṃnu me syātkṛtaṃ kṛtvā manyadhvaṃ putrakāḥ katham
किस पुत्र को छोड़ूँ? किसे लेकर जाऊँ? क्या करूँ जिससे मेरा कर्तव्य पूरा हो? हे पुत्रो, तुम क्या सोचते हो?
श्लोक 8 (1.256.8)
चिन्तयाना विमोक्षं वो नाधिगच्छामि किंचन । छादयिष्यामि वो गात्रैः करिष्ये मरणं सह ॥
cintayānā vimokṣaṃ vo nādhigacchāmi kiṃcana | chādayiṣyāmi vo gātraiḥ kariṣye maraṇaṃ saha
तुम्हें बचाने का उपाय सोचते हुए भी मुझे कोई मार्ग नहीं सूझता। मैं अपने अंगों से तुम्हें ढँक लूँगी और तुम्हारे साथ ही मर जाऊँगी।
श्लोक 9 (1.256.9)
जरितारौ कुलं ह्येतज्ज्येष्ठत्वेन प्रतिष्ठितम् । सारिसृक्कः प्रजायेत पितॄणां कुलवर्धनः ॥
jaritārau kulaṃ hyetajjyeṣṭhatvena pratiṣṭhitam | sārisṛkkaḥ prajāyeta pitṝṇāṃ kulavardhanaḥ
'यह कुल ज्येष्ठ होने के कारण जरितारि पर टिका है; सारिसृक्क पितरों के कुल को बढ़ाने वाला होगा;
श्लोक 10 (1.256.10)
स्तम्बमित्रस्तपः कुर्याद्द्रोणो ब्रह्मविदां वरः । इत्येवमुक्त्वा प्रययौ पिता वो निर्घृणः पुरा ॥
stambamitrastapaḥ kuryāddroṇo brahmavidāṃ varaḥ | ityevamuktvā prayayau pitā vo nirghṛṇaḥ purā
स्तम्बमित्र तप करेगा और द्रोण ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होगा' — यह कहकर तुम्हारा निर्दयी पिता बहुत पहले चला गया था।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (1.256.11)
कमुपादाय शक्येयं गन्तुं कष्टाऽऽपदुत्तमा । किं नु कृत्वा कृतं कार्यं भवेदिति च विह्वला । नापश्यत्स्वधिया मोक्षं स्वसुतानां तदानलात् ॥
kamupādāya śakyeyaṃ gantuṃ kaṣṭā''paduttamā | kiṃ nu kṛtvā kṛtaṃ kāryaṃ bhavediti ca vihvalā | nāpaśyatsvadhiyā mokṣaṃ svasutānāṃ tadānalāt
"किसे लेकर मैं जा सकूँ? यह विपत्ति अत्यन्त कष्टदायक है। क्या करूँ जिससे कर्तव्य पूरा हो?" — इस प्रकार व्याकुल होकर सोचती हुई भी वह अपनी बुद्धि से अपने पुत्रों को उस अग्नि से छुड़ाने का कोई उपाय न देख सकी।
श्लोक 12 (1.256.12)
एवं ब्रुवाणां शार्ङ्गास्ते प्रत्यूचुरथ मातरम् । स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पत यत्र न हव्यवाट् ॥
evaṃ bruvāṇāṃ śārṅgāste pratyūcuratha mātaram | snehamutsṛjya mātastvaṃ pata yatra na havyavāṭ
उसके ऐसा कहने पर शार्ङ्गकों ने अपनी माता को उत्तर दिया — "माँ, हमारे प्रति मोह छोड़कर तुम वहाँ उड़ जाओ जहाँ अग्नि न हो।
शार्ङ्गका ऊचुः
श्लोक 13 (1.256.13)
अस्मास्विह विनष्टेषु भवितारः सुतास्तव । त्वयि मातर्विनष्टायां न नः स्यात्कुलसन्ततिः ॥
asmāsviha vinaṣṭeṣu bhavitāraḥ sutāstava | tvayi mātarvinaṣṭāyāṃ na naḥ syātkulasantatiḥ
यदि हम यहाँ नष्ट हो गए तो तुम्हारे और पुत्र हो जाएँगे; किन्तु माँ, यदि तुम नष्ट हो गई तो हमारा कुल आगे नहीं चल पाएगा।
श्लोक 14 (1.256.14)
अन्ववेक्ष्यैतदुभयं क्षेमं स्याद्यत्कुलस्य नः । तद्वै कर्तुं परः कालो मातरेष भवेत्तव ॥
anvavekṣyaitadubhayaṃ kṣemaṃ syādyatkulasya naḥ | tadvai kartuṃ paraḥ kālo mātareṣa bhavettava
इन दोनों बातों पर विचार करके वही करो जिसमें हमारे कुल का कल्याण हो; माँ, ऐसा करने का यही अन्तिम अवसर है।
श्लोक 15 (1.256.15)
मा त्वं सर्वविनाशाय स्नेहं कार्षीः सुतेषु नः । न हीदं कर्म मोघं स्याल्लोककामस्य नः पितुः ॥
mā tvaṃ sarvavināśāya snehaṃ kārṣīḥ suteṣu naḥ | na hīdaṃ karma moghaṃ syāllokakāmasya naḥ pituḥ
हम पुत्रों के प्रति स्नेह करके सबके विनाश का कारण मत बनो; पुण्यलोकों की कामना रखने वाले हमारे पिता का यह कार्य व्यर्थ नहीं होना चाहिए।"
जरितोवाच
श्लोक 16 (1.256.16)
इदमाखोर्बिलं भूमौ वृक्षस्यास्य समीपतः । तदाविशध्वं त्वरिता वह्नेरत्र न वो भयम् ॥
idamākhorbilaṃ bhūmau vṛkṣasyāsya samīpataḥ | tadāviśadhvaṃ tvaritā vahneratra na vo bhayam
"इस वृक्ष के पास भूमि में यह चूहे का बिल है। तुम सब जल्दी से इसमें घुस जाओ; यहाँ तुम्हें अग्नि का भय नहीं रहेगा।
श्लोक 17 (1.256.17)
ततोऽहं पांसुना छिद्रमपिधास्यामि पुत्रकाः । एवं प्रतिकृतं मन्ये ज्वलतः कृष्णवर्त्मनः ॥
tato'haṃ pāṃsunā chidramapidhāsyāmi putrakāḥ | evaṃ pratikṛtaṃ manye jvalataḥ kṛṣṇavartmanaḥ
फिर, मेरे बच्चो, मैं धूल से इसका मुँह ढँक दूँगी। धधकती हुई, काले मार्ग वाली अग्नि से बचने का मैं यही उपाय समझती हूँ।
श्लोक 18 (1.256.18)
तत एष्याम्यतीतेऽग्नौ विहन्तुं पांसुसंचयम् । रोचतामेष वो वादो मोक्षार्थं च हुताशनात् ॥
tata eṣyāmyatīte'gnau vihantuṃ pāṃsusaṃcayam | rocatāmeṣa vo vādo mokṣārthaṃ ca hutāśanāt
फिर अग्नि के निकल जाने पर मैं धूल का ढेर हटाने के लिए लौट आऊँगी। अग्नि से छुटकारा पाने के लिए मेरी यह बात तुम्हें स्वीकार हो।"
शार्ङ्गका ऊचुः
श्लोक 19 (1.256.19)
अबर्हान्मांसभूतान्नः क्रव्यादाखुर्विनाशयेत् । पश्यमाना भयमिदं प्रवेष्टुं नात्र शक्नुमः ॥
abarhānmāṃsabhūtānnaḥ kravyādākhurvināśayet | paśyamānā bhayamidaṃ praveṣṭuṃ nātra śaknumaḥ
"हम बिना पंखों के, मांस के लोथड़े मात्र हैं; मांसभक्षी चूहा हमें नष्ट कर देगा। इस भय को देखते हुए हम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते।
श्लोक 20 (1.256.20)
कथमग्निर्न नो धक्ष्येत्कथमाखुर्न नाशयेत् । कथं न स्यात्पिता मोघः कथं माता ध्रियेत नः ॥
kathamagnirna no dhakṣyetkathamākhurna nāśayet | kathaṃ na syātpitā moghaḥ kathaṃ mātā dhriyeta naḥ
अग्नि हमें कैसे न जलाए? चूहा हमें कैसे न मारे? हमारे पिता का प्रयत्न कैसे व्यर्थ न हो? हमारी माता कैसे जीवित रहे?
श्लोक 21 (1.256.21)
बिल आखोर्विनाशः स्यादग्नेराकाशचारिणाम् । अन्ववेक्ष्यैतदुभयं श्रेयान्दाहो न भक्षणम् ॥
bila ākhorvināśaḥ syādagnerākāśacāriṇām | anvavekṣyaitadubhayaṃ śreyāndāho na bhakṣaṇam
बिल में चूहे से मृत्यु है, और आकाश में विचरने वालों के लिए अग्नि से। दोनों पर विचार करें तो जल जाना खाए जाने से अच्छा है।
श्लोक 22 (1.256.22)
गर्हितं मरणं नः स्यादाखुना भक्षिते बिले । शिष्टादिष्टः परित्यागः शरीरस्य हुताशनात् ॥
garhitaṃ maraṇaṃ naḥ syādākhunā bhakṣite bile | śiṣṭādiṣṭaḥ parityāgaḥ śarīrasya hutāśanāt
बिल में चूहे द्वारा खा लिए जाने पर हमारी मृत्यु निन्दनीय होगी; किन्तु अग्नि में शरीर का त्याग शिष्टजनों द्वारा मान्य है।
श्लोक 23 (1.256.23)
अग्निदाहे तु नियतं ब्रह्मलोके ध्रुवा गतिः ॥
agnidāhe tu niyataṃ brahmaloke dhruvā gatiḥ
अग्नि में जलकर मरने वाले की ब्रह्मलोक में निश्चित गति होती है।"