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आदि पर्व · अध्याय 257

जरिता का पुत्रों को छोड़कर जाना

जरिता अपने पुत्रों को विश्वास दिलाती है कि बिल का चूहा एक बाज़ उठा ले गया है, पर वे उसकी बात नहीं मानते और दूसरे चूहों से डरते हैं। वे कहते हैं कि बिल में निश्चित मृत्यु से अग्नि में अनिश्चित मृत्यु अच्छी है, और उससे — जो अभी युवती और सुन्दर है — अपने पति के पीछे जाकर और पुत्र पाने का आग्रह करते हैं। अन्त में वह अग्नि से सुरक्षित स्थान पर उड़ जाती है, और जब लपटें बच्चों तक पहुँचती हैं तब सबसे बड़ा पुत्र जरितारि अग्निदेव को सम्बोधित करने लगता है।

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जरितोवाच

श्लोक 1 (1.257.1)

अस्माद्बिलान्निष्पतितमाखुं श्येनो जहार तम् । क्षुद्रं पद्भ्यां गृहीत्वा च यातो नात्र भयं हि वः ॥

asmādbilānniṣpatitamākhuṃ śyeno jahāra tam | kṣudraṃ padbhyāṃ gṛhītvā ca yāto nātra bhayaṃ hi vaḥ

"इस बिल से निकले उस चूहे को एक बाज़ उठा ले गया; वह उस छोटे जीव को अपने पंजों में पकड़कर चला गया। इसलिए यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं है।"

शार्ङ्गका ऊचुः

श्लोक 2 (1.257.2)

न हृतं तं वयं विद्मः श्येनेनाखुं कथंचन । अन्येऽपि भवितारोऽत्र तेभ्योऽपि भयमेव नः ॥

na hṛtaṃ taṃ vayaṃ vidmaḥ śyenenākhuṃ kathaṃcana | anye'pi bhavitāro'tra tebhyo'pi bhayameva naḥ

"बाज़ द्वारा उस चूहे के उठा ले जाए जाने की बात हम बिल्कुल नहीं जानते। यहाँ और भी चूहे हो सकते हैं, और उनसे भी हमें भय ही है।

श्लोक 3 (1.257.3)

संशयो वह्निरागच्छेद्दृष्टं वायोर्निवर्तनम् । मृत्युर्नो बिलवासिभ्यो बिले स्यान्नात्र संशयः ॥

saṃśayo vahnirāgaccheddṛṣṭaṃ vāyornivartanam | mṛtyurno bilavāsibhyo bile syānnātra saṃśayaḥ

अग्नि यहाँ तक आएगी, यह संदिग्ध है — वायु को लौटते हुए देखा गया है। पर बिल में रहने वालों के हाथों बिल में हमारी मृत्यु निश्चित है।

श्लोक 4 (1.257.4)

निःसंशयात्संशयितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते । चर खे त्वं यथान्यायं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥

niḥsaṃśayātsaṃśayito mṛtyurmātarviśiṣyate | cara khe tvaṃ yathānyāyaṃ putrānāpsyasi śobhanān

माँ, निश्चित मृत्यु से अनिश्चित मृत्यु श्रेष्ठ है। तुम उचित रीति से आकाश में विचरो; तुम्हें सुन्दर पुत्र प्राप्त होंगे।"

जरितोवाच

श्लोक 5 (1.257.5)

अहं वेगेन तं यान्तमद्राक्षं पततां वरम् । बिलादाखुं समादाय श्येनं पुत्रा महाबलम् ॥

ahaṃ vegena taṃ yāntamadrākṣaṃ patatāṃ varam | bilādākhuṃ samādāya śyenaṃ putrā mahābalam

"पुत्रो, मैंने उस बलवान् पक्षिश्रेष्ठ बाज़ को बिल से चूहा लेकर वेग से जाते हुए देखा था।

श्लोक 6 (1.257.6)

तं पतन्तं महावेगा त्वरिता पृष्ठतोऽन्वगाम् । आशिषोऽस्य प्रयुञ्जाना हरतो मूषिकं बिलात् ॥

taṃ patantaṃ mahāvegā tvaritā pṛṣṭhato'nvagām | āśiṣo'sya prayuñjānā harato mūṣikaṃ bilāt

जब वह उड़ रहा था, तब मैं बड़े वेग से जल्दी-जल्दी उसके पीछे गई और बिल से चूहा ले जाने के लिए उसे आशीर्वाद देती रही —

श्लोक 7 (1.257.7)

यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि । भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥

yo no dveṣṭāramādāya śyenarāja pradhāvasi | bhava tvaṃ divamāsthāya niramitro hiraṇmayaḥ

'हे श्येनराज, तुम जो हमारे शत्रु को लेकर उड़े जा रहे हो, स्वर्ग में जाकर शत्रुरहित और स्वर्णमय हो जाओ।'

श्लोक 8 (1.257.8)

स यदा भक्षितस्तेन श्येनेनाखुः पतत्रिणा । तदाहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपायां पुनर्गृहम् ॥

sa yadā bhakṣitastena śyenenākhuḥ patatriṇā | tadāhaṃ tamanujñāpya pratyupāyāṃ punargṛham

जब उस पक्षी बाज़ ने उस चूहे को खा लिया, तब मैं उससे विदा लेकर फिर अपने घर लौट आई।

श्लोक 9 (1.257.9)

प्रविशध्वं बिलं पुत्रा विश्रब्धा नास्ति वो भयम् । श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुर्महात्मना ॥

praviśadhvaṃ bilaṃ putrā viśrabdhā nāsti vo bhayam | śyenena mama paśyantyā hṛta ākhurmahātmanā

पुत्रो, निश्चिन्त होकर बिल में चले जाओ; तुम्हें कोई भय नहीं है। मेरे देखते-देखते उस महान् बाज़ ने चूहे को उठा लिया।"

शार्ङ्गका ऊचुः

श्लोक 10 (1.257.10)

न विद्महे हृतं मातः श्येनेनाखुं कथंचन । अविज्ञाय न शक्यामः प्रवेष्टुं विवरं भुवः ॥

na vidmahe hṛtaṃ mātaḥ śyenenākhuṃ kathaṃcana | avijñāya na śakyāmaḥ praveṣṭuṃ vivaraṃ bhuvaḥ

"माँ, हम बिल्कुल नहीं जानते कि बाज़ चूहे को ले गया। बिना जाने हम धरती के बिल में प्रवेश नहीं कर सकते।"

जरितोवाच

श्लोक 11 (1.257.11)

अहं तमभिजानामि हृतं श्येनेन मूषिकम् । नास्ति वोऽत्र भयं पुत्राः क्रियतां वचनं मम ॥

ahaṃ tamabhijānāmi hṛtaṃ śyenena mūṣikam | nāsti vo'tra bhayaṃ putrāḥ kriyatāṃ vacanaṃ mama

"मैं भली-भाँति जानती हूँ कि बाज़ चूहे को ले गया। पुत्रो, यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं है; मेरी बात मानो।"

शार्ङ्गका ऊचुः

श्लोक 12 (1.257.12)

न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षयेथा भयाद्धि नः । समाकुलेषु ज्ञानेषु न बुद्धिकृतमेव तत् ॥

na tvaṃ mithyopacāreṇa mokṣayethā bhayāddhi naḥ | samākuleṣu jñāneṣu na buddhikṛtameva tat

"तुम झूठे बहाने से हमें भय से मुक्त करने का प्रयत्न मत करो। जब बुद्धि व्याकुल हो, तब कोई भी काम सोच-समझकर नहीं होता।

श्लोक 13 (1.257.13)

न चोपकृतमस्माभिर्न चास्मान्वेत्थ ये वयम् । पीड्यमाना बिभर्ष्यस्मान्का सती के वयं तव ॥

na copakṛtamasmābhirna cāsmānvettha ye vayam | pīḍyamānā bibharṣyasmānkā satī ke vayaṃ tava

हमने तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया, और तुम यह भी नहीं जानतीं कि हम कौन हैं। स्वयं कष्ट उठाकर तुम हमारा पालन क्यों करती हो? तुम हमारी कौन हो और हम तुम्हारे कौन हैं?

श्लोक 14 (1.257.14)

तरुणी दर्शनीयाऽसि समर्था भर्तुरेषणे । अनुगच्छ पतिं मातः पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥

taruṇī darśanīyā'si samarthā bhartureṣaṇe | anugaccha patiṃ mātaḥ putrānāpsyasi śobhanān

तुम युवती हो, सुन्दर हो, पति को खोज लेने में समर्थ हो। माँ, अपने पति के पीछे जाओ; तुम्हें सुन्दर पुत्र प्राप्त होंगे।

श्लोक 15 (1.257.15)

वयमग्निं समाविश्य लोकानाप्स्याम शोभनान् । अथास्मान्न दहेदग्निरायास्त्वं पुनरेव नः ॥

vayamagniṃ samāviśya lokānāpsyāma śobhanān | athāsmānna dahedagnirāyāstvaṃ punareva naḥ

हम अग्नि में प्रवेश करके उत्तम लोकों को प्राप्त करेंगे; और यदि अग्नि हमें न जलाए, तो तुम फिर हमारे पास लौट आना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.257.16)

एवमुक्ता ततः शार्ङ्गी पुत्रानुत्सृज्य खाण्डवे । जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्नेरनामयम् ॥

evamuktā tataḥ śārṅgī putrānutsṛjya khāṇḍave | jagāma tvaritā deśaṃ kṣemamagneranāmayam

ऐसा कहे जाने पर वह शार्ङ्गी अपने पुत्रों को खाण्डव वन में छोड़कर शीघ्र ही ऐसे स्थान पर चली गई जो अग्नि से सुरक्षित और निरापद था।

श्लोक 17 (1.257.17)

ततस्तीक्ष्णार्चिरभ्यागात्त्वरितो हव्यवाहनः । यत्र शार्ङ्गा बभूवुस्ते मन्दपालस्य पुत्रकाः ॥

tatastīkṣṇārcirabhyāgāttvarito havyavāhanaḥ | yatra śārṅgā babhūvuste mandapālasya putrakāḥ

तब तीखी लपटों वाले हव्यवाहन शीघ्रता से वहाँ आ पहुँचे जहाँ मन्दपाल के पुत्र वे शार्ङ्गक थे।

श्लोक 18 (1.257.18)

ततस्तं ज्वलितं दृष्ट्वा ज्वलनं ते विहङ्गमाः । व्यथिताः करुणा वाचः श्रावयामासुरन्तिकात् । जरितारिस्ततो वाक्यं श्रावयामास पावकम् ॥

tatastaṃ jvalitaṃ dṛṣṭvā jvalanaṃ te vihaṅgamāḥ | vyathitāḥ karuṇā vācaḥ śrāvayāmāsurantikāt | jaritāristato vākyaṃ śrāvayāmāsa pāvakam

उस धधकती अग्नि को देखकर वे पक्षी व्यथित होकर उसके निकट करुण वचन बोलने लगे; तब जरितारि ने अग्निदेव को यह वचन सुनाया।

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