आदि पर्व · अध्याय 258
शार्ङ्गक शिशुओं द्वारा अग्नि की स्तुति
आग जब उनके घोंसले की ओर बढ़ती है, तब मन्दपाल के चारों नन्हे पुत्र, जरितारि, सारिसृक्व, स्तम्बमित्र और द्रोण, एक-दूसरे को धैर्य बँधाते हैं और फिर बारी-बारी से अग्नि की स्तुति करते हैं: वायु की आत्मा और जल के उद्गम के रूप में, वर्षा को खींचने और लौटाने वाले सूर्य के रूप में, और तीनों लोकों के रचयिता तथा संहारक के रूप में। द्रोण की स्तुति से प्रसन्न होकर और मन्दपाल की पहले की प्रार्थना का स्मरण करके अग्नि उन्हें अभय देते हैं; द्रोण के कहने पर वे उन्हें सताने वाले बिलावों को जला डालते हैं, शार्ङ्गकों को छोड़ देते हैं और खाण्डव वन को जलाते हुए आगे बढ़ जाते हैं।
जरितारिरुवाच
श्लोक 1 (1.258.1)
पुरतः कृच्छ्रकालस्य धीमाञ्जागर्ति पुरुषः । स कृच्छ्रकालं संप्राप्य व्यथां नैवैति कर्हिचित् ॥
purataḥ kṛcchrakālasya dhīmāñjāgarti puruṣaḥ | sa kṛcchrakālaṃ saṃprāpya vyathāṃ naivaiti karhicit
बुद्धिमान पुरुष संकट का समय आने से पहले ही सजग रहता है; संकट का समय आ पहुँचने पर वह कभी व्याकुल नहीं होता।
श्लोक 2 (1.258.2)
यस्तु कृच्छ्रमनुप्राप्तं विचेता नावबुध्यते । स कृच्छ्रकाले व्यथितो न श्रेयो विन्दते महत् ॥
yastu kṛcchramanuprāptaṃ vicetā nāvabudhyate | sa kṛcchrakāle vyathito na śreyo vindate mahat
किन्तु जो मूढ़ आ पड़े संकट को समझता ही नहीं, वह संकट के समय व्यथित होता है और कोई बड़ा कल्याण नहीं पाता।
सारिसृक्व उवाच
श्लोक 3 (1.258.3)
धीरस्त्वमसि मेधावी प्राणकृच्छ्रमिदं च नः । प्राज्ञः शूरो बहूनां हि भवत्येको न संशयः ॥
dhīrastvamasi medhāvī prāṇakṛcchramidaṃ ca naḥ | prājñaḥ śūro bahūnāṃ hi bhavatyeko na saṃśayaḥ
तुम धीर और मेधावी हो, और यह हमारे प्राणों का संकट है। बहुतों में कोई एक ही बुद्धिमान और शूरवीर होता है, इसमें संदेह नहीं।
स्तम्बमित्र उवाच
श्लोक 4 (1.258.4)
ज्येष्ठस्तातो भवति वै ज्येष्ठो मुञ्चति कृच्छ्रतः । ज्येष्ठश्चेन्न प्रजानाति कनीयान्किं करिष्यति ॥
jyeṣṭhastāto bhavati vai jyeṣṭho muñcati kṛcchrataḥ | jyeṣṭhaścenna prajānāti kanīyānkiṃ kariṣyati
ज्येष्ठ भाई ही पिता होता है; ज्येष्ठ ही संकट से छुड़ाता है। यदि ज्येष्ठ ही उपाय न जाने तो छोटा क्या करेगा?
द्रोण उवाच
श्लोक 5 (1.258.5)
हिरण्यरेतास्त्वरितो ज्वलन्नायाति नः क्षयम् । सप्तजिह्वाननः क्रूरो लेलिहानो विसर्पति ॥
hiraṇyaretāstvarito jvalannāyāti naḥ kṣayam | saptajihvānanaḥ krūro lelihāno visarpati
हिरण्यरेता अग्नि धधकते हुए तेज़ी से हमारे घोंसले की ओर आ रहे हैं; सात जिह्वाओं वाले मुख का वह क्रूर अग्नि लपलपाता हुआ बढ़ता चला आ रहा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (1.258.6)
एवं संभाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः । तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाऽग्निं शृणु पार्थिव ॥
evaṃ saṃbhāṣya te'nyonyaṃ mandapālasya putrakāḥ | tuṣṭuvuḥ prayatā bhūtvā yathā'gniṃ śṛṇu pārthiva
आपस में इस प्रकार बातचीत करके मन्दपाल के उन नन्हे पुत्रों ने एकाग्र होकर अग्नि की स्तुति की। हे राजन्, वह स्तुति जैसे हुई, सुनो।
जरितारिरुवाच
श्लोक 7 (1.258.7)
आत्माऽसि वायोर्ज्वलन शरीरमसि वीरुधाम् । योनिरापश्च ते शुक्रं योनिस्त्वमसि चाम्भसः ॥
ātmā'si vāyorjvalana śarīramasi vīrudhām | yonirāpaśca te śukraṃ yonistvamasi cāmbhasaḥ
हे ज्वलन, तुम वायु की आत्मा हो और वनस्पतियों का शरीर हो। जल तुम्हारा उद्गम और तुम्हारा बीज है, और तुम भी जल के उद्गम हो।
श्लोक 8 (1.258.8)
ऊर्ध्वं चाधश्च सर्पन्ति पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा । अर्चिषस्ते महावीर्य रश्मयः सवितुर्यथा ॥
ūrdhvaṃ cādhaśca sarpanti pṛṣṭhataḥ pārśvatastathā | arciṣaste mahāvīrya raśmayaḥ savituryathā
हे महापराक्रमी, तुम्हारी ज्वालाएँ सूर्य की किरणों की भाँति ऊपर-नीचे, पीछे और दोनों ओर फैलती हैं।
सारिसृक्व उवाच
श्लोक 9 (1.258.9)
माता प्रणष्टा पितरं न विद्मः । पक्षा जाता नैव नो धूमकेतो । न नस्त्राता विद्यते वै त्वदन्य- । स्तस्मादस्मांस्त्राहि बालांस्त्वमग्ने ॥
mātā praṇaṣṭā pitaraṃ na vidmaḥ | pakṣā jātā naiva no dhūmaketo | na nastrātā vidyate vai tvadanya- | stasmādasmāṃstrāhi bālāṃstvamagne
हमारी माता खो गई है और पिता को हम जानते नहीं; हे धूमकेतु, हमारे पंख अभी नहीं उगे। तुम्हारे सिवा हमारा कोई रक्षक नहीं, इसलिए हे अग्नि, हम बालकों की रक्षा करो।
श्लोक 10 (1.258.10)
यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः । तेन नः परिपाहि त्वमार्तान्नः शरणैषिणः ॥
yadagne te śivaṃ rūpaṃ ye ca te sapta hetayaḥ | tena naḥ paripāhi tvamārtānnaḥ śaraṇaiṣiṇaḥ
हे अग्नि, तुम्हारा जो मंगलमय रूप है और तुम्हारी जो सात ज्वालाएँ हैं, उनके द्वारा हम शरण चाहने वाले दुखियों की चारों ओर से रक्षा करो।
श्लोक 11 (1.258.11)
त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो । नान्यस्तप्ता विद्यते गोषु देव । ऋषीनस्मान्बालकान्पालयस्व । परेणास्मान्प्रेहि वै हव्यवाह ॥
tvamevaikastapase jātavedo | nānyastaptā vidyate goṣu deva | ṛṣīnasmānbālakānpālayasva | pareṇāsmānprehi vai havyavāha
हे जातवेदा, तुम ही अकेले तपाते हो; हे देव, किरणों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई तपाने वाला नहीं। हम बालक ऋषियों की रक्षा करो; हे हव्यवाह, हमसे दूर होकर आगे निकल जाओ।
स्तम्बमित्र उवाच
श्लोक 12 (1.258.12)
सर्वमग्ने त्वमेवैकस्त्वयि सर्वमिदं जगत् । त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥
sarvamagne tvamevaikastvayi sarvamidaṃ jagat | tvaṃ dhārayasi bhūtāni bhuvanaṃ tvaṃ bibharṣi ca
हे अग्नि, तुम ही सब कुछ हो; यह सारा जगत् तुममें स्थित है। तुम प्राणियों को धारण करते हो और तुम ही लोकों का भरण करते हो।
श्लोक 13 (1.258.13)
त्वमग्निर्हव्यवाहस्त्वं त्वमेव परमं हविः । मनीषिणस्त्वां जानन्ति बहुधा चैकधापि च ॥
tvamagnirhavyavāhastvaṃ tvameva paramaṃ haviḥ | manīṣiṇastvāṃ jānanti bahudhā caikadhāpi ca
तुम अग्नि हो, तुम हव्यवाह हो, और तुम ही परम हवि हो। मनीषी तुम्हें अनेक रूपों में भी जानते हैं और एक रूप में भी।
श्लोक 14 (1.258.14)
सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान्हव्यवाह । काले प्राप्ते पचसि पुनः समिद्धः । त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- । स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ॥
sṛṣṭvā lokāṃstrīnimānhavyavāha | kāle prāpte pacasi punaḥ samiddhaḥ | tvaṃ sarvasya bhuvanasya prasūti- | stvamevāgne bhavasi punaḥ pratiṣṭhā
हे हव्यवाह, इन तीनों लोकों की रचना करके, समय आने पर तुम प्रज्वलित होकर फिर उन्हें पचा लेते हो। तुम ही सम्पूर्ण जगत् के उत्पत्ति-स्थान हो, और हे अग्नि, तुम ही फिर उसका आधार बनते हो।
द्रोण उवाच
श्लोक 15 (1.258.15)
त्वमन्नं प्राणिभिर्भुक्तमन्तर्भूतो जगत्पते । नित्यप्रवृद्धः पचसि त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
tvamannaṃ prāṇibhirbhuktamantarbhūto jagatpate | nityapravṛddhaḥ pacasi tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam
हे जगत्पति, तुम प्राणियों के भीतर रहकर, सदा बढ़ते हुए, उनके खाए अन्न को पचाते हो; सब कुछ तुममें ही प्रतिष्ठित है।
श्लोक 16 (1.258.16)
सूर्यो भूत्वा रश्मिभिर्जातवेदो । भूमेरम्भो भूमिजातान्रसांश्च । विश्वानादाय पुनरुत्सृज्य काले । दृष्ट्वा वृष्ट्या भावयसीह शुक्र ॥
sūryo bhūtvā raśmibhirjātavedo | bhūmerambho bhūmijātānrasāṃśca | viśvānādāya punarutsṛjya kāle | dṛṣṭvā vṛṣṭyā bhāvayasīha śukra
हे जातवेदा, तुम सूर्य बनकर अपनी किरणों से पृथ्वी के जल और पृथ्वी से उत्पन्न सारे रसों को खींच लेते हो; फिर समय देखकर उन्हें छोड़ते हो और हे शुक्र, वर्षा से इस लोक को पोषित करते हो।
श्लोक 17 (1.258.17)
त्वत्त एताः पुनः शुक्र वीरुधो हरितच्छदाः । जायन्ते पुष्करिण्यश्च सुभद्रश्च महोदधिः ॥
tvatta etāḥ punaḥ śukra vīrudho haritacchadāḥ | jāyante puṣkariṇyaśca subhadraśca mahodadhiḥ
हे शुक्र, तुमसे ही ये हरे पत्तों वाली वनस्पतियाँ फिर उगती हैं, कमल-सरोवर उत्पन्न होते हैं और मंगलमय महासागर भी।
श्लोक 18 (1.258.18)
इदं वै सद्म तिग्मांशो वरुणस्य परायणम् । शिवस्त्राता भवास्माकं माऽस्मानद्य विनाशय ॥
idaṃ vai sadma tigmāṃśo varuṇasya parāyaṇam | śivastrātā bhavāsmākaṃ mā'smānadya vināśaya
हे तीक्ष्ण किरणों वाले, यह हमारा निवास वरुण का आश्रय है। हमारे लिए कल्याणकारी रक्षक बनो; आज हमारा विनाश मत करो।
श्लोक 19 (1.258.19)
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन्हुताशन । परेण प्रेहि मुञ्चास्मान्सागरस्य गृहानिव ॥
piṅgākṣa lohitagrīva kṛṣṇavartmanhutāśana | pareṇa prehi muñcāsmānsāgarasya gṛhāniva
हे पिंगल नेत्रों वाले, लाल ग्रीवा वाले, काले मार्ग वाले हुताशन, हमसे दूर होकर निकल जाओ और हमें छोड़ दो, जैसे तुम सागर के घरों को छोड़ देते हो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (1.258.20)
एवमुक्तो जातवेदा द्रोणेन ब्रह्मवादिना । द्रोणमाह प्रतीतात्मा मन्दपालप्रतिज्ञया ॥
evamukto jātavedā droṇena brahmavādinā | droṇamāha pratītātmā mandapālapratijñayā
ब्रह्मवादी द्रोण के ऐसा कहने पर जातवेदा अग्नि प्रसन्नचित्त होकर, मन्दपाल को दिए वचन का स्मरण करते हुए, द्रोण से बोले—
अग्निरुवाच
श्लोक 21 (1.258.21)
ऋषिर्द्रोणस्त्वमसि वै ब्रह्मैतद्व्याहृतं त्वया । ईप्सितं ते करिष्यामि न च ते विद्यते भयम् ॥
ṛṣirdroṇastvamasi vai brahmaitadvyāhṛtaṃ tvayā | īpsitaṃ te kariṣyāmi na ca te vidyate bhayam
द्रोण, तुम ऋषि हो; तुमने जो कहा है वह वेद-वाणी है। मैं तुम्हारा मनचाहा करूँगा, और तुम्हें कोई भय नहीं है।
श्लोक 22 (1.258.22)
मन्दपालेन वै यूयं मम पूर्वं निवेदिताः । वर्जयेः पुत्रकान्मह्यं दहन्दावमिति स्म ह ॥
mandapālena vai yūyaṃ mama pūrvaṃ niveditāḥ | varjayeḥ putrakānmahyaṃ dahandāvamiti sma ha
मन्दपाल ने पहले ही तुम्हें मुझे सौंप दिया था, यह कहकर कि वन जलाते समय मेरे पुत्रों को छोड़ देना।
श्लोक 23 (1.258.23)
तस्य तद्वचनं द्रोण त्वया यच्चेह भाषितम् । उभयं मे गरीयस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते । भृशं प्रीतोऽस्मि भद्रं ते ब्रह्मंस्तोत्रेण सत्तम ॥
tasya tadvacanaṃ droṇa tvayā yacceha bhāṣitam | ubhayaṃ me garīyastu brūhi kiṃ karavāṇi te | bhṛśaṃ prīto'smi bhadraṃ te brahmaṃstotreṇa sattama
द्रोण, उसका वह वचन और यहाँ तुमने जो कहा, दोनों ही मेरे लिए महत्त्वपूर्ण हैं। बताओ, मैं तुम्हारा क्या करूँ? हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, तुम्हारी स्तुति से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो।
द्रोण उवाच
श्लोक 24 (1.258.24)
इमे मार्जारकाः शुक्र नित्यमुद्वेजयन्ति नः । एतान्कुरुष्व दग्धांस्त्वं हुताशन सबान्धवान् ॥
ime mārjārakāḥ śukra nityamudvejayanti naḥ | etānkuruṣva dagdhāṃstvaṃ hutāśana sabāndhavān
हे शुक्र, ये बिलाव हमें सदा सताते रहते हैं। हे हुताशन, इन्हें इनके बन्धु-बान्धवों सहित भस्म कर दो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (1.258.25)
तथा तत्कृतवानग्निरभ्यनुज्ञाय शार्ङ्गकान् । ददाह खाण्डवं दावं समिद्धो जनमेजय ॥
tathā tatkṛtavānagnirabhyanujñāya śārṅgakān | dadāha khāṇḍavaṃ dāvaṃ samiddho janamejaya
अग्नि ने वैसा ही किया, और शार्ङ्गकों को छोड़कर, हे जनमेजय, प्रज्वलित होकर खाण्डव वन को जला डाला।