आदि पर्व · अध्याय 259
मन्दपाल की चिन्ता और पत्नियों के उलाहने
अग्नि के वचन देने पर भी मन्दपाल अपने पुत्रों के लिए खुलकर चिन्ता करते हैं, तो उनकी युवा पत्नी लपिता ईर्ष्या से उन पर जरिता की याद में तड़पने का आरोप लगाती है और उन्हें उसी के पास जाने को कहती है; वे उत्तर देते हैं कि वे केवल संतान के लिए विचरते हैं। आग के निकल जाने पर जरिता अपने पुत्रों को जीवित और सकुशल पाती है। मन्दपाल वहाँ पहुँचते हैं, पर पहले न पुत्र उन्हें उत्तर देते हैं न जरिता, और जरिता उन्हें लपिता के पास लौट जाने को कहती है। वे सौतियाडाह के विष पर चेतावनी देते हुए बताते हैं कि अरुन्धती ने वसिष्ठ पर संदेह किया और इसी से उसकी आभा मलिन हो गई; फिर पुत्र उनकी सेवा में लग जाते हैं और वे उन्हें आश्वस्त करने लगते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.259.1)
मन्दपालोऽपि कौरव्य चिन्तयामास पुत्रकान् । उक्त्वाऽपि च स तिग्मांशुं नैव शर्माधिगच्छति ॥
mandapālo'pi kauravya cintayāmāsa putrakān | uktvā'pi ca sa tigmāṃśuṃ naiva śarmādhigacchati
हे कौरव्य, मन्दपाल भी अपने बच्चों की चिन्ता करते रहे; तीक्ष्ण किरणों वाले अग्नि से कह चुकने पर भी उन्हें चैन नहीं मिला।
श्लोक 2 (1.259.2)
स तप्यमानः पुत्रार्थे लपितामिदमब्रवीत् । कथं नु शक्ताः शरणे लपिते मम पुत्रकाः ॥
sa tapyamānaḥ putrārthe lapitāmidamabravīt | kathaṃ nu śaktāḥ śaraṇe lapite mama putrakāḥ
पुत्रों के लिए संतप्त होकर उन्होंने लपिता से कहा— "लपिते, मेरे बच्चे भला कैसे शरण पा सकेंगे?
मन्दपाल उवाच
श्लोक 3 (1.259.3)
वर्धमाने हुतवहे वाते चाशु प्रवायति । असमर्था विमोक्षाय भविष्यन्ति ममात्मजाः ॥
vardhamāne hutavahe vāte cāśu pravāyati | asamarthā vimokṣāya bhaviṣyanti mamātmajāḥ
आग बढ़ रही है और हवा तेज़ चल रही है; मेरे बच्चे बचकर निकलने में असमर्थ होंगे।
श्लोक 4 (1.259.4)
कथं त्वशक्ता त्राणाय माता तेषां तपस्विनी । भविष्यति हि शोकार्ता पुत्रत्राणमपश्यती ॥
kathaṃ tvaśaktā trāṇāya mātā teṣāṃ tapasvinī | bhaviṣyati hi śokārtā putratrāṇamapaśyatī
और उनकी माता, वह बेचारी तपस्विनी, उनकी रक्षा कैसे कर पाएगी? पुत्रों को बचाने का कोई उपाय न देखकर वह शोक से व्याकुल हो जाएगी।
श्लोक 5 (1.259.5)
कथमुड्डीयनेऽशक्तान्पतने च ममात्मजान् । सन्तप्यमाना बहुधा वाशमाना प्रधावती ॥
kathamuḍḍīyane'śaktānpatane ca mamātmajān | santapyamānā bahudhā vāśamānā pradhāvatī
मेरे बच्चों को उड़ने में असमर्थ और गिरते देखकर वह अनेक प्रकार से संतप्त होकर चीखती-पुकारती इधर-उधर दौड़ती होगी; उसकी क्या दशा होगी?
श्लोक 6 (1.259.6)
जरितारिः कथं पुत्रः सारिसृक्वः कथं च मे । स्तम्बमित्रः कथं द्रोणः कथं सा च तपस्विनी ॥
jaritāriḥ kathaṃ putraḥ sārisṛkvaḥ kathaṃ ca me | stambamitraḥ kathaṃ droṇaḥ kathaṃ sā ca tapasvinī
मेरा पुत्र जरितारि कैसा होगा, सारिसृक्व कैसा होगा? स्तम्बमित्र और द्रोण कैसे होंगे, और वह बेचारी तपस्विनी कैसी होगी?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (1.259.7)
लालप्यमानं तमृषिं मन्दपालं तथा वने । लपिता प्रत्युवाचेदं सासूयमिव भारत ॥
lālapyamānaṃ tamṛṣiṃ mandapālaṃ tathā vane | lapitā pratyuvācedaṃ sāsūyamiva bhārata
हे भारत, वन में इस प्रकार विलाप करते हुए ऋषि मन्दपाल को लपिता ने मानो ईर्ष्या से भरकर यह उत्तर दिया—
लपितोवाच
श्लोक 8 (1.259.8)
न ते पुत्रेष्ववेक्षाऽस्ति यानृषीनुक्तवानसि । तेजस्विनो वीर्यवन्तो न तेषां ज्वलनाद्भयम् ॥
na te putreṣvavekṣā'sti yānṛṣīnuktavānasi | tejasvino vīryavanto na teṣāṃ jvalanādbhayam
तुम्हें अपने पुत्रों की कोई चिन्ता नहीं है; उन्हें तो तुमने स्वयं ऋषि कहा है। वे तेजस्वी और पराक्रमी हैं; उन्हें अग्नि से कोई भय नहीं।
श्लोक 9 (1.259.9)
त्वयाऽग्नौ ते परीत्ताश्च स्वयं हि मम सन्निधौ । प्रतिश्रुतं तथा चेति ज्वलनेन महात्मना ॥
tvayā'gnau te parīttāśca svayaṃ hi mama sannidhau | pratiśrutaṃ tathā ceti jvalanena mahātmanā
तुमने स्वयं मेरे सामने उन्हें अग्नि को सौंपा था, और महात्मा अग्नि ने भी "ऐसा ही होगा" कहकर वचन दिया था।
श्लोक 10 (1.259.10)
लोकपालो न तां वाचमुक्त्वा मिथ्या करिष्यति । समक्षं बन्धुकृत्ये न तेन ते स्वस्थ मानसम् ॥
lokapālo na tāṃ vācamuktvā mithyā kariṣyati | samakṣaṃ bandhukṛtye na tena te svastha mānasam
लोकपाल अपना वचन देकर उसे कभी झूठा नहीं करेंगे। इसलिए हे स्वस्थचित्त, तुम्हारा मन बन्धुओं के प्रति कर्तव्य की ओर नहीं लगा है;
श्लोक 11 (1.259.11)
तामेव तु ममामित्रां चिन्तयन्परितप्यसे । ध्रुवं मयि न ते स्नेहो यथा तस्यां पुराऽभवत् ॥
tāmeva tu mamāmitrāṃ cintayanparitapyase | dhruvaṃ mayi na te sneho yathā tasyāṃ purā'bhavat
तुम तो मेरी उसी सौत की याद में संतप्त हो रहे हो। निश्चय ही तुम्हें मुझसे वैसा प्रेम नहीं है जैसा पहले उससे था।
श्लोक 12 (1.259.12)
नहि पक्षवता न्याय्यं निःस्नेहेन सुहृज्जने । पीड्यमान उपद्रष्टुं शक्तेनात्मा कथंचन ॥
nahi pakṣavatā nyāyyaṃ niḥsnehena suhṛjjane | pīḍyamāna upadraṣṭuṃ śaktenātmā kathaṃcana
जिसके पंख हों और जो समर्थ हो, उसके लिए यह कभी उचित नहीं कि प्रियजनों में उसका अपना अंश संकट में हो और वह स्नेहहीन होकर देखता रहे।
श्लोक 13 (1.259.13)
गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे । चरिष्याम्यहमप्येका यथा कापुरुषाश्रिता ॥
gaccha tvaṃ jaritāmeva yadarthaṃ paritapyase | cariṣyāmyahamapyekā yathā kāpuruṣāśritā
जाओ, उसी जरिता के पास चले जाओ जिसके लिए तुम इतना संतप्त हो रहे हो। मैं भी किसी नीच पुरुष का आश्रय लेने वाली स्त्री की भाँति अकेली ही विचरूँगी।
मन्दपाल उवाच
श्लोक 14 (1.259.14)
नाहमेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे । अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम ॥
nāhamevaṃ care loke yathā tvamabhimanyase | apatyahetorvicare tacca kṛcchragataṃ mama
मैं संसार में उस प्रकार नहीं विचरता जैसा तुम समझती हो। मैं संतान के लिए विचरता हूँ, और मेरी वह संतान संकट में है।
श्लोक 15 (1.259.15)
भूतं हित्वा च भाव्यर्थे योऽवलम्बेत्स मन्दधीः । अवमन्येत तं लोको यथेच्छसि तथा कुरु ॥
bhūtaṃ hitvā ca bhāvyarthe yo'valambetsa mandadhīḥ | avamanyeta taṃ loko yathecchasi tathā kuru
जो वर्तमान को छोड़कर भविष्य के भरोसे टिका रहता है, वह मन्दबुद्धि है और लोग उसका तिरस्कार करते हैं। तुम्हें जो अच्छा लगे, वैसा करो।
श्लोक 16 (1.259.16)
एष हि प्रज्वलन्नग्निर्लेलिहानो महीरुहान् । आविग्ने हृदि सन्तापं जनयत्यशिवं मम ॥
eṣa hi prajvalannagnirlelihāno mahīruhān | āvigne hṛdi santāpaṃ janayatyaśivaṃ mama
वृक्षों को चाटती हुई यह धधकती आग मेरे व्याकुल हृदय में अशुभ संताप उत्पन्न कर रही है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (1.259.17)
भर्तुर्हि वाक्यं सा श्रुत्वा लपिता दुःखिताऽभवत् । सान्त्वयामास च पुनः पतिं पतिपरायणा ॥
bharturhi vākyaṃ sā śrutvā lapitā duḥkhitā'bhavat | sāntvayāmāsa ca punaḥ patiṃ patiparāyaṇā
पति के ये वचन सुनकर लपिता दुखी हो गई, और पतिपरायणा होने के कारण उसने फिर पति को सान्त्वना दी।
श्लोक 18 (1.259.18)
तस्माद्देशादतिक्रान्ते ज्वलने जरिता पुनः । जगाम पुत्रकानेव जरिता पुत्रगृद्धिनी ॥
tasmāddeśādatikrānte jvalane jaritā punaḥ | jagāma putrakāneva jaritā putragṛddhinī
जब आग उस स्थान से आगे निकल गई, तब पुत्रों के लिए व्याकुल जरिता फिर सीधे अपने बच्चों के पास ही गई।
श्लोक 19 (1.259.19)
सा तान्कुशलिनः सर्वान्विमुक्ताञ्जातवेदसः । रोरूयमाणान्ददृशे वने पुत्रान्निरामयान् ॥
sā tānkuśalinaḥ sarvānvimuktāñjātavedasaḥ | rorūyamāṇāndadṛśe vane putrānnirāmayān
उसने वन में अपने सभी पुत्रों को कुशल, निरोग और अग्नि से मुक्त, ज़ोर-ज़ोर से चहचहाते हुए देखा।
श्लोक 20 (1.259.20)
अश्रूणि मुमुचे तेषां दर्शनात्सा पुनःपुनः । न श्रद्धेयं ततस्तेषां दर्शनं वै पुनःपुनः ॥
aśrūṇi mumuce teṣāṃ darśanātsā punaḥpunaḥ | na śraddheyaṃ tatasteṣāṃ darśanaṃ vai punaḥpunaḥ
उन्हें देखकर वह बार-बार आँसू बहाने लगी। "इन्हें फिर से देख पाना विश्वास करने योग्य नहीं लगता"—
श्लोक 21 (1.259.21)
इति मत्वाऽब्रवीद्वाक्यं जरिता पुत्रगृद्धिनी । एकैकशश्च पुत्रांस्तान्क्रोशमानान्वपद्यत ॥
iti matvā'bravīdvākyaṃ jaritā putragṛddhinī | ekaikaśaśca putrāṃstānkrośamānānvapadyata
ऐसा सोचकर पुत्रों के लिए व्याकुल जरिता बोल उठी, और पुकारते हुए अपने प्रत्येक पुत्र के पास एक-एक करके गई।
श्लोक 22 (1.259.22)
जरिता तु परिष्वज्य पुत्रस्नेहाच्चुचुम्ब ह ॥
jaritā tu pariṣvajya putrasnehāccucumba ha
जरिता ने पुत्र-स्नेह से उन्हें गले लगाया और चूमा।
श्लोक 23 (1.259.23)
ततोऽभ्यगच्छत्सहसा मन्दपालोऽपि भारत । अथ ते सर्व एवैनं नाभ्यनन्दंस्तदा सुताः ॥
tato'bhyagacchatsahasā mandapālo'pi bhārata | atha te sarva evainaṃ nābhyanandaṃstadā sutāḥ
हे भारत, तभी मन्दपाल भी सहसा वहाँ आ पहुँचे, किन्तु उनके किसी भी पुत्र ने उनका अभिनन्दन नहीं किया।
श्लोक 24 (1.259.24)
गुरुत्वान्मन्दपालस्य तपसश्च विशेषतः । अभिवादामहे सर्वे जातपक्षाः प्रसादतः ॥
gurutvānmandapālasya tapasaśca viśeṣataḥ | abhivādāmahe sarve jātapakṣāḥ prasādataḥ
मन्दपाल की गुरुता और विशेषकर उनके तप का आदर करते हुए वे बोले— "हम सब आपको प्रणाम करते हैं; आपकी कृपा से हमारे पंख निकल आए हैं।"
श्लोक 25 (1.259.25)
एवमुक्तवतां तेषां तानानन्द्य महातपाः । परिष्वज्य ततो मूर्ध्नि उपाघ्राय च बालकान् । पुत्रान्स्वयं समाहूय ततः प्रोवाच गौतमः ॥
evamuktavatāṃ teṣāṃ tānānandya mahātapāḥ | pariṣvajya tato mūrdhni upāghrāya ca bālakān | putrānsvayaṃ samāhūya tataḥ provāca gautamaḥ
उनके ऐसा कहने पर उन महातपस्वी ने उन्हें आनन्दित किया, बच्चों को गले लगाकर उनका सिर सूँघा, और स्वयं पुत्रों को पास बुलाकर गौतम-वंशी मुनि तब बोले।
श्लोक 26 (1.259.26)
लालप्यमानमेकैकं जरितां च पुनःपुनः । न चैवोचुस्तदा किंचित्तमृषिं साध्वसाधु वा ॥
lālapyamānamekaikaṃ jaritāṃ ca punaḥpunaḥ | na caivocustadā kiṃcittamṛṣiṃ sādhvasādhu vā
वे बार-बार एक-एक पुत्र से और जरिता से बोलते रहे, किन्तु उन्होंने उस समय ऋषि से भला-बुरा कुछ भी नहीं कहा।
मन्दपाल उवाच
श्लोक 27 (1.259.27)
ज्येष्ठः सुतस्ते कतमः कतमस्तस्य चानुजः । मध्यमः कतमश्चैव कनीयान्कतमश्च ते ॥
jyeṣṭhaḥ sutaste katamaḥ katamastasya cānujaḥ | madhyamaḥ katamaścaiva kanīyānkatamaśca te
"तुम्हारा ज्येष्ठ पुत्र कौन है और उसके बाद वाला कौन? मँझला कौन है और तुम्हारा सबसे छोटा कौन?
श्लोक 28 (1.259.28)
एवं ब्रुवन्तं दुःखार्तं किं मां न प्रतिभाषसे । कृतवानस्मि हव्याशे नैव शान्तिमितो लभे । एवमुक्त्वा तु तां मन्दपालस्तदाऽस्पृशत् ॥
evaṃ bruvantaṃ duḥkhārtaṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase | kṛtavānasmi havyāśe naiva śāntimito labhe | evamuktvā tu tāṃ mandapālastadā'spṛśat
मैं इतने दुख में तुमसे बोल रहा हूँ, फिर भी तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देतीं? मैंने अग्नि से प्रार्थना की थी, फिर भी मुझे इससे शान्ति नहीं मिलती।" उससे ऐसा कहकर मन्दपाल ने तब उसे स्पर्श किया।
जरितोवाच
श्लोक 29 (1.259.29)
किं नु ज्येष्ठेन ते कार्यं किमनन्तरजेन ते । किं वा मध्यमजातेन किं कनिष्ठेन वा पुनः ॥
kiṃ nu jyeṣṭhena te kāryaṃ kimanantarajena te | kiṃ vā madhyamajātena kiṃ kaniṣṭhena vā punaḥ
तुम्हें ज्येष्ठ से क्या काम, या उसके बाद जन्मे से क्या? मँझले से क्या प्रयोजन, या फिर सबसे छोटे से?
श्लोक 30 (1.259.30)
यां त्वं मां सर्वतो हीनामुत्सृज्यासि गतः पुरा । तामेव लपितां गच्छ तरुणीं चारुहासिनीम् ॥
yāṃ tvaṃ māṃ sarvato hīnāmutsṛjyāsi gataḥ purā | tāmeva lapitāṃ gaccha taruṇīṃ cāruhāsinīm
तुम मुझे सब प्रकार से असहाय छोड़कर पहले ही चले गए थे। जाओ, उसी तरुणी और मधुर मुस्कान वाली लपिता के पास जाओ।
मन्दपाल उवाच
श्लोक 31 (1.259.31)
न स्त्रीणां विद्यते किंचिदमुत्र पुरुषान्तरात् । सापत्नकमृते लोके नान्यदर्थविनाशनम् ॥
na strīṇāṃ vidyate kiṃcidamutra puruṣāntarāt | sāpatnakamṛte loke nānyadarthavināśanam
स्त्रियों के लिए, पर-पुरुष को छोड़कर, संसार में सौतियाडाह के समान उनके हित का नाश करने वाली दूसरी कोई वस्तु नहीं।
श्लोक 32 (1.259.32)
वैराग्निदीपनं चैव भृशमुद्वेगकारि च । सुव्रता चापि कल्याणी सर्वभूतेषु विश्रुता ॥
vairāgnidīpanaṃ caiva bhṛśamudvegakāri ca | suvratā cāpi kalyāṇī sarvabhūteṣu viśrutā
यह वैर की आग भड़काता है और अत्यन्त उद्वेग पैदा करता है। उत्तम व्रत वाली, कल्याणी और सब प्राणियों में विख्यात अरुन्धती ने भी
श्लोक 33 (1.259.33)
अरुन्धती महात्मानं वसिष्ठं पर्यशङ्कत । विशुद्धभावमत्यन्तं सदा प्रियहिते रतम् ॥
arundhatī mahātmānaṃ vasiṣṭhaṃ paryaśaṅkata | viśuddhabhāvamatyantaṃ sadā priyahite ratam
महात्मा वसिष्ठ पर संदेह किया, जिनका भाव अत्यन्त शुद्ध था और जो सदा उसके प्रिय और हित में लगे रहते थे,
श्लोक 34 (1.259.34)
सप्तर्षिमध्यगं वीरमवमेने च तं मुनिम् । अपध्यानेन सा तेन धूमारुणसमप्रभा । लक्ष्याऽलक्ष्या नाभिरूपा निमित्तमिव पश्यति ॥
saptarṣimadhyagaṃ vīramavamene ca taṃ munim | apadhyānena sā tena dhūmāruṇasamaprabhā | lakṣyā'lakṣyā nābhirūpā nimittamiva paśyati
और सप्तर्षियों के बीच स्थित उन वीर मुनि का अपमान किया। उसी दुर्भाव के कारण उसकी आभा धुएँ जैसी धूसर-लाल हो गई; कभी दिखती है कभी नहीं, सौन्दर्यहीन, वह मानो कोई अपशकुन-सी दिखाई देती है।
श्लोक 35 (1.259.35)
अपत्यहेतोः संप्राप्तं तथा त्वमपि मामिह । इष्टमेवं गते हि त्वं सा तथैवाद्य वर्तते ॥
apatyahetoḥ saṃprāptaṃ tathā tvamapi māmiha | iṣṭamevaṃ gate hi tvaṃ sā tathaivādya vartate
उसी प्रकार तुम भी मुझ पर संदेह करती हो, जो यहाँ संतान के लिए आया था। ऐसी स्थिति आ जाने पर तुम अपने प्रिय से ही विमुख हो गई हो; और वह आज तक वैसी ही बनी हुई है।
श्लोक 36 (1.259.36)
न हि भार्येति विश्वासः कार्यः पुंसा कथंचन । न हि कार्यमनुध्याति नारी पुत्रवती सती ॥
na hi bhāryeti viśvāsaḥ kāryaḥ puṃsā kathaṃcana | na hi kāryamanudhyāti nārī putravatī satī
पुरुष को कभी इस भरोसे नहीं रहना चाहिए कि यह मेरी पत्नी है; पुत्रवती स्त्री अपने कर्तव्य का ध्यान नहीं रखती।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (1.259.37)
ततस्ते सर्व एवैनं पुत्राः सम्यगुपासते । स च तानात्मजान्सर्वानाश्वासयितुमुद्यतः ॥
tataste sarva evainaṃ putrāḥ samyagupāsate | sa ca tānātmajānsarvānāśvāsayitumudyataḥ
तब उनके सभी पुत्र भली-भाँति उनकी सेवा में लग गए, और वे भी अपने सब पुत्रों को आश्वस्त करने को उद्यत हुए।