आदि पर्व · अध्याय 260
इन्द्र के वरदान और खाण्डव-दाह की समाप्ति
मन्दपाल अपने पुत्रों को बताते हैं कि अग्नि के वचन, उनकी माता की धर्मनिष्ठा और उनके अपने पराक्रम पर भरोसा होने से वे दूर रहे, और फिर पत्नी को साथ लेकर दूसरे देश चले जाते हैं। खाण्डव के प्राणियों की चर्बी से तृप्त अग्नि अर्जुन को दर्शन देते हैं; इन्द्र मरुद्गणों के साथ उतरकर अर्जुन को वचन देते हैं कि महादेव के प्रसन्न होने पर वे उन्हें अपने सब अस्त्र देंगे, और श्रीकृष्ण को अर्जुन के साथ शाश्वत मैत्री का वर देते हैं। इक्कीस दिन तक जलाने के बाद अग्नि दोनों वीरों का आभार मानते हैं, अर्जुन को मिले गाण्डीव, तरकशों और कपिध्वज रथ की पुष्टि करते हैं और उन्हें जाने की अनुमति देते हैं; श्रीकृष्ण, अर्जुन और दानव मय उनकी परिक्रमा करके एक नदी के तट पर साथ बैठ जाते हैं। यहीं आदिपर्व समाप्त होता है।
मन्दपाल उवाच
श्लोक 1 (1.260.1)
युष्माकमपवर्गार्थं विज्ञप्तो ज्वलनो मया । अग्निना च तथेत्येवं प्रतिज्ञातं महात्मना ॥
yuṣmākamapavargārthaṃ vijñapto jvalano mayā | agninā ca tathetyevaṃ pratijñātaṃ mahātmanā
तुम्हारी मुक्ति के लिए मैंने अग्नि से निवेदन किया था, और महात्मा अग्नि ने "ऐसा ही होगा" कहकर वचन दिया था।
श्लोक 2 (1.260.2)
अग्नेर्वचनमाज्ञाय मातुर्धर्मज्ञतां च वः । भवतां च परं वीर्यं नाहं पूर्वमिहागतः ॥
agnervacanamājñāya māturdharmajñatāṃ ca vaḥ | bhavatāṃ ca paraṃ vīryaṃ nāhaṃ pūrvamihāgataḥ
अग्नि के वचन को, तुम्हारी माता की धर्मज्ञता को और तुम्हारे महान् पराक्रम को जानकर मैं पहले यहाँ नहीं आया।
श्लोक 3 (1.260.3)
न सन्तापो हि वः कार्यः पुत्रका हृदि मां प्रति । ऋषीन्वेद हुताशोऽपि ब्रह्म तद्विदितं च वः ॥
na santāpo hi vaḥ kāryaḥ putrakā hṛdi māṃ prati | ṛṣīnveda hutāśo'pi brahma tadviditaṃ ca vaḥ
इसलिए पुत्रो, मेरे प्रति अपने हृदय में संताप मत रखो। अग्नि भी जानते हैं कि तुम ऋषि हो, और तुम्हें वेद का ज्ञान है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (1.260.4)
एवमाश्वासितान्पुत्रान्भार्यामादाय स द्विजः । मन्दपालस्ततो देशादन्यं देशं जगाम ह ॥
evamāśvāsitānputrānbhāryāmādāya sa dvijaḥ | mandapālastato deśādanyaṃ deśaṃ jagāma ha
इस प्रकार पुत्रों को आश्वस्त करके वह ब्राह्मण मन्दपाल पत्नी को साथ लेकर उस स्थान से दूसरे देश को चला गया।
श्लोक 5 (1.260.5)
भगवानपि तिग्मांशुः समिद्धः खाण्डवं ततः । ददाह सह कृष्णाभ्यां जनयञ्जगतो हितम् ॥
bhagavānapi tigmāṃśuḥ samiddhaḥ khāṇḍavaṃ tataḥ | dadāha saha kṛṣṇābhyāṃ janayañjagato hitam
तब भगवान् अग्नि ने प्रज्वलित होकर दोनों कृष्णों (श्रीकृष्ण और अर्जुन) के साथ खाण्डव वन को जलाया और जगत् का हित किया।
श्लोक 6 (1.260.6)
वसामेदोवहाः कुल्यास्तत्र पीत्वा च पावकः । जगाम परमां तृप्तिं दर्शयामास चार्जुनम् ॥
vasāmedovahāḥ kulyāstatra pītvā ca pāvakaḥ | jagāma paramāṃ tṛptiṃ darśayāmāsa cārjunam
वहाँ चर्बी और मेद बहाने वाली धाराओं को पीकर अग्नि परम तृप्ति को प्राप्त हुए और उन्होंने अर्जुन को अपना दर्शन दिया।
श्लोक 7 (1.260.7)
ततोऽन्तरिक्षाद्भगवानवतीर्य पुरन्दरः । मरुद्गणैर्वृतः पार्थं केशवं चेदमब्रवीत् ॥
tato'ntarikṣādbhagavānavatīrya purandaraḥ | marudgaṇairvṛtaḥ pārthaṃ keśavaṃ cedamabravīt
तब भगवान् पुरन्दर (इन्द्र) मरुद्गणों से घिरे हुए आकाश से उतरे और पार्थ तथा केशव से यह बोले—
इन्द्र उवाच
श्लोक 8 (1.260.8)
कृतं युवाभ्यां कर्मेदममरैरपि दुष्करम् । वरं वृणीतं तुष्टोऽस्मि दुर्लभं पुरुषेष्विह ॥
kṛtaṃ yuvābhyāṃ karmedamamarairapi duṣkaram | varaṃ vṛṇītaṃ tuṣṭo'smi durlabhaṃ puruṣeṣviha
तुम दोनों ने ऐसा कर्म किया है जो देवताओं के लिए भी कठिन है। मैं प्रसन्न हूँ; कोई ऐसा वर माँगो जो मनुष्यों में दुर्लभ हो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (1.260.9)
पार्थस्तु वरयामास शक्रादस्त्राणि सर्वशः । प्रदातुं तच्च शक्रस्तु कालं चक्रे महाद्युतिः ॥
pārthastu varayāmāsa śakrādastrāṇi sarvaśaḥ | pradātuṃ tacca śakrastu kālaṃ cakre mahādyutiḥ
पार्थ ने इन्द्र से उनके सब अस्त्र माँगे, और महातेजस्वी इन्द्र ने उन्हें देने के लिए समय निश्चित कर दिया।
इन्द्र उवाच
श्लोक 10 (1.260.10)
यदा प्रसन्नो भगवान्महादेवो भविष्यति । तदा तुभ्यं प्रदास्यामि पाण्डवास्त्राणि सर्वशः ॥
yadā prasanno bhagavānmahādevo bhaviṣyati | tadā tubhyaṃ pradāsyāmi pāṇḍavāstrāṇi sarvaśaḥ
जब भगवान् महादेव तुम पर प्रसन्न होंगे, तब हे पाण्डुपुत्र, मैं तुम्हें अपने सब अस्त्र दूँगा।
श्लोक 11 (1.260.11)
अहमेव च तं कालं वेत्स्यामि कुरुनन्दन । तपसा महता चापि दास्यामि भवतोऽप्यहम् ॥
ahameva ca taṃ kālaṃ vetsyāmi kurunandana | tapasā mahatā cāpi dāsyāmi bhavato'pyaham
हे कुरुनन्दन, उस समय को मैं स्वयं जान लूँगा, और तुम्हारी महान् तपस्या के फलस्वरूप मैं उन्हें तुम्हें दूँगा।
श्लोक 12 (1.260.12)
आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वशः । मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनञ्जय ॥
āgneyāni ca sarvāṇi vāyavyāni ca sarvaśaḥ | madīyāni ca sarvāṇi grahīṣyasi dhanañjaya
हे धनंजय, तुम सभी आग्नेय अस्त्र, सभी वायव्य अस्त्र और मेरे सभी अस्त्र प्राप्त करोगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (1.260.13)
वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम् । ददौ सुरपतिश्चैव वरं कृष्णाय धीमते ॥
vāsudevo'pi jagrāha prītiṃ pārthena śāśvatīm | dadau surapatiścaiva varaṃ kṛṣṇāya dhīmate
वासुदेव ने भी पार्थ के साथ शाश्वत प्रेम का वर लिया, और देवराज ने बुद्धिमान कृष्ण को वह वर दे दिया।
श्लोक 14 (1.260.14)
एवं दत्त्वा वरं ताभ्यां सह देवैर्मरुत्पतिः । हुताशनमनुज्ञाप्य जगाम त्रिदिवं प्रभुः ॥
evaṃ dattvā varaṃ tābhyāṃ saha devairmarutpatiḥ | hutāśanamanujñāpya jagāma tridivaṃ prabhuḥ
उन दोनों को इस प्रकार वर देकर मरुतों के स्वामी प्रभु इन्द्र अग्नि से विदा लेकर देवताओं के साथ स्वर्ग चले गए।
श्लोक 15 (1.260.15)
पावकश्च तदा दावं दग्ध्वा समृगपक्षिणम् । अहोभिरेकविंशद्भिर्विरराम सुतर्पितः ॥
pāvakaśca tadā dāvaṃ dagdhvā samṛgapakṣiṇam | ahobhirekaviṃśadbhirvirarāma sutarpitaḥ
और अग्नि ने उस वन को उसके पशु-पक्षियों समेत इक्कीस दिनों तक जलाया, फिर भली-भाँति तृप्त होकर शान्त हो गए।
श्लोक 16 (1.260.16)
जग्ध्वा मांसानि पीत्वा च मेदांसि रुधिराणि च । युक्तः परमया प्रीत्या तावुवाचाच्युतार्जुनौ ॥
jagdhvā māṃsāni pītvā ca medāṃsi rudhirāṇi ca | yuktaḥ paramayā prītyā tāvuvācācyutārjunau
मांस खाकर तथा मेद और रक्त पीकर, परम प्रसन्नता से भरे अग्नि ने अच्युत और अर्जुन से कहा—
अग्निरुवाच
श्लोक 17 (1.260.17)
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम् । अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम् ॥
yuvābhyāṃ puruṣāgryābhyāṃ tarpito'smi yathāsukham | anujānāmi vāṃ vīrau carataṃ yatra vāñchitam
तुम दोनों पुरुषश्रेष्ठों ने मुझे मनचाहा तृप्त कर दिया है। हे वीरो, मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ; जहाँ चाहो वहाँ जाओ।
श्लोक 18 (1.260.18)
गाण्डिवं च धनुर्दिव्यमक्षय्यौ च महेषुधी । कपिध्वजो रथश्चायं तव दत्तो महामते ॥
gāṇḍivaṃ ca dhanurdivyamakṣayyau ca maheṣudhī | kapidhvajo rathaścāyaṃ tava datto mahāmate
हे महामति, दिव्य गाण्डीव धनुष, दो बड़े अक्षय तरकश और यह कपिध्वज रथ तुम्हें दिए गए हैं।
श्लोक 19 (1.260.19)
अनेन धनुषा चैव रथेनानेन भारत । विजेष्यसि रणे शत्रून्सदेवासुरमानुषान् ॥
anena dhanuṣā caiva rathenānena bhārata | vijeṣyasi raṇe śatrūnsadevāsuramānuṣān
हे भारत, इसी धनुष और इसी रथ के द्वारा तुम युद्ध में देवता, असुर और मनुष्य, सभी शत्रुओं को जीत लोगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (1.260.20)
एवं तौ समनुज्ञातौ पावकेन महात्मना । अर्जुनो वासुदेवश्च दानवश्च मयस्तथा ॥
evaṃ tau samanujñātau pāvakena mahātmanā | arjuno vāsudevaśca dānavaśca mayastathā
इस प्रकार महात्मा अग्नि से अनुमति पाकर अर्जुन, वासुदेव और दानव मय भी,
श्लोक 21 (1.260.21)
परिक्रम्य ततः सर्वे त्रयोऽपि भरतर्षभ । रमणीये नदीकूले सहिताः समुपाविशन् ॥
parikramya tataḥ sarve trayo'pi bharatarṣabha | ramaṇīye nadīkūle sahitāḥ samupāviśan
हे भरतश्रेष्ठ, तीनों ने उनकी परिक्रमा की और फिर एक रमणीय नदी-तट पर साथ-साथ बैठ गए।