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आदि पर्व · अध्याय 28

गरुड द्वारा निषादों का भक्षण

सर्पों के कहने पर अमृत लाने को निकले गरुड अपनी माता विनता से पूछते हैं कि वे मार्ग में क्या खाएँ। विनता उन्हें समुद्र के एक एकान्त कोने में रहने वाले निषादों के पास भेजती हैं, पर चेतावनी देती हैं कि वे किसी ब्राह्मण को हानि न पहुँचाएँ, और ब्राह्मण की पहचान बताती हैं — वह कण्ठ में अंगारे की तरह जलेगा। वायु, चन्द्र, सूर्य, अग्नि, वसुओं और विष्णु की रक्षा का आशीर्वाद देकर वे उन्हें विदा करती हैं, और गरुड निषादों के मार्ग में अपनी विशाल चोंच खोलकर उन्हें हज़ारों की संख्या में निगल जाते हैं।

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सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.28.1)

इत्युक्तो गरुडः सर्पैस्ततो मातरमब्रवीत् । गच्छाम्यमृतमाहर्तुं भक्ष्यमिच्छामि वेदितुम् ॥

ityukto garuḍaḥ sarpaistato mātaramabravīt | gacchāmyamṛtamāhartuṃ bhakṣyamicchāmi veditum

सर्पों के ऐसा कहने पर गरुड ने अपनी माता से कहा — "मैं अमृत लाने जा रहा हूँ। मैं जानना चाहता हूँ कि मैं क्या खाऊँ।"

विनतोवाच

श्लोक 2 (1.28.2)

समुद्रकुक्षावेकान्ते निषादालयमुत्तमम् । भवनानि निषादानां तत्र सन्ति द्विजोत्तम ॥

samudrakukṣāvekānte niṣādālayamuttamam | bhavanāni niṣādānāṃ tatra santi dvijottama

समुद्र की कोख में एक एकान्त स्थान पर निषादों का उत्तम निवास है। हे पक्षिश्रेष्ठ, वहाँ निषादों के घर हैं,

श्लोक 3 (1.28.3)

पापिनां नष्टलोकानां निर्घृणानां दुरात्मनाम् । निषादानां सहस्राणि तान्भुक्त्वाऽमृतमानय ॥

pāpināṃ naṣṭalokānāṃ nirghṛṇānāṃ durātmanām | niṣādānāṃ sahasrāṇi tānbhuktvā'mṛtamānaya

जो पापी, निर्दय और दुष्टात्मा हैं और जिन्होंने अपने पुण्य-लोक खो दिए हैं। उन हज़ारों निषादों को खाकर अमृत ले आओ।

श्लोक 4 (1.28.4)

न च ते ब्राह्मणं हन्तुं कार्या बुद्धिः कथंचन । अवध्यः सर्वभूतानां ब्राह्मणो ह्यनलोपमः ॥

na ca te brāhmaṇaṃ hantuṃ kāryā buddhiḥ kathaṃcana | avadhyaḥ sarvabhūtānāṃ brāhmaṇo hyanalopamaḥ

परन्तु ब्राह्मण को मारने का विचार तुम किसी प्रकार भी मन में न लाना। ब्राह्मण अग्नि के समान है; वह किसी भी प्राणी के लिए अवध्य है।

श्लोक 5 (1.28.5)

अग्निरर्को विषं शस्त्रं विप्रो भवति कोपितः । गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः परिकीर्तितः ॥

agnirarko viṣaṃ śastraṃ vipro bhavati kopitaḥ | gururhi sarvabhūtānāṃ brāhmaṇaḥ parikīrtitaḥ

क्रोधित होने पर ब्राह्मण अग्नि, सूर्य, विष और शस्त्र बन जाता है। ब्राह्मण को समस्त प्राणियों का गुरु कहा गया है।

श्लोक 6 (1.28.6)

एवमादिस्वरूपैस्तु सतां वै ब्राह्मणो मतः । स ते तात न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वथा ॥

evamādisvarūpaistu satāṃ vai brāhmaṇo mataḥ | sa te tāta na hantavyaḥ saṃkruddhenāpi sarvathā

सज्जन ब्राह्मण को इन्हीं रूपों में देखते हैं। इसलिए, पुत्र, क्रोध में होने पर भी तुम उसे कभी न मारना।

श्लोक 7 (1.28.7)

ब्राह्मणानामभिद्रोहो न कर्तव्यः कथंचन । न ह्येवमग्निर्नादित्यो भस्म कुर्यात्तथानघ ॥

brāhmaṇānāmabhidroho na kartavyaḥ kathaṃcana | na hyevamagnirnādityo bhasma kuryāttathānagha

ब्राह्मणों से कभी भी द्रोह नहीं करना चाहिए। हे निष्पाप, न अग्नि और न सूर्य वैसा भस्म कर सकते हैं

श्लोक 8 (1.28.8)

यथा कुर्यादभिक्रुद्धो ब्राह्मणः संशितव्रतः । तदेतैर्विविधैर्लिङ्गैस्त्वं विद्यास्तं द्विजोत्तमम् ॥

yathā kuryādabhikruddho brāhmaṇaḥ saṃśitavrataḥ | tadetairvividhairliṅgaistvaṃ vidyāstaṃ dvijottamam

जैसा कठोर व्रत वाला ब्राह्मण क्रुद्ध होने पर कर देता है। इन विविध लक्षणों से तुम उस श्रेष्ठ द्विज को पहचानना।

श्लोक 9 (1.28.9)

भूतानामग्रभूर्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः ॥

bhūtānāmagrabhūrvipro varṇaśreṣṭhaḥ pitā guruḥ

ब्राह्मण प्राणियों में अग्रजन्मा है, वर्णों में श्रेष्ठ है, पिता और गुरु है।

गरुड उवाच

श्लोक 10 (1.28.10)

किंरूपो ब्राह्मणो मातः किंशीलः किंपराक्रमः ॥

kiṃrūpo brāhmaṇo mātaḥ kiṃśīlaḥ kiṃparākramaḥ

माँ, ब्राह्मण का रूप कैसा होता है? उसका स्वभाव कैसा होता है और उसका पराक्रम कैसा?

श्लोक 11 (1.28.11)

किंस्विदग्निनिभो भाति किंस्वित्सौम्यप्रदर्शनः । यथाहमभिजानीयां ब्राह्मणं लक्षणैः शुभैः ॥

kiṃsvidagninibho bhāti kiṃsvitsaumyapradarśanaḥ | yathāhamabhijānīyāṃ brāhmaṇaṃ lakṣaṇaiḥ śubhaiḥ

क्या वह अग्नि के समान दमकता है, या देखने में सौम्य होता है? मुझे बताओ, जिससे मैं शुभ लक्षणों से ब्राह्मण को पहचान सकूँ।

श्लोक 12 (1.28.12)

तन्मे कारणतो मातः पृच्छतो वक्तुमर्हसि ॥

tanme kāraṇato mātaḥ pṛcchato vaktumarhasi

माँ, मैं पूछ रहा हूँ; कारण सहित यह मुझे बताओ।

विनतोवाच

श्लोक 13 (1.28.13)

यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीर्णं बडिशं यथा ॥

yaste kaṇṭhamanuprāpto nigīrṇaṃ baḍiśaṃ yathā

जो तुम्हारे कण्ठ में पहुँचकर निगले हुए काँटे की तरह अटक जाए

श्लोक 14 (1.28.14)

दहेदङ्गारवत्पुत्रं तं विद्याद्ब्राह्मणर्षभम् । विप्रस्त्वया न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वदा ॥

dahedaṅgāravatputraṃ taṃ vidyādbrāhmaṇarṣabham | viprastvayā na hantavyaḥ saṃkruddhenāpi sarvadā

और पुत्र, तुम्हें अंगारे की तरह जलाने लगे, उसे श्रेष्ठ ब्राह्मण जानना। क्रोध में होने पर भी तुम्हें ब्राह्मण का वध कभी नहीं करना चाहिए।

सौतिरुवाच

श्लोक 15 (1.28.15)

प्रोवाच चैनं विनता पुत्रहार्दादिदं वचः । जठरे न च जीर्येद्यस्तं जानीहि द्विजोत्तमम् ॥

provāca cainaṃ vinatā putrahārdādidaṃ vacaḥ | jaṭhare na ca jīryedyastaṃ jānīhi dvijottamam

पुत्र-स्नेह के कारण विनता ने उससे यह भी कहा — "जो तुम्हारे पेट में न पचे, उसे श्रेष्ठ द्विज जानना।"

श्लोक 16 (1.28.16)

पुनः प्रोवाच विनता पुत्रहार्दादिदं वचः । जानन्त्यप्यतुलं वीर्यमाशीर्वादपरायणा ॥

punaḥ provāca vinatā putrahārdādidaṃ vacaḥ | jānantyapyatulaṃ vīryamāśīrvādaparāyaṇā

पुत्र-स्नेह से विनता फिर उससे बोलीं; यद्यपि वे उसके अतुलनीय बल को जानती थीं, फिर भी वे उसे आशीर्वाद देने में लगी थीं।

श्लोक 17 (1.28.17)

प्रीता परमदुःखार्ता नागैर्विप्रकृता सती ॥

prītā paramaduḥkhārtā nāgairviprakṛtā satī

नागों द्वारा सताई गई, स्नेहमयी किन्तु अत्यन्त दुःखी विनता बोलीं —

विनतोवाच

श्लोक 18 (1.28.18)

पक्षौ ते मारुतः पातु चन्द्रसूर्यौ च पृष्ठतः ॥

pakṣau te mārutaḥ pātu candrasūryau ca pṛṣṭhataḥ

वायु तुम्हारे पंखों की रक्षा करे, और चन्द्रमा तथा सूर्य तुम्हारी पीठ की।

श्लोक 19 (1.28.19)

शिरश्च पातु वह्निस्ते वसवः सर्वतस्तनुम् । विष्णुः सर्वगतः सर्वमङ्गानि तव चैव ह । अहं च ते सदा पुत्र शान्तिस्वस्तिपरायणा ॥

śiraśca pātu vahniste vasavaḥ sarvatastanum | viṣṇuḥ sarvagataḥ sarvamaṅgāni tava caiva ha | ahaṃ ca te sadā putra śāntisvastiparāyaṇā

अग्नि तुम्हारे सिर की रक्षा करे और वसुगण चारों ओर से तुम्हारे शरीर की। सर्वव्यापी विष्णु तुम्हारे सर्वस्व और तुम्हारे सब अंगों की रक्षा करें। और पुत्र, मैं सदा तुम्हारी शान्ति और कल्याण की कामना में लगी रहूँगी।

श्लोक 20 (1.28.20)

इहासीना भविष्यामि स्वस्तिकारे रता सदा । अरिष्टं व्रज पन्थानं पुत्र कार्यार्थसिद्धये ॥

ihāsīnā bhaviṣyāmi svastikāre ratā sadā | ariṣṭaṃ vraja panthānaṃ putra kāryārthasiddhaye

मैं यहीं बैठी सदा तुम्हारे मंगल-कर्म में लगी रहूँगी। पुत्र, अपने कार्य की सिद्धि के लिए निर्विघ्न मार्ग पर जाओ।

सौतिरुवाच

श्लोक 21 (1.28.21)

ततः स मातुर्वचनं निशम्य । वितत्य पक्षौ नभ उत्पपात । ततो निषादान्बलवानुपागतो । बुभुक्षितः काल इवान्तकोऽपरः ॥

tataḥ sa māturvacanaṃ niśamya | vitatya pakṣau nabha utpapāta | tato niṣādānbalavānupāgato | bubhukṣitaḥ kāla ivāntako'paraḥ

माता के वचन सुनकर उसने पंख फैलाए और आकाश में उड़ गया। फिर वह बलवान, भूखा पक्षी निषादों पर ऐसे आ पहुँचा, मानो समय आने पर दूसरा अन्तक (मृत्यु) आ गया हो।

श्लोक 22 (1.28.22)

स तान्निषादानुपसंहरंस्तदा । रजः समुद्धूय नभःस्पृशं महत् । समुद्रकुक्षौ च विशोषयन्पयः । समीपजान्भूधरजान्विचालयन् ॥

sa tānniṣādānupasaṃharaṃstadā | rajaḥ samuddhūya nabhaḥspṛśaṃ mahat | samudrakukṣau ca viśoṣayanpayaḥ | samīpajānbhūdharajānvicālayan

निषादों का संहार करते हुए उसने आकाश को छूती धूल का विशाल बवंडर उठाया, समुद्र की कोख का जल सुखा डाला और पास के पर्वतों पर उगे वृक्षों को हिला दिया।

श्लोक 23 (1.28.23)

ततः स चक्रे महदाननं तदा । निषादमार्गं प्रतिरुध्य पक्षिराट् । ततो निषादास्त्वरिताः प्रवव्रजु- । र्यतो मुखं तस्य भुजंगभोजिनः ॥

tataḥ sa cakre mahadānanaṃ tadā | niṣādamārgaṃ pratirudhya pakṣirāṭ | tato niṣādāstvaritāḥ pravavraju- | ryato mukhaṃ tasya bhujaṃgabhojinaḥ

तब पक्षिराज ने निषादों का मार्ग रोककर अपना मुँह बहुत बड़ा खोल दिया, और निषाद उतावली में उसी ओर भागे जिधर उस सर्पभक्षी का मुख था।

श्लोक 24 (1.28.24)

तदाननं विवृतमतिप्रमाणव- । त्समभ्ययुर्गगनमिवार्दिताः खगाः । सहस्रशः पवनरजोविमोहिता । यथाऽनिलप्रचलितपादपे वने ॥

tadānanaṃ vivṛtamatipramāṇava- | tsamabhyayurgaganamivārditāḥ khagāḥ | sahasraśaḥ pavanarajovimohitā | yathā'nilapracalitapādape vane

आँधी और धूल से भ्रमित होकर वे हज़ारों की संख्या में उस खुले, अत्यन्त विशाल मुख में ऐसे घुस गए, जैसे हवा से झकझोरे गए वृक्षों वाले वन में घबराए हुए पक्षी आकाश में उड़ जाते हैं।

श्लोक 25 (1.28.25)

ततः खगो वदनममित्रतापनः । समाहरत्परिचपलो महाबलः । निषूदयन्बहुविधमत्स्यजीविनो । बुभुक्षितो गगनचरेश्वरस्तदा ॥

tataḥ khago vadanamamitratāpanaḥ | samāharatparicapalo mahābalaḥ | niṣūdayanbahuvidhamatsyajīvino | bubhukṣito gaganacareśvarastadā

तब शत्रुओं को सन्ताप देने वाले, महाबली, चारों ओर फुर्ती से झपटते उस भूखे आकाशचारियों के स्वामी ने अपना मुख बन्द कर लिया और मछलियों पर जीने वाले अनेक प्रकार के लोगों का संहार कर डाला।

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