आदि पर्व · अध्याय 29
हाथी और कछुआ
निषादों के साथ निगला गया एक ब्राह्मण गरुड के कण्ठ को जलाने लगता है, और गरुड उसे उसकी निषाद पत्नी सहित बाहर निकल जाने देते हैं। भूख न मिटने पर गरुड अपने पिता कश्यप के पास जाते हैं, जो उन्हें विभावसु और सुप्रतीक नामक भाइयों की कथा सुनाते हैं — धन के बँटवारे पर झगड़कर उन्होंने एक-दूसरे को हाथी और कछुआ होने का शाप दिया, और वे आज भी पास के एक सरोवर में लड़ते रहते हैं। कश्यप गरुड को उन दोनों को खाने का आदेश देते हैं और देवताओं से होने वाले युद्ध के लिए आशीर्वाद देते हैं। गरुड उन्हें पंजों में पकड़कर देववृक्षों के पास जाते हैं, जहाँ विशाल रौहिण वृक्ष उन्हें बैठने के लिए अपनी सौ योजन लम्बी शाखा देता है, और वह शाखा उनके बैठते ही टूट जाती है।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.29.1)
तस्य कण्ठमनुप्राप्तो ब्राह्मणः सह भार्यया । दहन्दीप्त इवाङ्गारस्तमुवाचान्तरिक्षगः ॥
tasya kaṇṭhamanuprāpto brāhmaṇaḥ saha bhāryayā | dahandīpta ivāṅgārastamuvācāntarikṣagaḥ
अपनी पत्नी के साथ एक ब्राह्मण गरुड के कण्ठ में पहुँच गया था और दहकते अंगारे की तरह जल रहा था। तब आकाशचारी गरुड ने उससे कहा —
गरुड उवाच
श्लोक 2 (1.29.2)
द्विजोत्तम विनिर्गच्छ तूर्णमास्यादपावृतात् । न हि मे ब्राह्मणो वध्यः पापेष्वपि रतः सदा ॥
dvijottama vinirgaccha tūrṇamāsyādapāvṛtāt | na hi me brāhmaṇo vadhyaḥ pāpeṣvapi rataḥ sadā
हे द्विजश्रेष्ठ, मेरे खुले मुख से शीघ्र बाहर निकल आओ। ब्राह्मण मेरे लिए अवध्य है, चाहे वह सदा पाप में ही क्यों न लगा रहे।
सौतिरुवाच
श्लोक 3 (1.29.3)
ब्रुवाणमेवं गरुडं ब्राह्मणः प्रत्यभाषत । निषादी मम भार्येयं निर्गच्छतु मया सह ॥
bruvāṇamevaṃ garuḍaṃ brāhmaṇaḥ pratyabhāṣata | niṣādī mama bhāryeyaṃ nirgacchatu mayā saha
गरुड के ऐसा कहने पर ब्राह्मण ने उत्तर दिया — "यह निषादी मेरी पत्नी है; यह भी मेरे साथ बाहर निकले।"
गरुड उवाच
श्लोक 4 (1.29.4)
एतामपि निषादीं त्वं परिगृह्याशु निष्पत । तूर्णं संभावयात्मानमजीर्णं मम तेजसा ॥
etāmapi niṣādīṃ tvaṃ parigṛhyāśu niṣpata | tūrṇaṃ saṃbhāvayātmānamajīrṇaṃ mama tejasā
इस निषादी को भी साथ लेकर तुरन्त बाहर निकल आओ। मेरे तेज से पच जाने से पहले ही शीघ्र अपने प्राण बचा लो।
सौतिरुवाच
श्लोक 5 (1.29.5)
ततः स विप्रो निष्क्रान्तो निषादीसहितस्तदा । वर्धयित्वा च गरुडमिष्टं देशं जगाम ह ॥
tataḥ sa vipro niṣkrānto niṣādīsahitastadā | vardhayitvā ca garuḍamiṣṭaṃ deśaṃ jagāma ha
तब वह ब्राह्मण निषादी के साथ बाहर निकल आया और गरुड को आशीर्वाद देकर अपने मनचाहे देश को चला गया।
श्लोक 6 (1.29.6)
सहभार्ये विनिष्क्रान्ते तस्मिन्विप्रे स पक्षिराट् । वितत्य पक्षावाकाशमुत्पपात मनोजवः ॥
sahabhārye viniṣkrānte tasminvipre sa pakṣirāṭ | vitatya pakṣāvākāśamutpapāta manojavaḥ
पत्नी सहित उस ब्राह्मण के निकल जाने पर मन के समान वेग वाला पक्षिराज पंख फैलाकर आकाश में उड़ चला।
श्लोक 7 (1.29.7)
ततोऽपश्यत्स्वपितरं पृष्टश्चाख्यातवान्पितुः । यथान्यायममेयात्मा तं चोवाच महानृषिः ॥
tato'paśyatsvapitaraṃ pṛṣṭaścākhyātavānpituḥ | yathānyāyamameyātmā taṃ covāca mahānṛṣiḥ
फिर उसने अपने पिता को देखा, और उनके पूछने पर यथोचित रूप से सब कुछ कह सुनाया। तब अपरिमित आत्मा वाले उन महर्षि ने उससे कहा —
कश्यप उवाच
श्लोक 8 (1.29.8)
कच्चिद्वः कुशलं नित्यं भोजने बहुलं सुत । कच्चिच्च मानुषे लोके तवान्नं विद्यते बहु । क्व गन्तास्यतिवेगेन मम त्वं वक्तुमर्हसि ॥
kaccidvaḥ kuśalaṃ nityaṃ bhojane bahulaṃ suta | kaccicca mānuṣe loke tavānnaṃ vidyate bahu | kva gantāsyativegena mama tvaṃ vaktumarhasi
पुत्र, तुम सब कुशल से तो हो? क्या तुम्हें सदा भरपूर भोजन मिलता है? क्या मनुष्य-लोक में तुम्हारे लिए पर्याप्त अन्न है? मुझे बताओ, तुम इतने वेग से कहाँ जा रहे हो?
गरुड उवाच
श्लोक 9 (1.29.9)
माता मे कुशला शश्वत्तथा भ्राता तथा ह्यहम् । न हि मे कुशलं तात भोजने बहुले सदा ॥
mātā me kuśalā śaśvattathā bhrātā tathā hyaham | na hi me kuśalaṃ tāta bhojane bahule sadā
मेरी माता सदा कुशल से हैं, मेरा भाई भी, और मैं भी। पर हे तात, भरपूर भोजन के विषय में मैं सदा कुशल नहीं रहता।
श्लोक 10 (1.29.10)
अहं हि सर्पैः प्रहितः सोममाहर्तुमुत्तमम् । मातुर्दास्यविमोक्षार्थमाहरिष्ये तमद्य वै ॥
ahaṃ hi sarpaiḥ prahitaḥ somamāhartumuttamam | māturdāsyavimokṣārthamāhariṣye tamadya vai
सर्पों ने मुझे उत्तम सोम लाने भेजा है। अपनी माता को दासता से छुड़ाने के लिए मैं आज ही उसे लाऊँगा।
श्लोक 11 (1.29.11)
मात्रा चात्र समादिष्टो निषादान्भक्षयेति ह । न च मे तृप्तिरभवद्भक्षयित्वा सहस्रशः ॥
mātrā cātra samādiṣṭo niṣādānbhakṣayeti ha | na ca me tṛptirabhavadbhakṣayitvā sahasraśaḥ
माता ने मुझे आदेश दिया था कि निषादों को खा लो; पर हज़ारों को खाकर भी मेरी तृप्ति नहीं हुई।
श्लोक 12 (1.29.12)
तस्माद्भक्ष्यं त्वमपरं भगवन्प्रदिशस्व मे । यद्भुक्त्वाऽमृतमाहर्तुं समर्थः स्यामहं प्रभो ॥
tasmādbhakṣyaṃ tvamaparaṃ bhagavanpradiśasva me | yadbhuktvā'mṛtamāhartuṃ samarthaḥ syāmahaṃ prabho
इसलिए हे भगवन्, मुझे कोई और भोजन बताइए, जिसे खाकर, हे प्रभो, मैं अमृत लाने में समर्थ हो सकूँ।
श्लोक 13 (1.29.13)
क्षुत्पिपासाविघातार्थं भक्ष्यमाख्यातु मे भवान् ॥
kṣutpipāsāvighātārthaṃ bhakṣyamākhyātu me bhavān
मेरी भूख-प्यास मिटाने के लिए आप मुझे कोई भोजन बताइए।
कश्यप उवाच
श्लोक 14 (1.29.14)
इदं सरो महापुण्यं देवलोकेऽपि विश्रुतम् ॥
idaṃ saro mahāpuṇyaṃ devaloke'pi viśrutam
यह अत्यन्त पवित्र सरोवर है, जो देवलोक में भी प्रसिद्ध है,
श्लोक 15 (1.29.15)
यत्र कूर्माग्रजं हस्ती सदा कर्षत्यवाङ्मुखः । तयोर्जन्मान्तरे वैरं संप्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥
yatra kūrmāgrajaṃ hastī sadā karṣatyavāṅmukhaḥ | tayorjanmāntare vairaṃ saṃpravakṣyāmyaśeṣataḥ
जहाँ एक हाथी सिर झुकाए सदा कछुआ बने अपने बड़े भाई को खींचता रहता है। उन दोनों के पूर्वजन्म के वैर की कथा मैं तुम्हें पूरी सुनाता हूँ।
श्लोक 16 (1.29.16)
तन्मे तत्त्वं निबोधस्व यत्प्रमाणौ च तावुभौ । शृणु त्वं वत्स भद्रं ते कथां वैराग्यवर्धिनीम् ॥
tanme tattvaṃ nibodhasva yatpramāṇau ca tāvubhau | śṛṇu tvaṃ vatsa bhadraṃ te kathāṃ vairāgyavardhinīm
उसका यथार्थ और यह भी कि वे दोनों कितने विशाल हैं, मुझसे जानो। वत्स, तुम्हारा कल्याण हो, वैराग्य बढ़ाने वाली यह कथा सुनो,
श्लोक 17 (1.29.17)
पित्रोरर्थविभागे वै समुत्पन्नां पुराण्डज । आसीद्विभावसुर्नाम महर्षिः कोपनो भृशम् ॥
pitrorarthavibhāge vai samutpannāṃ purāṇḍaja | āsīdvibhāvasurnāma maharṣiḥ kopano bhṛśam
जो बहुत पहले, हे अण्डज, माता-पिता के धन के बँटवारे को लेकर उत्पन्न हुई थी। विभावसु नाम के एक महर्षि थे, जो अत्यन्त क्रोधी थे।
श्लोक 18 (1.29.18)
भ्राता तस्यानुजश्चासीत्सुप्रतीको महातपाः । स नेच्छति धनं भ्रात्रा सहैकस्थं महामुनिः ॥
bhrātā tasyānujaścāsītsupratīko mahātapāḥ | sa necchati dhanaṃ bhrātrā sahaikasthaṃ mahāmuniḥ
उनका छोटा भाई सुप्रतीक था, जो महान तपस्वी था। वह महामुनि अपने भाई के साथ साझे में धन रखना नहीं चाहता था।
श्लोक 19 (1.29.19)
विभागं कीर्तयत्येव सुप्रतीको हि नित्यशः । अथाब्रवीच्च तं भ्राता सुप्रतीकं विभावसुः ॥
vibhāgaṃ kīrtayatyeva supratīko hi nityaśaḥ | athābravīcca taṃ bhrātā supratīkaṃ vibhāvasuḥ
सुप्रतीक प्रतिदिन बँटवारे की ही बात करता रहता था। तब उसके भाई विभावसु ने सुप्रतीक से कहा —
श्लोक 20 (1.29.20)
विभागे बहवो दोषा भविष्यन्ति महातपः । विभागं बहवो मोहात्कर्तुमिच्छन्ति नित्यशः । ततो विभक्तास्त्वन्योन्यं नाद्रियन्तेऽर्थमोहिताः ॥
vibhāge bahavo doṣā bhaviṣyanti mahātapaḥ | vibhāgaṃ bahavo mohātkartumicchanti nityaśaḥ | tato vibhaktāstvanyonyaṃ nādriyante'rthamohitāḥ
हे महातपस्वी, बँटवारे से बहुत-से दोष उत्पन्न होंगे। बहुत-से लोग मोहवश सदा बँटवारा करना चाहते हैं, और बँट जाने पर धन के मोह में पड़कर एक-दूसरे का आदर नहीं करते।
श्लोक 21 (1.29.21)
ततः स्वार्थपरान्मूढान्पृथग्भूतान्स्वकैर्धनैः । विदित्वा भेदयन्त्येतानमित्रा मित्ररूपिणः ॥
tataḥ svārthaparānmūḍhānpṛthagbhūtānsvakairdhanaiḥ | viditvā bhedayantyetānamitrā mitrarūpiṇaḥ
तब उन्हें स्वार्थी, मूढ़ और अपने-अपने धन के साथ अलग हुआ जानकर मित्र-रूपधारी शत्रु उनमें फूट डाल देते हैं।
श्लोक 22 (1.29.22)
विदित्वा चापरे भिन्नानन्तरेषु पतन्त्यथ । भिन्नानामतुलो नाशः क्षिप्रमेव प्रवर्तते ॥
viditvā cāpare bhinnānantareṣu patantyatha | bhinnānāmatulo nāśaḥ kṣiprameva pravartate
और दूसरे लोग उन्हें बँटा हुआ जानकर उनकी दुर्बलताओं पर टूट पड़ते हैं। बँटे हुओं का असीम विनाश बहुत शीघ्र आरम्भ हो जाता है।
श्लोक 23 (1.29.23)
तस्माद्विभागं भ्रातॄणां न प्रशंसन्ति साधवः । एवमुक्तः सुप्रतीको भागं कीर्तयतेऽनिशम् ॥
tasmādvibhāgaṃ bhrātṝṇāṃ na praśaṃsanti sādhavaḥ | evamuktaḥ supratīko bhāgaṃ kīrtayate'niśam
इसीलिए सज्जन भाइयों के बँटवारे की प्रशंसा नहीं करते। ऐसा कहे जाने पर भी सुप्रतीक निरन्तर अपने भाग की माँग करता रहा।
श्लोक 24 (1.29.24)
एवं निर्बध्यमानस्तु शशापैनं विभावसुः । गुरुशास्त्रेऽनिबद्धानामन्योन्येनाभिशङ्किनाम् ॥
evaṃ nirbadhyamānastu śaśāpainaṃ vibhāvasuḥ | guruśāstre'nibaddhānāmanyonyenābhiśaṅkinām
इस प्रकार बार-बार हठ किए जाने पर विभावसु ने उसे शाप दिया — "तुम उन लोगों में से हो जो गुरु और शास्त्र की मर्यादा में नहीं बँधते और एक-दूसरे पर संदेह करते हैं।
श्लोक 25 (1.29.25)
नियन्तुं न हि शक्यस्त्वं भेदतो धनमिच्छसि । यस्मात्तस्मात्सुप्रतीक हस्तित्वं समवाप्स्यसि ॥
niyantuṃ na hi śakyastvaṃ bhedato dhanamicchasi | yasmāttasmātsupratīka hastitvaṃ samavāpsyasi
तुम्हें रोका नहीं जा सकता; तुम बँटवारा करके धन चाहते हो। इसलिए, सुप्रतीक, तुम हाथी बनोगे।"
श्लोक 26 (1.29.26)
शप्तस्त्वेवं सुप्रतीको विभावसुमथाब्रवीत् । त्वमप्यन्तर्जलचरः कच्छपः संभविष्यसि ॥
śaptastvevaṃ supratīko vibhāvasumathābravīt | tvamapyantarjalacaraḥ kacchapaḥ saṃbhaviṣyasi
इस प्रकार शाप पाकर सुप्रतीक ने विभावसु से कहा — "तुम भी जल के भीतर विचरने वाले कछुए बनोगे।"
श्लोक 27 (1.29.27)
एवमन्योन्यशापात्तौ सुप्रतीकविभावसू । गजकच्छपतां प्राप्तावर्थार्थं मूढचेतसौ ॥
evamanyonyaśāpāttau supratīkavibhāvasū | gajakacchapatāṃ prāptāvarthārthaṃ mūḍhacetasau
इस प्रकार परस्पर शाप के कारण धन के लिए मोहित-चित्त सुप्रतीक और विभावसु हाथी और कछुआ बन गए।
श्लोक 28 (1.29.28)
रोषदोषानुषङ्गेण तिर्यग्योनिगतावपि । परस्परद्वेषरतौ प्रमाणबलदर्पितौ ॥
roṣadoṣānuṣaṅgeṇa tiryagyonigatāvapi | parasparadveṣaratau pramāṇabaladarpitau
क्रोध के दोष से बँधे होने के कारण पशु-योनि में जाकर भी वे एक-दूसरे से द्वेष में ही रमे रहते हैं और अपने आकार तथा बल पर गर्व करते हैं।
श्लोक 29 (1.29.29)
सरस्यस्मिन्महाकायौ पूर्ववैरानुसारिणौ । तयोरन्यतरः श्रीमान्समुपैति महागजः ॥
sarasyasminmahākāyau pūrvavairānusāriṇau | tayoranyataraḥ śrīmānsamupaiti mahāgajaḥ
इस सरोवर में वे दोनों विशालकाय जीव अपने पुराने वैर पर चलते हैं। उनमें से एक, वह शोभायमान महागज, यहाँ आता है,
श्लोक 30 (1.29.30)
यस्य बृंहितशब्देन कूर्मोऽप्यन्तर्जलेशयः । उत्थितोऽसौ महाकायः कृत्स्नं विक्षोभयन्सरः ॥
yasya bṛṃhitaśabdena kūrmo'pyantarjaleśayaḥ | utthito'sau mahākāyaḥ kṛtsnaṃ vikṣobhayansaraḥ
और उसकी चिंघाड़ सुनकर जल के भीतर पड़ा रहने वाला वह विशालकाय कछुआ भी सारे सरोवर को मथता हुआ ऊपर उठ आता है।
श्लोक 31 (1.29.31)
तं दृष्ट्वाऽऽवेष्टितकरः पतत्येष गजो जलम् । दन्तहस्ताग्रलाङ्गूलपादवेगेन वीर्यवान् ॥
taṃ dṛṣṭvā''veṣṭitakaraḥ patatyeṣa gajo jalam | dantahastāgralāṅgūlapādavegena vīryavān
उसे देखकर वह पराक्रमी हाथी सूँड़ लपेटकर अपने दाँतों, सूँड़ के अग्रभाग, पूँछ और पैरों के वेग से जल में कूद पड़ता है,
श्लोक 32 (1.29.32)
विक्षोभयंस्ततो नागः सरो बहुझषाकुलम् । कूर्मोऽप्यभ्युद्यतशिरा युद्धायाभ्येति वीर्यवान् ॥
vikṣobhayaṃstato nāgaḥ saro bahujhaṣākulam | kūrmo'pyabhyudyataśirā yuddhāyābhyeti vīryavān
और वह हाथी मछलियों से भरे सरोवर को मथ डालता है; उधर पराक्रमी कछुआ भी सिर उठाकर युद्ध के लिए आगे बढ़ता है।
श्लोक 33 (1.29.33)
षडुच्छ्रितो योजनानि गजस्तद्द्विगुणायतः । कूर्मस्त्रियोजनोत्सेधो दशयोजनमण्डलः ॥
ṣaḍucchrito yojanāni gajastaddviguṇāyataḥ | kūrmastriyojanotsedho daśayojanamaṇḍalaḥ
हाथी छह योजन ऊँचा और उससे दुगुना लम्बा है; कछुआ तीन योजन ऊँचा है और उसका घेरा दस योजन का है।
श्लोक 34 (1.29.34)
तावुभौ युद्धसंमत्तौ परस्परवधैषिणौ । उपयुज्याशु कर्मेदं साधयेहितमात्मनः ॥
tāvubhau yuddhasaṃmattau parasparavadhaiṣiṇau | upayujyāśu karmedaṃ sādhayehitamātmanaḥ
वे दोनों युद्ध के उन्माद में हैं और एक-दूसरे का वध चाहते हैं। उन्हें शीघ्र खाकर अपना यह अभीष्ट कार्य सिद्ध करो।
श्लोक 35 (1.29.35)
महाभ्रघनसंकाशं तं भुक्त्वामृतमानय । महागिरिसमप्रख्यं घोररूपं च हस्तिनम् ॥
mahābhraghanasaṃkāśaṃ taṃ bhuktvāmṛtamānaya | mahāgirisamaprakhyaṃ ghorarūpaṃ ca hastinam
घने महामेघ के समान दिखने वाले उस (कछुए) को और महान पर्वत के समान भयानक रूप वाले हाथी को खाकर अमृत ले आओ।
सौतिरुवाच
श्लोक 36 (1.29.36)
इत्युक्त्वा गरुडं सोऽथ माङ्गल्यमकरोत्तदा । युध्यतः सह देवैस्ते युद्धे भवतु मङ्गलम् ॥
ityuktvā garuḍaṃ so'tha māṅgalyamakarottadā | yudhyataḥ saha devaiste yuddhe bhavatu maṅgalam
गरुड से ऐसा कहकर कश्यप ने तब मंगल-वचन कहे — "देवताओं के साथ युद्ध करते समय रण में तुम्हारा मंगल हो।
श्लोक 37 (1.29.37)
पूर्णकुम्भो द्विजा गावो यच्चान्यत्किंचिदुत्तमम् । शुभं स्वस्त्ययनं चापि भविष्यति तवाण्डज ॥
pūrṇakumbho dvijā gāvo yaccānyatkiṃciduttamam | śubhaṃ svastyayanaṃ cāpi bhaviṣyati tavāṇḍaja
हे अण्डज, जल से भरा कलश, ब्राह्मण, गौएँ और जो कुछ भी उत्तम है, तथा शुभ स्वस्तिवाचन — ये सब तुम्हारे लिए मंगलकारी होंगे।
श्लोक 38 (1.29.38)
युध्यमानस्य सङ्ग्रामे देवैः सार्धं महाबल । ऋचो यजूंषि सामानि पवित्राणि हवींषि च ॥
yudhyamānasya saṅgrāme devaiḥ sārdhaṃ mahābala | ṛco yajūṃṣi sāmāni pavitrāṇi havīṃṣi ca
हे महाबली, जब तुम संग्राम में देवताओं से लड़ोगे, तब ऋचाएँ, यजुष् और साम, पवित्र मन्त्र और हवि,
श्लोक 39 (1.29.39)
रहस्यानि च सर्वाणि सर्वे वेदाश्च ते बलम् । वर्धयिष्यन्ति समरे भविष्यति खगोत्तम । इत्युक्तो गरुडः पित्रा गतस्तं ह्रदमन्तिकात् ॥
rahasyāni ca sarvāṇi sarve vedāśca te balam | vardhayiṣyanti samare bhaviṣyati khagottama | ityukto garuḍaḥ pitrā gatastaṃ hradamantikāt
सारे रहस्य-ज्ञान और सारे वेद तुम्हारा बल होंगे; हे खगश्रेष्ठ, वे रण में उसे बढ़ाएँगे।" पिता के ऐसा कहने पर गरुड उस सरोवर के पास गया।
श्लोक 40 (1.29.40)
अपश्यन्निर्मलजलं नानापक्षिसमाकुलम् । स तत्स्मृत्वा पितुर्वाक्यं भीमवेगोऽन्तरिक्षगः ॥
apaśyannirmalajalaṃ nānāpakṣisamākulam | sa tatsmṛtvā piturvākyaṃ bhīmavego'ntarikṣagaḥ
उसने उसका निर्मल जल देखा, जो अनेक प्रकार के पक्षियों से भरा था। पिता के वचन को स्मरण करके भयानक वेग वाले उस आकाशचारी ने
श्लोक 41 (1.29.41)
नखेन गजमेकेन कूर्ममेकेन चाक्षिपत् । समुत्पपात चाकाशं तत उच्चैर्विहङ्गमः ॥
nakhena gajamekena kūrmamekena cākṣipat | samutpapāta cākāśaṃ tata uccairvihaṅgamaḥ
एक पंजे से हाथी को और दूसरे से कछुए को उठा लिया, और फिर वह पक्षी ऊँचे आकाश में उड़ गया।
श्लोक 42 (1.29.42)
सोऽलम्बं तीर्थमासाद्य देववृक्षानुपागमत् । ते भीताः समकम्पन्त तस्य पक्षानिलाहताः ॥
so'lambaṃ tīrthamāsādya devavṛkṣānupāgamat | te bhītāḥ samakampanta tasya pakṣānilāhatāḥ
अलम्ब नामक तीर्थ पर पहुँचकर वह देववृक्षों के पास आया। उसके पंखों की हवा के थपेड़ों से वे भयभीत होकर काँपने लगे,
श्लोक 43 (1.29.43)
न नो भञ्ज्यादिति तदा दिव्याः कनकशाखिनः । प्रचलाङ्गान्स तान्दृष्ट्वा मनोरथफलद्रुमान् ॥
na no bhañjyāditi tadā divyāḥ kanakaśākhinaḥ | pracalāṅgānsa tāndṛṣṭvā manorathaphaladrumān
स्वर्ण-शाखाओं वाले वे दिव्य वृक्ष यह सोचकर कि कहीं यह हमें तोड़ न दे। मनोरथ का फल देने वाले उन वृक्षों को सब अंगों से काँपते देखकर
श्लोक 44 (1.29.44)
अन्यानतुलरूपाङ्गानुपचक्राम खेचरः । काञ्चनै राजतैश्चैव फलैर्वैदूर्यशाखिनः । सागराम्बुपरिक्षिप्तान्भ्राजमानान्महाद्रुमान् ॥
anyānatularūpāṅgānupacakrāma khecaraḥ | kāñcanai rājataiścaiva phalairvaidūryaśākhinaḥ | sāgarāmbuparikṣiptānbhrājamānānmahādrumān
वह आकाशचारी अनुपम रूप वाले दूसरे महावृक्षों के पास गया, जिनके फल सोने और चाँदी के थे, शाखाएँ वैदूर्य मणि की थीं, और जो समुद्र के जल से घिरे हुए चमक रहे थे।
श्लोक 45 (1.29.45)
तेषां मध्ये महानासीत्पादपः सुमनोहरः । सहस्रयोजनोत्सेधो बहुशाखासमन्वितः ॥
teṣāṃ madhye mahānāsītpādapaḥ sumanoharaḥ | sahasrayojanotsedho bahuśākhāsamanvitaḥ
उनके बीच एक अत्यन्त मनोहर विशाल वृक्ष था, जो हज़ार योजन ऊँचा और अनेक शाखाओं से युक्त था,
श्लोक 46 (1.29.46)
खगानामालयो दिव्यो नाम्ना रौहिणपादपः । यस्य छायां समाश्रित्य सद्यो भवति निर्वृतः ॥
khagānāmālayo divyo nāmnā rauhiṇapādapaḥ | yasya chāyāṃ samāśritya sadyo bhavati nirvṛtaḥ
वह पक्षियों का दिव्य आश्रय था और रौहिण वृक्ष कहलाता था; जो उसकी छाया का आश्रय लेता है, वह तुरन्त सुखी हो जाता है।
श्लोक 47 (1.29.47)
तमुवाच खगश्रेष्ठं तत्र रौहिणपादपः । अतिप्रवृद्धः सुमहानापतन्तं मनोजवम् ॥
tamuvāca khagaśreṣṭhaṃ tatra rauhiṇapādapaḥ | atipravṛddhaḥ sumahānāpatantaṃ manojavam
वहाँ अत्यन्त बढ़े हुए, विशाल रौहिण वृक्ष ने मन के वेग से उड़कर आते हुए उस पक्षिश्रेष्ठ से कहा —
रौहिण उवाच
श्लोक 48 (1.29.48)
यैषा मम महाशाखा शतयोजनमायता । एतामास्थाय शाखां त्वं खादेमौ गजकच्छपौ ॥
yaiṣā mama mahāśākhā śatayojanamāyatā | etāmāsthāya śākhāṃ tvaṃ khādemau gajakacchapau
मेरी यह विशाल शाखा सौ योजन लम्बी है। इसी शाखा पर बैठकर तुम इन हाथी और कछुए को खाओ।
सौतिरुवाच
श्लोक 49 (1.29.49)
ततो द्रुमं पतगसहस्रसेवितं । महीधरप्रतिमवपुः प्रकम्पयन् । खगोत्तमो द्रुतमभिपत्य वेगवा- । न्बभञ्ज तामविरलपत्रसंचयाम् ॥
tato drumaṃ patagasahasrasevitaṃ | mahīdharapratimavapuḥ prakampayan | khagottamo drutamabhipatya vegavā- | nbabhañja tāmaviralapatrasaṃcayām
तब पर्वत के समान शरीर वाले उस वेगवान पक्षिश्रेष्ठ ने हज़ारों पक्षियों के बसेरे उस वृक्ष को हिलाते हुए तेज़ी से उस पर झपटकर घने पत्तों से लदी वह शाखा तोड़ डाली।