आदि पर्व · अध्याय 30
गरुड द्वारा वालखिल्यों की रक्षा
महाशाखा गरुड के बोझ से टूट जाती है, और उस पर नीचे मुँह किए लटकते नन्हे वालखिल्य ऋषियों को देखकर वे उन्हें बचाने के लिए शाखा को चोंच में थाम लेते हैं, जबकि हाथी और कछुआ अब भी उनके पंजों में हैं; विस्मित ऋषि भारी भार उठाने के कारण उनका नाम गरुड रखते हैं। गन्धमादन पर्वत पर पिता कश्यप वालखिल्यों को प्रसन्न करके अनुमति ले लेते हैं, और ऋषि हिमालय चले जाते हैं; गरुड शाखा को एक निर्जन पर्वत पर गिराकर दोनों जीवों को खा जाते हैं। तब देवताओं में भयानक उत्पात होने लगते हैं। बृहस्पति इन्द्र को बताते हैं कि कश्यप का पुत्र सोम हरने आ रहा है, और देवता कवच तथा आयुध धारण करके अमृत को घेरकर उसकी रक्षा में डट जाते हैं।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.30.1)
स्पृष्टमात्रा तु पद्भ्यां सा गरुडेन बलीयसा । अभज्यत तरोः शाखा भग्नां चैकामधारयत् ॥
spṛṣṭamātrā tu padbhyāṃ sā garuḍena balīyasā | abhajyata taroḥ śākhā bhagnāṃ caikāmadhārayat
बलवान गरुड के पैरों का स्पर्श होते ही वृक्ष की वह शाखा टूट गई, और उसने उस एक टूटी शाखा को थाम लिया।
श्लोक 2 (1.30.2)
तां भङ्क्त्वा स महाशाखां स्मयमानो विलोकयन् । अथात्र लम्बतोऽपश्यद्वालखिल्यानधोमुखान् ॥
tāṃ bhaṅktvā sa mahāśākhāṃ smayamāno vilokayan | athātra lambato'paśyadvālakhilyānadhomukhān
उस महाशाखा को तोड़कर उसने मुस्कुराते हुए उसे देखा, और तब उस पर नीचे मुँह किए लटकते वालखिल्यों को देखा।
श्लोक 3 (1.30.3)
ऋषयो ह्यत्र लम्बन्ते न हन्यामिति तानृषीन् । तपोरतांल्लम्बमानान्ब्रह्मर्षीनभिवीक्ष्य सः ॥
ṛṣayo hyatra lambante na hanyāmiti tānṛṣīn | taporatāṃllambamānānbrahmarṣīnabhivīkṣya saḥ
"यहाँ ऋषि लटक रहे हैं, मैं इन्हें मार न डालूँ" — तपस्या में रत, वहाँ लटकते उन ब्रह्मर्षियों को देखकर उसने सोचा।
श्लोक 4 (1.30.4)
हन्यादेतान्संपतन्ती शाखेत्यथ विचिन्त्य सः । नखैर्दृढतरं वीरः संगृह्य गजकच्छपौ ॥
hanyādetānsaṃpatantī śākhetyatha vicintya saḥ | nakhairdṛḍhataraṃ vīraḥ saṃgṛhya gajakacchapau
"गिरती हुई शाखा इन्हें मार डालेगी" — यह विचार करके उस वीर ने हाथी और कछुए को पंजों में और भी दृढ़ता से पकड़ लिया,
श्लोक 5 (1.30.5)
स तद्विनाशसंत्रासादभिपत्य खगाधिपः । शाखामास्येन जग्राह तेषामेवान्ववेक्षया ॥
sa tadvināśasaṃtrāsādabhipatya khagādhipaḥ | śākhāmāsyena jagrāha teṣāmevānvavekṣayā
और उनके नाश के भय से पक्षिराज ने झपटकर, केवल उन्हीं का ध्यान रखते हुए, उस शाखा को अपनी चोंच में पकड़ लिया।
श्लोक 6 (1.30.6)
अतिदैवं तु तत्तस्य कर्म दृष्ट्वा महर्षयः । विस्मयोत्कम्पहृदया नाम चक्रुर्महाखगे ॥
atidaivaṃ tu tattasya karma dṛṣṭvā maharṣayaḥ | vismayotkampahṛdayā nāma cakrurmahākhage
उसका वह कर्म, जो देवताओं के लिए भी असम्भव था, देखकर महर्षियों के हृदय विस्मय से काँप उठे और उन्होंने उस महान पक्षी का नाम रखा —
श्लोक 7 (1.30.7)
गुरुं भारं समासाद्योड्डीन एष विहङ्गमः । गरुडस्तु खगश्रेष्ठस्तस्मात्पन्नगभोजनः ॥
guruṃ bhāraṃ samāsādyoḍḍīna eṣa vihaṅgamaḥ | garuḍastu khagaśreṣṭhastasmātpannagabhojanaḥ
"क्योंकि यह पक्षी भारी (गुरु) भार लेकर उड़ा है, इसलिए यह सर्पभक्षी पक्षिश्रेष्ठ गरुड कहलाएगा।"
श्लोक 8 (1.30.8)
ततः शनैः पर्यपतत्पक्षैः शैलान्प्रकम्पयन् । एवं सोऽभ्यपतद्देशान्बहून्सगजकच्छपः ॥
tataḥ śanaiḥ paryapatatpakṣaiḥ śailānprakampayan | evaṃ so'bhyapataddeśānbahūnsagajakacchapaḥ
फिर वह अपने पंखों से पर्वतों को कँपाता हुआ धीरे-धीरे उड़ता चला। इस प्रकार हाथी और कछुए को लिए वह अनेक देशों के ऊपर उड़ता रहा,
श्लोक 9 (1.30.9)
दयार्थं वालखिल्यानां न च स्थानमविन्दत । स गत्वा पर्वतश्रेष्ठं गन्धमादनमञ्जसा ॥
dayārthaṃ vālakhilyānāṃ na ca sthānamavindata | sa gatvā parvataśreṣṭhaṃ gandhamādanamañjasā
और वालखिल्यों पर दया के कारण उसे उतरने का कोई स्थान नहीं मिला। तब वह सीधे पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादन पर गया,
श्लोक 10 (1.30.10)
ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम् । ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहङ्गमम् ॥
dadarśa kaśyapaṃ tatra pitaraṃ tapasi sthitam | dadarśa taṃ pitā cāpi divyarūpaṃ vihaṅgamam
और वहाँ उसने तपस्या में लगे अपने पिता कश्यप को देखा। पिता ने भी उस दिव्य रूप वाले पक्षी को देखा,
श्लोक 11 (1.30.11)
तेजोवीर्यबलोपेतं मनोमारुतरंहसम् । शैलशृङ्गप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥
tejovīryabalopetaṃ manomārutaraṃhasam | śailaśṛṅgapratīkāśaṃ brahmadaṇḍamivodyatam
जो तेज, पराक्रम और बल से युक्त था, मन और वायु के समान वेगवान था, पर्वत-शिखर जैसा था और उठे हुए ब्रह्मदण्ड के समान था,
श्लोक 12 (1.30.12)
अचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम् । महावीर्यधरं रौद्रं साक्षादग्निमिवोद्यतम् ॥
acintyamanabhidhyeyaṃ sarvabhūtabhayaṃkaram | mahāvīryadharaṃ raudraṃ sākṣādagnimivodyatam
अचिन्त्य, कल्पना से भी परे, सब प्राणियों को भयभीत करने वाला, महान पराक्रम धारण करने वाला, रौद्र, मानो साक्षात् धधकती अग्नि हो,
श्लोक 13 (1.30.13)
अप्रधृष्यमजेयं च देवदानवराक्षसैः । भेत्तारं गिरिशृङ्गाणां समुद्रजलशोषणम् ॥
apradhṛṣyamajeyaṃ ca devadānavarākṣasaiḥ | bhettāraṃ giriśṛṅgāṇāṃ samudrajalaśoṣaṇam
देवता, दानव और राक्षसों के लिए भी अधृष्य और अजेय, पर्वत-शिखरों को तोड़ने वाला, समुद्र के जल को सुखा देने वाला,
श्लोक 14 (1.30.14)
लोकसंलोडनं घोरं कृतान्तसमदर्शनम् । तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान्कश्यपस्तदा । विदित्वा चास्य संकल्पमिदं वचनमब्रवीत् ॥
lokasaṃloḍanaṃ ghoraṃ kṛtāntasamadarśanam | tamāgatamabhiprekṣya bhagavānkaśyapastadā | viditvā cāsya saṃkalpamidaṃ vacanamabravīt
लोकों को मथ डालने वाला, भयंकर, यमराज के समान दिखने वाला। उसे आया देखकर और उसका संकल्प जानकर भगवान कश्यप ने तब यह वचन कहा —
कश्यप उवाच
श्लोक 15 (1.30.15)
पुत्र मा साहसं कार्षीर्मा सद्यो लप्स्यसे व्यथाम् । मा त्वां दहेयुः संक्रुद्धा वालखिल्या मरीचिपाः ॥
putra mā sāhasaṃ kārṣīrmā sadyo lapsyase vyathām | mā tvāṃ daheyuḥ saṃkruddhā vālakhilyā marīcipāḥ
पुत्र, कोई दुस्साहस न करो, नहीं तो तुरन्त कष्ट पाओगे। कहीं सूर्य-किरणों का पान करने वाले वालखिल्य क्रुद्ध होकर तुम्हें भस्म न कर दें।
सौतिरुवाच
श्लोक 16 (1.30.16)
ततः प्रसादयामास कश्यपः पुत्रकारणात् । वालखिल्यान्महाभागांस्तपसा हतकल्मषान् ॥
tataḥ prasādayāmāsa kaśyapaḥ putrakāraṇāt | vālakhilyānmahābhāgāṃstapasā hatakalmaṣān
तब पुत्र के लिए कश्यप ने तपस्या से निष्पाप हुए उन महाभाग वालखिल्यों को प्रसन्न किया —
कश्यप उवाच
श्लोक 17 (1.30.17)
प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधनाः । चिकीर्षति महत्कर्म तदनुज्ञातुमर्हथ ॥
prajāhitārthamārambho garuḍasya tapodhanāḥ | cikīrṣati mahatkarma tadanujñātumarhatha
हे तपोधनो, गरुड का यह उद्योग प्रजा के हित के लिए है। वह एक महान कार्य करना चाहता है; आप उसे अनुमति दें।
सौतिरुवाच
श्लोक 18 (1.30.18)
एवमुक्ता भगवता मुनयस्ते समभ्ययुः । मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोऽर्थिनः ॥
evamuktā bhagavatā munayaste samabhyayuḥ | muktvā śākhāṃ giriṃ puṇyaṃ himavantaṃ tapo'rthinaḥ
भगवान कश्यप के ऐसा कहने पर वे मुनि शाखा छोड़कर तप की इच्छा से पवित्र हिमालय पर्वत पर चले गए।
श्लोक 19 (1.30.19)
ततस्तेष्वपयातेषु पितरं विनतासुतः । शाखाव्याक्षिप्तवदनः पर्यपृच्छत कश्यपम् ॥
tatasteṣvapayāteṣu pitaraṃ vinatāsutaḥ | śākhāvyākṣiptavadanaḥ paryapṛcchata kaśyapam
उनके चले जाने पर, शाखा मुँह में होने से कठिनाई से बोलते हुए विनता-पुत्र ने अपने पिता कश्यप से पूछा —
गरुड उवाच
श्लोक 20 (1.30.20)
भगवन्क्व विमुञ्चामि तरोः शाखामिमामहम् । वर्जितं मानुषैर्देशमाख्यातु भगवान्मम ॥
bhagavankva vimuñcāmi taroḥ śākhāmimāmaham | varjitaṃ mānuṣairdeśamākhyātu bhagavānmama
भगवन्, वृक्ष की इस शाखा को मैं कहाँ छोड़ूँ? भगवन्, मुझे मनुष्यों से रहित कोई स्थान बताइए।
सौतिरुवाच
श्लोक 21 (1.30.21)
ततो निःपुरुषं शैलं हिमसंरुद्धकन्दरम् । अगम्यं मनसाप्यन्यैस्तस्याचख्यौ स कश्यपः ॥
tato niḥpuruṣaṃ śailaṃ himasaṃruddhakandaram | agamyaṃ manasāpyanyaistasyācakhyau sa kaśyapaḥ
तब कश्यप ने उसे एक मनुष्य-रहित पर्वत बताया, जिसकी कन्दराएँ हिम से ढकी थीं और जहाँ दूसरे मन से भी नहीं पहुँच सकते थे।
श्लोक 22 (1.30.22)
तं पर्वतं महाकुक्षिमुद्दिश्य स महाखगः । जवेनाभ्यपतत्तार्क्ष्यः सशाखागजकच्छपः ॥
taṃ parvataṃ mahākukṣimuddiśya sa mahākhagaḥ | javenābhyapatattārkṣyaḥ saśākhāgajakacchapaḥ
विशाल कुक्षि वाले उस पर्वत को लक्ष्य करके महापक्षी तार्क्ष्य शाखा, हाथी और कछुए को लिए वेग से उड़ चला।
श्लोक 23 (1.30.23)
न तां वध्री परिणहेच्छतचर्मा महातनुम् । शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्य ययौ खगः ॥
na tāṃ vadhrī pariṇahecchatacarmā mahātanum | śākhino mahatīṃ śākhāṃ yāṃ pragṛhya yayau khagaḥ
जिस विशाल शाखा को लेकर वह पक्षी गया, उस विराट् शाखा को सौ चमड़ों से बनी रस्सी भी लपेटकर बाँध नहीं सकती थी।
श्लोक 24 (1.30.24)
स ततः शतसाहस्रं योजनान्तरमागतः । कालेन नातिमहता गरुडः पतगेश्वरः ॥
sa tataḥ śatasāhasraṃ yojanāntaramāgataḥ | kālena nātimahatā garuḍaḥ patageśvaraḥ
तब पक्षियों के स्वामी गरुड ने थोड़े ही समय में एक लाख योजन की दूरी पार कर ली।
श्लोक 25 (1.30.25)
स तं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनात्पितुः । अमुञ्चन्महतीं शाखां सस्वनं तत्र खेचरः ॥
sa taṃ gatvā kṣaṇenaiva parvataṃ vacanātpituḥ | amuñcanmahatīṃ śākhāṃ sasvanaṃ tatra khecaraḥ
पिता के कहे अनुसार क्षण भर में उस पर्वत पर पहुँचकर उस आकाशचारी ने वह विशाल शाखा भारी शब्द के साथ वहाँ गिरा दी।
श्लोक 26 (1.30.26)
पक्षानिलहतश्चास्य प्राकम्पत स शैलराट् । मुमोच पुष्पवर्षं च समागलितपादपः ॥
pakṣānilahataścāsya prākampata sa śailarāṭ | mumoca puṣpavarṣaṃ ca samāgalitapādapaḥ
उसके पंखों की हवा से आहत होकर वह पर्वतराज काँप उठा, और उसके डगमगाते वृक्षों से फूलों की वर्षा होने लगी।
श्लोक 27 (1.30.27)
शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्य समन्ततः । मणिकाञ्चनचित्राणि शोभयन्ति महागिरिम् ॥
śṛṅgāṇi ca vyaśīryanta girestasya samantataḥ | maṇikāñcanacitrāṇi śobhayanti mahāgirim
उस पर्वत के मणि और सुवर्ण से चित्रित शिखर, जो उस महागिरि की शोभा थे, चारों ओर से टूटकर बिखर गए।
श्लोक 28 (1.30.28)
शाखिनो बहवश्चापि शाखयाऽभिहतास्तया । काञ्चनैः कुसुमैर्भान्ति विद्युत्वन्त इवाम्बुदाः ॥
śākhino bahavaścāpi śākhayā'bhihatāstayā | kāñcanaiḥ kusumairbhānti vidyutvanta ivāmbudāḥ
उस शाखा की चोट खाए बहुत-से वृक्ष भी अपने सुनहरे फूलों से बिजली से युक्त बादलों के समान चमकने लगे।
श्लोक 29 (1.30.29)
ते हेमविकचा भूमौ युताः पर्वतधातुभिः । व्यराजञ्छाखिनस्तत्र सूर्यांशुप्रतिरञ्जिताः ॥
te hemavikacā bhūmau yutāḥ parvatadhātubhiḥ | vyarājañchākhinastatra sūryāṃśupratirañjitāḥ
सोने जैसे दमकते फूलों वाले वे वृक्ष भूमि पर गिरकर पर्वत की धातुओं से मिल गए और सूर्य की किरणों से रँगे हुए वहाँ शोभा पाने लगे।
श्लोक 30 (1.30.30)
ततस्तस्य गिरेः शृङ्गमास्थाय स खगोत्तमः । भक्षयामास गरुडस्तावुभौ गजकच्छपौ ॥
tatastasya gireḥ śṛṅgamāsthāya sa khagottamaḥ | bhakṣayāmāsa garuḍastāvubhau gajakacchapau
फिर उस पर्वत के एक शिखर पर बैठकर पक्षिश्रेष्ठ गरुड ने हाथी और कछुए, दोनों को खा लिया।
श्लोक 31 (1.30.31)
तावुभौ भक्षयित्वा तु स तार्क्ष्यः कूर्मकुञ्जरौ । ततः पर्वतकूटाग्रादुत्पपात महाजवः ॥
tāvubhau bhakṣayitvā tu sa tārkṣyaḥ kūrmakuñjarau | tataḥ parvatakūṭāgrādutpapāta mahājavaḥ
कछुए और हाथी दोनों को खाकर प्रचण्ड वेग वाला तार्क्ष्य उस पर्वत-शिखर से ऊपर उड़ गया।
श्लोक 32 (1.30.32)
प्रावर्तन्ताथ देवानामुत्पाता भयशंसिनः । इन्द्रस्य वज्रं दयितं प्रजज्वाल भयात्ततः ॥
prāvartantātha devānāmutpātā bhayaśaṃsinaḥ | indrasya vajraṃ dayitaṃ prajajvāla bhayāttataḥ
तब देवताओं के बीच भय की सूचना देने वाले उत्पात होने लगे। इन्द्र का प्रिय वज्र भय से प्रज्वलित हो उठा।
श्लोक 33 (1.30.33)
सधूमा न्यपतत्सार्चिर्दिवोल्का नभसश्च्युता । तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वशः ॥
sadhūmā nyapatatsārcirdivolkā nabhasaścyutā | tathā vasūnāṃ rudrāṇāmādityānāṃ ca sarvaśaḥ
दिन में ही आकाश से धुएँ और ज्वाला सहित एक उल्का गिरी। और वसुओं, रुद्रों और आदित्यों के सब,
श्लोक 34 (1.30.34)
साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणाः । स्वं स्वं प्रहरणं तेषां परस्परमुपाद्रवत् ॥
sādhyānāṃ marutāṃ caiva ye cānye devatāgaṇāḥ | svaṃ svaṃ praharaṇaṃ teṣāṃ parasparamupādravat
साध्यों, मरुतों तथा अन्य जो भी देवगण थे, उन सबके अपने-अपने आयुध एक-दूसरे पर टूट पड़े।
श्लोक 35 (1.30.35)
अभूतपूर्वं संग्रामे तदा देवासुरेऽपि च । ववुर्वाताः सनिर्घाताः पेतुरुल्काः सहस्रशः ॥
abhūtapūrvaṃ saṃgrāme tadā devāsure'pi ca | vavurvātāḥ sanirghātāḥ peturulkāḥ sahasraśaḥ
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, देवासुर-संग्राम में भी नहीं। कड़कड़ाहट के साथ आँधियाँ चलने लगीं और हज़ारों उल्काएँ गिरने लगीं।
श्लोक 36 (1.30.36)
निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम् । देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम् ॥
nirabhrameva cākāśaṃ prajagarja mahāsvanam | devānāmapi yo devaḥ so'pyavarṣata śoṇitam
बादल-रहित आकाश भारी गर्जना करने लगा, और देवताओं के भी देव, वर्षा के स्वामी ने रक्त बरसाया।
श्लोक 37 (1.30.37)
मम्लुर्माल्यानि देवानां नेशुस्तेजांसि चैव हि । उत्पातमेघा रौद्राश्च ववृषुः शोणितं बहु ॥
mamlurmālyāni devānāṃ neśustejāṃsi caiva hi | utpātameghā raudrāśca vavṛṣuḥ śoṇitaṃ bahu
देवताओं की मालाएँ मुरझा गईं और उनका तेज क्षीण हो गया; भयानक उत्पात-मेघ बहुत-सा रक्त बरसाने लगे।
श्लोक 38 (1.30.38)
रजांसि मुकुटान्येषामुत्थितानि व्यधर्षयन् । ततस्त्राससमुद्विग्नः सह देवैः शतक्रतुः । उत्पातान्दारुणान्पश्यन्नित्युवाच बृहस्पतिम् ॥
rajāṃsi mukuṭānyeṣāmutthitāni vyadharṣayan | tatastrāsasamudvignaḥ saha devaiḥ śatakratuḥ | utpātāndāruṇānpaśyannityuvāca bṛhaspatim
धूल उठकर उनके मुकुटों को मलिन करने लगी। तब भय से व्याकुल शतक्रतु इन्द्र ने देवताओं के साथ उन भयानक उत्पातों को देखकर बृहस्पति से यह कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 39 (1.30.39)
किमर्थं भगवन्घोरा उत्पाताः सहसोत्थिताः । न च शत्रुं प्रपश्यामि युधि यो नः प्रधर्षयेत् ॥
kimarthaṃ bhagavanghorā utpātāḥ sahasotthitāḥ | na ca śatruṃ prapaśyāmi yudhi yo naḥ pradharṣayet
भगवन्, ये भयानक उत्पात अचानक क्यों उठ खड़े हुए हैं? मुझे युद्ध में ऐसा कोई शत्रु नहीं दिखता जो हमें दबा सके।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 40 (1.30.40)
तवापराधाद्देवेन्द्र प्रमादाच्च शतक्रतो । तपसा वालखिल्यानां महर्षीणां महात्मनाम् ॥
tavāparādhāddevendra pramādācca śatakrato | tapasā vālakhilyānāṃ maharṣīṇāṃ mahātmanām
हे देवराज शतक्रतु, तुम्हारे अपराध और प्रमाद से, तथा महात्मा महर्षि वालखिल्यों की तपस्या से,
श्लोक 41 (1.30.41)
कश्यपस्य मुनेः पुत्रो विनतायाश्च खेचरः । हर्तुं सोममभिप्राप्तो बलवान्कामरूपधृक् ॥
kaśyapasya muneḥ putro vinatāyāśca khecaraḥ | hartuṃ somamabhiprāpto balavānkāmarūpadhṛk
मुनि कश्यप और विनता का आकाशचारी पुत्र, जो बलवान है और इच्छानुसार रूप धारण कर सकता है, सोम हरने आ पहुँचा है।
श्लोक 42 (1.30.42)
समर्थो बलिनां श्रेष्ठो हर्तुं सोमं विहंगमः । सर्वं संभावयाम्यस्मिन्नसाध्यमपि साधयेत् ॥
samartho balināṃ śreṣṭho hartuṃ somaṃ vihaṃgamaḥ | sarvaṃ saṃbhāvayāmyasminnasādhyamapi sādhayet
बलवानों में श्रेष्ठ वह पक्षी सोम हरने में समर्थ है। मैं उसमें सब कुछ सम्भव मानता हूँ; वह असाध्य को भी साध सकता है।
सौतिरुवाच
श्लोक 43 (1.30.43)
श्रुत्वैतद्वचनं शक्रः प्रोवाचामृतरक्षिणः । महावीर्यबलः पक्षी हर्तुं सोममिहोद्यतः ॥
śrutvaitadvacanaṃ śakraḥ provācāmṛtarakṣiṇaḥ | mahāvīryabalaḥ pakṣī hartuṃ somamihodyataḥ
यह वचन सुनकर इन्द्र ने अमृत के रक्षकों से कहा — "महान पराक्रम और बल वाला एक पक्षी यहाँ से सोम हरने को उद्यत है।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 44 (1.30.44)
युष्मान्संबोधयाम्येष गृहीत्वावरणायुधान् । परिवार्यामृतं सर्वे यूयं मद्वचनादिह ॥
yuṣmānsaṃbodhayāmyeṣa gṛhītvāvaraṇāyudhān | parivāryāmṛtaṃ sarve yūyaṃ madvacanādiha
मैं तुम्हें सावधान कर रहा हूँ। कवच और आयुध धारण करो, और तुम सब मेरी आज्ञा से यहाँ अमृत को चारों ओर से घेर लो
श्लोक 45 (1.30.45)
रक्षध्वं विबुधा वीरा यथा न स हरेद्बलात् । अतुलं हि बलं तस्य बृहस्पतिरुवाच ह ॥
rakṣadhvaṃ vibudhā vīrā yathā na sa haredbalāt | atulaṃ hi balaṃ tasya bṛhaspatiruvāca ha
और हे वीर देवताओ, उसकी ऐसी रक्षा करो कि वह उसे बलपूर्वक न ले जा सके; क्योंकि उसका बल अतुलनीय है — ऐसा बृहस्पति ने कहा है।
सौतिरुवाच
श्लोक 46 (1.30.46)
तच्छ्रुत्वा विबुधा वाक्यं विस्मिता यत्नमास्थिताः । परिवार्यामृतं तस्थुर्वज्री चेन्द्रः प्रतापवान् ॥
tacchrutvā vibudhā vākyaṃ vismitā yatnamāsthitāḥ | parivāryāmṛtaṃ tasthurvajrī cendraḥ pratāpavān
यह वचन सुनकर देवता विस्मित हुए और यत्नपूर्वक तैयार होकर अमृत को घेरकर खड़े हो गए; प्रतापी वज्रधारी इन्द्र भी वहाँ डट गए।
श्लोक 47 (1.30.47)
धारयन्तो विचित्राणि काञ्चनानि मनस्विनः । कवचानि महार्हाणि वैदूर्यविकृतानि च ॥
dhārayanto vicitrāṇi kāñcanāni manasvinaḥ | kavacāni mahārhāṇi vaidūryavikṛtāni ca
उन मनस्वी देवताओं ने सुवर्ण के बने, वैदूर्य मणियों से जड़े विचित्र और बहुमूल्य कवच धारण किए,
श्लोक 48 (1.30.48)
चर्माण्यपि च गात्रेषु भानुमन्ति दृढानि च । विविधानि च शस्त्राणि घोररूपाण्यनेकशः ॥
carmāṇyapi ca gātreṣu bhānumanti dṛḍhāni ca | vividhāni ca śastrāṇi ghorarūpāṇyanekaśaḥ
और अंगों पर दृढ़, चमकते हुए चर्म के रक्षा-कवच भी; और अनेक प्रकार के भयानक रूप वाले बहुत-से शस्त्र,
श्लोक 49 (1.30.49)
शिततीक्ष्णाग्रधाराणि समुद्यम्य सुरोत्तमः । सविस्फुलिङ्गज्वालानि सधूमानि च सर्वशः ॥
śitatīkṣṇāgradhārāṇi samudyamya surottamaḥ | savisphuliṅgajvālāni sadhūmāni ca sarvaśaḥ
जिनकी नोकें और धारें तीखी और पैनी थीं और जिनसे चिनगारियाँ, ज्वालाएँ और धुआँ निकल रहा था — उन्हें श्रेष्ठ देवताओं ने उठा लिया:
श्लोक 50 (1.30.50)
चक्राणि परिघांश्चैव त्रिशूलानि परश्वधान् । शक्तीश्च विविधास्तीक्ष्णाः करवालांश्च निर्मलान् । स्वदेहरूपाण्यादाय गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ॥
cakrāṇi parighāṃścaiva triśūlāni paraśvadhān | śaktīśca vividhāstīkṣṇāḥ karavālāṃśca nirmalān | svadeharūpāṇyādāya gadāścograpradarśanāḥ
चक्र, परिघ, त्रिशूल, फरसे, अनेक प्रकार की तीखी शक्तियाँ, निर्मल तलवारें और देखने में भयंकर गदाएँ — अपने-अपने शरीर के अनुरूप ये आयुध लेकर
श्लोक 51 (1.30.51)
तैः शस्त्रैर्भानुमद्भिस्ते दिव्याभरणभूषिताः । भानुमन्तः सुरगणास्तस्थुर्विगतकल्मषाः ॥
taiḥ śastrairbhānumadbhiste divyābharaṇabhūṣitāḥ | bhānumantaḥ suragaṇāstasthurvigatakalmaṣāḥ
दिव्य आभूषणों से सजे, उन चमकते शस्त्रों से दीप्तिमान, निष्पाप देवगण वहाँ खड़े हो गए।
श्लोक 52 (1.30.52)
अनुपमबलवीर्यतेजसो । धृतमनसः परिरक्षणेऽमृतस्य । असुरपुरविदारणाः सुरा । ज्वलनसमिद्धवपुःप्रकाशिनः ॥
anupamabalavīryatejaso | dhṛtamanasaḥ parirakṣaṇe'mṛtasya | asurapuravidāraṇāḥ surā | jvalanasamiddhavapuḥprakāśinaḥ
अनुपम बल, पराक्रम और तेज वाले, अमृत की रक्षा में मन लगाए, असुरों के नगरों को ध्वस्त करने वाले वे देवता अग्नि के समान प्रज्वलित शरीरों से प्रकाशित हो रहे थे।
श्लोक 53 (1.30.53)
इति समरवरं सुराः स्थितास्ते । परिघसहस्रशतैः समाकुलम् । विगलितमिव चाम्बरान्तरं । तपनमरीचिविकाशितं बभासे ॥
iti samaravaraṃ surāḥ sthitāste | parighasahasraśataiḥ samākulam | vigalitamiva cāmbarāntaraṃ | tapanamarīcivikāśitaṃ babhāse
इस प्रकार देवता वहाँ डटे रहे, और लाखों परिघों से भरी वह उत्तम रणभूमि सूर्य की किरणों से प्रकाशित होकर आकाश के टूटकर गिरे हुए टुकड़े के समान चमक उठी।