आदि पर्व · अध्याय 34
इन्द्र से गरुड की सन्धि और विनता की मुक्ति
गरुड इन्द्र की मित्रता स्वीकार करते हैं और पूछे जाने पर अपने बल का वर्णन करते हैं। वे अमृत को ऐसे स्थान पर रखने को सहमत होते हैं जहाँ से इन्द्र उसे वापस ले जा सकें, और वर माँगते हैं कि सर्प उनके भोजन बनें। वे अमृत अपनी माता के पास लाते हैं, उसे कुशों पर रखते हैं, सर्पों से पीने से पहले स्नान करने को कहते हैं और विनता को दासता से मुक्त घोषित करते हैं। सर्पों के स्नान करते समय इन्द्र अमृत ले जाते हैं; सर्प उस घास को चाटते हैं जहाँ अमृत रखा था, जिससे उनकी जीभें दो भागों में बँट जाती हैं और कुश पवित्र हो जाते हैं। अध्याय इस कथा को सुनने के पुण्य के साथ समाप्त होता है।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.34.1)
इत्येवमुक्तो गरुडः प्रत्युवाच शचीपतिम् । सख्यं मेऽस्तु त्वया देव यथेच्छसि पुरंदर । बलं तु मम जानीहि महच्चासह्यमेव च ॥
ityevamukto garuḍaḥ pratyuvāca śacīpatim | sakhyaṃ me'stu tvayā deva yathecchasi puraṃdara | balaṃ tu mama jānīhi mahaccāsahyameva ca
ऐसा कहे जाने पर गरुड ने शचीपति को उत्तर दिया — "हे देव पुरन्दर, जैसा आप चाहते हैं, आपसे मेरी मित्रता हो। पर मेरे बल को आप महान और असह्य जानिए।
गरुड उवाच
श्लोक 2 (1.34.2)
कामं नैतत्प्रशंसन्ति सन्तः स्वबलसंस्तवम् । अनिमित्तं सुरश्रेष्ठ सद्यः प्राप्नोति गर्हणाम् ॥
kāmaṃ naitatpraśaṃsanti santaḥ svabalasaṃstavam | animittaṃ suraśreṣṭha sadyaḥ prāpnoti garhaṇām
यह सच है कि सज्जन लोग अपने ही बल की प्रशंसा को अच्छा नहीं मानते; हे सुरश्रेष्ठ, जो बिना कारण ऐसा करता है, वह तुरन्त निन्दा का पात्र बनता है।
श्लोक 3 (1.34.3)
गुणसंकीर्तनं चापि पृष्टेनान्येन गोपते । वक्तव्यं न तु वक्तव्यं स्वयमेव शतक्रतो ॥
guṇasaṃkīrtanaṃ cāpi pṛṣṭenānyena gopate | vaktavyaṃ na tu vaktavyaṃ svayameva śatakrato
हे स्वामी, गुणों का बखान भी पूछे जाने पर किसी दूसरे को ही करना चाहिए; हे शतक्रतु, स्वयं अपने मुँह से नहीं।
श्लोक 4 (1.34.4)
सखेति कृत्वा तु सखे पृष्टो वक्ष्याम्यहं त्वया । न ह्यात्मस्तवसंयुक्तं वक्तव्यमनिमित्ततः ॥
sakheti kṛtvā tu sakhe pṛṣṭo vakṣyāmyahaṃ tvayā | na hyātmastavasaṃyuktaṃ vaktavyamanimittataḥ
किन्तु हे सखा, आपने मुझे मित्र मानकर पूछा है, इसलिए बताता हूँ; क्योंकि बिना कारण आत्म-प्रशंसा भरी बात नहीं कहनी चाहिए।
श्लोक 5 (1.34.5)
सपर्वतवनामुर्वीं ससागरजलामिमाम् । वहे पक्षेण वै शक्र त्वामप्यत्रावलम्बिनम् ॥
saparvatavanāmurvīṃ sasāgarajalāmimām | vahe pakṣeṇa vai śakra tvāmapyatrāvalambinam
हे शक्र, पर्वतों, वनों और समुद्र के जल सहित इस पृथ्वी को मैं एक पंख पर उठा सकता हूँ, और उस पर लटके हुए आपको भी।
श्लोक 6 (1.34.6)
सर्वान्संपिण्डितान्वापि लोकान्सस्थाणुजङ्गमान् । वहेयमपरिश्रान्तो विद्धीदं मे महद्बलम् ॥
sarvānsaṃpiṇḍitānvāpi lokānsasthāṇujaṅgamān | vaheyamapariśrānto viddhīdaṃ me mahadbalam
अथवा चर-अचर सहित सब लोकों को एक साथ इकट्ठा करके भी मैं बिना थके उठा सकता हूँ। मेरा यह महान बल जानिए।"
सौतिरुवाच
श्लोक 7 (1.34.7)
इत्युक्तवचनं वीरं किरीटी श्रीमतां वरः । आह शौनक देवेन्द्रः सर्वलोकहितः प्रभुः ॥
ityuktavacanaṃ vīraṃ kirīṭī śrīmatāṃ varaḥ | āha śaunaka devendraḥ sarvalokahitaḥ prabhuḥ
हे शौनक, वीर गरुड के ऐसा कहने पर किरीटधारी, श्रीमानों में श्रेष्ठ और सब लोकों के हितैषी प्रभु देवराज ने कहा —
श्लोक 8 (1.34.8)
एवमेव यथात्थ त्वं सर्वं संभाव्यते त्वयि । संगृह्यतामिदानीं मे सख्यमत्यन्तमुत्तमम् ॥
evameva yathāttha tvaṃ sarvaṃ saṃbhāvyate tvayi | saṃgṛhyatāmidānīṃ me sakhyamatyantamuttamam
"जैसा तुम कहते हो, वैसा ही है; तुम्हारे लिए सब कुछ सम्भव है। अब मेरी अत्यन्त उत्तम और स्थायी मित्रता स्वीकार करो।
श्लोक 9 (1.34.9)
न कार्यं यदि सोमेन मम सोमः प्रदीयताम् । अस्मांस्ते हि प्रबाधेयुर्येभ्यो दद्याद्भवानिमम् ॥
na kāryaṃ yadi somena mama somaḥ pradīyatām | asmāṃste hi prabādheyuryebhyo dadyādbhavānimam
यदि तुम्हें सोम से कोई प्रयोजन नहीं है, तो सोम मुझे दे दो; क्योंकि जिन्हें तुम इसे दोगे, वे हमें पीड़ा देंगे।"
गरुड उवाच
श्लोक 10 (1.34.10)
किंचित्कारणमुद्दिश्य सोमोऽयं नीयते मया । न दास्यामि समापातुं सोमं कस्मैचिदप्यहम् ॥
kiṃcitkāraṇamuddiśya somo'yaṃ nīyate mayā | na dāsyāmi samāpātuṃ somaṃ kasmaicidapyaham
मैं यह सोम एक विशेष प्रयोजन से ले जा रहा हूँ। मैं इसे किसी को भी पीने के लिए नहीं दूँगा।
श्लोक 11 (1.34.11)
यत्रेमं तु सहस्राक्ष निक्षिपेयमहं स्वयम् । त्वमादाय ततस्तूर्णं हरेथास्त्रिदिवेश्वर ॥
yatremaṃ tu sahasrākṣa nikṣipeyamahaṃ svayam | tvamādāya tatastūrṇaṃ harethāstridiveśvara
परन्तु हे सहस्राक्ष, जहाँ मैं इसे स्वयं रख दूँ, वहाँ से हे स्वर्गाधिपति, आप इसे तुरन्त उठाकर ले जाइए।
शक्र उवाच
श्लोक 12 (1.34.12)
वाक्येनानेन तुष्टोऽहं यत्त्वयोक्तमिहाण्डज । यमिच्छसि वरं मत्तस्तं गृहाण खगोत्तम ॥
vākyenānena tuṣṭo'haṃ yattvayoktamihāṇḍaja | yamicchasi varaṃ mattastaṃ gṛhāṇa khagottama
हे अण्डज, तुमने यहाँ जो कहा, उससे मैं सन्तुष्ट हूँ। हे पक्षिश्रेष्ठ, तुम जो वर चाहो, मुझसे ले लो।
सौतिरुवाच
श्लोक 13 (1.34.13)
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं कद्रूपुत्राननुस्मरन् । स्मृत्वा चैवोपधिकृतं मातुर्दास्यनिमित्ततः ॥
ityuktaḥ pratyuvācedaṃ kadrūputrānanusmaran | smṛtvā caivopadhikṛtaṃ māturdāsyanimittataḥ
ऐसा कहे जाने पर गरुड ने कद्रू के पुत्रों का, और माता को दासी बनाने के लिए उनके द्वारा किए गए छल का स्मरण करते हुए उत्तर दिया —
गरुड उवाच
श्लोक 14 (1.34.14)
ईशोऽहमपि सर्वस्य करिष्यामि तु तेऽर्थिताम् । भवेयुर्भुजगाः शक्र मम भक्ष्या महाबलाः ॥
īśo'hamapi sarvasya kariṣyāmi tu te'rthitām | bhaveyurbhujagāḥ śakra mama bhakṣyā mahābalāḥ
यद्यपि मैं सब कुछ करने में समर्थ हूँ, फिर भी आपकी याचना पूरी करूँगा। हे शक्र, महाबली सर्प मेरे भोजन बनें।
सौतिरुवाच
श्लोक 15 (1.34.15)
तथेत्युक्त्वाऽन्वगच्छत्तं ततो दानवसूदनः । देवदेवं महात्मानं योगिनामीश्वरं हरिम् ॥
tathetyuktvā'nvagacchattaṃ tato dānavasūdanaḥ | devadevaṃ mahātmānaṃ yogināmīśvaraṃ harim
"तथास्तु" कहकर दानवों का संहार करने वाले इन्द्र तब देवों के देव, महात्मा, योगियों के ईश्वर श्रीहरि के पास गए।
श्लोक 16 (1.34.16)
स चान्वमोदत्तं चार्थं यथोक्तं गरुडेन वै । इदं भूयो वचः प्राह भगवांस्त्रिदशेश्वरः ॥
sa cānvamodattaṃ cārthaṃ yathoktaṃ garuḍena vai | idaṃ bhūyo vacaḥ prāha bhagavāṃstridaśeśvaraḥ
श्रीहरि ने गरुड द्वारा कही गई उस बात का वैसा ही अनुमोदन किया। तब भगवान देवराज ने फिर यह वचन कहा —
श्लोक 17 (1.34.17)
हरिष्यामि विनिक्षिप्तं सोममित्यनुभाष्य तम् । आजगाम ततस्तूर्णं सुपर्णो मातुरन्तिकम् ॥
hariṣyāmi vinikṣiptaṃ somamityanubhāṣya tam | ājagāma tatastūrṇaṃ suparṇo māturantikam
"रखे जाने पर मैं सोम को उठा ले जाऊँगा।" इन्द्र के उनसे ऐसा कहने के बाद सुपर्ण तुरन्त अपनी माता के पास आ गए।
श्लोक 18 (1.34.18)
विनयावनतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् । इदमानीतममृतं देवानां भवनान्मया ॥
vinayāvanato bhūtvā vacanaṃ cedamabravīt | idamānītamamṛtaṃ devānāṃ bhavanānmayā
विनय से झुककर उन्होंने यह वचन कहा — "मैं यह अमृत देवताओं के लोक से ले आया हूँ।
श्लोक 19 (1.34.19)
प्रशाधि किमितो मातः करिष्यामि शुभव्रते ॥
praśādhi kimito mātaḥ kariṣyāmi śubhavrate
हे शुभव्रते माता, आज्ञा दीजिए — अब मैं क्या करूँ?"
विनतोवाच
श्लोक 20 (1.34.20)
परितुष्टाऽहमेतेन कर्मणा तव पुत्रक । अजरश्चामरश्चैव देवानां सुप्रियो भव ॥
parituṣṭā'hametena karmaṇā tava putraka | ajaraścāmaraścaiva devānāṃ supriyo bhava
बेटा, तुम्हारे इस कर्म से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम अजर-अमर रहो और देवताओं के अत्यन्त प्रिय बनो।
सौतिरुवाच
श्लोक 21 (1.34.21)
अथ सर्पानुवाचेदं सर्वान्परमहृष्टवत् । इदमानीतममृतं निक्षेप्स्यामि कुशेषु वः ॥
atha sarpānuvācedaṃ sarvānparamahṛṣṭavat | idamānītamamṛtaṃ nikṣepsyāmi kuśeṣu vaḥ
तब अत्यन्त हर्षित होकर उन्होंने सब सर्पों से कहा — "यह रहा वह अमृत जो मैं लाया हूँ। मैं इसे तुम्हारे लिए कुशों पर रख देता हूँ।
गरुड उवाच
श्लोक 22 (1.34.22)
स्नाता मङ्गलसंयुक्तास्ततः प्राश्नीत पन्नगाः । भवद्भिरिदमासीनैर्यदुक्तं तद्वचस्तदा ॥
snātā maṅgalasaṃyuktāstataḥ prāśnīta pannagāḥ | bhavadbhiridamāsīnairyaduktaṃ tadvacastadā
हे सर्पो, स्नान करके और मंगल-कर्म सम्पन्न करके तब इसका सेवन करो। पहले यहाँ बैठे हुए तुमने जो बात कही थी —
श्लोक 23 (1.34.23)
अदासी चैव मातेयमद्यप्रभृति चास्तु मे । यथोक्तं भवतामेतद्वचो मे प्रतिपादितम् ॥
adāsī caiva māteyamadyaprabhṛti cāstu me | yathoktaṃ bhavatāmetadvaco me pratipāditam
आज से मेरी यह माता दासी न रहे; क्योंकि तुमने जैसा कहा था, तुम्हारी वह माँग मैंने पूरी कर दी है।
सौतिरुवाच
श्लोक 24 (1.34.24)
ततः स्नातुं गताः सर्पाः प्रत्युक्त्वा तं तथेत्युत । शक्रोऽप्यमृतमाक्षिप्य जगाम त्रिदिवं पुनः ॥
tataḥ snātuṃ gatāḥ sarpāḥ pratyuktvā taṃ tathetyuta | śakro'pyamṛtamākṣipya jagāma tridivaṃ punaḥ
तब सर्प उन्हें "ऐसा ही हो" कहकर स्नान करने चले गए। इधर इन्द्र भी अमृत उठाकर फिर स्वर्ग लौट गए।
श्लोक 25 (1.34.25)
अथागतास्तमुद्देशं सर्पाः सोमार्थिनस्तदा । स्नाताश्च कृतजप्याश्च प्रहृष्टाः कृतमङ्गलाः ॥
athāgatāstamuddeśaṃ sarpāḥ somārthinastadā | snātāśca kṛtajapyāśca prahṛṣṭāḥ kṛtamaṅgalāḥ
तब सोम के इच्छुक सर्प स्नान करके, जप करके और मंगल-कर्म सम्पन्न करके प्रसन्नतापूर्वक उस स्थान पर आए।
श्लोक 26 (1.34.26)
परस्परकृतद्वेषाः सोमप्राशनकर्मणि । अहं पूर्वमहं पूर्वमित्युक्त्वा ते समाद्रवन् ॥
parasparakṛtadveṣāḥ somaprāśanakarmaṇi | ahaṃ pūrvamahaṃ pūrvamityuktvā te samādravan
सोम पीने को लेकर आपस में झगड़ते हुए वे "पहले मैं, पहले मैं" कहते हुए दौड़ पड़े।
श्लोक 27 (1.34.27)
यत्रैतदमृतं चापि स्थापितं कुशसंस्तरे । तद्विज्ञाय हृतं सर्पाः प्रतिमायाकृतं च तत् ॥
yatraitadamṛtaṃ cāpi sthāpitaṃ kuśasaṃstare | tadvijñāya hṛtaṃ sarpāḥ pratimāyākṛtaṃ ca tat
किन्तु जब सर्पों ने जाना कि कुश के आसन पर रखा गया अमृत हर लिया गया है, और यह उनके छल के बदले किया गया छल है,
श्लोक 28 (1.34.28)
सोमस्थानमिदं चेति दर्भांस्ते लिलिहुस्तदा । ततो द्विधा कृता जिह्वाः सर्पाणां तेन कर्मणा ॥
somasthānamidaṃ ceti darbhāṃste lilihustadā | tato dvidhā kṛtā jihvāḥ sarpāṇāṃ tena karmaṇā
तो उन्होंने "यही सोम का स्थान है" ऐसा सोचकर उन दर्भों को चाटा। उस कर्म से सर्पों की जीभें दो भागों में बँट गईं।
श्लोक 29 (1.34.29)
अभवंश्चामृतस्पर्शाद्दर्भास्तेऽथ पवित्रिणः । नागाश्च वञ्चिता भूत्वा विसृज्य विनतां ततः । विषादमगमंस्तीव्रं गरुडस्य बलात्प्रभो ॥
abhavaṃścāmṛtasparśāddarbhāste'tha pavitriṇaḥ | nāgāśca vañcitā bhūtvā visṛjya vinatāṃ tataḥ | viṣādamagamaṃstīvraṃ garuḍasya balātprabho
और अमृत के स्पर्श से वे दर्भ पवित्र हो गए। हे प्रभो, छले गए नागों ने विनता को मुक्त कर दिया और गरुड के बल के कारण वे गहरे विषाद में डूब गए।
श्लोक 30 (1.34.30)
एवं तदमृतं तेन हृतमाहृतमेव च । द्विजिह्वाश्च कृताः सर्पा गरुडेन महात्मना ॥
evaṃ tadamṛtaṃ tena hṛtamāhṛtameva ca | dvijihvāśca kṛtāḥ sarpā garuḍena mahātmanā
इस प्रकार गरुड ने अमृत का हरण किया और उसे यहाँ ले आए, और महात्मा गरुड के कारण सर्प दो जीभों वाले हो गए।
श्लोक 31 (1.34.31)
ततः सुपर्णः परमप्रहर्षवान् । विहृत्य मात्रा सह तत्र कानने । भुजंगभक्षः परमार्चितः खगैः । अहीनकीर्तिर्विनतामनन्दयत् ॥
tataḥ suparṇaḥ paramapraharṣavān | vihṛtya mātrā saha tatra kānane | bhujaṃgabhakṣaḥ paramārcitaḥ khagaiḥ | ahīnakīrtirvinatāmanandayat
तब अत्यन्त हर्षित सुपर्ण अपनी माता के साथ उस वन में विहार करते रहे। सर्पों को भोजन बनाने वाले, पक्षियों द्वारा अत्यन्त सम्मानित और अक्षुण्ण कीर्ति वाले गरुड ने विनता को आनन्दित किया।
श्लोक 32 (1.34.32)
इमां कथां यः शृणुयान्नरः सदा । पठेत वा द्विजगणमुख्यसंसदि । असंशयं त्रिदिवमियात्स पुण्यभाक् । महात्मनः पतगपतेः प्रकीर्तनात् ॥
imāṃ kathāṃ yaḥ śṛṇuyānnaraḥ sadā | paṭheta vā dvijagaṇamukhyasaṃsadi | asaṃśayaṃ tridivamiyātsa puṇyabhāk | mahātmanaḥ patagapateḥ prakīrtanāt
जो मनुष्य इस कथा को सदा सुनता है, अथवा श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सभा में इसका पाठ करता है, वह महात्मा पक्षिराज के इस गुणगान से पुण्य का भागी होकर निःसन्देह स्वर्ग को जाता है।