Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 35

नागों के नाम

शौनक कहते हैं कि सौति ने शापों, वरदानों और विनता के दोनों पुत्रों के नाम बता दिए हैं, और अब सर्पों के नाम भी जानना चाहते हैं। सौति उत्तर देते हैं कि सर्प इतने अधिक हैं कि सबके नाम नहीं गिनाए जा सकते, और शेष, वासुकि, ऐरावत और तक्षक से आरम्भ करके प्रमुख नागों के नाम बताते हैं। अन्त में वे कहते हैं कि उनकी सन्तानें और वंशज हज़ारों, लाखों और उससे भी अधिक हैं, जिनकी गणना सम्भव नहीं।

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

शौनक उवाच

श्लोक 1 (1.35.1)

भुजङ्गमानां शापस्य मात्रा चैव सुतेन च । विनतायास्त्वया प्रोक्तं कारणं सूतनन्दन ॥

bhujaṅgamānāṃ śāpasya mātrā caiva sutena ca | vinatāyāstvayā proktaṃ kāraṇaṃ sūtanandana

हे सूतनन्दन, आपने माता द्वारा सर्पों को दिए गए शाप का, और पुत्र द्वारा विनता को दिए गए शाप का कारण बता दिया है;

श्लोक 2 (1.35.2)

वरप्रदानं भर्त्रा च कद्रूविनतयोस्तथा । नामनी चैव ते प्रोक्ते पक्षिणोर्वैनतेययोः ॥

varapradānaṃ bhartrā ca kadrūvinatayostathā | nāmanī caiva te prokte pakṣiṇorvainateyayoḥ

पति द्वारा कद्रू और विनता को दिए गए वर भी, और विनता के दोनों पक्षी-पुत्रों के नाम भी आपने बता दिए हैं।

श्लोक 3 (1.35.3)

पन्नगानां तु नामानि न कीर्तयसि सूतज । प्राधान्येनापि नामानि श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥

pannagānāṃ tu nāmāni na kīrtayasi sūtaja | prādhānyenāpi nāmāni śrotumicchāmahe vayam

किन्तु हे सूतपुत्र, आप सर्पों के नाम नहीं बता रहे। हम उनमें से कम-से-कम प्रमुख नागों के नाम सुनना चाहते हैं।

सौतिरुवाच

श्लोक 4 (1.35.4)

बहुत्वान्नामधेयानि पन्नगानां तपोधन । न कीर्तयिष्ये सर्वेषां प्राधान्येन तु मे शृणु ॥

bahutvānnāmadheyāni pannagānāṃ tapodhana | na kīrtayiṣye sarveṣāṃ prādhānyena tu me śṛṇu

हे तपोधन, सर्प इतने अधिक हैं कि मैं सबके नाम नहीं गिनाऊँगा; पर प्रमुख नागों के नाम मुझसे सुनिए।

श्लोक 5 (1.35.5)

शेषः प्रथमतो जातो वासुकिस्तदनन्तरम् । ऐरावतस्तक्षकश्च कर्कोटकधनञ्जयौ ॥

śeṣaḥ prathamato jāto vāsukistadanantaram | airāvatastakṣakaśca karkoṭakadhanañjayau

सबसे पहले शेष उत्पन्न हुए, उनके बाद वासुकि; फिर ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक और धनंजय;

श्लोक 6 (1.35.6)

कालियो मणिनागश्च नागश्चापूरणस्तथा । नागस्तथा पिञ्जरक एलापत्रोऽथ वामनः ॥

kāliyo maṇināgaśca nāgaścāpūraṇastathā | nāgastathā piñjaraka elāpatro'tha vāmanaḥ

कालिय, मणिनाग और नाग आपूरण; नाग पिंजरक, एलापत्र और वामन;

श्लोक 7 (1.35.7)

नीलानीलौ तथा नागौ कल्माषशबलौ तथा । आर्यकश्चोग्रकश्चैव नागः कलशपोतकः ॥

nīlānīlau tathā nāgau kalmāṣaśabalau tathā | āryakaścograkaścaiva nāgaḥ kalaśapotakaḥ

नील और अनील नाग, कल्माष और शबल, आर्यक और उग्रक, तथा नाग कलशपोतक;

श्लोक 8 (1.35.8)

सुमनाख्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः । आप्तः कोटरकश्चैव शङ्खो वालिशिखस्तथा ॥

sumanākhyo dadhimukhastathā vimalapiṇḍakaḥ | āptaḥ koṭarakaścaiva śaṅkho vāliśikhastathā

सुमन, दधिमुख और विमलपिण्डक; आप्त, कोटरक, शंख और वालिशिख;

श्लोक 9 (1.35.9)

निष्टानको हेमगुहो नहुषः पिङ्गलस्तथा । बाह्यकर्णो हस्तिपदस्तथा मुद्गरपिण्डकः ॥

niṣṭānako hemaguho nahuṣaḥ piṅgalastathā | bāhyakarṇo hastipadastathā mudgarapiṇḍakaḥ

निष्टानक, हेमगुह, नहुष और पिंगल; बाह्यकर्ण, हस्तिपद और मुद्गरपिण्डक;

श्लोक 10 (1.35.10)

कम्बलाश्वतरौ चापि नागः कालीयकस्तथा । वृत्तसंवर्तकौ नागौ द्वौ च पद्माविति श्रुतौ ॥

kambalāśvatarau cāpi nāgaḥ kālīyakastathā | vṛttasaṃvartakau nāgau dvau ca padmāviti śrutau

कम्बल और अश्वतर, तथा नाग कालीयक; वृत्त और संवर्तक नाग, और "पद्म" नाम से प्रसिद्ध दो नाग;

श्लोक 11 (1.35.11)

नागः शङ्खमुखश्चैव तथा कूष्माण्डकोऽपरः । क्षेमकश्च तथा नागो नागः पिण्डारकस्तथा ॥

nāgaḥ śaṅkhamukhaścaiva tathā kūṣmāṇḍako'paraḥ | kṣemakaśca tathā nāgo nāgaḥ piṇḍārakastathā

नाग शंखमुख और दूसरा कूष्माण्डक; नाग क्षेमक और नाग पिण्डारक;

श्लोक 12 (1.35.12)

करवीरः पुष्पदंष्ट्रो बिल्वको बिल्वपाण्डुरः । मूषकादः शङ्खशिराः पूर्णभद्रो हरिद्रकः ॥

karavīraḥ puṣpadaṃṣṭro bilvako bilvapāṇḍuraḥ | mūṣakādaḥ śaṅkhaśirāḥ pūrṇabhadro haridrakaḥ

करवीर, पुष्पदंष्ट्र, बिल्वक और बिल्वपाण्डुर; मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र और हरिद्रक;

श्लोक 13 (1.35.13)

अपराजितो ज्योतिकश्च पन्नगः श्रीवहस्तथा । कौरव्यो धृतराष्ट्रश्च शङ्खपिण्डश्च वीर्यवान् ॥

aparājito jyotikaśca pannagaḥ śrīvahastathā | kauravyo dhṛtarāṣṭraśca śaṅkhapiṇḍaśca vīryavān

अपराजित, ज्योतिक और नाग श्रीवह; कौरव्य, धृतराष्ट्र और पराक्रमी शंखपिण्ड;

श्लोक 14 (1.35.14)

विरजाश्च सुबाहुश्च शालिपिण्डश्च वीर्यवान् । हस्तिपिण्डः पिठरकः सुमुखः कौणपाशनः ॥

virajāśca subāhuśca śālipiṇḍaśca vīryavān | hastipiṇḍaḥ piṭharakaḥ sumukhaḥ kauṇapāśanaḥ

विरजा, सुबाहु और पराक्रमी शालिपिण्ड; हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख और कौणपाशन;

श्लोक 15 (1.35.15)

कुठरः कुञ्जरश्चैव तथा नागः प्रभाकरः । कुमुदः कुमुदाक्षश्च तित्तिरिर्हलिकस्तथा ॥

kuṭharaḥ kuñjaraścaiva tathā nāgaḥ prabhākaraḥ | kumudaḥ kumudākṣaśca tittirirhalikastathā

कुठर और कुंजर, तथा नाग प्रभाकर; कुमुद और कुमुदाक्ष, तित्तिरि और हलिक;

श्लोक 16 (1.35.16)

कर्दमश्च महानागो नागश्च बहुमूलकः । कर्कराकर्करौ नागौ कुण्डोदरमहोदरौ ॥

kardamaśca mahānāgo nāgaśca bahumūlakaḥ | karkarākarkarau nāgau kuṇḍodaramahodarau

महानाग कर्दम और नाग बहुमूलक; कर्कर और अकर्कर नाग, तथा कुण्डोदर और महोदर।

श्लोक 17 (1.35.17)

एते प्राधान्यतो नागाः कीर्तिता द्विजसत्तम । बहुत्वान्नामधेयानामितरे नानुकीर्तिताः ॥

ete prādhānyato nāgāḥ kīrtitā dvijasattama | bahutvānnāmadheyānāmitare nānukīrtitāḥ

हे द्विजश्रेष्ठ, ये प्रमुख नाग मैंने गिनाए हैं। नाम बहुत अधिक होने के कारण शेष नागों का वर्णन नहीं किया गया।

श्लोक 18 (1.35.18)

एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः । असङ्ख्येयेति मत्वा तान्न ब्रवीमि तपोधन ॥

eteṣāṃ prasavo yaśca prasavasya ca saṃtatiḥ | asaṅkhyeyeti matvā tānna bravīmi tapodhana

हे तपोधन, इनकी सन्तानें और उन सन्तानों की आगे की परम्परा असंख्य है; यह जानकर मैं उनके नाम नहीं बताता।

श्लोक 19 (1.35.19)

बहूनीह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । अशक्यान्येव सङ्ख्यातुं पन्नगानां तपोधन ॥

bahūnīha sahasrāṇi prayutānyarbudāni ca | aśakyānyeva saṅkhyātuṃ pannagānāṃ tapodhana

हे तपोधन, इस संसार में सर्प अनेक हज़ार, लाखों और करोड़ों हैं; उनकी गणना करना सम्भव ही नहीं है।

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36