आदि पर्व · अध्याय 37
नागों की मन्त्रणा
माता के शाप से चिन्तित वासुकि जनमेजय के भावी सर्पयज्ञ को रोकने का उपाय खोजने के लिए अपने भाइयों को एकत्र करते हैं। नाग एक के बाद एक योजनाएँ रखते हैं — ब्राह्मण बनकर राजा से याचना करना, उसके मन्त्री बन जाना, उसके ऋत्विजों को डसना, मेघ बनकर अग्नि बुझाना, यज्ञपात्र चुराना, भोजन दूषित करना, राजा का अपहरण या वध करना — जबकि कुछ चेताते हैं कि ब्रह्महत्या अनुचित होगी। वासुकि इन सबको अस्वीकार कर कहते हैं कि कश्यप को प्रसन्न करना श्रेयस्कर होगा, और स्वीकार करते हैं कि निर्णय का भार उन्हें बहुत सता रहा है।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.37.1)
मातुः सकाशात्तं शापं श्रुत्वा वै पन्नगोत्तमः । वासुकिश्चिन्तयामास शापोऽयं न भवेत्कथम् ॥
mātuḥ sakāśāttaṃ śāpaṃ śrutvā vai pannagottamaḥ | vāsukiścintayāmāsa śāpo'yaṃ na bhavetkatham
माता के मुख से वह शाप सुनकर नागश्रेष्ठ वासुकि सोचने लगे कि यह शाप किस प्रकार निष्फल हो।
श्लोक 2 (1.37.2)
ततः स मन्त्रयामास भ्रातृभिः सह सर्वशः । ऐरावतप्रभृतिभिः सर्वैर्धर्मपरायणैः ॥
tataḥ sa mantrayāmāsa bhrātṛbhiḥ saha sarvaśaḥ | airāvataprabhṛtibhiḥ sarvairdharmaparāyaṇaiḥ
तब उन्होंने ऐरावत आदि अपने सभी धर्मपरायण भाइयों के साथ मिलकर विचार-विमर्श किया।
वासुकिरुवाच
श्लोक 3 (1.37.3)
अयं शापो यथोद्दिष्टो विदितं वस्तथाऽनघाः । तस्य शापस्य मोक्षार्थं मन्त्रयित्वा यतामहे ॥
ayaṃ śāpo yathoddiṣṭo viditaṃ vastathā'naghāḥ | tasya śāpasya mokṣārthaṃ mantrayitvā yatāmahe
हे निष्पाप भाइयो, यह शाप जिस प्रकार दिया गया, वह तुम जानते हो। आओ, आपस में मन्त्रणा करके इससे छूटने का प्रयत्न करें।
श्लोक 4 (1.37.4)
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातो हि विद्यते । न तु मात्राऽभिशप्तानां मोक्षः क्वचन विद्यते ॥
sarveṣāmeva śāpānāṃ pratighāto hi vidyate | na tu mātrā'bhiśaptānāṃ mokṣaḥ kvacana vidyate
सब शापों का कोई-न-कोई प्रतिकार होता है, परन्तु जिन्हें स्वयं माता ने शाप दिया हो, उनका छुटकारा कहीं नहीं होता।
श्लोक 5 (1.37.5)
अव्ययस्याप्रमेयस्य सत्यस्य च तथाग्रतः । शप्ता इत्येव मे श्रुत्वा जायते हृदि वेपथुः ॥
avyayasyāprameyasya satyasya ca tathāgrataḥ | śaptā ityeva me śrutvā jāyate hṛdi vepathuḥ
जब मैं सुनता हूँ कि हमें उस अविनाशी, अप्रमेय और सत्यस्वरूप देव के सामने ही शाप दिया गया, तो मेरा हृदय काँप उठता है।
श्लोक 6 (1.37.6)
नूनं सर्वविनाशोऽयमस्माकं समुपागतः । शापः सृष्टो महाघोरो मात्रा खल्वविनीतया । न ह्येतां सोऽव्ययो देवः शपन्तीं प्रत्यषेधयत् ॥
nūnaṃ sarvavināśo'yamasmākaṃ samupāgataḥ | śāpaḥ sṛṣṭo mahāghoro mātrā khalvavinītayā | na hyetāṃ so'vyayo devaḥ śapantīṃ pratyaṣedhayat
निश्चय ही हमारा सर्वनाश आ पहुँचा है। हमारी उद्दण्ड माता ने यह अत्यन्त भयंकर शाप दिया है, और शाप देती हुई उसे उस अविनाशी देव ने रोका भी नहीं।
श्लोक 7 (1.37.7)
तस्मात्संमन्त्रयामोऽद्य भुजङ्गानामनामयम् । यथा भवेद्धि सर्वेषां मा नः कालोऽत्यगादयम् ॥
tasmātsaṃmantrayāmo'dya bhujaṅgānāmanāmayam | yathā bhaveddhi sarveṣāṃ mā naḥ kālo'tyagādayam
इसलिए आज हम विचार करें कि सब नागों का कुशल किस प्रकार हो, जिससे यह समय हमारे हाथ से निकल न जाए।
श्लोक 8 (1.37.8)
सर्व एव हि नस्तावद्बुद्धिमन्तो विचक्षणाः । अपि मन्त्रयमाणा हि हेतुं पश्याम मोक्षणे ॥
sarva eva hi nastāvadbuddhimanto vicakṣaṇāḥ | api mantrayamāṇā hi hetuṃ paśyāma mokṣaṇe
हम सब बुद्धिमान और विवेकी हैं। मिलकर मन्त्रणा करें तो छुटकारे का कोई उपाय अवश्य खोज लेंगे,
श्लोक 9 (1.37.9)
यथा नष्टं पुरा देवा गूढमग्निं गुहागतम् । यथा स यज्ञो न भवेद्यथा वाऽपि पराभवः । जनमेजयस्य सर्पाणां विनाशकरणाय वै ॥
yathā naṣṭaṃ purā devā gūḍhamagniṃ guhāgatam | yathā sa yajño na bhavedyathā vā'pi parābhavaḥ | janamejayasya sarpāṇāṃ vināśakaraṇāya vai
जैसे प्राचीन काल में देवताओं ने गुफा में छिपकर लुप्त हुए अग्नि को खोज निकाला था — ऐसा उपाय, जिससे सर्पों के विनाश के लिए होने वाला जनमेजय का वह यज्ञ हो ही न, या विफल हो जाए।
सौतिरुवाच
श्लोक 10 (1.37.10)
तथेत्युक्त्वा ततः सर्वे काद्रवेयाः समागताः । समयं चक्रिरे तत्र मन्त्रबुद्धिविशारदाः ॥
tathetyuktvā tataḥ sarve kādraveyāḥ samāgatāḥ | samayaṃ cakrire tatra mantrabuddhiviśāradāḥ
"ऐसा ही हो" कहकर कद्रू के सभी पुत्र वहाँ एकत्र हुए, और मन्त्रणा तथा बुद्धि में कुशल वे नाग मिलकर कोई निश्चय करने बैठे।
श्लोक 11 (1.37.11)
एके तत्राब्रुवन्नागा वयं भूत्वा द्विजर्षभाः । जनमेजयं तु भिक्षामो यज्ञस्ते न भवेदिति ॥
eke tatrābruvannāgā vayaṃ bhūtvā dvijarṣabhāḥ | janamejayaṃ tu bhikṣāmo yajñaste na bhavediti
वहाँ कुछ नागों ने कहा — "हम श्रेष्ठ ब्राह्मण बनकर जनमेजय से याचना करेंगे कि तुम्हारा यज्ञ न हो।"
श्लोक 12 (1.37.12)
अपरे त्वब्रुवन्नागास्तत्र पण्डितमानिनः । मन्त्रिणोऽस्य वयं सर्वे भविष्यामः सुसंमताः ॥
apare tvabruvannāgāstatra paṇḍitamāninaḥ | mantriṇo'sya vayaṃ sarve bhaviṣyāmaḥ susaṃmatāḥ
दूसरे नाग, जो अपने को पण्डित मानते थे, बोले — "हम सब उसके अत्यन्त सम्मानित मन्त्री बन जाएँगे।
श्लोक 13 (1.37.13)
स नः प्रक्ष्यति सर्वेषु कार्येष्वर्थविनिश्चयम् । तत्र बुद्धिं प्रदास्यामो यथा यज्ञो निवर्त्स्यति ॥
sa naḥ prakṣyati sarveṣu kāryeṣvarthaviniścayam | tatra buddhiṃ pradāsyāmo yathā yajño nivartsyati
वह सब कामों में हमसे निर्णय पूछेगा, और हम उसे ऐसी सलाह देंगे जिससे यज्ञ रुक जाए।
श्लोक 14 (1.37.14)
स नो बहुमतान्राजा बुद्ध्या बुद्धिमतां वरः । यज्ञार्थं प्रक्ष्यति व्यक्तं नेति वक्ष्यामहे वयम् ॥
sa no bahumatānrājā buddhyā buddhimatāṃ varaḥ | yajñārthaṃ prakṣyati vyaktaṃ neti vakṣyāmahe vayam
बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा हमारी बुद्धि के कारण हमें बहुत मानेगा और यज्ञ के विषय में अवश्य पूछेगा; तब हम कहेंगे — 'नहीं',
श्लोक 15 (1.37.15)
दर्शयन्तो बहून्दोषान्प्रेत्य चेह च दारुणान् । हेतुभिः कारणैश्चैव यथा यज्ञो भवेन्न सः ॥
darśayanto bahūndoṣānpretya ceha ca dāruṇān | hetubhiḥ kāraṇaiścaiva yathā yajño bhavenna saḥ
और युक्तियों तथा कारणों से उसके इस लोक और परलोक के अनेक भयानक दोष दिखाएँगे, जिससे वह यज्ञ न हो।
श्लोक 16 (1.37.16)
अथवा य उपाध्यायः क्रतोस्तस्य भविष्यति । सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रतः ॥
athavā ya upādhyāyaḥ kratostasya bhaviṣyati | sarpasatravidhānajño rājakāryahite rataḥ
अथवा जो उस यज्ञ का आचार्य होगा, सर्पसत्र की विधि जानने वाला और राजा के हित में लगा रहने वाला —
श्लोक 17 (1.37.17)
तं गत्वा दशतां कश्चिद्भुजङ्गः स मरिष्यति । तस्मिन्मृते यज्ञकारे क्रतुः स न भविष्यति ॥
taṃ gatvā daśatāṃ kaścidbhujaṅgaḥ sa mariṣyati | tasminmṛte yajñakāre kratuḥ sa na bhaviṣyati
कोई सर्प जाकर उसे डस ले, तो वह मर जाएगा। यज्ञ कराने वाले के मर जाने पर वह यज्ञ नहीं होगा।
श्लोक 18 (1.37.18)
ये चान्ये सर्पसत्रज्ञा भविष्यन्त्यस्य चर्त्विजः । तांश्च सर्वान्दशिष्यामः कृतमेवं भविष्यति ॥
ye cānye sarpasatrajñā bhaviṣyantyasya cartvijaḥ | tāṃśca sarvāndaśiṣyāmaḥ kṛtamevaṃ bhaviṣyati
और सर्पसत्र के जानकार जो दूसरे ऋत्विज उसके होंगे, उन सबको भी हम डस लेंगे। इस प्रकार काम बन जाएगा।"
श्लोक 19 (1.37.19)
अपरे त्वब्रुवन्नागा धर्मात्मानो दयालवः । अबुद्धिरेषा भवतां ब्रह्महत्या न शोभनम् ॥
apare tvabruvannāgā dharmātmāno dayālavaḥ | abuddhireṣā bhavatāṃ brahmahatyā na śobhanam
किन्तु दूसरे धर्मात्मा और दयालु नागों ने कहा — "यह तुम्हारी नासमझी है। ब्रह्महत्या अच्छी बात नहीं है।
श्लोक 20 (1.37.20)
सम्यक्सद्धर्ममूला वै व्यसने शान्तिरुत्तमा । अधर्मोत्तरता नाम कृत्स्नं व्यापादयेज्जगत् ॥
samyaksaddharmamūlā vai vyasane śāntiruttamā | adharmottaratā nāma kṛtsnaṃ vyāpādayejjagat
विपत्ति में सद्धर्म पर भली-भाँति टिकी हुई शान्ति ही सबसे उत्तम उपाय है। अधर्म को आगे रखना तो सारे जगत का नाश कर देगा।"
श्लोक 21 (1.37.21)
अपरे त्वब्रुवन्नागाः समिद्धं जातवेदसम् । वर्षैर्निर्वापयिष्यामो मेघा भूत्वा सविद्युतः ॥
apare tvabruvannāgāḥ samiddhaṃ jātavedasam | varṣairnirvāpayiṣyāmo meghā bhūtvā savidyutaḥ
दूसरे नागों ने कहा — "हम बिजली से भरे मेघ बनकर वर्षा से उस प्रज्वलित अग्नि को बुझा देंगे।
श्लोक 22 (1.37.22)
स्रुग्भाण्डं निशि गत्वा च अपरे भुजगोत्तमाः । प्रमत्तानां हरन्त्वाशु विघ्न एवं भविष्यति ॥
srugbhāṇḍaṃ niśi gatvā ca apare bhujagottamāḥ | pramattānāṃ harantvāśu vighna evaṃ bhaviṣyati
और दूसरे श्रेष्ठ नाग रात में जाकर असावधान ऋत्विजों के स्रुवा और यज्ञपात्र झटपट उठा ले जाएँ। इस प्रकार विघ्न पड़ जाएगा।
श्लोक 23 (1.37.23)
यज्ञे वा भुजगास्तस्मिञ्शतशोऽथ सहस्रशः । जनान्दशन्तु वै सर्वे नैवं त्रासो भविष्यति ॥
yajñe vā bhujagāstasmiñśataśo'tha sahasraśaḥ | janāndaśantu vai sarve naivaṃ trāso bhaviṣyati
अथवा उस यज्ञ में सैकड़ों-हज़ारों सर्प सब लोगों को डस लें; तब हमारा भय नहीं रहेगा।
श्लोक 24 (1.37.24)
अथवा संस्कृतं भोज्यं दूषयन्तु भुजङ्गमाः । स्वेन मूत्रपुरीषेण सर्वभोज्यविनाशिना ॥
athavā saṃskṛtaṃ bhojyaṃ dūṣayantu bhujaṅgamāḥ | svena mūtrapurīṣeṇa sarvabhojyavināśinā
अथवा सर्प अपने मल-मूत्र से, जो सब प्रकार के भोजन को नष्ट कर देता है, वहाँ बने भोजन को दूषित कर दें।"
श्लोक 25 (1.37.25)
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र ऋत्विजोऽस्य भवामहे । यज्ञविघ्नं करिष्यामो दक्षिणा दीयतामिति ॥
apare tvabruvaṃstatra ṛtvijo'sya bhavāmahe | yajñavighnaṃ kariṣyāmo dakṣiṇā dīyatāmiti
वहाँ कुछ और नागों ने कहा — "हम उसके ऋत्विज बन जाएँगे और 'दक्षिणा दी जाए' कहकर यज्ञ में विघ्न डालेंगे।
श्लोक 26 (1.37.26)
वश्यतां च गतोऽसौ नः करिष्यति यथेप्सितम् । अपरे त्वब्रुवंस्तत्र जले प्रक्रीडितं नृपम् ॥
vaśyatāṃ ca gato'sau naḥ kariṣyati yathepsitam | apare tvabruvaṃstatra jale prakrīḍitaṃ nṛpam
हमारे वश में हो जाने पर वह हमारी इच्छा के अनुसार करेगा।" वहाँ कुछ और बोले — "जब राजा जल में क्रीड़ा कर रहा हो,
श्लोक 27 (1.37.27)
गृहमानीय बध्नीमः क्रतुरेवं भवेन्न सः । अपरे त्वब्रुवंस्तत्र नागाः पण्डितमानिनः ॥
gṛhamānīya badhnīmaḥ kraturevaṃ bhavenna saḥ | apare tvabruvaṃstatra nāgāḥ paṇḍitamāninaḥ
तब हम उसे अपने घर ले जाकर बाँध देंगे; इस प्रकार वह यज्ञ नहीं होगा।" वहाँ अपने को पण्डित मानने वाले कुछ और नागों ने कहा —
श्लोक 28 (1.37.28)
दशामस्तं प्रगृह्याशु कृतमेवं भविष्यति । छिन्नं मूलमनर्थानां मृते तस्मिन्भविष्यति ॥
daśāmastaṃ pragṛhyāśu kṛtamevaṃ bhaviṣyati | chinnaṃ mūlamanarthānāṃ mṛte tasminbhaviṣyati
"हम उसे पकड़कर तुरन्त डस लें; इस प्रकार काम हो जाएगा। उसके मरते ही हमारे अनर्थों की जड़ कट जाएगी।"
नागा ऊचुः
श्लोक 29 (1.37.29)
एषा नो नैष्ठिकी बुद्धिः सर्वेषामीक्षणश्रवः । अथ यन्मन्यसे राजन्द्रुतं तत्संविधीयताम् ॥
eṣā no naiṣṭhikī buddhiḥ sarveṣāmīkṣaṇaśravaḥ | atha yanmanyase rājandrutaṃ tatsaṃvidhīyatām
हे नेत्रों से ही सुनने वाले नागराज, हम सबका यही अन्तिम मत है। अब आप जो उचित समझें, वह शीघ्र किया जाए।
सौतिरुवाच
श्लोक 30 (1.37.30)
इत्युक्त्वा समुदैक्षन्त वासुकिं पन्नगोत्तमम् । वासुकिश्चापि संचिन्त्य तानुवाच भुजङ्गमान् ॥
ityuktvā samudaikṣanta vāsukiṃ pannagottamam | vāsukiścāpi saṃcintya tānuvāca bhujaṅgamān
ऐसा कहकर वे नागश्रेष्ठ वासुकि की ओर देखने लगे। वासुकि ने भी सोच-विचार कर उन नागों से कहा —
वासुकिरुवाच
श्लोक 31 (1.37.31)
नैषा वो नैष्ठिकी बुद्धिर्मता कर्तुं भुजङ्गमाः । सर्वेषामेव मे बुद्धिः पन्नगानां न रोचते ॥
naiṣā vo naiṣṭhikī buddhirmatā kartuṃ bhujaṅgamāḥ | sarveṣāmeva me buddhiḥ pannagānāṃ na rocate
हे भुजंगमो, तुम्हारा यह अन्तिम निश्चय अमल में लाने योग्य नहीं है। तुम सब नागों का कोई भी विचार मुझे अच्छा नहीं लगता।
श्लोक 32 (1.37.32)
किं तत्र संविधातव्यं भवतां स्याद्धितं तु यत् । श्रेयः प्रसादनं मन्ये कश्यपस्य महात्मनः ॥
kiṃ tatra saṃvidhātavyaṃ bhavatāṃ syāddhitaṃ tu yat | śreyaḥ prasādanaṃ manye kaśyapasya mahātmanaḥ
इस विषय में ऐसा क्या किया जाए जो सचमुच तुम्हारे हित में हो? मेरे विचार से महात्मा कश्यप को प्रसन्न करना ही कल्याणकारी है।
श्लोक 33 (1.37.33)
ज्ञातिवर्गस्य सौहार्दादात्मनश्च भुजङ्गमाः । न च जानाति मे बुद्धिः किंचित्कर्तुं वचो हि वः ॥
jñātivargasya sauhārdādātmanaśca bhujaṅgamāḥ | na ca jānāti me buddhiḥ kiṃcitkartuṃ vaco hi vaḥ
हे नागो, अपने कुटुम्ब और अपने प्रति स्नेह के कारण मेरी बुद्धि तुम्हारी किसी भी बात पर चलने का मार्ग नहीं देख पाती।
श्लोक 34 (1.37.34)
मया हीदं विधातव्यं भवतां यद्धितं भवेत् । अनेनाहं भृशं तप्ये गुणदोषौ मदाश्रयौ ॥
mayā hīdaṃ vidhātavyaṃ bhavatāṃ yaddhitaṃ bhavet | anenāhaṃ bhṛśaṃ tapye guṇadoṣau madāśrayau
जो तुम्हारे हित में हो, वह मुझे ही करना है; इसी से मैं बहुत संतप्त हूँ, क्योंकि गुण और दोष दोनों का भार मुझ पर ही है।