आदि पर्व · अध्याय 38
एलापत्र की सलाह
सब प्रस्ताव सुनने के बाद नाग एलापत्र कहता है कि यज्ञ रोका नहीं जा सकता और नागों को दैव का ही आश्रय लेना होगा। वह याद करता है कि जब कद्रू ने अपने पुत्रों को शाप दिया, तब उसने देवताओं को ब्रह्मा से यह पूछते सुना था कि उन्होंने ऐसा क्यों होने दिया; ब्रह्मा ने उत्तर दिया कि केवल दुष्ट सर्प नष्ट होंगे, और धर्मात्मा सर्पों को मुनि जरत्कारु तथा उसी नाम वाली वासुकि की बहन से उत्पन्न आस्तीक बचाएगा। इसलिए एलापत्र वासुकि से आग्रह करता है कि जब वे मुनि कन्या माँगने आएँ, तब वे अपनी बहन उन्हें सौंप दें।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.38.1)
सर्पाणां तु वचः श्रुत्वा सर्वेषामिति चेति च । वासुकेश्च वचः श्रुत्वा एलापत्रोऽब्रवीदिदम् ॥
sarpāṇāṃ tu vacaḥ śrutvā sarveṣāmiti ceti ca | vāsukeśca vacaḥ śrutvā elāpatro'bravīdidam
सब सर्पों की "ऐसा करें", "वैसा करें" वाली बातें और वासुकि का वचन सुनकर एलापत्र ने यह कहा —
एलापत्र उवाच
श्लोक 2 (1.38.2)
प्रागेव दर्शिता बुद्धिर्मयैषा भुजगोत्तमाः । हेयेति यदि वो बुद्धिस्तवापि च तथा प्रभो ॥
prāgeva darśitā buddhirmayaiṣā bhujagottamāḥ | heyeti yadi vo buddhistavāpi ca tathā prabho
हे नागश्रेष्ठो, यह विचार मैंने पहले ही सामने रखा था। यदि तुम्हें यह त्यागने योग्य लगे, और हे प्रभु, आपको भी वैसा ही लगे —
श्लोक 3 (1.38.3)
अस्तु कामं ममाद्यापि बुद्धिः स्मरणमागता । तां शृणुध्वं प्रवक्ष्यामि याथातथ्येन पन्नगाः ॥
astu kāmaṃ mamādyāpi buddhiḥ smaraṇamāgatā | tāṃ śṛṇudhvaṃ pravakṣyāmi yāthātathyena pannagāḥ
तो ऐसा ही सही। पर आज भी एक बात मुझे स्मरण हो आई है। हे पन्नगो, सुनो; मैं उसे ज्यों-का-त्यों कहता हूँ।
श्लोक 4 (1.38.4)
न स यज्ञो न भविता न स राजा तथाविधः । जनमेजयः पाण्डवेयो यतोऽस्माकं महद्भयम् ॥
na sa yajño na bhavitā na sa rājā tathāvidhaḥ | janamejayaḥ pāṇḍaveyo yato'smākaṃ mahadbhayam
वह यज्ञ होकर ही रहेगा, और जिससे हमें महान् भय है, वह पाण्डववंशी राजा जनमेजय भी ऐसा नहीं है कि उसे उससे रोका जा सके।
श्लोक 5 (1.38.5)
दैवेनोपहतो राजन्यो भवेदिह पूरुषः । स दैवमेवाश्रयेत नान्यत्तत्र परायणम् ॥
daivenopahato rājanyo bhavediha pūruṣaḥ | sa daivamevāśrayeta nānyattatra parāyaṇam
हे राजन्, इस संसार में जो पुरुष दैव का मारा हो, उसे दैव की ही शरण लेनी चाहिए; उसके लिए दूसरा कोई सहारा नहीं है।
श्लोक 6 (1.38.6)
तदिदं चैवमस्माकं भयं पन्नगसत्तमाः । दैवमेवाश्रयामोऽत्र शृणुध्वं च वचो मम ॥
tadidaṃ caivamasmākaṃ bhayaṃ pannagasattamāḥ | daivamevāśrayāmo'tra śṛṇudhvaṃ ca vaco mama
हे नागश्रेष्ठो, हमारा यह भय भी ऐसा ही है। इसमें हम दैव का ही आश्रय लें; और मेरी बात सुनो।
श्लोक 7 (1.38.7)
अहं शापे समुत्सृष्टे समश्रौषं वचस्तदा । मातुरुत्सङ्गमारूढो भयात्पन्नगसत्तमाः । देवानां पन्नगश्रेष्ठास्तीक्ष्णास्तीक्ष्णा इति प्रभो ॥
ahaṃ śāpe samutsṛṣṭe samaśrauṣaṃ vacastadā | māturutsaṅgamārūḍho bhayātpannagasattamāḥ | devānāṃ pannagaśreṣṭhāstīkṣṇāstīkṣṇā iti prabho
हे नागश्रेष्ठो, जब शाप दिया गया, तब मैं भय के मारे माता की गोद में चढ़ा बैठा था। उस समय मैंने देवताओं के वचन सुने। हे प्रभो, वे कह रहे थे — "कठोर है, कठोर है!"
श्लोक 8 (1.38.8)
शापदुःखाग्नितप्तानां पन्नगानामनामयम् । कृपया परयाऽऽविष्टाः प्रार्थयन्तो दिवौकसः ॥
śāpaduḥkhāgnitaptānāṃ pannagānāmanāmayam | kṛpayā parayā''viṣṭāḥ prārthayanto divaukasaḥ
शाप के दुःख की आग में तपते नागों के कल्याण की कामना से, अत्यन्त करुणा से भरे देवताओं ने ब्रह्मा से प्रार्थना की —
देवा ऊचुः
श्लोक 9 (1.38.9)
का हि लब्ध्वा प्रियान्पुत्राञ्शपेदेवं पितामह । ऋते कद्रूं तीक्ष्णरूपां देवदेव तवाग्रतः ॥
kā hi labdhvā priyānputrāñśapedevaṃ pitāmaha | ṛte kadrūṃ tīkṣṇarūpāṃ devadeva tavāgrataḥ
हे पितामह, हे देवाधिदेव, क्रूर स्वभाव वाली कद्रू को छोड़कर ऐसी कौन स्त्री होगी जो प्रिय पुत्रों को पाकर आपके सामने ही उन्हें इस प्रकार शाप दे?
श्लोक 10 (1.38.10)
तथेति च वचस्तस्यास्त्वयाप्युक्तं पितामह । इच्छाम एतद्विज्ञातुं कारणं यन्न वारिता ॥
tatheti ca vacastasyāstvayāpyuktaṃ pitāmaha | icchāma etadvijñātuṃ kāraṇaṃ yanna vāritā
और हे पितामह, आपने भी उसके वचन पर "तथास्तु" कह दिया। हम जानना चाहते हैं कि उसे रोका क्यों नहीं गया।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 11 (1.38.11)
बहवः पन्नगास्तीक्ष्णा घोररूपा विषोल्बणाः । प्रजानां हितकामोऽहं न च वारितवांस्तदा ॥
bahavaḥ pannagāstīkṣṇā ghorarūpā viṣolbaṇāḥ | prajānāṃ hitakāmo'haṃ na ca vāritavāṃstadā
सर्प बहुत हैं — क्रूर, भयानक रूप वाले और प्रचण्ड विष से भरे। प्रजा का हित चाहकर ही मैंने उस समय उसे नहीं रोका।
श्लोक 12 (1.38.12)
ये दन्दशूकाः क्षुद्राश्च पापाचारा विषोल्बणाः । तेषां विनाशो भविता न तु ये धर्मचारिणः ॥
ye dandaśūkāḥ kṣudrāśca pāpācārā viṣolbaṇāḥ | teṣāṃ vināśo bhavitā na tu ye dharmacāriṇaḥ
जो डसने वाले, क्षुद्र, पापाचारी और प्रचण्ड विष वाले हैं, उनका नाश होगा; पर जो धर्म का आचरण करते हैं, उनका नहीं।
श्लोक 13 (1.38.13)
यन्निमित्तं च भविता मोक्षस्तेषां महाभयात् । पन्नगानां निबोधध्वं तस्मिन्काले समागते ॥
yannimittaṃ ca bhavitā mokṣasteṣāṃ mahābhayāt | pannagānāṃ nibodhadhvaṃ tasminkāle samāgate
और जब वह समय आएगा, तब किस कारण उन नागों का उस महाभय से छुटकारा होगा, यह भी सुनो।
श्लोक 14 (1.38.14)
यायावरकुले धीमान्भविष्यति महानृषिः । जरत्कारुरिति ख्यातस्तपस्वी नियतेन्द्रियः ॥
yāyāvarakule dhīmānbhaviṣyati mahānṛṣiḥ | jaratkāruriti khyātastapasvī niyatendriyaḥ
यायावर कुल में जरत्कारु नाम से प्रसिद्ध एक बुद्धिमान महर्षि होंगे, जो तपस्वी और जितेन्द्रिय होंगे।
श्लोक 15 (1.38.15)
तस्य पुत्रो जरत्कारोर्भविष्यति तपोधनः । आस्तीको नाम यज्ञं स प्रतिषेत्स्यति तं तदा । तत्र मोक्ष्यन्ति भुजगा ये भविष्यन्ति धार्मिकाः ॥
tasya putro jaratkārorbhaviṣyati tapodhanaḥ | āstīko nāma yajñaṃ sa pratiṣetsyati taṃ tadā | tatra mokṣyanti bhujagā ye bhaviṣyanti dhārmikāḥ
उन जरत्कारु के आस्तीक नाम का एक तपस्वी पुत्र होगा। वह उस समय उस यज्ञ को रोक देगा, और जो नाग धर्मात्मा होंगे, वे उसमें बच जाएँगे।
देवा ऊचुः
श्लोक 16 (1.38.16)
स मुनिप्रवरो ब्रह्मञ्जरत्कारुर्महातपाः । कस्यां पुत्रं महात्मानं जनयिष्यति वीर्यवान् ॥
sa munipravaro brahmañjaratkārurmahātapāḥ | kasyāṃ putraṃ mahātmānaṃ janayiṣyati vīryavān
हे ब्रह्मन्, वे मुनिश्रेष्ठ, महातपस्वी, पराक्रमी जरत्कारु किस स्त्री से उस महात्मा पुत्र को उत्पन्न करेंगे?
ब्रह्मोवाच
श्लोक 17 (1.38.17)
वासुकेर्भगिनी कन्या समुत्पन्ना सुशोभना । तस्मै दास्यति तां कन्यां वासुकिर्भुजगोत्तमः ॥
vāsukerbhaginī kanyā samutpannā suśobhanā | tasmai dāsyati tāṃ kanyāṃ vāsukirbhujagottamaḥ
वासुकि की एक बहन, अत्यन्त सुन्दर कन्या, उत्पन्न हुई है। नागश्रेष्ठ वासुकि वह कन्या उन्हें ब्याह देंगे।
श्लोक 18 (1.38.18)
तस्यां जनयिता पुत्रं वेदवेदाङ्गपारगम् । सनामायां सनामा स कन्यायां द्विजसत्तमः ॥
tasyāṃ janayitā putraṃ vedavedāṅgapāragam | sanāmāyāṃ sanāmā sa kanyāyāṃ dvijasattamaḥ
उसी नाम वाली उस कन्या से, उसी नाम वाले वे द्विजश्रेष्ठ वेद-वेदांगों में पारंगत पुत्र उत्पन्न करेंगे।
एलापत्र उवाच
श्लोक 19 (1.38.19)
एवमस्त्विति तं देवाः पितामहमथाब्रुवन् । उक्त्वैवं वचनं देवान्विरिञ्चिस्त्रिदिवं ययौ ॥
evamastviti taṃ devāḥ pitāmahamathābruvan | uktvaivaṃ vacanaṃ devānviriñcistridivaṃ yayau
तब देवताओं ने पितामह से कहा — "ऐसा ही हो।" देवताओं से ऐसा कहकर ब्रह्मा स्वर्गलोक को चले गए।
श्लोक 20 (1.38.20)
सोऽहमेवं प्रपश्यामि वासुके भगिनी तव । जरत्कारुरिति ख्याता तां तस्मै प्रतिपादय ॥
so'hamevaṃ prapaśyāmi vāsuke bhaginī tava | jaratkāruriti khyātā tāṃ tasmai pratipādaya
इसलिए हे वासुकि, मैं ऐसा देखता हूँ कि आपकी बहन जरत्कारु नाम से प्रसिद्ध है। आप उसे उन मुनि को सौंप दें —
श्लोक 21 (1.38.21)
भैक्षवद्भिक्षमाणाय नागानां भयशान्तये । ऋषये सुव्रतायैनामेष मोक्षः श्रुतो मया ॥
bhaikṣavadbhikṣamāṇāya nāgānāṃ bhayaśāntaye | ṛṣaye suvratāyaināmeṣa mokṣaḥ śruto mayā
जब वे उत्तम व्रत वाले ऋषि भिक्षा की भाँति कन्या माँगें, तब नागों का भय मिटाने के लिए उसे उन्हें दे दें। छुटकारे का यही उपाय मैंने सुना है।