आदि पर्व · अध्याय 40
परीक्षित् और मौनव्रती मुनि
सौति जरत्कारु नाम का अर्थ बताते हैं, जो मुनि और वासुकि की बहन दोनों का नाम है, और फिर आस्तीक के जन्म की कथा आरम्भ करते हैं। मुनि जरत्कारु विवाह की इच्छा के बिना तप करते हुए पृथ्वी पर विचरते हैं। इसी बीच आखेट पर निकले राजा परीक्षित् का घायल मृग ओझल हो जाता है, और थके हुए राजा मौनव्रत धारण किए एक मुनि से उसके बारे में पूछते हैं; उत्तर न मिलने पर क्रोधित होकर वे मुनि के कंधे पर एक मरा हुआ साँप डाल देते हैं और नगर लौट जाते हैं। मुनि के तेजस्वी पुत्र शृंगी को यह बात तब पता चलती है जब उसका मित्र कृश उसके पिता के मुर्दा ढोने पर उसका उपहास करता है।
शौनक उवाच
श्लोक 1 (1.40.1)
जरत्कारुरिति ख्यातो यस्त्वया सूतनन्दन । इच्छामि तदहं श्रोतुं ऋषेस्तस्य महात्मनः ॥
jaratkāruriti khyāto yastvayā sūtanandana | icchāmi tadahaṃ śrotuṃ ṛṣestasya mahātmanaḥ
हे सूतनन्दन, जिन महात्मा ऋषि को तुमने जरत्कारु नाम से बताया, उनके विषय में मैं सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (1.40.2)
किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत्प्रथितं भुवि । जरत्कारुनिरुक्तिं त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥
kiṃ kāraṇaṃ jaratkārornāmaitatprathitaṃ bhuvi | jaratkāruniruktiṃ tvaṃ yathāvadvaktumarhasi
जरत्कारु का यह नाम पृथ्वी पर किस कारण प्रसिद्ध हुआ? जरत्कारु नाम का अर्थ तुम ठीक-ठीक बताओ।
सौतिरुवाच
श्लोक 3 (1.40.3)
जरेति क्षयमाहुर्वै दारुणं कारुसंज्ञितम् । शरीरं कारु तस्यासीत्तत्स धीमाञ्शनैःशनैः ॥
jareti kṣayamāhurvai dāruṇaṃ kārusaṃjñitam | śarīraṃ kāru tasyāsīttatsa dhīmāñśanaiḥśanaiḥ
'जरा' का अर्थ क्षय कहा गया है और 'कारु' दारुण (विशाल) का नाम है। उनका शरीर दारुण था, और उस बुद्धिमान ने धीरे-धीरे
श्लोक 4 (1.40.4)
क्षपयामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते । जरत्कारुरिति ब्रह्मन्वासुकेर्भगिनी तथा ॥
kṣapayāmāsa tīvreṇa tapasetyata ucyate | jaratkāruriti brahmanvāsukerbhaginī tathā
कठोर तप से उसे क्षीण कर डाला; इसीलिए, हे ब्रह्मन्, वे जरत्कारु कहलाते हैं। वासुकि की बहन का नाम भी इसी प्रकार जरत्कारु है।
श्लोक 5 (1.40.5)
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत्तदा । उग्रश्रवसमामन्त्र्य उपपन्नमिति ब्रुवन् ॥
evamuktastu dharmātmā śaunakaḥ prāhasattadā | ugraśravasamāmantrya upapannamiti bruvan
यह सुनकर धर्मात्मा शौनक हँस पड़े और उग्रश्रवा को सम्बोधित करके बोले — "यह ठीक है।"
शौनक उवाच
श्लोक 6 (1.40.6)
उक्तं नाम यथा पूर्वं सर्वं तच्छ्रुतवानहम् । यथा तु जातो ह्यास्तीक एतदिच्छामि वेदितुम् । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सौतिः प्रोवाच शास्त्रतः ॥
uktaṃ nāma yathā pūrvaṃ sarvaṃ tacchrutavānaham | yathā tu jāto hyāstīka etadicchāmi veditum | tacchrutvā vacanaṃ tasya sautiḥ provāca śāstrataḥ
नाम के विषय में तुमने पहले जो कहा, वह सब मैंने सुन लिया। अब मैं जानना चाहता हूँ कि आस्तीक का जन्म कैसे हुआ। — उनकी यह बात सुनकर सौति ने परम्परा के अनुसार कहना आरम्भ किया।
सौतिरुवाच
श्लोक 7 (1.40.7)
संदिश्य पन्नगान्सर्वान्वासुकिः सुसमाहितः । स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति ॥
saṃdiśya pannagānsarvānvāsukiḥ susamāhitaḥ | svasāramudyamya tadā jaratkārumṛṣiṃ prati
वासुकि ने पूरी सावधानी के साथ सब नागों को आदेश दिया और अपनी बहन को ऋषि जरत्कारु के लिए तैयार रखा।
श्लोक 8 (1.40.8)
अथ कालस्य महतः स मुनिः संशितव्रतः । तपस्यभिरतो धीमान्स दारान्नाभ्यकाङ्क्षत ॥
atha kālasya mahataḥ sa muniḥ saṃśitavrataḥ | tapasyabhirato dhīmānsa dārānnābhyakāṅkṣata
फिर बहुत समय बीत गया, पर कठोर व्रत वाले, तप में लीन वे बुद्धिमान मुनि पत्नी की इच्छा नहीं करते थे।
श्लोक 9 (1.40.9)
स तूर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः । स्वाध्यायवान्वीतभयः कृतात्मा । चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा । न चापि दारान्मनसाप्यकाङ्क्षत् ॥
sa tūrdhvaretāstapasi prasaktaḥ | svādhyāyavānvītabhayaḥ kṛtātmā | cacāra sarvāṃ pṛthivīṃ mahātmā | na cāpi dārānmanasāpyakāṅkṣat
वे ऊर्ध्वरेता, तप में आसक्त, स्वाध्यायशील, निर्भय और आत्मसंयमी महात्मा सारी पृथ्वी पर विचरते रहे, और उन्होंने मन से भी पत्नी की कामना नहीं की।
श्लोक 10 (1.40.10)
ततोऽपरस्मिन्संप्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु । परिक्षिन्नाम राजासीद्ब्रह्मन्कौरववंशजः ॥
tato'parasminsaṃprāpte kāle kasmiṃścideva tu | parikṣinnāma rājāsīdbrahmankauravavaṃśajaḥ
फिर आगे चलकर किसी समय, हे ब्रह्मन्, कौरव वंश में उत्पन्न परीक्षित् नाम के एक राजा हुए।
श्लोक 11 (1.40.11)
यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि । बभूव मृगयाशीलः पुरास्य प्रपितामहः ॥
yathā pāṇḍurmahābāhurdhanurdharavaro yudhi | babhūva mṛgayāśīlaḥ purāsya prapitāmahaḥ
जैसे उनके प्रपितामह, युद्ध में श्रेष्ठ धनुर्धर महाबाहु पाण्डु, प्राचीन काल में आखेट के प्रेमी थे,
श्लोक 12 (1.40.12)
तथा विख्यातवाँल्लोके परीक्षिदभिमन्युजः । मृगान्विध्यन्वराहांश्च तरक्षून्महिषांस्तथा । अन्यांश्च विविधान्वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ॥
tathā vikhyātavām̐lloke parīkṣidabhimanyujaḥ | mṛgānvidhyanvarāhāṃśca tarakṣūnmahiṣāṃstathā | anyāṃśca vividhānvanyāṃścacāra pṛthivīpatiḥ
वैसे ही अभिमन्युपुत्र परीक्षित् भी संसार में विख्यात थे। हिरनों, सूअरों, लकड़बग्घों, भैंसों और तरह-तरह के दूसरे वन्य पशुओं को बाणों से बेधते हुए वे पृथ्वीपति वनों में विचरते थे।
श्लोक 13 (1.40.13)
स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा । पृष्ठतो धनुरादाय ससार गहने वने ॥
sa kadācinmṛgaṃ viddhvā bāṇenānataparvaṇā | pṛṣṭhato dhanurādāya sasāra gahane vane
एक बार झुकी गाँठ वाले बाण से एक मृग को बेधकर वे धनुष लिए उसके पीछे-पीछे घने वन में चले गए,
श्लोक 14 (1.40.14)
यथैव भगवान्रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि । अन्वगच्छद्धनुष्पाणिः पर्यन्वेष्टुमितस्ततः ॥
yathaiva bhagavānrudro viddhvā yajñamṛgaṃ divi | anvagacchaddhanuṣpāṇiḥ paryanveṣṭumitastataḥ
जैसे भगवान् रुद्र ने स्वर्ग में यज्ञरूपी मृग को बेधकर हाथ में धनुष लिए इधर-उधर ढूँढ़ते हुए उसका पीछा किया था।
श्लोक 15 (1.40.15)
न हि तेन मृगो विद्धो जीवन्गच्छति वै वने । पूर्वरूपं तु तत्तूर्णं तस्यासीत्स्वर्गतिं प्रति ॥
na hi tena mṛgo viddho jīvangacchati vai vane | pūrvarūpaṃ tu tattūrṇaṃ tasyāsītsvargatiṃ prati
उनके बाण से बिंधा कोई मृग कभी जीवित होकर वन में नहीं जाता था। यह तो निश्चय ही उनकी शीघ्र होने वाली स्वर्ग-यात्रा का पूर्व-संकेत था।
श्लोक 16 (1.40.16)
परिक्षितो नरेन्द्रस्य विद्धो यन्नष्टवान्मृगः । दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः ॥
parikṣito narendrasya viddho yannaṣṭavānmṛgaḥ | dūraṃ cāpahṛtastena mṛgeṇa sa mahīpatiḥ
राजा परीक्षित् का बेधा हुआ वह मृग ओझल हो गया, और वह मृग राजा को बहुत दूर खींच ले गया।
श्लोक 17 (1.40.17)
परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने । गवां प्रचारेष्वासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम् ॥
pariśrāntaḥ pipāsārta āsasāda muniṃ vane | gavāṃ pracāreṣvāsīnaṃ vatsānāṃ mukhaniḥsṛtam
थके और प्यास से व्याकुल राजा को वन में गौओं के चरागाह में बैठे एक मुनि मिले। दूध पीते बछड़ों के मुख से निकलने वाले
श्लोक 18 (1.40.18)
भूयिष्ठमुपयुञ्जानं फेनमापिबतां पयः । तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् ॥
bhūyiṣṭhamupayuñjānaṃ phenamāpibatāṃ payaḥ | tamabhidrutya vegena sa rājā saṃśitavratam
फेन का ही वे भरपूर सेवन करते थे। उन कठोर व्रत वाले मुनि के पास वेग से दौड़कर पहुँचने के बाद
श्लोक 19 (1.40.19)
अपृच्छद्धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः । भोभो ब्रह्मन्नहं राजा परीक्षिदभिमन्युजः ॥
apṛcchaddhanurudyamya taṃ muniṃ kṣucchramānvitaḥ | bhobho brahmannahaṃ rājā parīkṣidabhimanyujaḥ
भूख और थकान से व्याकुल राजा ने धनुष उठाकर उनसे पूछा — "हे ब्रह्मन्! मैं अभिमन्यु का पुत्र राजा परीक्षित् हूँ।
श्लोक 20 (1.40.20)
मया विद्धो मृगो नष्टः कच्चित्तं दृष्टवानसि । स मुनिस्तं तु नोवाच किंचिन्मौनव्रते स्थितः ॥
mayā viddho mṛgo naṣṭaḥ kaccittaṃ dṛṣṭavānasi | sa munistaṃ tu novāca kiṃcinmaunavrate sthitaḥ
मेरे बाण से बिंधा एक मृग खो गया है। क्या तुमने उसे देखा है?" किन्तु मौनव्रत में स्थित उन मुनि ने उनसे कुछ भी नहीं कहा।
श्लोक 21 (1.40.21)
तस्य स्कन्धे मृतं सर्पं क्रुद्धो राजा समासजत् । समुत्क्षिप्य धनुष्कोट्या स चैनं समुपैक्षत ॥
tasya skandhe mṛtaṃ sarpaṃ kruddho rājā samāsajat | samutkṣipya dhanuṣkoṭyā sa cainaṃ samupaikṣata
तब क्रोधित राजा ने धनुष की नोक से एक मरा हुआ साँप उठाकर उनके कंधे पर डाल दिया। मुनि ने उनकी ओर देखा भर, और कुछ नहीं किया।
श्लोक 22 (1.40.22)
न स किंचिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाऽशुभम् । स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम् । दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वासीत्तथैव सः ॥
na sa kiṃciduvācainaṃ śubhaṃ vā yadi vā'śubham | sa rājā krodhamutsṛjya vyathitastaṃ tathāgatam | dṛṣṭvā jagāma nagaramṛṣistvāsīttathaiva saḥ
उन्होंने राजा से भला-बुरा कुछ नहीं कहा। उन्हें उस दशा में देखकर राजा का क्रोध उतर गया, वे व्यथित हुए और नगर लौट गए; पर ऋषि जैसे थे, वैसे ही बैठे रहे।
श्लोक 23 (1.40.23)
न हि तं राजशार्दूलं क्षमाशीलो महामुनिः । स्वधर्मनिरतं भूपं समाक्षिप्तोऽप्यधर्षयत् ॥
na hi taṃ rājaśārdūlaṃ kṣamāśīlo mahāmuniḥ | svadharmanirataṃ bhūpaṃ samākṣipto'pyadharṣayat
क्षमाशील महामुनि ने अपमानित होकर भी अपने धर्म में लगे उस नृपश्रेष्ठ राजा का कोई अनिष्ट नहीं किया।
श्लोक 24 (1.40.24)
न हि तं राजशार्दूलस्तथा धर्मपरायणम् । जानाति भरतश्रेष्ठस्तत एनमधर्षयत् ॥
na hi taṃ rājaśārdūlastathā dharmaparāyaṇam | jānāti bharataśreṣṭhastata enamadharṣayat
और उस भरतश्रेष्ठ नृपसिंह ने भी नहीं जाना था कि वे मुनि ऐसे धर्मपरायण हैं; इसी कारण उसने उनका अपमान किया।
श्लोक 25 (1.40.25)
तरुणस्तस्य पुत्रोऽभूत्तिग्मतेजा महातपाः । शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रसादो महाव्रतः ॥
taruṇastasya putro'bhūttigmatejā mahātapāḥ | śṛṅgī nāma mahākrodho duṣprasādo mahāvrataḥ
उन मुनि का एक युवा पुत्र था — प्रखर तेजस्वी, महातपस्वी, शृंगी नाम का; वह अत्यन्त क्रोधी, कठिनाई से प्रसन्न होने वाला और कठोर व्रतधारी था।
श्लोक 26 (1.40.26)
स देवं परमासीनं सर्वभूतहिते रतम् । ब्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंयतः ॥
sa devaṃ paramāsīnaṃ sarvabhūtahite ratam | brahmāṇamupatasthe vai kāle kāle susaṃyataḥ
वह समय-समय पर पूर्ण संयम के साथ परम पद पर आसीन, सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले देव ब्रह्मा की सेवा में उपस्थित होता था।
श्लोक 27 (1.40.27)
स तेन समनुज्ञातो ब्रह्मणा गृहमेयिवान् । सख्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल ॥
sa tena samanujñāto brahmaṇā gṛhameyivān | sakhyoktaḥ krīḍamānena sa tatra hasatā kila
ब्रह्मा से आज्ञा पाकर वह घर लौटा था, तब कहते हैं, वहाँ खेलते और हँसते हुए उसके एक मित्र ने उससे कुछ कहा।
श्लोक 28 (1.40.28)
संरम्भात्कोपनोऽतीव विषकल्पो मुनेः सुतः । उद्दिश्य पितरं तस्य यच्छ्रुत्वा रोषमाहरत् । ऋषिपुत्रेण नर्मार्थे कृशेन द्विजसत्तम ॥
saṃrambhātkopano'tīva viṣakalpo muneḥ sutaḥ | uddiśya pitaraṃ tasya yacchrutvā roṣamāharat | ṛṣiputreṇa narmārthe kṛśena dvijasattama
मुनि का वह पुत्र उतावला, अत्यन्त क्रोधी और विष के समान था। हे द्विजश्रेष्ठ, ऋषिपुत्र कृश ने हँसी-हँसी में उसके पिता के विषय में जो कहा, उसे सुनकर वह रोष से भर उठा। कृश ने कहा था —
कृश उवाच
श्लोक 29 (1.40.29)
तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः । शवं स्कन्धेन वहति मा शृङ्गिन्गर्वितो भव ॥
tejasvinastava pitā tathaiva ca tapasvinaḥ | śavaṃ skandhena vahati mā śṛṅgingarvito bhava
तुम्हारे पिता तेजस्वी और तपस्वी होकर भी अपने कंधे पर एक मुर्दा ढो रहे हैं। शृंगी, घमण्ड मत करो।
श्लोक 30 (1.40.30)
व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म किंचिद्वचो वद । अस्मद्विधेषु सिद्धेषु ब्रह्मवित्सु तपस्विषु ॥
vyāharatsvṛṣiputreṣu mā sma kiṃcidvaco vada | asmadvidheṣu siddheṣu brahmavitsu tapasviṣu
जब हम जैसे सिद्ध, ब्रह्मज्ञानी, तपस्वी ऋषिपुत्र बात कर रहे हों, तब तुम एक शब्द भी मत बोलना।
श्लोक 31 (1.40.31)
क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः । दर्पजाः पितरं द्रष्टा यस्त्वं शवधरं तथा ॥
kva te puruṣamānitvaṃ kva te vācastathāvidhāḥ | darpajāḥ pitaraṃ draṣṭā yastvaṃ śavadharaṃ tathā
अब कहाँ गया तुम्हारे पौरुष का अभिमान, कहाँ गईं तुम्हारी वे घमण्ड-भरी बातें, जब तुम अपने पिता को इस तरह मुर्दा ढोते देखोगे?
श्लोक 32 (1.40.32)
पित्रा च तव तत्कर्म नानुरूपमिवात्मनः । कृतं मुनिजनश्रेष्ठ येनाहं भृशदुःखितः ॥
pitrā ca tava tatkarma nānurūpamivātmanaḥ | kṛtaṃ munijanaśreṣṭha yenāhaṃ bhṛśaduḥkhitaḥ
हे मुनिश्रेष्ठ, तुम्हारे पिता ने जो काम किया है, वह उनके योग्य नहीं लगता; इससे मुझे बहुत दुःख हुआ है।