Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 41

शृङ्गी का परिक्षित् को शाप

अपने साथी कृश से यह सुनकर कि राजा परिक्षित् ने उसके मौन पिता के कंधे पर मरा हुआ साँप डाल दिया है, युवा ऋषि शृङ्गी क्रोध से भड़क उठता है और राजा को शाप देता है कि सात रातों के भीतर नाग तक्षक उसे यमलोक पहुँचा देगा। जब वह यह बात पिता को बताता है, तो शमीक उसे डाँटते हैं — प्रजा की रक्षा करने वाला राजा ही धर्म, यज्ञ और सबके कल्याण का आधार है, और भूखे-थके परिक्षित् ने उनके मौनव्रत को जाने बिना ही वह काम किया था।

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42

सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.41.1)

एवमुक्तः स तेजस्वी शृङ्गी कोपसमन्वितः । मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना ॥

evamuktaḥ sa tejasvī śṛṅgī kopasamanvitaḥ | mṛtadhāraṃ guruṃ śrutvā paryatapyata manyunā

ऐसा कहे जाने पर तेजस्वी शृङ्गी क्रोध से भर उठा। अपने पिता और गुरु के मृत शरीर ढोने की बात सुनकर वह रोष से संतप्त हो गया।

श्लोक 2 (1.41.2)

स तं कृशमभिप्रेक्ष्य सूनृतां वाचमुत्सृजन् । अपृच्छत्तं कथं तातः सर्वभूतहिते रतः ॥

sa taṃ kṛśamabhiprekṣya sūnṛtāṃ vācamutsṛjan | apṛcchattaṃ kathaṃ tātaḥ sarvabhūtahite rataḥ

उसने कृश की ओर देखकर मधुर वाणी में पूछा — "मेरे पिता, जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं,

शृङ्ग्युवाच

श्लोक 3 (1.41.3)

अनन्यचेताः सततं विष्णुं देवमतोषयत् । वन्यान्नभोजी सततं मुनिर्मौनव्रते स्थितः । एवंभूतः स तेजस्वी स मेऽद्य मृतधारकः ॥

ananyacetāḥ satataṃ viṣṇuṃ devamatoṣayat | vanyānnabhojī satataṃ munirmaunavrate sthitaḥ | evaṃbhūtaḥ sa tejasvī sa me'dya mṛtadhārakaḥ

जो अनन्य चित्त से निरंतर भगवान् विष्णु को प्रसन्न करते आए हैं, जो सदा वन के अन्न पर जीते हैं और मौनव्रत में स्थित मुनि हैं — ऐसे तेजस्वी पिता आज मृत वस्तु कैसे ढो रहे हैं?"

कृश उवाच

श्लोक 4 (1.41.4)

राज्ञा परिक्षिता तात मृगयां परिधावता । अवसक्तः पितुस्तेऽद्य मृतः स्कन्धे भुजङ्गमः ॥

rājñā parikṣitā tāta mṛgayāṃ paridhāvatā | avasaktaḥ pituste'dya mṛtaḥ skandhe bhujaṅgamaḥ

"तात, शिकार के लिए इधर-उधर दौड़ते राजा परिक्षित् ने आज तुम्हारे पिता के कंधे पर एक मरा हुआ साँप डाल दिया है।"

शृङ्ग्युवाच

श्लोक 5 (1.41.5)

किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः । ब्रूहि तत्कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो बलम् ॥

kiṃ me pitrā kṛtaṃ tasya rājño'niṣṭaṃ durātmanaḥ | brūhi tatkṛśa tattvena paśya me tapaso balam

"मेरे पिता ने उस दुष्टात्मा राजा का क्या अनिष्ट किया था? कृश, मुझे ठीक-ठीक बताओ, और फिर मेरी तपस्या का बल देखो।"

कृश उवाच

श्लोक 6 (1.41.6)

स राजा मृगयां यातः परिक्षिदभिमन्युजः । ससार मृगमेकाकी विद्ध्वा बाणेन शीघ्रगम् ॥

sa rājā mṛgayāṃ yātaḥ parikṣidabhimanyujaḥ | sasāra mṛgamekākī viddhvā bāṇena śīghragam

"अभिमन्यु के पुत्र राजा परिक्षित् शिकार खेलने निकले थे। उन्होंने एक तेज़ दौड़ने वाले मृग को बाण से बींधा और अकेले ही उसका पीछा किया।

श्लोक 7 (1.41.7)

न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन्महावने । पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम् ॥

na cāpaśyanmṛgaṃ rājā caraṃstasminmahāvane | pitaraṃ te sa dṛṣṭvaiva papracchānabhibhāṣiṇam

उस विशाल वन में घूमते हुए राजा को वह मृग दिखाई नहीं दिया। तुम्हारे पिता को देखते ही उन्होंने उनसे पूछा, पर वे कुछ नहीं बोले।

श्लोक 8 (1.41.8)

तं स्थाणुभूतं तिष्ठन्तं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः । पुनःपुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ॥

taṃ sthāṇubhūtaṃ tiṣṭhantaṃ kṣutpipāsāśramāturaḥ | punaḥpunarmṛgaṃ naṣṭaṃ papraccha pitaraṃ tava

भूख, प्यास और थकान से व्याकुल राजा ने ठूँठ की भाँति निश्चल खड़े तुम्हारे पिता से बार-बार उस खोए हुए मृग के विषय में पूछा।

श्लोक 9 (1.41.9)

स च मौनव्रतोपेतो नैव तं प्रत्यभाषत । तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्पं स्कन्धे समासजत् ॥

sa ca maunavratopeto naiva taṃ pratyabhāṣata | tasya rājā dhanuṣkoṭyā sarpaṃ skandhe samāsajat

मौनव्रत में होने के कारण उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। तब राजा ने धनुष की नोक से एक साँप उनके कंधे पर रख दिया।

श्लोक 10 (1.41.10)

शृङ्गिंस्तव पिता सोऽपि तथैवास्ते यतव्रतः । सोऽपि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्वयम् ॥

śṛṅgiṃstava pitā so'pi tathaivāste yatavrataḥ | so'pi rājā svanagaraṃ prasthito gajasāhvayam

शृङ्गी, तुम्हारे पिता अब भी उसी प्रकार अपने व्रत में स्थिर बैठे हैं, और राजा अपने नगर हस्तिनापुर को चले गए हैं।"

सौतिरुवाच

श्लोक 11 (1.41.11)

श्रुत्वैवमृषिपुत्रस्तु शवं स्कन्धे प्रतिष्ठितम् । कोपसंरक्तनयनः प्रज्वलन्निव मन्युना ॥

śrutvaivamṛṣiputrastu śavaṃ skandhe pratiṣṭhitam | kopasaṃraktanayanaḥ prajvalanniva manyunā

यह सुनकर कि उसके पिता के कंधे पर शव रखा गया है, ऋषिपुत्र की आँखें क्रोध से लाल हो गईं और वह मानो रोष से जल उठा।

श्लोक 12 (1.41.12)

आविष्टः स हि कोपेन शशाप नृपतिं तदा । वार्युपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगबलात्कृतः ॥

āviṣṭaḥ sa hi kopena śaśāpa nṛpatiṃ tadā | vāryupaspṛśya tejasvī krodhavegabalātkṛtaḥ

क्रोध से आविष्ट उस तेजस्वी ने जल का स्पर्श (आचमन) किया और क्रोध के वेग से विवश होकर उसी समय राजा को शाप दे दिया।

शृङ्ग्युवाच

श्लोक 13 (1.41.13)

योऽसौ वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य ह । स्कन्धे मृतं समास्राक्षीत्पन्नगं राजकिल्विषी ॥

yo'sau vṛddhasya tātasya tathā kṛcchragatasya ha | skandhe mṛtaṃ samāsrākṣītpannagaṃ rājakilviṣī

"जिस अपराधी राजा ने मेरे वृद्ध और ऐसे कष्ट में पड़े पिता के कंधे पर मरा हुआ साँप डाल दिया,

श्लोक 14 (1.41.14)

तं पापमतिसंक्रुद्धस्तक्षकः पन्नगेश्वरः । आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः ॥

taṃ pāpamatisaṃkruddhastakṣakaḥ pannageśvaraḥ | āśīviṣastigmatejā madvākyabalacoditaḥ

उस पापी को अत्यंत क्रुद्ध, प्रचण्ड तेज वाला विषधर नागराज तक्षक, मेरे वचन के बल से प्रेरित होकर,

श्लोक 15 (1.41.15)

सप्तरात्रादितो नेता यमस्य सदनं प्रति । द्विजानामवमन्तारं कुरूणामयशस्करम् ॥

saptarātrādito netā yamasya sadanaṃ prati | dvijānāmavamantāraṃ kurūṇāmayaśaskaram

आज से सात रातों के भीतर यमराज के लोक में पहुँचा देगा — ब्राह्मणों का अपमान करने वाले, कुरुवंश को कलंकित करने वाले उस राजा को!"

सौतिरुवाच

श्लोक 16 (1.41.16)

इति शप्त्वातिसंक्रुद्धः शृङ्गी पितरमभ्यगात् । आसीनं गोव्रजे तस्मिन्वहन्तं शवपन्नगम् ॥

iti śaptvātisaṃkruddhaḥ śṛṅgī pitaramabhyagāt | āsīnaṃ govraje tasminvahantaṃ śavapannagam

अत्यंत क्रोध में यह शाप देकर शृङ्गी अपने पिता के पास गया, जो उस गोशाला में मरा हुआ साँप धारण किए बैठे थे।

श्लोक 17 (1.41.17)

स तमालक्ष्य पितरं शृङ्गी स्कन्धगतेन वै । शवेन भुजगेनासीद्भूयः क्रोधसमाकुलः ॥

sa tamālakṣya pitaraṃ śṛṅgī skandhagatena vai | śavena bhujagenāsīdbhūyaḥ krodhasamākulaḥ

पिता के कंधे पर पड़े उस मरे हुए साँप को देखकर शृङ्गी फिर से क्रोध से व्याकुल हो उठा।

श्लोक 18 (1.41.18)

दुःखाच्चाश्रूणि मुमुचे पितरं चेदमब्रवीत् । श्रुत्वेमां धर्षणां तात तव तेन दुरात्मना ॥

duḥkhāccāśrūṇi mumuce pitaraṃ cedamabravīt | śrutvemāṃ dharṣaṇāṃ tāta tava tena durātmanā

दुःख से उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और उसने पिता से कहा — "तात, उस दुष्टात्मा द्वारा आपके इस अपमान की बात सुनकर,

शृङ्ग्युवाच

श्लोक 19 (1.41.19)

राज्ञा परिक्षिता कोपादशपं तमहं नृपम् । यथार्हति स एवोग्रं शापं कुरुकुलाधमः । सप्तमेऽहनि तं पापं तक्षकः पन्नगोत्तमः ॥

rājñā parikṣitā kopādaśapaṃ tamahaṃ nṛpam | yathārhati sa evograṃ śāpaṃ kurukulādhamaḥ | saptame'hani taṃ pāpaṃ takṣakaḥ pannagottamaḥ

राजा परिक्षित् को मैंने क्रोध में शाप दे दिया है; कुरुकुल का वह अधम इसी कठोर शाप के योग्य है। सातवें दिन नागश्रेष्ठ तक्षक उस पापी को

श्लोक 20 (1.41.20)

वैवस्वतस्य सदनं नेता परमदारुणम् । तमब्रवीत्पिता ब्रह्मंस्तथा कोपसमन्वितम् ॥

vaivasvatasya sadanaṃ netā paramadāruṇam | tamabravītpitā brahmaṃstathā kopasamanvitam

वैवस्वत (यमराज) के अत्यंत भयानक लोक में ले जाएगा।" हे ब्रह्मन्, तब पिता ने क्रोध से भरे अपने पुत्र से कहा —

शमीक उवाच

श्लोक 21 (1.41.21)

न मे प्रियं कृतं तात नैष धर्मस्तपस्विनाम् । वयं तस्य नरेन्द्रस्य विषये निवसामहे ॥

na me priyaṃ kṛtaṃ tāta naiṣa dharmastapasvinām | vayaṃ tasya narendrasya viṣaye nivasāmahe

"पुत्र, तुमने मुझे प्रिय लगने वाला काम नहीं किया; यह तपस्वियों का धर्म नहीं है। हम उस नरेश के राज्य में रहते हैं

श्लोक 22 (1.41.22)

न्यायतो रक्षितास्तेन तस्य पापं न रोचये । सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञो ह्यस्मद्विधैः सदा ॥

nyāyato rakṣitāstena tasya pāpaṃ na rocaye | sarvathā vartamānasya rājño hyasmadvidhaiḥ sadā

और वे न्यायपूर्वक हमारी रक्षा करते हैं; मैं उनका अनिष्ट नहीं चाहता। राजा चाहे जैसा भी आचरण करे, हम जैसे लोगों को उसे सदा क्षमा ही करना चाहिए,

श्लोक 23 (1.41.23)

क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः । यदि राजा न संरक्षेत्पीडा नः परमा भवेत् ॥

kṣantavyaṃ putra dharmo hi hato hanti na saṃśayaḥ | yadi rājā na saṃrakṣetpīḍā naḥ paramā bhavet

क्योंकि पुत्र, आहत किया हुआ धर्म आहत करने वाले का ही नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं। यदि राजा हमारी रक्षा न करे तो हमें भारी पीड़ा भोगनी पड़े;

श्लोक 24 (1.41.24)

न शक्नुयाम चरितुं धर्मं पुत्र यथासुखम् । रक्षमाणा वयं तात राजभिर्धर्मदृष्टिभिः ॥

na śaknuyāma carituṃ dharmaṃ putra yathāsukham | rakṣamāṇā vayaṃ tāta rājabhirdharmadṛṣṭibhiḥ

पुत्र, हम सुखपूर्वक धर्म का आचरण नहीं कर पाते। धर्म पर दृष्टि रखने वाले राजाओं से रक्षित होकर ही

श्लोक 25 (1.41.25)

चरामो विपुलं धर्मं तेषां भागोऽस्ति धर्मतः । सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञः क्षन्तव्यमेव हि ॥

carāmo vipulaṃ dharmaṃ teṣāṃ bhāgo'sti dharmataḥ | sarvathā vartamānasya rājñaḥ kṣantavyameva hi

हम विपुल धर्म का आचरण कर पाते हैं, और धर्म के अनुसार उसमें उनका भी भाग होता है। राजा चाहे जैसा भी व्यवहार करे, उसे क्षमा ही करना चाहिए।

श्लोक 26 (1.41.26)

परिक्षित्तु विशेषेण यथाऽस्य प्रपितामहः । रक्षत्यस्मांस्तथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजा विभो ॥

parikṣittu viśeṣeṇa yathā'sya prapitāmahaḥ | rakṣatyasmāṃstathā rājñā rakṣitavyāḥ prajā vibho

और परिक्षित् तो विशेष रूप से अपने प्रपितामह की भाँति हमारी रक्षा करते हैं। हे समर्थ, राजा को प्रजा की ऐसी ही रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 27 (1.41.27)

अराजके जनपदे दोषा जायन्ति वै सदा । उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ॥

arājake janapade doṣā jāyanti vai sadā | udvṛttaṃ satataṃ lokaṃ rājā daṇḍena śāsti vai

राजा से रहित देश में सदा अनेक दोष उत्पन्न होते हैं। मर्यादा तोड़ने को तत्पर संसार को राजा ही दण्ड के द्वारा अनुशासित रखता है।

श्लोक 28 (1.41.28)

दण्डात्प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा । नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥

daṇḍātpratibhayaṃ bhūyaḥ śāntirutpadyate tadā | nodvignaścarate dharmaṃ nodvignaścarate kriyām

दण्ड से भय उत्पन्न होता है और फिर उससे शान्ति आती है। तब मनुष्य बिना उद्वेग के धर्म का पालन करता है और बिना उद्वेग के अपने कर्म करता है।

श्लोक 29 (1.41.29)

राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात्स्वर्गः प्रतिष्ठितः । राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञाद्देवाः प्रतिष्ठिताः ॥

rājñā pratiṣṭhito dharmo dharmātsvargaḥ pratiṣṭhitaḥ | rājño yajñakriyāḥ sarvā yajñāddevāḥ pratiṣṭhitāḥ

राजा से धर्म प्रतिष्ठित होता है और धर्म से स्वर्ग। यज्ञ की सारी क्रियाएँ राजा पर आश्रित हैं और यज्ञ पर देवता।

श्लोक 30 (1.41.30)

देवाद्वृष्टिः प्रवर्तेत वृष्टेरोषधयः स्मृताः । ओषधिभ्यो मनुष्याणां धारयन्सततं हितम् ॥

devādvṛṣṭiḥ pravarteta vṛṣṭeroṣadhayaḥ smṛtāḥ | oṣadhibhyo manuṣyāṇāṃ dhārayansatataṃ hitam

देवताओं से वर्षा होती है, वर्षा से औषधियाँ और अन्न उपजते हैं, और उन्हीं से मनुष्यों का हित होता है। उस हित को निरंतर धारण करने वाला,

श्लोक 31 (1.41.31)

मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकरः पुनः । दशश्रोत्रियसमो राजा इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥

manuṣyāṇāṃ ca yo dhātā rājā rājyakaraḥ punaḥ | daśaśrotriyasamo rājā ityevaṃ manurabravīt

मनुष्यों का पालनकर्ता और राज्य का संचालक राजा दस श्रोत्रिय ब्राह्मणों के समान है — ऐसा मनु ने कहा है।

श्लोक 32 (1.41.32)

तेनेह क्षुधितेनैत्य श्रान्तेन मृगलिप्सुना । अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥

teneha kṣudhitenaitya śrāntena mṛgalipsunā | ajānatā kṛtaṃ manye vratametadidaṃ mama

वे यहाँ भूखे और थके हुए, मृग की खोज में आए थे। मेरा मानना है कि उन्होंने मेरे इस व्रत को जाने बिना ही यह किया।

श्लोक 33 (1.41.33)

कस्मादिदं त्वया बाल्यात्सहसा दुष्कृतं कृतम् । न ह्यर्हति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा ॥

kasmādidaṃ tvayā bālyātsahasā duṣkṛtaṃ kṛtam | na hyarhati nṛpaḥ śāpamasmattaḥ putra sarvathā

तुमने बालबुद्धि के कारण सहसा यह दुष्कर्म क्यों कर डाला? पुत्र, राजा किसी भी प्रकार हमसे शाप पाने के योग्य नहीं हैं।"

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42