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आदि पर्व · अध्याय 42

शमीक की चेतावनी और मार्ग में काश्यप

शृङ्गी कहता है कि उसका शाप टल नहीं सकता, और शमीक उसे क्षमा का मार्ग अपनाने का उपदेश देते हैं, क्योंकि तपस्वियों को सिद्धि क्षमा से ही मिलती है। करुणा से प्रेरित होकर शमीक अपने शिष्य गौरमुख को राजा परिक्षित् को सावधान करने भेजते हैं। राजा को अपनी मृत्यु से अधिक दुःख मौनव्रती मुनि के प्रति किए अपराध का होता है। वे एक खंभे पर बने सुरक्षित महल में रहने लगते हैं। सातवें दिन ब्राह्मण काश्यप उनकी चिकित्सा के लिए निकलते हैं, और मार्ग में वृद्ध ब्राह्मण के वेश में तक्षक उनसे मिलकर उन्हें लौट जाने को कहता है।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

शृङ्ग्युवाच

श्लोक 1 (1.42.1)

यद्येतत्साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम् । प्रियं वाप्यप्रियं वा ते वागुक्ता न मृषा भवेत् ॥

yadyetatsāhasaṃ tāta yadi vā duṣkṛtaṃ kṛtam | priyaṃ vāpyapriyaṃ vā te vāguktā na mṛṣā bhavet

"पिताजी, यह दुस्साहस हो या दुष्कर्म, आपको प्रिय लगे या अप्रिय, मेरी कही हुई बात झूठी नहीं हो सकती।

श्लोक 2 (1.42.2)

नैवान्यथेदं भविता पितरेष ब्रवीमि ते । नाहं मृषा ब्रवीम्येवं स्वैरेष्वपि कुतः शपन् ॥

naivānyathedaṃ bhavitā pitareṣa bravīmi te | nāhaṃ mṛṣā bravīmyevaṃ svaireṣvapi kutaḥ śapan

पिताजी, मैं आपसे कहता हूँ, यह अन्यथा नहीं होगा। मैं हँसी में भी झूठ नहीं बोलता, फिर शाप देते समय तो बात ही क्या।"

शमीक उवाच

श्लोक 3 (1.42.3)

जानाम्युग्रप्रभावं त्वां तात सत्यगिरं तथा । नानृतं चोक्तपूर्वं ते नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥

jānāmyugraprabhāvaṃ tvāṃ tāta satyagiraṃ tathā | nānṛtaṃ coktapūrvaṃ te naitanmithyā bhaviṣyati

"पुत्र, मैं जानता हूँ कि तुम्हारा प्रभाव उग्र है और तुम सत्यवादी हो। तुमने पहले कभी असत्य नहीं कहा, इसलिए यह भी मिथ्या नहीं होगा।

श्लोक 4 (1.42.4)

पित्रा पुत्रो वयस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु । यथा स्याद्गुणसंयुक्तः प्राप्नुयाच्च महद्यशः ॥

pitrā putro vayastho'pi satataṃ vācya eva tu | yathā syādguṇasaṃyuktaḥ prāpnuyācca mahadyaśaḥ

फिर भी पुत्र बड़ा हो जाए तब भी पिता को उसे सदा उपदेश देते रहना चाहिए, जिससे वह गुणों से युक्त हो और महान यश प्राप्त करे।

श्लोक 5 (1.42.5)

किं पुनर्बाल एव त्वं तपसा भावितः सदा । वर्धते चेत्प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम् ॥

kiṃ punarbāla eva tvaṃ tapasā bhāvitaḥ sadā | vardhate cetprabhavatāṃ kopo'tīva mahātmanām

फिर तुम तो अभी बालक ही हो, यद्यपि सदा तप से संपन्न रहे हो। यदि सामर्थ्यवान महात्माओं का क्रोध बहुत बढ़ जाए,

श्लोक 6 (1.42.6)

उत्सीदेयुरिमे लोकाः क्षमा चास्य प्रतिक्रिया । सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वयि धर्मभृतां वर । पुत्रत्वं बालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम् ॥

utsīdeyurime lokāḥ kṣamā cāsya pratikriyā | so'haṃ paśyāmi vaktavyaṃ tvayi dharmabhṛtāṃ vara | putratvaṃ bālatāṃ caiva tavāvekṣya ca sāhasam

तो ये लोक नष्ट हो जाएँ, और इसका उपाय क्षमा ही है। इसलिए हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, तुम्हारे पुत्र होने, तुम्हारी बाल्यावस्था और तुम्हारे इस दुस्साहस को देखकर मुझे तुमसे कुछ कहना आवश्यक लगता है।

श्लोक 7 (1.42.7)

स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् । चर क्रोधमिमं हित्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥

sa tvaṃ śamaparo bhūtvā vanyamāhāramācaran | cara krodhamimaṃ hitvā naivaṃ dharmaṃ prahāsyasi

तुम शान्ति को अपनाकर, वन के आहार पर जीते हुए, इस क्रोध को त्यागकर विचरण करो; ऐसा करने से तुम अपना धर्म नहीं खोओगे।

श्लोक 8 (1.42.8)

क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् । ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥

krodho hi dharmaṃ harati yatīnāṃ duḥkhasaṃcitam | tato dharmavihīnānāṃ gatiriṣṭā na vidyate

क्योंकि क्रोध तपस्वियों के कष्ट से संचित धर्म को हर लेता है, और धर्म से रहित लोगों को अभीष्ट गति नहीं मिलती।

श्लोक 9 (1.42.9)

शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः । क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥

śama eva yatīnāṃ hi kṣamiṇāṃ siddhikārakaḥ | kṣamāvatāmayaṃ lokaḥ paraścaiva kṣamāvatām

क्षमाशील तपस्वियों को शान्ति ही सिद्धि दिलाती है। यह लोक भी क्षमावानों का है और परलोक भी क्षमावानों का।

श्लोक 10 (1.42.10)

तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः । क्षमया प्राप्स्यसे लोकान्ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥

tasmāccarethāḥ satataṃ kṣamāśīlo jitendriyaḥ | kṣamayā prāpsyase lokānbrahmaṇaḥ samanantarān

इसलिए तुम सदा क्षमाशील और जितेन्द्रिय होकर आचरण करो। क्षमा के द्वारा तुम ब्रह्मा के लोक के समीपवर्ती लोकों को प्राप्त करोगे।

श्लोक 11 (1.42.11)

मया तु शममास्थाय यच्छक्यं कर्तुमद्य वै । तत्करिष्याम्यहं तात प्रेषयिष्ये नृपाय वै ॥

mayā tu śamamāsthāya yacchakyaṃ kartumadya vai | tatkariṣyāmyahaṃ tāta preṣayiṣye nṛpāya vai

मैं तो शान्ति का आश्रय लेकर आज जो कुछ किया जा सकता है, वह करूँगा, पुत्र — मैं राजा के पास यह संदेश भेजूँगा:

श्लोक 12 (1.42.12)

मम पुत्रेण शप्तोऽसि बालेनाकृतबुद्धिना । ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेक्ष्य राजन्नमर्षिणा ॥

mama putreṇa śapto'si bālenākṛtabuddhinā | mamemāṃ dharṣaṇāṃ tvattaḥ prekṣya rājannamarṣiṇā

'राजन्, मेरे अबोध बालक पुत्र ने आपको शाप दे दिया है; आपके द्वारा किया गया मेरा यह अपमान देखकर वह उसे सहन नहीं कर सका।'"

सौतिरुवाच

श्लोक 13 (1.42.13)

एवमादिश्य शिष्यं स प्रेषयामास सुव्रतः । परिक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपाः ॥

evamādiśya śiṣyaṃ sa preṣayāmāsa suvrataḥ | parikṣite nṛpataye dayāpanno mahātapāḥ

इस प्रकार निर्देश देकर उन व्रतनिष्ठ महातपस्वी ने दया से द्रवित होकर एक शिष्य को राजा परिक्षित् के पास भेजा।

श्लोक 14 (1.42.14)

संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ॥

saṃdiśya kuśalapraśnaṃ kāryavṛttāntameva ca | śiṣyaṃ gauramukhaṃ nāma śīlavantaṃ samāhitam

उन्होंने गौरमुख नामक अपने सुशील और एकाग्रचित्त शिष्य को राजा का कुशल-समाचार पूछने तथा पूरी घटना बताने का संदेश देकर भेजा।

श्लोक 15 (1.42.15)

सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् । विवेश भवनं राज्ञः पूर्वं द्वास्थैर्निवेदितः ॥

so'bhigamya tataḥ śīghraṃ narendraṃ kuruvardhanam | viveśa bhavanaṃ rājñaḥ pūrvaṃ dvāsthairniveditaḥ

गौरमुख शीघ्र ही कुरुवंश की वृद्धि करने वाले राजा के पास पहुँचे और द्वारपालों द्वारा सूचना दिए जाने के बाद राजभवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 16 (1.42.16)

पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा । आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ॥

pūjitastu narendreṇa dvijo gauramukhastadā | ācakhyau ca pariśrānto rājñaḥ sarvamaśeṣataḥ

राजा ने ब्राह्मण गौरमुख का सत्कार किया। तब मार्ग से थके गौरमुख ने राजा को सारी बात बिना कुछ छोड़े कह सुनाई —

श्लोक 17 (1.42.17)

शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ । शमीको नाम राजेन्द्र वर्तते विषये तव ॥

śamīkavacanaṃ ghoraṃ yathoktaṃ mantrisannidhau | śamīko nāma rājendra vartate viṣaye tava

शमीक का वह गंभीर संदेश, जैसा कहा गया था, मन्त्रियों की उपस्थिति में: "राजेन्द्र, आपके राज्य में शमीक नाम के एक ऋषि रहते हैं,

गौरमुख उवाच

श्लोक 18 (1.42.18)

ऋषिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः । तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः ॥

ṛṣiḥ paramadharmātmā dāntaḥ śānto mahātapāḥ | tasya tvayā naravyāghra sarpaḥ prāṇairviyojitaḥ

वे परम धर्मात्मा, संयमी, शान्त और महातपस्वी हैं। हे नरश्रेष्ठ, आपने उन्हीं पर एक निष्प्राण सर्प

श्लोक 19 (1.42.19)

अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे मौनान्वितस्य च । क्षान्तवांस्तव तत्कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ॥

avasakto dhanuṣkoṭyā skandhe maunānvitasya ca | kṣāntavāṃstava tatkarma putrastasya na cakṣame

धनुष की नोक से उनके कंधे पर डाल दिया था, जब वे मौनव्रत में थे। उन्होंने आपका वह कर्म क्षमा कर दिया, पर उनके पुत्र ने उसे सहन नहीं किया।

श्लोक 20 (1.42.20)

तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमद्य वै । तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्तव भविष्यति ॥

tena śapto'si rājendra piturajñātamadya vai | takṣakaḥ saptarātreṇa mṛtyustava bhaviṣyati

हे राजेन्द्र, उसने आज अपने पिता के अनजाने में आपको शाप दे दिया है कि सात रातों के भीतर तक्षक आपकी मृत्यु बनेगा।

श्लोक 21 (1.42.21)

तत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाब्रवीत् । तदन्यथा न शक्यं च कर्तुं केनचिदप्युत ॥

tatra rakṣāṃ kuruṣveti punaḥ punarathābravīt | tadanyathā na śakyaṃ ca kartuṃ kenacidapyuta

उन्होंने बार-बार कहा है — 'इससे अपनी रक्षा का उपाय कीजिए।' इसे कोई भी अन्यथा नहीं कर सकता,

श्लोक 22 (1.42.22)

न हि शक्नोति संयन्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम् । ततोऽहं प्रेषितस्तेन तव राजन्हितार्थिना ॥

na hi śaknoti saṃyantuṃ putraṃ kopasamanvitam | tato'haṃ preṣitastena tava rājanhitārthinā

क्योंकि वे अपने क्रोधित पुत्र को रोक नहीं सकते। इसीलिए, राजन्, आपके हित की कामना से उन्होंने मुझे भेजा है।"

सौतिरुवाच

श्लोक 23 (1.42.23)

इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः । पर्यतप्यत तत्पापं कृत्वा राजा महातपाः ॥

iti śrutvā vaco ghoraṃ sa rājā kurunandanaḥ | paryatapyata tatpāpaṃ kṛtvā rājā mahātapāḥ

यह भयानक वचन सुनकर कुरुनन्दन, महातपस्वी राजा परिक्षित् उस पाप को करने के कारण पश्चात्ताप से संतप्त हो उठे।

श्लोक 24 (1.42.24)

तं च मौनव्रतं श्रुत्वा वने मुनिवरं तदा । भूय एवाभवद्राजा शोकसंतप्तमानसः ॥

taṃ ca maunavrataṃ śrutvā vane munivaraṃ tadā | bhūya evābhavadrājā śokasaṃtaptamānasaḥ

और जब उन्होंने सुना कि वन में वे श्रेष्ठ मुनि मौनव्रत में थे, तब राजा का मन और भी शोक से संतप्त हो गया।

श्लोक 25 (1.42.25)

अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च । पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत्किल्बिषं मुनेः ॥

anukrośātmatāṃ tasya śamīkasyāvadhārya ca | paryatapyata bhūyo'pi kṛtvā tatkilbiṣaṃ muneḥ

शमीक की करुणामय प्रकृति को समझकर, मुनि के प्रति किए अपने अपराध के कारण वे और भी अधिक पछताने लगे।

श्लोक 26 (1.42.26)

न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत । अशोचदमरप्रख्यो यथा कृत्वेह कर्म तत् ॥

na hi mṛtyuṃ tathā rājā śrutvā vai so'nvatapyata | aśocadamaraprakhyo yathā kṛtveha karma tat

देवतुल्य राजा को अपनी मृत्यु का समाचार सुनकर उतना दुःख नहीं हुआ, जितना यह कर्म कर बैठने का शोक हुआ।

श्लोक 27 (1.42.27)

ततस्तं प्रेषयामास राजा गौरमुखं तदा । भूयः प्रसादं भगवान्करोत्विह ममेति वै ॥

tatastaṃ preṣayāmāsa rājā gauramukhaṃ tadā | bhūyaḥ prasādaṃ bhagavānkarotviha mameti vai

तब राजा ने गौरमुख को यह कहकर वापस भेजा — "पूज्य मुनि मुझ पर फिर से कृपा करें।"

श्लोक 28 (1.42.28)

श्रुत्वा तु वचनं राज्ञो मुनिर्गौरमुखस्तदा । समनुज्ञाप्य वेगेन प्रजगामाश्रमं गुरोः ॥

śrutvā tu vacanaṃ rājño munirgauramukhastadā | samanujñāpya vegena prajagāmāśramaṃ guroḥ

राजा का वचन सुनकर मुनि गौरमुख ने विदा ली और शीघ्रता से अपने गुरु के आश्रम को लौट गए।

श्लोक 29 (1.42.29)

तस्मिंश्च गतमात्रेऽथ राजा गौरमुखे तदा । मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास सह संविग्नमानसः ॥

tasmiṃśca gatamātre'tha rājā gauramukhe tadā | mantribhirmantrayāmāsa saha saṃvignamānasaḥ

गौरमुख के जाते ही राजा ने व्याकुल मन से अपने मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा की।

श्लोक 30 (1.42.30)

संमन्त्र्य मन्त्रिभिश्चैव स तथा मन्त्रतत्त्ववित् । प्रासादं कारयामास एकस्तम्भं सुरक्षितम् ॥

saṃmantrya mantribhiścaiva sa tathā mantratattvavit | prāsādaṃ kārayāmāsa ekastambhaṃ surakṣitam

मन्त्रियों से विचार-विमर्श करके नीति के मर्मज्ञ राजा ने एक ही खंभे पर खड़ा, भली-भाँति सुरक्षित एक महल बनवाया।

श्लोक 31 (1.42.31)

रक्षां च विदधे तत्र भिषजश्चौषधानि च । ब्राह्मणान्मन्त्रसिद्धांश्च सर्वतो वै न्ययोजयत् ॥

rakṣāṃ ca vidadhe tatra bhiṣajaścauṣadhāni ca | brāhmaṇānmantrasiddhāṃśca sarvato vai nyayojayat

उन्होंने वहाँ रक्षा की व्यवस्था की, वैद्य और औषधियाँ रखवाईं, और चारों ओर मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणों को नियुक्त किया।

श्लोक 32 (1.42.32)

राजकार्याणि तत्रस्थः सर्वाण्येवाकरोच्च सः । मन्त्रिभिः सह धर्मज्ञः समन्तात्परिरक्षितः ॥

rājakāryāṇi tatrasthaḥ sarvāṇyevākarocca saḥ | mantribhiḥ saha dharmajñaḥ samantātparirakṣitaḥ

वहीं रहते हुए, चारों ओर से सुरक्षित उन धर्मज्ञ राजा ने मन्त्रियों के साथ राज्य के सारे कार्य किए।

श्लोक 33 (1.42.33)

न चैनं कश्चिदारूढं लभते राजसत्तमम् । वातोऽपि निश्चरंस्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते ॥

na cainaṃ kaścidārūḍhaṃ labhate rājasattamam | vāto'pi niścaraṃstatra praveśe vinivāryate

ऊपर चढ़ जाने के बाद उन श्रेष्ठ राजा तक कोई नहीं पहुँच सकता था; वहाँ बहती हुई वायु को भी भीतर आने से रोका जाता था।

श्लोक 34 (1.42.34)

प्राप्ते च दिवसे तस्मिन्सप्तमे द्विजसत्तमः । काश्यपोऽभ्यागमद्विद्वांस्तं राजानं चिकित्सितुम् ॥

prāpte ca divase tasminsaptame dvijasattamaḥ | kāśyapo'bhyāgamadvidvāṃstaṃ rājānaṃ cikitsitum

सातवाँ दिन आने पर विद्वान् द्विजश्रेष्ठ काश्यप राजा की चिकित्सा करने के लिए चल पड़े।

श्लोक 35 (1.42.35)

श्रुतं हि तेन तदभूद्यथा तं राजसत्तमम् । तक्षकः पन्नगश्रेष्ठो नेष्यते यमसादनम् ॥

śrutaṃ hi tena tadabhūdyathā taṃ rājasattamam | takṣakaḥ pannagaśreṣṭho neṣyate yamasādanam

क्योंकि उन्होंने सुना था कि नागश्रेष्ठ तक्षक उस श्रेष्ठ राजा को यमलोक पहुँचाने वाला है।

श्लोक 36 (1.42.36)

तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण करिष्येऽहमपज्वरम् । तत्र मेऽर्थश्च धर्मश्च भवितेति विचिन्तयन् ॥

taṃ daṣṭaṃ pannagendreṇa kariṣye'hamapajvaram | tatra me'rthaśca dharmaśca bhaviteti vicintayan

वे सोच रहे थे — "नागराज के डँसने के बाद मैं राजा को विष-ज्वर से मुक्त कर दूँगा; इससे मुझे धन भी मिलेगा और धर्म भी।"

श्लोक 37 (1.42.37)

तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं पथि । गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वयोऽतिगः ॥

taṃ dadarśa sa nāgendrastakṣakaḥ kāśyapaṃ pathi | gacchantamekamanasaṃ dvijo bhūtvā vayo'tigaḥ

नागराज तक्षक ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके मार्ग में एकाग्र मन से जाते हुए काश्यप को देखा।

श्लोक 38 (1.42.38)

तमब्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुंगवम् । क्व भवांस्त्वरितो याति किंच कार्यं चिकीर्षति ॥

tamabravītpannagendraḥ kāśyapaṃ munipuṃgavam | kva bhavāṃstvarito yāti kiṃca kāryaṃ cikīrṣati

नागराज ने मुनिश्रेष्ठ काश्यप से कहा — "आप इतनी शीघ्रता से कहाँ जा रहे हैं, और क्या करना चाहते हैं?"

काश्यप उवाच

श्लोक 39 (1.42.39)

नृपं कुरुकुलोत्पन्नं परिक्षितमरिंदमम् । तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाद्य प्रधक्ष्यति ॥

nṛpaṃ kurukulotpannaṃ parikṣitamariṃdamam | takṣakaḥ pannagaśreṣṭhastejasādya pradhakṣyati

"आज नागश्रेष्ठ तक्षक कुरुकुल में उत्पन्न शत्रुदमन राजा परिक्षित् को अपने तेज से भस्म कर देगा।

श्लोक 40 (1.42.40)

तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसम् । पाण्डवानां कुलकरं राजानममितौजसम् । गच्छामि त्वरितं सौम्य सद्यः कर्तुमपज्वरम् ॥

taṃ daṣṭaṃ pannagendreṇa tenāgnisamatejasam | pāṇḍavānāṃ kulakaraṃ rājānamamitaujasam | gacchāmi tvaritaṃ saumya sadyaḥ kartumapajvaram

अग्नि के समान तेजस्वी, अपार पराक्रमी, पाण्डवों के वंश को आगे बढ़ाने वाले उस राजा को जब नागराज डँस लेगा, तब उसे तुरन्त विष-ज्वर से मुक्त करने के लिए, हे सौम्य, मैं शीघ्रता से वहाँ जा रहा हूँ।

श्लोक 41 (1.42.41)

विज्ञातविषविद्योऽहं ब्राह्मणो लोकपूजितः । अस्मद्गुरुकटाक्षेण कल्योऽहं विषनाशने ॥

vijñātaviṣavidyo'haṃ brāhmaṇo lokapūjitaḥ | asmadgurukaṭākṣeṇa kalyo'haṃ viṣanāśane

मैं विष-विद्या का ज्ञाता, लोक में पूजित ब्राह्मण हूँ; अपने गुरु की कृपा-दृष्टि से मैं विष का नाश करने में समर्थ हूँ।"

तक्षक उवाच

श्लोक 42 (1.42.42)

अहं स तक्षको ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् । निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम् ॥

ahaṃ sa takṣako brahmaṃstaṃ dhakṣyāmi mahīpatim | nivartasva na śaktastvaṃ mayā daṣṭaṃ cikitsitum

"ब्रह्मन्, मैं ही वह तक्षक हूँ। मैं उस राजा को भस्म कर दूँगा। लौट जाइए — मेरे डँसे हुए की चिकित्सा आप नहीं कर सकते।"

काश्यप उवाच

श्लोक 43 (1.42.43)

अहं तं नृपतिं गत्वा त्वया दष्टमपज्वरम् । करिष्यामीति मे बुद्धिर्विद्याबलसमन्विता ॥

ahaṃ taṃ nṛpatiṃ gatvā tvayā daṣṭamapajvaram | kariṣyāmīti me buddhirvidyābalasamanvitā

"मैं उस राजा के पास जाऊँगा और तुम्हारे डँस लेने पर भी उसे विष-ज्वर से मुक्त कर दूँगा। मेरा यह निश्चय मेरी विद्या के बल पर टिका है।"

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43