आदि पर्व · अध्याय 43
तक्षक का काश्यप को लौटाना और परिक्षित् को डँसना
काश्यप की परीक्षा लेने के लिए तक्षक अपने दंश से एक बरगद को भस्म कर देता है, और काश्यप अपनी विद्या से उसे फिर जीवित कर देते हैं। तब तक्षक उनसे पूछता है कि वे किस लाभ के लिए जा रहे हैं, और राजा से मिलने वाले धन से अधिक धन देने का प्रस्ताव करता है। अपनी दिव्य दृष्टि से यह जानकर कि परिक्षित् की आयु पूरी हो चुकी है, काश्यप धन लेकर लौट जाते हैं। तक्षक तपस्वियों के वेश में सर्पों को राजा के पास फल भेंट करने भेजता है। एक फल से छोटा-सा कीड़ा निकलता है; सूर्यास्त के समय राजा हँसी में उसे अपनी गर्दन पर रख लेते हैं, और वही तक्षक बनकर उन्हें लपेट लेता है और डँस लेता है।
तक्षक उवाच
श्लोक 1 (1.43.1)
यदि दष्टं मयेह त्वं शक्तः किंचिच्चिकित्सितुम् । ततो वृक्षं मया दष्टमिमं जीवय काश्यप ॥
yadi daṣṭaṃ mayeha tvaṃ śaktaḥ kiṃciccikitsitum | tato vṛkṣaṃ mayā daṣṭamimaṃ jīvaya kāśyapa
"काश्यप, यदि तुम मेरे डँसे हुए किसी को भी ठीक करने में समर्थ हो, तो मेरे डँसे हुए इस वृक्ष को जीवित कर दिखाओ।
श्लोक 2 (1.43.2)
परं मन्त्रबलं यत्ते तद्दर्शय यतस्व च । न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ॥
paraṃ mantrabalaṃ yatte taddarśaya yatasva ca | nyagrodhamenaṃ dhakṣyāmi paśyataste dvijottama
तुम्हारे मन्त्रों में जो परम बल है, उसे दिखाओ और प्रयत्न करो। हे द्विजश्रेष्ठ, मैं तुम्हारे देखते-देखते इस बरगद को भस्म कर दूँगा।"
काश्यप उवाच
श्लोक 3 (1.43.3)
दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यद्येतदभिमन्यसे । अहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजंगम । पश्य मन्त्रबलं मेऽद्य न्यग्रोधं दश पन्नग ॥
daśa nāgendra vṛkṣaṃ tvaṃ yadyetadabhimanyase | ahamenaṃ tvayā daṣṭaṃ jīvayiṣye bhujaṃgama | paśya mantrabalaṃ me'dya nyagrodhaṃ daśa pannaga
"नागराज, यदि तुम्हारा यही विचार है तो इस वृक्ष को डँसो। हे भुजंगम, तुम्हारे डँसे हुए इस वृक्ष को मैं जीवित कर दूँगा। हे पन्नग, बरगद को डँसो और आज मेरे मन्त्रों का बल देखो।"
सौतिरुवाच
श्लोक 4 (1.43.4)
एवमुक्तः स नागेन्द्रः काश्यपेन महात्मना । अदशद्वृक्षमभ्येत्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तमः ॥
evamuktaḥ sa nāgendraḥ kāśyapena mahātmanā | adaśadvṛkṣamabhyetya nyagrodhaṃ pannagottamaḥ
महात्मा काश्यप के ऐसा कहने पर सर्पश्रेष्ठ नागराज ने उस बरगद के पास जाकर उसे डँस लिया।
श्लोक 5 (1.43.5)
स वृक्षस्तेन दष्टस्तु पन्नगेन महात्मना । आशीविषविषोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः ॥
sa vṛkṣastena daṣṭastu pannagena mahātmanā | āśīviṣaviṣopetaḥ prajajvāla samantataḥ
उस महाबली सर्प के डँसते ही विषधर के विष से भरा वह वृक्ष चारों ओर से जल उठा।
श्लोक 6 (1.43.6)
तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरब्रवीत् । कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवयैव वनस्पतिम् ॥
taṃ dagdhvā sa nagaṃ nāgaḥ kāśyapaṃ punarabravīt | kuru yatnaṃ dvijaśreṣṭha jīvayaiva vanaspatim
वृक्ष को जलाकर नाग ने काश्यप से फिर कहा — "हे द्विजश्रेष्ठ, प्रयत्न करो और इस वनस्पति को जीवित कर दो।"
श्लोक 7 (1.43.7)
भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा । भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमब्रवीत् ॥
bhasmībhūtaṃ tato vṛkṣaṃ pannagendrasya tejasā | bhasma sarvaṃ samāhṛtya kāśyapo vākyamabravīt
नागराज के तेज से वृक्ष भस्म हो चुका था। तब काश्यप ने सारी भस्म इकट्ठी की और कहा —
काश्यप उवाच
श्लोक 8 (1.43.8)
विद्याबलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽद्य वनस्पतौ । अहं संजीवयाम्येनं पश्यतस्ते भुजंगम ॥
vidyābalaṃ pannagendra paśya me'dya vanaspatau | ahaṃ saṃjīvayāmyenaṃ paśyataste bhujaṃgama
"नागराज, आज इस वृक्ष पर मेरी विद्या का बल देखो। हे भुजंगम, तुम्हारे देखते-देखते मैं इसे फिर से जीवित कर दूँगा।"
सौतिरुवाच
श्लोक 9 (1.43.9)
ततः स भगवान्विद्वान्काश्यपो द्विजसत्तमः । भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवयत् ॥
tataḥ sa bhagavānvidvānkāśyapo dvijasattamaḥ | bhasmarāśīkṛtaṃ vṛkṣaṃ vidyayā samajīvayat
तब भगवान्, विद्वान् द्विजश्रेष्ठ काश्यप ने भस्म का ढेर बन चुके उस वृक्ष को अपनी विद्या से फिर जीवित कर दिया।
श्लोक 10 (1.43.10)
अङ्कुरं कृतवांस्तत्र ततः पर्णद्वयान्वितम् । पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः ॥
aṅkuraṃ kṛtavāṃstatra tataḥ parṇadvayānvitam | palāśinaṃ śākhinaṃ ca tathā viṭapinaṃ punaḥ
उन्होंने पहले वहाँ अंकुर उत्पन्न किया, फिर उसमें दो पत्ते लाए, फिर उसे पत्तों और शाखाओं से भर दिया और अंत में फिर से फैला हुआ वृक्ष बना दिया।
श्लोक 11 (1.43.11)
तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना । उवाच तक्षको ब्रह्मन्नैतदत्यद्भुतं त्वयि ॥
taṃ dṛṣṭvā jīvitaṃ vṛkṣaṃ kāśyapena mahātmanā | uvāca takṣako brahmannaitadatyadbhutaṃ tvayi
महात्मा काश्यप द्वारा वृक्ष को जीवित किया गया देखकर तक्षक बोला — "ब्रह्मन्, तुम जैसे के लिए यह कोई बड़ा आश्चर्य नहीं है
तक्षक उवाच
श्लोक 12 (1.43.12)
द्विजेन्द्र यद्विषं हन्या मम वा मद्विधस्य वा । कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन ॥
dvijendra yadviṣaṃ hanyā mama vā madvidhasya vā | kaṃ tvamarthamabhiprepsuryāsi tatra tapodhana
कि तुम मेरा या मेरे जैसे किसी का विष नष्ट कर सको, हे द्विजेन्द्र। पर हे तपोधन, तुम किस लाभ की इच्छा से वहाँ जा रहे हो?
श्लोक 13 (1.43.13)
यत्तेऽभिलषितं प्राप्तं फलं तस्मान्नृपोत्तमात् । अहमेव प्रदास्यामि तत्ते यद्यपि दुर्लभम् ॥
yatte'bhilaṣitaṃ prāptaṃ phalaṃ tasmānnṛpottamāt | ahameva pradāsyāmi tatte yadyapi durlabham
उस श्रेष्ठ राजा से जो फल पाने की तुम्हारी अभिलाषा है, वह चाहे कितना ही दुर्लभ हो, मैं स्वयं तुम्हें दे दूँगा।
श्लोक 14 (1.43.14)
विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे । घटमानस्य ते विप्र सिद्धिः संशयिता भवेत् ॥
vipraśāpābhibhūte ca kṣīṇāyuṣi narādhipe | ghaṭamānasya te vipra siddhiḥ saṃśayitā bhavet
राजा ब्राह्मण के शाप से ग्रस्त है और उसकी आयु क्षीण हो चुकी है। हे विप्र, प्रयत्न करने पर भी तुम्हारी सफलता संदिग्ध रहेगी।
श्लोक 15 (1.43.15)
ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । निरंशुरिव घर्मांशुरन्तर्धानमितो व्रजेत् ॥
tato yaśaḥ pradīptaṃ te triṣu lokeṣu viśrutam | niraṃśuriva gharmāṃśurantardhānamito vrajet
और तब तीनों लोकों में विख्यात तुम्हारा उज्ज्वल यश किरणों से रहित सूर्य की भाँति यहाँ से लुप्त हो जाएगा।"
काश्यप उवाच
श्लोक 16 (1.43.16)
धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजंगम । ततोऽहं विनिवर्तिष्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै ॥
dhanārthī yāmyahaṃ tatra tanme dehi bhujaṃgama | tato'haṃ vinivartiṣye svāpateyaṃ pragṛhya vai
"मैं धन के लिए वहाँ जा रहा हूँ। हे भुजंगम, वह धन तुम मुझे दे दो, तो मैं उसे लेकर लौट जाऊँगा।"
तक्षक उवाच
श्लोक 17 (1.43.17)
यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद्राज्ञस्ततोऽधिकम् । अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ॥
yāvaddhanaṃ prārthayase tasmādrājñastato'dhikam | ahameva pradāsyāmi nivartasva dvijottama
"उस राजा से तुम जितना धन चाहते हो, उससे अधिक मैं ही तुम्हें दूँगा। हे द्विजोत्तम, लौट जाओ।"
सौतिरुवाच
श्लोक 18 (1.43.18)
तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः । प्रदध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान् ॥
takṣakasya vacaḥ śrutvā kāśyapo dvijasattamaḥ | pradadhyau sumahātejā rājānaṃ prati buddhimān
तक्षक की बात सुनकर महातेजस्वी, बुद्धिमान द्विजश्रेष्ठ काश्यप ने राजा के विषय में ध्यान लगाया।
श्लोक 19 (1.43.19)
दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा । क्षीणायुषं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यपः ॥
divyajñānaḥ sa tejasvī jñātvā taṃ nṛpatiṃ tadā | kṣīṇāyuṣaṃ pāṇḍaveyamapāvartata kāśyapaḥ
दिव्य ज्ञान से संपन्न उस तेजस्वी काश्यप ने जान लिया कि पाण्डव-वंशी उस राजा की आयु पूरी हो चुकी है, और वे लौट पड़े,
श्लोक 20 (1.43.20)
लब्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद्यावदीप्सितम् । निवृत्ते काश्यपे तस्मिन्समयेन महात्मनि ॥
labdhvā vittaṃ munivarastakṣakādyāvadīpsitam | nivṛtte kāśyape tasminsamayena mahātmani
तक्षक से जितना धन चाहा था, उतना पाकर। जब महात्मा काश्यप इस प्रकार समझौते के अनुसार लौट गए,
श्लोक 21 (1.43.21)
जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वयम् । अथ शुश्राव गच्छन्स तक्षको जगतीपतिम् ॥
jagāma takṣakastūrṇaṃ nagaraṃ nāgasāhvayam | atha śuśrāva gacchansa takṣako jagatīpatim
तब तक्षक शीघ्र ही हस्तिनापुर नगर की ओर चल पड़ा। मार्ग में तक्षक ने सुना कि पृथ्वीपति राजा
श्लोक 22 (1.43.22)
मन्त्रैर्विषहरैर्दिव्यै रक्ष्यमाणं प्रयत्नतः । स चिन्तयामास तदा मायायोगेन पार्थिवः ॥
mantrairviṣaharairdivyai rakṣyamāṇaṃ prayatnataḥ | sa cintayāmāsa tadā māyāyogena pārthivaḥ
विष हरने वाले दिव्य मन्त्रों से बड़े प्रयत्नपूर्वक सुरक्षित हैं। तब उसने विचार किया — "माया के प्रयोग से उस राजा को
श्लोक 23 (1.43.23)
मया वञ्चयितव्योऽसौ क उपायो भवेदिति । ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत्स भुजंगमान् ॥
mayā vañcayitavyo'sau ka upāyo bhavediti | tatastāpasarūpeṇa prāhiṇotsa bhujaṃgamān
मुझे छलना होगा; पर उसका उपाय क्या हो?" फिर उसने तपस्वियों के वेश में कुछ सर्पों को भेजा,
श्लोक 24 (1.43.24)
फलपत्रोदकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः । गच्छध्वं यूयमव्यग्रा राजानं कार्यवत्तया ॥
phalapatrodakaṃ gṛhya rājñe nāgo'tha takṣakaḥ | gacchadhvaṃ yūyamavyagrā rājānaṃ kāryavattayā
जो राजा के लिए फल, पत्ते और जल लिए हुए थे। नाग तक्षक ने उनसे कहा — "तुम सब शान्त भाव से, किसी काम के बहाने राजा के पास जाओ,
तक्षक उवाच
श्लोक 25 (1.43.25)
फलपत्रोदकं नागाः प्रतिग्राहयितुं नृपम् । ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजङ्गमाः ॥
phalapatrodakaṃ nāgāḥ pratigrāhayituṃ nṛpam | te takṣakasamādiṣṭāstathā cakrurbhujaṅgamāḥ
हे नागो, राजा को फल, पत्ते और जल भेंट करने के लिए।" तक्षक की आज्ञा पाकर सर्पों ने वैसा ही किया।
सौतिरुवाच
श्लोक 26 (1.43.26)
उपनिन्युस्तथा राज्ञे दर्भानम्भः फलानि च । तच्च सर्वं स राजेन्द्रः प्रतिजग्राह वीर्यवान् ॥
upaninyustathā rājñe darbhānambhaḥ phalāni ca | tacca sarvaṃ sa rājendraḥ pratijagrāha vīryavān
वे राजा के लिए कुश, जल और फल ले गए, और पराक्रमी राजेन्द्र ने वह सब स्वीकार कर लिया।
श्लोक 27 (1.43.27)
कृत्वा तेषां च कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान् । गतेषु तेषु नागेषु तापसच्छद्मरूपिषु ॥
kṛtvā teṣāṃ ca kāryāṇi gamyatāmityuvāca tān | gateṣu teṣu nāgeṣu tāpasacchadmarūpiṣu
उनका काम पूरा करके राजा ने उनसे कहा — "अब आप जाइए।" तपस्वियों के छद्म वेश वाले उन नागों के चले जाने पर
श्लोक 28 (1.43.28)
अमात्यान्सुहृदश्चैव प्रोवाच स नराधिपः । भक्षयन्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वशः ॥
amātyānsuhṛdaścaiva provāca sa narādhipaḥ | bhakṣayantu bhavanto vai svādūnīmāni sarvaśaḥ
राजा ने अपने मन्त्रियों और मित्रों से कहा — "आप सब ये स्वादिष्ट फल खाइए,
परिक्षिदुवाच
श्लोक 29 (1.43.29)
तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मया । ततो राजा ससचिवः फलान्यादातुमैच्छत ॥
tāpasairupanītāni phalāni sahitā mayā | tato rājā sasacivaḥ phalānyādātumaicchata
जो तपस्वी लाए हैं — मेरे साथ ही।" तब राजा ने मन्त्रियों सहित फल लेने की इच्छा की।
सौतिरुवाच
श्लोक 30 (1.43.30)
विधिना संप्रयुक्तो वै ऋषिवाक्येन तेन तु । यस्मिन्नेव फले नागस्तमेवाभक्षयत्स्वयम् ॥
vidhinā saṃprayukto vai ṛṣivākyena tena tu | yasminneva phale nāgastamevābhakṣayatsvayam
विधाता की प्रेरणा और उस ऋषि के वचन के प्रभाव से राजा ने स्वयं वही फल खाया जिसमें नाग छिपा था।
श्लोक 31 (1.43.31)
ततो भक्षयतस्तस्य फलात्कृमिरभूदणुः । ह्रस्वकः कृष्णनयनस्ताम्रवर्णोऽथ शौनक ॥
tato bhakṣayatastasya phalātkṛmirabhūdaṇuḥ | hrasvakaḥ kṛṣṇanayanastāmravarṇo'tha śaunaka
हे शौनक, खाते समय उस फल में से एक नन्हा-सा कीड़ा निकला — छोटा, काली आँखों वाला और ताँबे के रंग का।
श्लोक 32 (1.43.32)
स तं गृह्य नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमब्रवीत् । अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम् ॥
sa taṃ gṛhya nṛpaśreṣṭhaḥ sacivānidamabravīt | astamabhyeti savitā viṣādadya na me bhayam
उसे हाथ में लेकर श्रेष्ठ राजा ने मन्त्रियों से कहा — "सूर्य अस्त हो रहा है; आज मुझे विष का कोई भय नहीं है।
परिक्षिदुवाच
श्लोक 33 (1.43.33)
सत्यवागस्तु स मुनिः कृमिर्मां दशतामयम् । तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत् ॥
satyavāgastu sa muniḥ kṛmirmāṃ daśatāmayam | takṣako nāma bhūtvā vai tathā parihṛtaṃ bhavet
मुनि का वचन सत्य हो — यह कीड़ा ही तक्षक बनकर मुझे डँस ले। इस प्रकार संकट टल जाएगा।"
सौतिरुवाच
श्लोक 34 (1.43.34)
ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिणः कालचोदिताः । एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां सन्निवेश्य ह ॥
te cainamanvavartanta mantriṇaḥ kālacoditāḥ | evamuktvā sa rājendro grīvāyāṃ sanniveśya ha
काल से प्रेरित मन्त्रियों ने भी उनकी बात मान ली। ऐसा कहकर राजेन्द्र ने उस कीड़े को अपनी गर्दन पर रख लिया
श्लोक 35 (1.43.35)
कृमिकं प्राहसत्तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः । प्रहसन्नेव भोगेन तक्षकेणाभिवेष्टितः ॥
kṛmikaṃ prāhasattūrṇaṃ mumūrṣurnaṣṭacetanaḥ | prahasanneva bhogena takṣakeṇābhiveṣṭitaḥ
और मृत्यु के निकट, चेतना खो चुके वे तुरन्त हँस पड़े। हँसते-हँसते ही वे तक्षक की कुंडली में लिपट गए —
श्लोक 36 (1.43.36)
तस्मात्फलाद्विनिष्क्रम्य यत्तद्राज्ञे निवेदितम् । वेष्टयित्वा च भोगेन विनद्य च महास्वनम् । अदशत्पृथिवीपालं तक्षकः पन्नगेश्वरः ॥
tasmātphalādviniṣkramya yattadrājñe niveditam | veṣṭayitvā ca bhogena vinadya ca mahāsvanam | adaśatpṛthivīpālaṃ takṣakaḥ pannageśvaraḥ
उसी तक्षक की, जो राजा को भेंट किए गए फल से निकला था। अपने शरीर से राजा को लपेटकर और भयंकर गर्जना करके नागराज तक्षक ने उस पृथ्वीपालक को डँस लिया।