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आदि पर्व · अध्याय 44

जनमेजय का राजा बनना

तक्षक आकाश-मार्ग से चला जाता है, मन्त्री रोते हुए भाग खड़े होते हैं, और विष की आग से जलता महल ऐसे ढह जाता है मानो उस पर वज्र गिरा हो। अन्त्येष्टि-संस्कार के बाद नगरवासी परिक्षित् के बालक पुत्र जनमेजय को राजा बनाते हैं, जो मन्त्रियों और पुरोहितों की सहायता से शासन करते हैं। मन्त्री उनके लिए काशिराज सुवर्णवर्मा की पुत्री वपुष्टमा का हाथ माँगते हैं, और दोनों पुरूरवा और उर्वशी की भाँति प्रेमपूर्वक सुख से रहते हैं।

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सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.44.1)

तं तथा मन्त्रिणो दृष्ट्वा भोगेन परिवेष्टितम् । विषण्णवदनाः सर्वे रुरुदुर्भृशदुःखिताः ॥

taṃ tathā mantriṇo dṛṣṭvā bhogena pariveṣṭitam | viṣaṇṇavadanāḥ sarve rurudurbhṛśaduḥkhitāḥ

राजा को इस प्रकार नाग की कुंडली में लिपटा देखकर सभी मन्त्री उदास मुख से, अत्यन्त दुःखी होकर रोने लगे।

श्लोक 2 (1.44.2)

तं तु नागं ततो दृष्ट्वा मन्त्रिणस्ते प्रदुद्रुवुः । अपश्यन्त तथा यान्तमाकाशे नागमद्भुतम् ॥

taṃ tu nāgaṃ tato dṛṣṭvā mantriṇaste pradudruvuḥ | apaśyanta tathā yāntamākāśe nāgamadbhutam

उस नाग को देखकर मन्त्री भाग खड़े हुए, और उन्होंने उस अद्भुत नाग को आकाश में जाते देखा —

श्लोक 3 (1.44.3)

सीमन्तमिव कुर्वाणं नभसः पद्मवर्चसम् । तक्षकं पन्नगश्रेष्ठं भृशं शोकपरायणाः ॥

sīmantamiva kurvāṇaṃ nabhasaḥ padmavarcasam | takṣakaṃ pannagaśreṣṭhaṃ bhṛśaṃ śokaparāyaṇāḥ

कमल के समान कान्ति वाले नागश्रेष्ठ तक्षक को, जो मानो आकाश में माँग की रेखा खींचता जा रहा था; और वे शोक में डूब गए।

श्लोक 4 (1.44.4)

ततस्तु ते तद्गृहमग्निना वृतं । प्रदीप्यमानं विषजेन भोगिनः । भयात्परित्यज्य दिशः प्रपेदिरे । पपात तच्चाशनिताडितं यथा ॥

tatastu te tadgṛhamagninā vṛtaṃ | pradīpyamānaṃ viṣajena bhoginaḥ | bhayātparityajya diśaḥ prapedire | papāta taccāśanitāḍitaṃ yathā

तब नाग के विष से उत्पन्न अग्नि से घिरे उस जलते हुए भवन को छोड़कर वे भय के मारे सब दिशाओं में भाग गए, और वह भवन ऐसे गिर पड़ा मानो उस पर वज्र गिरा हो।

श्लोक 5 (1.44.5)

ततो नृपे तक्षकतेजसाहते । प्रयुज्य सर्वाः परलोकसत्क्रियाः । शुचिर्द्विजो राजपुरोहितस्तदा । तथैव ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः ॥

tato nṛpe takṣakatejasāhate | prayujya sarvāḥ paralokasatkriyāḥ | śucirdvijo rājapurohitastadā | tathaiva te tasya nṛpasya mantriṇaḥ

तक्षक के तेज से राजा के मारे जाने पर पवित्र ब्राह्मण राजपुरोहित ने और उसी प्रकार राजा के मन्त्रियों ने परलोक-सम्बन्धी सभी संस्कार सम्पन्न किए;

श्लोक 6 (1.44.6)

नृपं शिशुं तस्य सुतं प्रचक्रिरे । समेत्य सर्वे पुरवासिनो जनाः । नृपं यमाहुस्तममित्रघातिनं । कुरुप्रवीरं जनमेजयं जनाः ॥

nṛpaṃ śiśuṃ tasya sutaṃ pracakrire | sametya sarve puravāsino janāḥ | nṛpaṃ yamāhustamamitraghātinaṃ | kurupravīraṃ janamejayaṃ janāḥ

और नगर के सब निवासियों ने मिलकर उनके बालक पुत्र को राजा बनाया — शत्रुओं का संहार करने वाले उस कुरुवीर को, जिसे लोग जनमेजय कहते हैं।

श्लोक 7 (1.44.7)

स बाल एवार्यमतिर्नृपोत्तमः । सहैव तैर्मन्त्रिपुरोहितैस्तदा । शशास राज्यं कुरुपुंगवाग्रजो । यथाऽस्य वीरः प्रपितामहस्तथा ॥

sa bāla evāryamatirnṛpottamaḥ | sahaiva tairmantripurohitaistadā | śaśāsa rājyaṃ kurupuṃgavāgrajo | yathā'sya vīraḥ prapitāmahastathā

बालक होते हुए भी उदार बुद्धि वाले, कुरुश्रेष्ठों में अग्रणी उस उत्तम राजा ने उन मन्त्रियों और पुरोहितों के साथ वैसे ही राज्य का शासन किया, जैसे उनके वीर प्रपितामह ने किया था।

श्लोक 8 (1.44.8)

ततस्तु राजानममित्रतापनं । समीक्ष्य ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः । सुवर्णवर्माणमुपेत्य काशिपं । वपुष्टमार्थं वरयांप्रचक्रमुः ॥

tatastu rājānamamitratāpanaṃ | samīkṣya te tasya nṛpasya mantriṇaḥ | suvarṇavarmāṇamupetya kāśipaṃ | vapuṣṭamārthaṃ varayāṃpracakramuḥ

तब शत्रुओं को संतप्त करने वाले उस राजा के विषय में विचार करके उनके मन्त्री काशिराज सुवर्णवर्मा के पास गए और राजा के लिए उनकी पुत्री वपुष्टमा का हाथ माँगा।

श्लोक 9 (1.44.9)

ततः स राजा प्रददौ वपुष्टमां । कुरुप्रवीराय परीक्ष्य धर्मतः । स चापि तां प्राप्य मुदा युतोऽभवन् । न चान्यनारीषु मनो दधे क्वचित् ॥

tataḥ sa rājā pradadau vapuṣṭamāṃ | kurupravīrāya parīkṣya dharmataḥ | sa cāpi tāṃ prāpya mudā yuto'bhavan | na cānyanārīṣu mano dadhe kvacit

उस राजा ने धर्मपूर्वक परख कर वपुष्टमा कुरुवीर को सौंप दी। उसे पाकर जनमेजय आनन्द से भर गए और उन्होंने कभी किसी अन्य स्त्री में मन नहीं लगाया।

श्लोक 10 (1.44.10)

सरःसु फुल्लेषु वनेषु चैव ह । प्रसन्नचेता विजहार वीर्यवान् । तथा स राजन्यवरो विजह्रिवान् । यथोर्वशीं प्राप्य पुरा पुरूरवाः ॥

saraḥsu phulleṣu vaneṣu caiva ha | prasannacetā vijahāra vīryavān | tathā sa rājanyavaro vijahrivān | yathorvaśīṃ prāpya purā purūravāḥ

प्रसन्नचित्त वह पराक्रमी राजा खिले हुए सरोवरों और वनों में विहार करता रहा। वह श्रेष्ठ क्षत्रिय उसी प्रकार आनन्द से विहार करता रहा, जैसे प्राचीन काल में पुरूरवा उर्वशी को पाकर करते थे।

श्लोक 11 (1.44.11)

वपुष्टमा चापि वरं पतिव्रता । प्रतीतरूपा समवाप्य भूपतिम् । भावेन रामा रमयांबभूव तं । विहारकालेष्ववरोधसुन्दरी ॥

vapuṣṭamā cāpi varaṃ pativratā | pratītarūpā samavāpya bhūpatim | bhāvena rāmā ramayāṃbabhūva taṃ | vihārakāleṣvavarodhasundarī

पतिव्रता, प्रसिद्ध रूपवती, अन्तःपुर की वह सुन्दरी वपुष्टमा भी उस श्रेष्ठ राजा को पति रूप में पाकर विहार के समय अपने प्रेमभाव से उन्हें आनन्दित करती रही।

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