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आदि पर्व · अध्याय 46

जरत्कारु की प्रतिज्ञा और वासुकि की बहन

जरत्कारु बताते हैं कि जिस पुत्र की बात पितर कर रहे हैं, वह वे स्वयं हैं, और वे तीन शर्तों पर विवाह करना स्वीकार करते हैं—कन्या उन्हीं के नाम की हो, भिक्षा की भाँति स्वयं अर्पित की जाए, और उसका भरण-पोषण उन्हें न करना पड़े। बूढ़ा समझे जाने के कारण कोई उन्हें पत्नी नहीं देता, तब वे वन में सब प्राणियों से कन्या की याचना करते हैं। उन पर दृष्टि रखने वाले नाग यह बात वासुकि को बताते हैं, जो अपनी अलंकृत बहन को मुनि के पास ले आते हैं। जरत्कारु हिचकते हैं, कन्या का नाम पूछते हैं और वासुकि से कहते हैं कि वे उसका भरण-पोषण नहीं करेंगे।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.46.1)

एतच्छ्रुत्वा जरत्कारुर्भृशं शोकपरायणः । उवाच तान्पितॄन्दुःखाद्बाष्पसंदिग्धया गिरा ॥

etacchrutvā jaratkārurbhṛśaṃ śokaparāyaṇaḥ | uvāca tānpitṝnduḥkhādbāṣpasaṃdigdhayā girā

यह सुनकर जरत्कारु अत्यन्त शोक में डूब गए और दुःख से आँसुओं में रुँधी वाणी में उन पितरों से बोले—

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 2 (1.46.2)

मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः । तद्ब्रूत यन्मया कार्यं भवतां प्रियकाम्यया ॥

mama pūrve bhavanto vai pitaraḥ sapitāmahāḥ | tadbrūta yanmayā kāryaṃ bhavatāṃ priyakāmyayā

"आप ही मेरे पूर्वज हैं—मेरे पिता और पितामह। तो बताइए, आपको प्रसन्न करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए।

श्लोक 3 (1.46.3)

अहमेव जरत्कारुः किल्बिषी भवतां सुतः । ते दण्डं धारयत मे दुष्कृतेरकृतात्मनः ॥

ahameva jaratkāruḥ kilbiṣī bhavatāṃ sutaḥ | te daṇḍaṃ dhārayata me duṣkṛterakṛtātmanaḥ

मैं ही आपका पापी पुत्र जरत्कारु हूँ। मुझ असंयमी दुष्कर्मी को आप दण्ड दीजिए।"

पितर ऊचुः

श्लोक 4 (1.46.4)

पुत्र दिष्ट्याऽसि संप्राप्त इमं देशं यदृच्छया । किमर्थं च त्वया ब्रह्मन्न कृतो दारसङ्ग्रहः ॥

putra diṣṭyā'si saṃprāpta imaṃ deśaṃ yadṛcchayā | kimarthaṃ ca tvayā brahmanna kṛto dārasaṅgrahaḥ

"पुत्र, सौभाग्य से तुम संयोगवश इस स्थान पर आ पहुँचे हो। हे ब्रह्मन्, तुमने विवाह क्यों नहीं किया?"

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 5 (1.46.5)

ममायं पितरो नित्यं हृद्यर्थः परिवर्तते । ऊर्ध्वरेताः शरीरं वै प्रापयेयममुत्र वै ॥

mamāyaṃ pitaro nityaṃ hṛdyarthaḥ parivartate | ūrdhvaretāḥ śarīraṃ vai prāpayeyamamutra vai

"हे पितरो, मेरे हृदय में सदा यही विचार घूमता रहा है कि मैं ऊर्ध्वरेता (आजीवन ब्रह्मचारी) रहकर ही इस शरीर को परलोक तक ले जाऊँ।

श्लोक 6 (1.46.6)

न दारान्वै करिष्येऽहमिति मे भावितं मनः । एवं दृष्ट्वा तु भवतः शकुन्तानिव लम्बतः ॥

na dārānvai kariṣye'hamiti me bhāvitaṃ manaḥ | evaṃ dṛṣṭvā tu bhavataḥ śakuntāniva lambataḥ

मेरा मन यही ठान चुका था कि ‘मैं विवाह नहीं करूँगा।’ परन्तु आपको पक्षियों की भाँति लटकते देखकर

श्लोक 7 (1.46.7)

मया निवर्तिता बुद्धिर्ब्रह्मचर्यात्पितामहाः । करिष्ये वः प्रियं कामं निवेक्ष्येऽहमसंशयम् ॥

mayā nivartitā buddhirbrahmacaryātpitāmahāḥ | kariṣye vaḥ priyaṃ kāmaṃ nivekṣye'hamasaṃśayam

हे पितामहो, मैंने ब्रह्मचर्य से अपना मन हटा लिया है। मैं आपका प्रिय और अभीष्ट कार्य करूँगा—निःसन्देह विवाह करूँगा,

श्लोक 8 (1.46.8)

सनाम्नीं यद्यहं कन्यामुपलप्स्ये कदाचन । भविष्यति च या काचिद्भैक्ष्यवत्स्वयमुद्यता ॥

sanāmnīṃ yadyahaṃ kanyāmupalapsye kadācana | bhaviṣyati ca yā kācidbhaikṣyavatsvayamudyatā

यदि कभी मुझे अपने ही नाम वाली कोई कन्या मिल जाए, जो भिक्षा की भाँति स्वयं मुझे अर्पित की जाए,

श्लोक 9 (1.46.9)

प्रतिग्रहीता तामस्मि न भरेयं च यामहम् । एवंविधमहं कुर्यां निवेशं प्राप्नुयां यदि । अन्यथा न करिष्येऽहं सत्यमेतत्पितामहाः ॥

pratigrahītā tāmasmi na bhareyaṃ ca yāmaham | evaṃvidhamahaṃ kuryāṃ niveśaṃ prāpnuyāṃ yadi | anyathā na kariṣye'haṃ satyametatpitāmahāḥ

और जिसका भरण-पोषण मुझे न करना पड़े—उसे मैं ग्रहण करूँगा। यदि ऐसा विवाह मिल सका तो करूँगा, अन्यथा नहीं करूँगा। हे पितामहो, यह सत्य है।

श्लोक 10 (1.46.10)

तत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय वै । शाश्वताश्चाव्ययाश्चैव तिष्ठन्तु पितरो मम ॥

tatra cotpatsyate janturbhavatāṃ tāraṇāya vai | śāśvatāścāvyayāścaiva tiṣṭhantu pitaro mama

उससे आपका उद्धार करने के लिए संतान उत्पन्न होगी। मेरे पितर सदा शाश्वत और अक्षय होकर स्थित रहें।"

सौतिरुवाच

श्लोक 11 (1.46.11)

एवमुक्त्वा तु स पितॄंश्चचार पृथिवीं मुनिः । न च स्म लभते भार्यां वृद्धोऽयमिति शौनक ॥

evamuktvā tu sa pitṝṃścacāra pṛthivīṃ muniḥ | na ca sma labhate bhāryāṃ vṛddho'yamiti śaunaka

पितरों से ऐसा कहकर मुनि पृथ्वी पर घूमने लगे, परन्तु हे शौनक, "यह बूढ़ा है"—ऐसा सोचकर कोई उन्हें पत्नी नहीं देता था।

श्लोक 12 (1.46.12)

यदा निर्वेदमापन्नः पितृभिश्चोदितस्तथा । तदाऽरण्यं स गत्वोच्चैश्चुक्रोश भृशदुःखितः ॥

yadā nirvedamāpannaḥ pitṛbhiścoditastathā | tadā'raṇyaṃ sa gatvoccaiścukrośa bhṛśaduḥkhitaḥ

जब वे निराश हो गए और पितर भी उन्हें प्रेरित करते रहे, तब वे वन में जाकर अत्यन्त दुःखी होकर ऊँचे स्वर में पुकारने लगे।

श्लोक 13 (1.46.13)

स त्वरण्यगतः प्राज्ञः पितॄणां हितकाम्यया । उवाच कन्यां याचामि तिस्रो वाचः शनैरिमाः ॥

sa tvaraṇyagataḥ prājñaḥ pitṝṇāṃ hitakāmyayā | uvāca kanyāṃ yācāmi tisro vācaḥ śanairimāḥ

वन में पहुँचकर उस बुद्धिमान ने पितरों के हित की कामना से धीरे-धीरे तीन बार कहा—"मैं कन्या की याचना करता हूँ"—और ये वचन बोले—

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 14 (1.46.14)

यानि भूतानि सन्तीह स्थावराणि चराणि च । अन्तर्हितानि वा यानि तानि शृण्वन्तु मे वचः ॥

yāni bhūtāni santīha sthāvarāṇi carāṇi ca | antarhitāni vā yāni tāni śṛṇvantu me vacaḥ

"यहाँ जितने भी प्राणी हैं—स्थावर और जंगम—और जो अदृश्य हैं, वे सब मेरी बात सुनें।

श्लोक 15 (1.46.15)

उग्रे तपसि वर्तन्तं पितरश्चोदयन्ति माम् । निविशस्वेति दुःखार्ताः सन्तानस्य चिकीर्षया ॥

ugre tapasi vartantaṃ pitaraścodayanti mām | niviśasveti duḥkhārtāḥ santānasya cikīrṣayā

मैं उग्र तपस्या में लगा था, तब दुःख से पीड़ित मेरे पितर संतान की इच्छा से मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि ‘विवाह करो।’

श्लोक 16 (1.46.16)

निवेशायाखिलां भूमिं कन्याभैक्ष्यं चरामि भोः । दरिद्रो दुःखशीलश्च पितृभिः सन्नियोजितः ॥

niveśāyākhilāṃ bhūmiṃ kanyābhaikṣyaṃ carāmi bhoḥ | daridro duḥkhaśīlaśca pitṛbhiḥ sanniyojitaḥ

हे सज्जनो, विवाह के लिए मैं कन्या की भिक्षा माँगता हुआ सारी पृथ्वी पर घूम रहा हूँ—निर्धन, कष्ट में जीने वाला, और पितरों द्वारा नियुक्त।

श्लोक 17 (1.46.17)

यस्य कन्याऽस्ति भूतस्य ये मयेह प्रकीर्तिताः । ते मे कन्यां प्रयच्छन्तु चरतः सर्वतोदिशम् ॥

yasya kanyā'sti bhūtasya ye mayeha prakīrtitāḥ | te me kanyāṃ prayacchantu carataḥ sarvatodiśam

मैंने जिन प्राणियों का यहाँ नाम लिया है, उनमें से जिसके भी कन्या हो, वह दिशा-दिशा में घूमते हुए मुझे अपनी कन्या दे।

श्लोक 18 (1.46.18)

मम कन्या सनाम्नी या भैक्ष्यवच्चोदिता भवेत् । भरेयं चैव यां नाहं तां मे कन्यां प्रयच्छत ॥

mama kanyā sanāmnī yā bhaikṣyavaccoditā bhavet | bhareyaṃ caiva yāṃ nāhaṃ tāṃ me kanyāṃ prayacchata

जो कन्या मेरे ही नाम की हो, भिक्षा की भाँति मुझे अर्पित की जाए, और जिसका भरण-पोषण मुझे न करना पड़े—ऐसी कन्या मुझे दीजिए।"

सौतिरुवाच

श्लोक 19 (1.46.19)

ततस्ते पन्नगा ये वै जरत्कारौ समाहिताः । तामादाय प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदयन् ॥

tataste pannagā ye vai jaratkārau samāhitāḥ | tāmādāya pravṛttiṃ te vāsukeḥ pratyavedayan

तब जो नाग जरत्कारु पर दृष्टि रखने के लिए लगाए गए थे, उन्होंने यह समाचार लेकर वासुकि को सुनाया।

श्लोक 20 (1.46.20)

तेषां श्रुत्वा स नागेन्द्रस्तां कन्यां समलङ्कृताम् । प्रगृह्यारण्यमगमत्समीपं तस्य पन्नगः ॥

teṣāṃ śrutvā sa nāgendrastāṃ kanyāṃ samalaṅkṛtām | pragṛhyāraṇyamagamatsamīpaṃ tasya pannagaḥ

उनकी बात सुनकर नागराज उस कन्या को भली-भाँति अलंकृत करके साथ ले वन में मुनि के पास गए।

श्लोक 21 (1.46.21)

तत्र तां भैक्ष्यवत्कन्यां प्रादात्तस्मै महात्मने । नागेन्द्रो वासुकिर्ब्रह्मन्न स तां प्रत्यगृह्णत ॥

tatra tāṃ bhaikṣyavatkanyāṃ prādāttasmai mahātmane | nāgendro vāsukirbrahmanna sa tāṃ pratyagṛhṇata

हे ब्रह्मन्, वहाँ नागराज वासुकि ने वह कन्या भिक्षा की भाँति उन महात्मा को अर्पित की, परन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया,

श्लोक 22 (1.46.22)

असनामेति वै मत्वा भरणे चाविचारिते । मोक्षभावे स्थितश्चापि मन्दीभूतः परिग्रहे ॥

asanāmeti vai matvā bharaṇe cāvicārite | mokṣabhāve sthitaścāpi mandībhūtaḥ parigrahe

यह सोचकर कि इसका नाम मेरे नाम जैसा नहीं है और इसके भरण-पोषण की बात तय नहीं हुई है। मोक्ष के भाव में स्थित होने के कारण भी वे पत्नी ग्रहण करने में शिथिल थे।

श्लोक 23 (1.46.23)

ततो नाम स कन्यायाः पप्रच्छ भृगुनन्दन । वासुकिं भरणं चास्या न कुर्यामित्युवाच ह ॥

tato nāma sa kanyāyāḥ papraccha bhṛgunandana | vāsukiṃ bharaṇaṃ cāsyā na kuryāmityuvāca ha

हे भृगुनन्दन, तब उन्होंने वासुकि से कन्या का नाम पूछा और कहा—"मैं इसका भरण-पोषण नहीं करूँगा।"

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