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आदि पर्व · अध्याय 47

जरत्कारु का विवाह और प्रस्थान

वासुकि जरत्कारु को बताते हैं कि यह कन्या उनकी बहन है और उसका नाम भी जरत्कारु ही है, और वे उसके भरण-पोषण तथा रक्षा का वचन देते हैं। मुनि इस शर्त पर उससे विवाह करते हैं कि वह कभी उनका अप्रिय नहीं करेगी, और वह बड़ी सावधानी से उनकी सेवा करती है, यहाँ तक कि उसे गर्भ ठहर जाता है। एक साँझ, जब मुनि उसकी गोद में सिर रखकर सो रहे होते हैं, वह उन्हें जगा देती है ताकि उनकी संध्या-उपासना न छूटे; मुनि इसे अपमान मानकर चले जाने का निश्चय करते हैं। वह विनती करती है कि उसके बन्धुओं को उनसे पुत्र की आवश्यकता है, और मुनि उसे आश्वस्त करते हैं कि उसके गर्भ में एक धर्मात्मा ऋषि है, फिर तपस्या के लिए चले जाते हैं।

अध्याय 46अध्याय-सूचीअध्याय 48

सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.47.1)

वासुकिस्त्वब्रवीद्वाक्यं जरत्कारुमृषिं तदा । सनाम्नी तव कन्येयं स्वसा मे तपसान्विता ॥

vāsukistvabravīdvākyaṃ jaratkārumṛṣiṃ tadā | sanāmnī tava kanyeyaṃ svasā me tapasānvitā

तब वासुकि ने जरत्कारु ऋषि से कहा—"यह कन्या आपके ही नाम की है। यह मेरी बहन है और तपस्विनी है।"

वासुकिरुवाच

श्लोक 2 (1.47.2)

भरिष्यामि च ते भार्यां प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम । रक्षणं च करिष्येऽस्याः सर्वशक्त्या तपोधन । त्वदर्थं रक्ष्यते चैषा मया मुनिवरोत्तम ॥

bhariṣyāmi ca te bhāryāṃ pratīcchemāṃ dvijottama | rakṣaṇaṃ ca kariṣye'syāḥ sarvaśaktyā tapodhana | tvadarthaṃ rakṣyate caiṣā mayā munivarottama

"आपकी पत्नी का भरण-पोषण मैं करूँगा; हे द्विजोत्तम, इसे स्वीकार कीजिए। हे तपोधन, मैं पूरी शक्ति से इसकी रक्षा करूँगा। हे मुनिश्रेष्ठ, आपके ही लिए मैं इसकी रक्षा करता आया हूँ।"

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 3 (1.47.3)

न भरिष्येऽहमेतां वै एष मे समयः कृतः । अप्रियं च न कर्तव्यं कृते चैनां त्यजाम्यहम् ॥

na bhariṣye'hametāṃ vai eṣa me samayaḥ kṛtaḥ | apriyaṃ ca na kartavyaṃ kṛte caināṃ tyajāmyaham

"मैं इसका भरण-पोषण नहीं करूँगा—यही मेरी शर्त है। और इसे मेरा कोई अप्रिय कार्य नहीं करना होगा; यदि करेगी तो मैं इसे त्याग दूँगा।"

सौतिरुवाच

श्लोक 4 (1.47.4)

प्रतिश्रुते तु नागेन भरिष्ये भगिनीमिति । जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह ॥

pratiśrute tu nāgena bhariṣye bhaginīmiti | jaratkārustadā veśma bhujagasya jagāma ha

जब नाग ने वचन दिया कि "मैं अपनी बहन का भरण-पोषण करूँगा," तब जरत्कारु उस नाग के भवन में गए।

श्लोक 5 (1.47.5)

तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः । जग्राह पाणिं धर्मात्मा विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥

tatra mantravidāṃ śreṣṭhastapovṛddho mahāvrataḥ | jagrāha pāṇiṃ dharmātmā vidhimantrapuraskṛtam

वहाँ मन्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, तप में बढ़े-चढ़े, महान व्रतधारी धर्मात्मा मुनि ने विधि और मन्त्रों के साथ उसका पाणिग्रहण किया।

श्लोक 6 (1.47.6)

ततो वासगृहं रम्यं पन्नगेन्द्रस्य संमतम् । जगाम भार्यामादाय स्तूयमानो महर्षिभिः ॥

tato vāsagṛhaṃ ramyaṃ pannagendrasya saṃmatam | jagāma bhāryāmādāya stūyamāno maharṣibhiḥ

फिर महर्षियों से स्तुत होते हुए वे पत्नी को साथ लेकर नागराज के द्वारा निश्चित किए गए एक सुन्दर शयनगृह में गए।

श्लोक 7 (1.47.7)

शयनं तत्र संक्लृप्तं स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् । तत्र भार्यासहायो वै जरत्कारुरुवास ह ॥

śayanaṃ tatra saṃklṛptaṃ spardhyāstaraṇasaṃvṛtam | tatra bhāryāsahāyo vai jaratkāruruvāsa ha

वहाँ बहुमूल्य बिछौनों से ढकी शय्या सजाई गई थी, और वहीं जरत्कारु अपनी पत्नी के साथ रहने लगे।

श्लोक 8 (1.47.8)

स तत्र समयं चक्रे भार्यया सह सत्तमः । विप्रियं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन ॥

sa tatra samayaṃ cakre bhāryayā saha sattamaḥ | vipriyaṃ me na kartavyaṃ na ca vācyaṃ kadācana

वहाँ उन श्रेष्ठ मुनि ने अपनी पत्नी के साथ यह शर्त ठहराई—"तुम्हें कभी मेरा अप्रिय नहीं करना है और न कभी अप्रिय वचन कहना है।

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 9 (1.47.9)

त्यजेयं विप्रिये च त्वां कृते वासं च ते गृहे । एतद्गृहाण वचनं मया यत्समुदीरितम् ॥

tyajeyaṃ vipriye ca tvāṃ kṛte vāsaṃ ca te gṛhe | etadgṛhāṇa vacanaṃ mayā yatsamudīritam

यदि तुमने कोई अप्रिय कार्य किया, तो मैं तुम्हें और तुम्हारे घर में अपना निवास त्याग दूँगा। मेरे कहे इन वचनों को भली-भाँति ग्रहण कर लो।"

सौतिरुवाच

श्लोक 10 (1.47.10)

ततः परमसंविग्ना स्वसा नागपतेस्तदा । अतिदुःखान्विता वाक्यं तमुवाचैवमस्त्विति ॥

tataḥ paramasaṃvignā svasā nāgapatestadā | atiduḥkhānvitā vākyaṃ tamuvācaivamastviti

तब नागराज की बहन अत्यन्त घबराई और बहुत दुःखी होकर उनसे बोली—"ऐसा ही हो।"

श्लोक 11 (1.47.11)

तथैव सा च भर्तारं दुःखशीलमुपाचरत् । उपायैः श्वेतकाकीयैः प्रियकामा यशस्विनी ॥

tathaiva sā ca bhartāraṃ duḥkhaśīlamupācarat | upāyaiḥ śvetakākīyaiḥ priyakāmā yaśasvinī

उसी प्रकार प्रिय करने की इच्छा वाली वह यशस्विनी अपने कठोर स्वभाव वाले पति की "श्वेत काक" जैसे दुर्लभ और सजग उपायों से सेवा करने लगी।

श्लोक 12 (1.47.12)

ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिद्वासुकेः स्वसा । भर्तारं वै यथान्यायमुपतस्थे महामुनिम् ॥

ṛtukāle tataḥ snātā kadācidvāsukeḥ svasā | bhartāraṃ vai yathānyāyamupatasthe mahāmunim

फिर एक बार ऋतुकाल आने पर स्नान करके वासुकि की बहन विधिपूर्वक अपने पति महामुनि के पास गई।

श्लोक 13 (1.47.13)

तत्र तस्याः समभवद्गर्भो ज्वलनसन्निभः । अतीव तेजसा युक्तो वैश्वानरसमद्युतिः ॥

tatra tasyāḥ samabhavadgarbho jvalanasannibhaḥ | atīva tejasā yukto vaiśvānarasamadyutiḥ

तब उसके गर्भ में अग्नि के समान दीप्तिमान, अत्यन्त तेज से युक्त, वैश्वानर (अग्नि) जैसी कान्ति वाला गर्भ ठहरा।

श्लोक 14 (1.47.14)

शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव सः । ततः कतिपयाहस्तु जरत्कारुर्महायशाः ॥

śuklapakṣe yathā somo vyavardhata tathaiva saḥ | tataḥ katipayāhastu jaratkārurmahāyaśāḥ

वह शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ने लगा। फिर कुछ दिनों बाद महायशस्वी जरत्कारु

श्लोक 15 (1.47.15)

उत्सङ्गेऽस्याः शिरः कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत् । तस्मिंश्च सुप्ते विप्रेन्द्रे सवितास्तमियाद्गिरिम् ॥

utsaṅge'syāḥ śiraḥ kṛtvā suṣvāpa parikhinnavat | tasmiṃśca supte viprendre savitāstamiyādgirim

मानो थककर उसकी गोद में सिर रखकर सो गए। उन विप्रश्रेष्ठ के सोते-सोते सूर्य अस्ताचल की ओर ढलने लगा।

श्लोक 16 (1.47.16)

अह्नः परिक्षये ब्रह्मंस्ततः साऽचिन्तयत्तदा । वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी ॥

ahnaḥ parikṣaye brahmaṃstataḥ sā'cintayattadā | vāsukerbhaginī bhītā dharmalopānmanasvinī

हे ब्रह्मन्, दिन ढलने पर धर्म-लोप से भयभीत वासुकि की वह मनस्विनी बहन मन में सोचने लगी—

श्लोक 17 (1.47.17)

किं नु मे सुकृतं भूयाद्भर्तुरुत्थापनं न वा । दुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुयाम् ॥

kiṃ nu me sukṛtaṃ bhūyādbharturutthāpanaṃ na vā | duḥkhaśīlo hi dharmātmā kathaṃ nāsyāparādhnuyām

"मेरे लिए क्या उचित होगा—पति को जगाऊँ या नहीं? ये धर्मात्मा हैं, पर इनका स्वभाव कठोर है। मैं इनका अपराध करने से कैसे बचूँ?

श्लोक 18 (1.47.18)

कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथवा पुनः । धर्मलोपो गरीयान्वै स्यादित्यत्राकरोन्मतिम् ॥

kopo vā dharmaśīlasya dharmalopo'thavā punaḥ | dharmalopo garīyānvai syādityatrākaronmatim

एक ओर इन धर्मशील का क्रोध है, दूसरी ओर धर्म का लोप। धर्म-लोप ही अधिक भारी होगा।" ऐसा उसने मन में निश्चय किया।

श्लोक 19 (1.47.19)

उत्थापयिष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति । धर्मलोपो भवेदस्य सन्ध्यातिक्रमणे ध्रुवम् ॥

utthāpayiṣye yadyenaṃ dhruvaṃ kopaṃ kariṣyati | dharmalopo bhavedasya sandhyātikramaṇe dhruvam

"यदि मैं इन्हें जगाऊँगी तो ये निश्चय ही क्रोध करेंगे; पर संध्या का समय बीत गया तो इनका धर्म-लोप निश्चित है।"

श्लोक 20 (1.47.20)

इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजंगमा । तमृषिं दीप्ततपसं शयानमनलोपमम् ॥

iti niścitya manasā jaratkārurbhujaṃgamā | tamṛṣiṃ dīptatapasaṃ śayānamanalopamam

मन में ऐसा निश्चय करके नागकन्या जरत्कारु ने अग्नि के समान तेजस्वी, दीप्त तपस्या वाले उन सोते हुए ऋषि से

श्लोक 21 (1.47.21)

उवाचेदं वचः श्लक्ष्णं ततो मधुरभाषिणी । उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति ॥

uvācedaṃ vacaḥ ślakṣṇaṃ tato madhurabhāṣiṇī | uttiṣṭha tvaṃ mahābhāga sūryo'stamupagacchati

मधुर वाणी में ये कोमल वचन कहे—"हे महाभाग, उठिए, सूर्य अस्त हो रहा है।

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 22 (1.47.22)

सन्ध्यामुपास्स्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्रतः । प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽयं मुहूर्तो रम्यदारुणः ॥

sandhyāmupāssva bhagavannapaḥ spṛṣṭvā yatavrataḥ | prāduṣkṛtāgnihotro'yaṃ muhūrto ramyadāruṇaḥ

हे भगवन्, व्रत में स्थित होकर जल का आचमन कीजिए और संध्या-उपासना कीजिए। अग्निहोत्र के प्रज्वलित होने का यह मुहूर्त सुन्दर भी है और भयावह भी।

सौतिरुवाच

श्लोक 23 (1.47.23)

सन्ध्या प्रवर्तते चेयं पश्चिमायां दिशि प्रभो । एवमुक्तः स भगवाञ्जरत्कारुर्महातपाः ॥

sandhyā pravartate ceyaṃ paścimāyāṃ diśi prabho | evamuktaḥ sa bhagavāñjaratkārurmahātapāḥ

हे प्रभो, पश्चिम दिशा में संध्या उतर रही है।" ऐसा कहे जाने पर महातपस्वी भगवान जरत्कारु

श्लोक 24 (1.47.24)

भार्यां प्रस्फुरमाणौष्ठ इदं वचनमब्रवीत् । अवमानः प्रयुक्तोऽयं त्वया मम भुजंगमे ॥

bhāryāṃ prasphuramāṇauṣṭha idaṃ vacanamabravīt | avamānaḥ prayukto'yaṃ tvayā mama bhujaṃgame

काँपते होंठों से अपनी पत्नी से यह वचन बोले—"हे नागकन्ये, तुमने मेरा अपमान किया है।

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 25 (1.47.25)

समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम् । शक्तिरस्ति न वामोरु मयि सुप्ते विभावसोः ॥

samīpe te na vatsyāmi gamiṣyāmi yathāgatam | śaktirasti na vāmoru mayi supte vibhāvasoḥ

मैं अब तुम्हारे पास नहीं रहूँगा; जैसे आया था वैसे ही चला जाऊँगा। हे सुन्दरी, मेरे मन में यह निश्चित है कि जब मैं सोया हूँ, तब सूर्य में यह शक्ति नहीं

श्लोक 26 (1.47.26)

अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हृदि वर्तते । न चाप्यवमतस्येह वासो रोचेत कस्यचित् ॥

astaṃ gantuṃ yathākālamiti me hṛdi vartate | na cāpyavamatasyeha vāso roceta kasyacit

कि वह समय पर अस्त हो जाए। अपमानित होकर कोई भी कहीं रहना पसंद नहीं करेगा,

सौतिरुवाच

श्लोक 27 (1.47.27)

किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा । एवमुक्ता जरत्कारुर्भर्त्रा हृदयकम्पनम् ॥

kiṃ punardharmaśīlasya mama vā madvidhasya vā | evamuktā jaratkārurbhartrā hṛdayakampanam

फिर मुझ जैसे या मेरे समान किसी धर्मशील की तो बात ही क्या।" पति के ऐसे हृदय कँपा देने वाले वचन सुनकर

श्लोक 28 (1.47.28)

अब्रवीद्भगिनी तत्र वासुकेः सन्निवेशने । नावमानात्कृतवती तवाहं विप्र बोधनम् ॥

abravīdbhaginī tatra vāsukeḥ sanniveśane | nāvamānātkṛtavatī tavāhaṃ vipra bodhanam

वासुकि की बहन जरत्कारु ने वहीं अपने भाई के भवन में कहा—"हे विप्र, मैंने आपको अपमान करने के लिए नहीं जगाया।

श्लोक 29 (1.47.29)

धर्मलोपो न ते विप्र स्यादित्येतन्मया कृतम् । उवाच भार्यामित्युक्तो जरत्कारुर्महातपाः ॥

dharmalopo na te vipra syādityetanmayā kṛtam | uvāca bhāryāmityukto jaratkārurmahātapāḥ

हे विप्र, मैंने यह इसलिए किया कि आपका धर्म-लोप न हो।" ऐसा कहे जाने पर महातपस्वी जरत्कारु ने पत्नी से कहा—

श्लोक 30 (1.47.30)

ऋषिः कोपसमाविष्टस्त्यक्तुकामो भुजंगमाम् । न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजंगमे ॥

ṛṣiḥ kopasamāviṣṭastyaktukāmo bhujaṃgamām | na me vāganṛtaṃ prāha gamiṣye'haṃ bhujaṃgame

क्रोध से भरे और नागकन्या को त्यागने के इच्छुक उन ऋषि ने कहा—"मेरी वाणी ने कभी असत्य नहीं कहा। हे नागकन्ये, मैं जाऊँगा।

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 31 (1.47.31)

समयो ह्येष मे पूर्वं त्वया सह मिथः कृतः । सुखमस्म्युषितो भद्रे ब्रूयास्त्वं भ्रातरं शुभे ॥

samayo hyeṣa me pūrvaṃ tvayā saha mithaḥ kṛtaḥ | sukhamasmyuṣito bhadre brūyāstvaṃ bhrātaraṃ śubhe

क्योंकि मैंने पहले ही तुम्हारे साथ यह शर्त की थी। हे भद्रे, मैं यहाँ सुख से रहा। हे शुभे, अपने भाई से कहना,

श्लोक 32 (1.47.32)

इतो मयि गते भीरु गतः स भगवानिति । त्वं चापि मयि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमर्हसि ॥

ito mayi gate bhīru gataḥ sa bhagavāniti | tvaṃ cāpi mayi niṣkrānte na śokaṃ kartumarhasi

हे भीरु, मेरे यहाँ से चले जाने पर, कि ‘वे भगवान चले गए।’ और मेरे चले जाने पर तुम शोक मत करना।"

सौतिरुवाच

श्लोक 33 (1.47.33)

इत्युक्ता साऽनवद्याङ्गी प्रत्युवाच मुनिं तदा । जरत्कारुं जरत्कारुश्चिन्ताशोकपरायणा ॥

ityuktā sā'navadyāṅgī pratyuvāca muniṃ tadā | jaratkāruṃ jaratkāruścintāśokaparāyaṇā

ऐसा कहे जाने पर चिन्ता और शोक में डूबी, निर्दोष अंगों वाली जरत्कारु ने तब मुनि जरत्कारु को उत्तर दिया।

श्लोक 34 (1.47.34)

बाष्पगद्गदया वाचा मुखेन परिशुष्यता । कृताञ्जलिर्वरारोहा पर्यश्रुनयना ततः ॥

bāṣpagadgadayā vācā mukhena pariśuṣyatā | kṛtāñjalirvarārohā paryaśrunayanā tataḥ

आँसुओं से गद्गद वाणी और सूखते मुख के साथ, हाथ जोड़कर, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली वह सुन्दरी

श्लोक 35 (1.47.35)

धैर्यमालम्ब्य वामोरूर्हृदयेन प्रवेपता । न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥

dhairyamālambya vāmorūrhṛdayena pravepatā | na māmarhasi dharmajña parityaktumanāgasam

काँपते हृदय से धीरज धरकर बोली—"हे धर्मज्ञ, मुझ निरपराध को त्यागना आपको उचित नहीं।

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 36 (1.47.36)

धर्मे स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रियहिते रताम् । प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम ॥

dharme sthitāṃ sthito dharme sadā priyahite ratām | pradāne kāraṇaṃ yacca mama tubhyaṃ dvijottama

आप धर्म में स्थित हैं, मैं भी धर्म में स्थित हूँ और सदा आपके प्रिय और हित में लगी रहती हूँ। हे द्विजश्रेष्ठ, मुझे आपको देने का जो कारण था,

श्लोक 37 (1.47.37)

तदलब्धवतीं मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुकिः । मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम ॥

tadalabdhavatīṃ mandāṃ kiṃ māṃ vakṣyati vāsukiḥ | mātṛśāpābhibhūtānāṃ jñātīnāṃ mama sattama

उसे यदि मैं अभागिन प्राप्त न कर सकी, तो वासुकि मुझसे क्या कहेंगे? हे सज्जनश्रेष्ठ, मेरे जाति-बन्धु माता के शाप से ग्रस्त हैं।

श्लोक 38 (1.47.38)

अपत्यमीप्सितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते । त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत् ॥

apatyamīpsitaṃ tvattastacca tāvanna dṛśyate | tvatto hyapatyalābhena jñātīnāṃ me śivaṃ bhavet

उन्हें आपसे संतान की आशा है, और वह अभी तक दिखाई नहीं देती। आपसे संतान प्राप्त होने पर ही मेरे बन्धुओं का कल्याण होगा।

श्लोक 39 (1.47.39)

संप्रयोगो भवेन्नायं मम मोघस्त्वया द्विज । ज्ञातीनां हितमिच्छन्ती भगवंस्त्वां प्रसादये ॥

saṃprayogo bhavennāyaṃ mama moghastvayā dvija | jñātīnāṃ hitamicchantī bhagavaṃstvāṃ prasādaye

हे द्विज, आपके साथ मेरा यह संयोग व्यर्थ न जाए। अपने बन्धुओं का हित चाहती हुई, हे भगवन्, मैं आपसे प्रसन्न होने की विनती करती हूँ।

श्लोक 40 (1.47.40)

इममव्यक्तरूपं मे गर्भमाधाय सत्तम । कथं त्यक्त्वा महात्मा सन्गन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥

imamavyaktarūpaṃ me garbhamādhāya sattama | kathaṃ tyaktvā mahātmā sangantumicchasyanāgasam

हे सज्जनश्रेष्ठ, मुझमें यह गर्भ स्थापित करके, जिसका रूप अभी प्रकट नहीं हुआ, आप महात्मा होकर मुझ निरपराध को छोड़कर कैसे जाना चाहते हैं?"

सौतिरुवाच

श्लोक 41 (1.47.41)

एवमुक्तस्तु स मुनिर्भार्यां वचनमब्रवीत् । यद्युक्तमनुरूपं च जरत्कारुं तपोधनः ॥

evamuktastu sa munirbhāryāṃ vacanamabravīt | yadyuktamanurūpaṃ ca jaratkāruṃ tapodhanaḥ

ऐसा कहे जाने पर उन तपोधन मुनि ने अपनी पत्नी जरत्कारु से उचित और अनुरूप वचन कहे—

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 42 (1.47.42)

अस्त्ययं सुभगे गर्भस्तव वैश्वानरोपमः । ऋषिः परमधर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः ॥

astyayaṃ subhage garbhastava vaiśvānaropamaḥ | ṛṣiḥ paramadharmātmā vedavedāṅgapāragaḥ

"हे सुभगे, तुम्हारे गर्भ में अग्नि के समान तेजस्वी यह संतान है—एक परम धर्मात्मा ऋषि, वेदों और वेदाङ्गों में पारंगत।"

सौतिरुवाच

श्लोक 43 (1.47.43)

एवमुक्त्वा स धर्मात्मा जरत्कारुर्महानृषिः । उग्राय तपसे भूयो जगाम कृतनिश्चयः ॥

evamuktvā sa dharmātmā jaratkārurmahānṛṣiḥ | ugrāya tapase bhūyo jagāma kṛtaniścayaḥ

ऐसा कहकर वे धर्मात्मा महर्षि जरत्कारु दृढ़ निश्चय के साथ फिर से उग्र तपस्या के लिए चले गए।

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