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आदि पर्व · अध्याय 48

आस्तीक का जन्म

वासुकि की बहन अपने भाई को बताती है कि उसके पति चले गए हैं। वासुकि चिन्तित हैं, क्योंकि ब्रह्मा ने कहा था कि इसी विवाह से उत्पन्न पुत्र नागों को सर्प-सत्र से बचाएगा; वे पूछते हैं कि क्या उसे गर्भ है, और वह पति के अंतिम शब्द "अस्ति" (है) का स्मरण कराकर उन्हें आश्वस्त करती है। समय आने पर वह एक तेजस्वी पुत्र को जन्म देती है, जिसका नाम उसी शब्द के कारण आस्तीक पड़ता है। वह च्यवन के पुत्र से वेद पढ़ता है और नागराज के भवन में बड़ा होकर सब नागों को आनन्दित करता है।

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सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.48.1)

गतमात्रं तु भर्तारं जरत्कारुरवेदयत् । भ्रातुः सकाशमागत्य यथातथ्यं तपोधन ॥

gatamātraṃ tu bhartāraṃ jaratkāruravedayat | bhrātuḥ sakāśamāgatya yathātathyaṃ tapodhana

हे तपोधन, पति के जाते ही जरत्कारु ने भाई के पास जाकर सब कुछ ज्यों का त्यों बता दिया।

श्लोक 2 (1.48.2)

ततः स भुजगश्रेष्ठः श्रुत्वा सुमहदप्रियम् । उवाच भगिनीं दीनां तदा दीनतरः स्वयम् ॥

tataḥ sa bhujagaśreṣṭhaḥ śrutvā sumahadapriyam | uvāca bhaginīṃ dīnāṃ tadā dīnataraḥ svayam

यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर वह नागश्रेष्ठ स्वयं और भी दुःखी होकर अपनी दुःखी बहन से बोला—

वासुकिरुवाच

श्लोक 3 (1.48.3)

जानासि भद्रे यत्कार्यं प्रदाने कारणं च यत् । पन्नगानां हितार्थाय पुत्रस्ते स्यात्ततो यदि ॥

jānāsi bhadre yatkāryaṃ pradāne kāraṇaṃ ca yat | pannagānāṃ hitārthāya putraste syāttato yadi

"भद्रे, तुम जानती हो कि क्या करना है और तुम्हें देने का कारण क्या था—नागों का हित। यदि उनसे तुम्हें पुत्र हो,

श्लोक 4 (1.48.4)

स सर्पसत्रात्किल नो मोक्षयिष्यति वीर्यवान् । एवं पितामहः पूर्वमुक्तवांस्तु सुरैः सह ॥

sa sarpasatrātkila no mokṣayiṣyati vīryavān | evaṃ pitāmahaḥ pūrvamuktavāṃstu suraiḥ saha

तो वह पराक्रमी हमें सर्प-सत्र से छुड़ाएगा। पूर्वकाल में देवताओं के साथ पितामह ब्रह्मा ने ऐसा ही कहा था।

श्लोक 5 (1.48.5)

अप्यस्ति गर्भः सुभगे तस्मात्ते मुनिसत्तमात् । न चेच्छाम्यफलं तस्य दारकर्म मनीषिणः ॥

apyasti garbhaḥ subhage tasmātte munisattamāt | na cecchāmyaphalaṃ tasya dārakarma manīṣiṇaḥ

हे सुभगे, क्या उन मुनिश्रेष्ठ से तुम्हें गर्भ है? मैं नहीं चाहता कि उन मनीषी का विवाह निष्फल जाए।

श्लोक 6 (1.48.6)

कामं च मम न न्याय्यं प्रष्टुं त्वां कार्यमीदृशम् । किंतु कार्यगरीयस्त्वात्ततस्त्वाऽहमचूचुदम् ॥

kāmaṃ ca mama na nyāyyaṃ praṣṭuṃ tvāṃ kāryamīdṛśam | kiṃtu kāryagarīyastvāttatastvā'hamacūcudam

वैसे तो तुमसे ऐसी बात पूछना मेरे लिए उचित नहीं, किन्तु कार्य की गुरुता के कारण मैंने तुमसे यह पूछा है।

श्लोक 7 (1.48.7)

दुर्वार्यतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विनः । नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत्स माम् ॥

durvāryatāṃ viditvā ca bhartuste'titapasvinaḥ | nainamanvāgamiṣyāmi kadāciddhi śapetsa mām

तुम्हारे अत्यन्त तपस्वी पति को रोक पाना कठिन है, यह जानकर मैं उनके पीछे नहीं जाऊँगा; कहीं वे मुझे शाप न दे दें।

श्लोक 8 (1.48.8)

आचक्ष्व भद्रे भर्तुः स्वं सर्वमेव विचेष्टितम् । उद्धरस्व च शल्यं मे घोरं हृदि चिरस्थितम् ॥

ācakṣva bhadre bhartuḥ svaṃ sarvameva viceṣṭitam | uddharasva ca śalyaṃ me ghoraṃ hṛdi cirasthitam

भद्रे, अपने पति का सारा आचरण मुझे बताओ, और मेरे हृदय में बहुत समय से गड़े इस भयानक काँटे को निकाल दो।"

सौतिरुवाच

श्लोक 9 (1.48.9)

जरत्कारुस्ततो वाक्यमित्युक्ता प्रत्यभाषत । आश्वासयन्ती सन्तप्तं वासुकिं पन्नगेश्वरम् ॥

jaratkārustato vākyamityuktā pratyabhāṣata | āśvāsayantī santaptaṃ vāsukiṃ pannageśvaram

ऐसा कहे जाने पर जरत्कारु ने संतप्त नागराज वासुकि को सांत्वना देते हुए उत्तर दिया—

जरत्कारुरुवाच

श्लोक 10 (1.48.10)

पृष्टो मयाऽपत्यहेतोः स महात्मा महातपाः । अस्तीत्युत्तरमुद्दिश्य ममेदं गतवांश्च सः ॥

pṛṣṭo mayā'patyahetoḥ sa mahātmā mahātapāḥ | astītyuttaramuddiśya mamedaṃ gatavāṃśca saḥ

"मैंने संतान के विषय में उन महात्मा महातपस्वी से पूछा था। उत्तर में उन्होंने ‘अस्ति’ (है) कहा और फिर चले गए।

श्लोक 11 (1.48.11)

स्वैरेष्वपि न तेनाहं स्मरामि वितथं वचः । उक्तपूर्वं कुतो राजन्सांपराये स वक्ष्यति ॥

svaireṣvapi na tenāhaṃ smarāmi vitathaṃ vacaḥ | uktapūrvaṃ kuto rājansāṃparāye sa vakṣyati

हँसी-विनोद में भी उन्होंने कभी असत्य वचन कहा हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं। फिर हे राजन्, ऐसे गम्भीर अवसर पर वे असत्य क्यों कहेंगे?

श्लोक 12 (1.48.12)

न संतापस्त्वया कार्यः कार्यं प्रति भुजंगमे । उत्पत्स्यति च ते पुत्रो ज्वलनार्कसमप्रभः ॥

na saṃtāpastvayā kāryaḥ kāryaṃ prati bhujaṃgame | utpatsyati ca te putro jvalanārkasamaprabhaḥ

उन्होंने कहा था—‘हे नागकन्ये, इस कार्य को लेकर तुम्हें दुःख नहीं करना चाहिए। तुम्हारे अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा।’

श्लोक 13 (1.48.13)

इत्युक्त्वा स हि मां भ्रातर्गतो भर्ता तपोधनः । तस्माद्व्येतु परं दुःखं तवेदं मनसि स्थितम् ॥

ityuktvā sa hi māṃ bhrātargato bhartā tapodhanaḥ | tasmādvyetu paraṃ duḥkhaṃ tavedaṃ manasi sthitam

भैया, मुझसे ऐसा कहकर मेरे तपोधन पति चले गए। इसलिए आपके मन में बसा यह भारी दुःख दूर हो जाए।"

सौतिरुवाच

श्लोक 14 (1.48.14)

एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकिः परया मुदा । एवमस्त्विति तद्वाक्यं भगिन्याः प्रत्यगृह्णत ॥

etacchrutvā sa nāgendro vāsukiḥ parayā mudā | evamastviti tadvākyaṃ bhaginyāḥ pratyagṛhṇata

यह सुनकर नागराज वासुकि ने बड़े हर्ष के साथ "ऐसा ही हो" कहकर बहन की बात स्वीकार कर ली।

श्लोक 15 (1.48.15)

सान्त्वमानार्थदानैश्च पूजया चारुरूपया । सोदर्यां पूजयामास स्वसारं पन्नगोत्तमः ॥

sāntvamānārthadānaiśca pūjayā cārurūpayā | sodaryāṃ pūjayāmāsa svasāraṃ pannagottamaḥ

उस नागश्रेष्ठ ने सान्त्वना, सम्मान, धन के दान और सुन्दर सत्कार से अपनी सगी बहन का आदर किया।

श्लोक 16 (1.48.16)

ततः प्रववृधे गर्भो महातेजा महाप्रभः । यथा सोमो द्विजश्रेष्ठ शुक्लपक्षोदितो दिवि ॥

tataḥ pravavṛdhe garbho mahātejā mahāprabhaḥ | yathā somo dvijaśreṣṭha śuklapakṣodito divi

हे द्विजश्रेष्ठ, तब वह महातेजस्वी, महान प्रभा वाला गर्भ आकाश में शुक्ल पक्ष में उदित चन्द्रमा की भाँति बढ़ने लगा।

श्लोक 17 (1.48.17)

अथ काले तु सा ब्रह्मन्प्रजज्ञे भुजगस्वसा । कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभयापहम् ॥

atha kāle tu sā brahmanprajajñe bhujagasvasā | kumāraṃ devagarbhābhaṃ pitṛmātṛbhayāpaham

हे ब्रह्मन्, फिर समय आने पर नाग की बहन ने देव-शिशु के समान कान्तिमान एक कुमार को जन्म दिया, जो पिता और माता दोनों के कुलों का भय दूर करने वाला था।

श्लोक 18 (1.48.18)

ववृधे स तु तत्रैव नागराजनिवेशने । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान्भार्गवच्यवनात्मजात् ॥

vavṛdhe sa tu tatraiva nāgarājaniveśane | vedāṃścādhijage sāṅgānbhārgavacyavanātmajāt

वह वहीं नागराज के भवन में बड़ा हुआ और उसने भृगुवंशी च्यवन के पुत्र से अंगों सहित वेदों का अध्ययन किया।

श्लोक 19 (1.48.19)

चीर्णव्रतो बाल एव बुद्धिसत्त्वगुणान्वितः । नाम चास्याभवत्ख्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ॥

cīrṇavrato bāla eva buddhisattvaguṇānvitaḥ | nāma cāsyābhavatkhyātaṃ lokeṣvāstīka ityuta

बालक होते हुए भी उसने व्रतों का पालन कर लिया था; वह बुद्धि, सत्त्व और सद्गुणों से सम्पन्न था। लोकों में उसका नाम "आस्तीक" प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 20 (1.48.20)

अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात्पिता गर्भस्थमेव तम् । वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ॥

astītyuktvā gato yasmātpitā garbhasthameva tam | vanaṃ tasmādidaṃ tasya nāmāstīketi viśrutam

क्योंकि जब वह गर्भ में ही था, तब उसके पिता "अस्ति" (है) कहकर वन को चले गए थे, इसीलिए उसका नाम आस्तीक विख्यात हुआ।

श्लोक 21 (1.48.21)

स बाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितबुद्धिमान् । गृहे पन्नगराजस्य प्रयत्नात्परिरक्षितः ॥

sa bāla eva tatrasthaścarannamitabuddhimān | gṛhe pannagarājasya prayatnātparirakṣitaḥ

असीम बुद्धि वाला वह बालक वहीं रहता हुआ नागराज के घर में बड़े यत्न से सुरक्षित रखा गया।

श्लोक 22 (1.48.22)

भगवानिव देवेशः शूलपाणिर्हिरण्मयः । विवर्धमानः सर्वांस्तान्पन्नगानभ्यहर्षयत् ॥

bhagavāniva deveśaḥ śūlapāṇirhiraṇmayaḥ | vivardhamānaḥ sarvāṃstānpannagānabhyaharṣayat

शूलधारी, स्वर्णिम देवाधिदेव भगवान शिव के समान वह बढ़ता गया और उसने उन सब नागों को हर्षित किया।

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