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आदि पर्व · अध्याय 49

परीक्षित् और मौनव्रती मुनि

शौनक के अनुरोध पर सौति बताते हैं कि जनमेजय ने अपने मन्त्रियों से अपने पिता की मृत्यु के विषय में कैसे पूछा। मन्त्री परीक्षित् की प्रशंसा एक न्यायप्रिय और प्रजाप्रिय राजा के रूप में करते हैं, जिन्होंने साठ वर्ष राज्य किया, और फिर बताते हैं कि वन में घायल मृग के खो जाने पर थके और भूखे राजा ने मौनव्रत धारण किए एक मुनि से प्रश्न किया। मुनि के मौन से क्रुद्ध होकर राजा ने धनुष की नोक से एक मरा हुआ साँप उठाकर मुनि के कंधे पर रख दिया, और मुनि बिना कुछ कहे उसे धारण किए रहे।

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

शौनक उवाच

श्लोक 1 (1.49.1)

यदपृच्छत्तदा राजा मन्त्रिणो जनमेजयः । पितुः स्वर्गगतिं तन्मे विस्तरेण पुनर्वद ॥

yadapṛcchattadā rājā mantriṇo janamejayaḥ | pituḥ svargagatiṃ tanme vistareṇa punarvada

उस समय राजा जनमेजय ने अपने पिता के स्वर्गगमन के विषय में मन्त्रियों से जो पूछा था, वह मुझे फिर से विस्तारपूर्वक बताइए।

सौतिरुवाच

श्लोक 2 (1.49.2)

शृणु ब्रह्मन्यथाऽपृच्छन्मन्त्रिणो नृपतिस्तदा । यथा चाख्यातवन्तस्ते निधनं तत्परिक्षितः ॥

śṛṇu brahmanyathā'pṛcchanmantriṇo nṛpatistadā | yathā cākhyātavantaste nidhanaṃ tatparikṣitaḥ

हे ब्रह्मन्, सुनिए कि तब राजा ने अपने मन्त्रियों से किस प्रकार पूछा और उन्होंने परीक्षित् की मृत्यु का वृत्तान्त उसे किस प्रकार सुनाया।

जनमेजय उवाच

श्लोक 3 (1.49.3)

जानन्ति स्म भवन्तस्तद्यथावृत्तं पितुर्मम । आसीद्यथा स निधनं गतः काले महायशाः ॥

jānanti sma bhavantastadyathāvṛttaṃ piturmama | āsīdyathā sa nidhanaṃ gataḥ kāle mahāyaśāḥ

आप लोग जानते हैं कि मेरे पिता के साथ क्या घटा था — वे महायशस्वी राजा समय आने पर किस प्रकार मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 4 (1.49.4)

श्रुत्वा भवत्सकाशाद्धि पितुर्वृत्तमशेषतः । कल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातुचित् ॥

śrutvā bhavatsakāśāddhi piturvṛttamaśeṣataḥ | kalyāṇaṃ pratipatsyāmi viparītaṃ na jātucit

आप लोगों से अपने पिता का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर मैं वही करूँगा जो कल्याणकारी हो, उसके विपरीत कभी नहीं।

सौतिरुवाच

श्लोक 5 (1.49.5)

मन्त्रिणोऽथाब्रुवन्वाक्यं पृष्टास्तेन महात्मना । सर्वे धर्मविदः प्राज्ञा राजानं जनमेजयम् ॥

mantriṇo'thābruvanvākyaṃ pṛṣṭāstena mahātmanā | sarve dharmavidaḥ prājñā rājānaṃ janamejayam

उस महात्मा राजा के इस प्रकार पूछने पर सभी धर्मज्ञ और बुद्धिमान मन्त्री राजा जनमेजय से बोले।

मन्त्रिण ऊचुः

श्लोक 6 (1.49.6)

शृणु पार्थिव यद्ब्रूषे पितुस्तव महात्मनः । चरितं पार्थिवेन्द्रस्य यथा निष्ठां गतश्च सः ॥

śṛṇu pārthiva yadbrūṣe pitustava mahātmanaḥ | caritaṃ pārthivendrasya yathā niṣṭhāṃ gataśca saḥ

हे राजन्, आप जो पूछते हैं, वह सुनिए — अपने महात्मा पिता, उन राजाधिराज का चरित्र, और यह कि उनका अन्त किस प्रकार हुआ।

श्लोक 7 (1.49.7)

धर्मात्मा च महात्मा च प्रजापालः पिता तव । आसीदिह यथावृत्तः स महात्मा शृणुष्व तत् ॥

dharmātmā ca mahātmā ca prajāpālaḥ pitā tava | āsīdiha yathāvṛttaḥ sa mahātmā śṛṇuṣva tat

आपके पिता धर्मात्मा, महात्मा और प्रजा के पालक थे। वे महात्मा इस लोक में किस प्रकार रहे, यह सुनिए।

श्लोक 8 (1.49.8)

चातुर्वर्ण्यं स्वधर्मस्थं स कृत्वा पर्यरक्षत । धर्मतो धर्मविद्राजा धर्मो विग्रहवानिव ॥

cāturvarṇyaṃ svadharmasthaṃ sa kṛtvā paryarakṣata | dharmato dharmavidrājā dharmo vigrahavāniva

उन्होंने चारों वर्णों को अपने-अपने धर्म में स्थित रखकर उनकी रक्षा की। वे धर्मज्ञ राजा धर्म के अनुसार शासन करते थे, मानो देहधारी धर्म ही हों।

श्लोक 9 (1.49.9)

ररक्ष पृथिवीं देवीं श्रीमानतुलविक्रमः । द्वेष्टारस्तस्य नैवासन्स च द्वेष्टि न कंचन ॥

rarakṣa pṛthivīṃ devīṃ śrīmānatulavikramaḥ | dveṣṭārastasya naivāsansa ca dveṣṭi na kaṃcana

अतुलनीय पराक्रमवाले उन श्रीमान् राजा ने देवी पृथ्वी की रक्षा की। उनसे द्वेष करनेवाला कोई नहीं था, और वे भी किसी से द्वेष नहीं करते थे।

श्लोक 10 (1.49.10)

समः सर्वेषु भूतेषु प्रजापतिरिवाभवत् । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव स्वकर्मसु ॥

samaḥ sarveṣu bhūteṣu prajāpatirivābhavat | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścaiva svakarmasu

वे सब प्राणियों के प्रति प्रजापति के समान समभाव रखते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — सब अपने-अपने कर्मों में

श्लोक 11 (1.49.11)

स्थितः सुमनसो राजंस्तेन राज्ञा स्वधिष्ठिताः । विधवानाथविकलान्कृपणांश्च बभार सः ॥

sthitaḥ sumanaso rājaṃstena rājñā svadhiṣṭhitāḥ | vidhavānāthavikalānkṛpaṇāṃśca babhāra saḥ

हे राजन्, उस राजा के सुशासन में प्रसन्नचित्त होकर स्थित रहते थे। वे विधवाओं, अनाथों, अपंगों और दीनों का भरण-पोषण करते थे।

श्लोक 12 (1.49.12)

सुदर्शः सर्वभूतानामासीत्सोम इवापरः । तुष्टपुष्टजनः श्रीमान्सत्यवाग्दृढविक्रमः ॥

sudarśaḥ sarvabhūtānāmāsītsoma ivāparaḥ | tuṣṭapuṣṭajanaḥ śrīmānsatyavāgdṛḍhavikramaḥ

वे सब प्राणियों के लिए दूसरे चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन थे। उनकी प्रजा सन्तुष्ट और पुष्ट थी; वे श्रीमान्, सत्यवादी और दृढ़ पराक्रमी थे।

श्लोक 13 (1.49.13)

धनुर्वेदे तु शिष्योऽभून्नृपः शारद्वतस्य सः । गोविन्दस्य प्रियश्चासीत्पिता ते जनमेजय ॥

dhanurvede tu śiṣyo'bhūnnṛpaḥ śāradvatasya saḥ | govindasya priyaścāsītpitā te janamejaya

धनुर्वेद में वे राजा शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य के शिष्य थे। हे जनमेजय, आपके पिता गोविन्द के प्रिय थे।

श्लोक 14 (1.49.14)

लोकस्य चैव सर्वस्य प्रिय आसीन्महायशाः । परिक्षीणेषु कुरुषु सोत्तरायामजीजनत् ॥

lokasya caiva sarvasya priya āsīnmahāyaśāḥ | parikṣīṇeṣu kuruṣu sottarāyāmajījanat

वे महायशस्वी राजा समस्त लोक के भी प्रिय थे। जब कुरुवंश क्षीण हो चुका था, तब अभिमन्यु ने उत्तरा के गर्भ से उन्हें उत्पन्न किया;

श्लोक 15 (1.49.15)

परिक्षिदभवत्तेन सौभद्रस्यात्मजो बली । राजधर्मार्थकुशलो युक्तः सर्वगुणैर्वृतः ॥

parikṣidabhavattena saubhadrasyātmajo balī | rājadharmārthakuśalo yuktaḥ sarvaguṇairvṛtaḥ

इसी कारण सुभद्रानन्दन के वे बलवान् पुत्र परीक्षित् कहलाए। वे राजधर्म और अर्थनीति में कुशल तथा सब गुणों से सम्पन्न थे।

श्लोक 16 (1.49.16)

जितेन्द्रियश्चात्मवांश्च मेधावी धर्मसेविता । षड्वर्गजिन्महाबुद्धिर्नीतिशास्त्रविदुत्तमः ॥

jitendriyaścātmavāṃśca medhāvī dharmasevitā | ṣaḍvargajinmahābuddhirnītiśāstraviduttamaḥ

वे जितेन्द्रिय, आत्मवान्, मेधावी और धर्म का पालन करनेवाले थे; छहों आन्तरिक शत्रुओं को जीतनेवाले, महाबुद्धिमान और नीतिशास्त्र के श्रेष्ठ ज्ञाता थे।

श्लोक 17 (1.49.17)

प्रजा इमास्तव पिता षष्टिवर्षाण्यपालयत् । ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्वेषां दुःखमावहन् ॥

prajā imāstava pitā ṣaṣṭivarṣāṇyapālayat | tato diṣṭāntamāpannaḥ sarveṣāṃ duḥkhamāvahan

आपके पिता ने साठ वर्ष तक इस प्रजा का पालन किया। फिर सबको दुःख देते हुए वे अपने नियत अन्त को प्राप्त हुए।

श्लोक 18 (1.49.18)

ततस्त्वं पुरुषश्रेष्ठ धर्मेण प्रतिपेदिवान् । इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कुरुकुलागतम् । बाल एवाभिषिक्तस्त्वं सर्वभूतानुपालकः ॥

tatastvaṃ puruṣaśreṣṭha dharmeṇa pratipedivān | idaṃ varṣasahasrāṇi rājyaṃ kurukulāgatam | bāla evābhiṣiktastvaṃ sarvabhūtānupālakaḥ

उसके बाद, हे पुरुषश्रेष्ठ, आपने धर्मपूर्वक यह राज्य प्राप्त किया, जो सहस्रों वर्षों से कुरुकुल में चला आ रहा है। बाल्यावस्था में ही आपका अभिषेक हुआ, और आप सब प्राणियों के पालक हैं।

जनमेजय उवाच

श्लोक 19 (1.49.19)

नास्मिन्कुले जातु बभूव राजा । यो न प्रजानां प्रियकृत्प्रियश्च । विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां । वृत्तं महद्वृत्तपरायणानाम् ॥

nāsminkule jātu babhūva rājā | yo na prajānāṃ priyakṛtpriyaśca | viśeṣataḥ prekṣya pitāmahānāṃ | vṛttaṃ mahadvṛttaparāyaṇānām

इस कुल में कभी ऐसा राजा नहीं हुआ जो प्रजा का प्रिय करनेवाला और प्रजा का प्रिय न रहा हो — विशेषकर जब सदाचारपरायण मेरे पितामहों के महान् आचरण को देखा जाए।

श्लोक 20 (1.49.20)

कथं निधनमापन्नः पिता मम तथाविधः । आचक्षध्वं यथावन्मे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥

kathaṃ nidhanamāpannaḥ pitā mama tathāvidhaḥ | ācakṣadhvaṃ yathāvanme śrotumicchāmi tattvataḥ

ऐसे मेरे पिता किस प्रकार मृत्यु को प्राप्त हुए? मुझे ठीक-ठीक बताइए; मैं सच्चाई सुनना चाहता हूँ।

सौतिरुवाच

श्लोक 21 (1.49.21)

एवं संचोदिता राज्ञा मन्त्रिणस्ते नराधिपम् । ऊचुः सर्वे यथावृत्तं राज्ञः प्रियहितैषिणः ॥

evaṃ saṃcoditā rājñā mantriṇaste narādhipam | ūcuḥ sarve yathāvṛttaṃ rājñaḥ priyahitaiṣiṇaḥ

राजा के इस प्रकार प्रेरित करने पर राजा का प्रिय और हित चाहनेवाले उन सब मन्त्रियों ने नरेश को सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया।

मन्त्रिण ऊचुः

श्लोक 22 (1.49.22)

स राजा पृथिवीपालः सर्वशस्त्रभृतां वरः । बभूव मृगयाशीलस्तव राजन्पिता सदा ॥

sa rājā pṛthivīpālaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | babhūva mṛgayāśīlastava rājanpitā sadā

हे राजन्, पृथ्वी के पालक और सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ आपके पिता सदा आखेट के प्रेमी थे,

श्लोक 23 (1.49.23)

यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि । अस्मास्वासज्य सर्वाणि राजकार्याण्यशेषतः ॥

yathā pāṇḍurmahābāhurdhanurdharavaro yudhi | asmāsvāsajya sarvāṇi rājakāryāṇyaśeṣataḥ

महाबाहु पाण्डु की भाँति, जो युद्ध में धनुर्धरों में श्रेष्ठ थे; और उन्होंने राज्य के सारे कार्य पूरी तरह हम पर छोड़ रखे थे।

श्लोक 24 (1.49.24)

स कदाचिद्वनगतो मृगं विव्याध पत्रिणा । विद्ध्वा चान्वसरत्तूर्णं तं मृगं गहने वने ॥

sa kadācidvanagato mṛgaṃ vivyādha patriṇā | viddhvā cānvasarattūrṇaṃ taṃ mṛgaṃ gahane vane

एक बार वन में जाकर उन्होंने एक मृग को बाण से बेधा, और उसे घायल करके शीघ्रता से घने वन में उसके पीछे चल पड़े।

श्लोक 25 (1.49.25)

पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशस्ततायुधकलापवान् । न चाससाद गहने मृगं नष्टं पिता तव ॥

padātirbaddhanistriṃśastatāyudhakalāpavān | na cāsasāda gahane mṛgaṃ naṣṭaṃ pitā tava

पैदल, कमर में तलवार बाँधे, तरकश और आयुध लिए आपके पिता उस मृग को न पा सके, जो घने वन में ओझल हो गया था।

श्लोक 26 (1.49.26)

परिश्रान्तो वयस्थश्च षष्टिवर्षो जरान्वितः । क्षुधितः स महारण्ये ददर्श मुनिसत्तमम् ॥

pariśrānto vayasthaśca ṣaṣṭivarṣo jarānvitaḥ | kṣudhitaḥ sa mahāraṇye dadarśa munisattamam

थके हुए, ढलती अवस्था के, साठ वर्ष के और जरा से युक्त, भूखे राजा ने उस महावन में एक श्रेष्ठ मुनि को देखा।

श्लोक 27 (1.49.27)

स तं पप्रच्छ राजेन्द्रो मुनिं मौनव्रते स्थितम् । न च किंचिदुवाचेदं पृष्टोऽपि स मुनिस्तदा ॥

sa taṃ papraccha rājendro muniṃ maunavrate sthitam | na ca kiṃciduvācedaṃ pṛṣṭo'pi sa munistadā

उन राजेन्द्र ने मौनव्रत में स्थित उस मुनि से प्रश्न किया, किन्तु पूछे जाने पर भी मुनि ने तब कुछ नहीं कहा।

श्लोक 28 (1.49.28)

ततो राजा क्षुच्छ्रमार्तस्तं मुनिं स्थाणुवत्स्थितम् । मौनव्रतधरं शान्तं सद्यो मन्युवशं गतः ॥

tato rājā kṣucchramārtastaṃ muniṃ sthāṇuvatsthitam | maunavratadharaṃ śāntaṃ sadyo manyuvaśaṃ gataḥ

तब भूख और थकान से पीड़ित राजा उस मुनि पर तुरन्त क्रोध के वश में हो गए, जो ठूँठ की भाँति अचल, शान्त और मौनव्रत धारण किए खड़े थे।

श्लोक 29 (1.49.29)

न बुबोध च तं राजा मौनव्रतधरं मुनिम् । स तं क्रोधसमाविष्टो धर्षयामास ते पिता ॥

na bubodha ca taṃ rājā maunavratadharaṃ munim | sa taṃ krodhasamāviṣṭo dharṣayāmāsa te pitā

राजा यह न समझ सके कि मुनि मौनव्रत धारण किए हुए हैं। क्रोध से भरकर आपके पिता ने उनका अपमान किया।

श्लोक 30 (1.49.30)

मृतं सर्पं धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य धरातलात् । तस्य शुद्धात्मनः प्रादात्स्कन्धे भरतसत्तम ॥

mṛtaṃ sarpaṃ dhanuṣkoṭyā samutkṣipya dharātalāt | tasya śuddhātmanaḥ prādātskandhe bharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ, उन्होंने धनुष की नोक से धरती पर पड़ा एक मरा हुआ साँप उठाकर उस शुद्धात्मा मुनि के कंधे पर डाल दिया।

श्लोक 31 (1.49.31)

न चोवाच स मेधावी तमथो साध्वसाधु वा । तस्थौ तथैव चाक्रुद्धः सर्पं स्कन्धेन धारयन् ॥

na covāca sa medhāvī tamatho sādhvasādhu vā | tasthau tathaiva cākruddhaḥ sarpaṃ skandhena dhārayan

उस मेधावी मुनि ने उनसे भला या बुरा कुछ नहीं कहा। वे बिना क्रोध किए पहले की ही भाँति खड़े रहे और साँप को कंधे पर धारण किए रहे।

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50