आदि पर्व · अध्याय 50
शृङ्गी का शाप और जनमेजय का संकल्प
मन्त्री आगे बताते हैं — मुनि के तेजस्वी पुत्र शृङ्गी ने अपमान की बात सुनकर परीक्षित् को शाप दिया कि सात दिन के भीतर तक्षक उन्हें भस्म कर देगा। शिष्य गौरमुख द्वारा चेताए जाने पर भी राजा बच न सके; तक्षक ने मार्ग में विषवैद्य काश्यप से भेंट की, एक वृक्ष को डसकर अपने विष का बल दिखाया जिसे काश्यप ने फिर जीवित कर दिया, और उन्हें धन देकर लौटा दिया, फिर महल में परीक्षित् को मार डाला। वृक्ष के साथ भस्म होकर फिर जी उठे एक लकड़हारे ने यह संवाद बताया था। शोकाकुल जनमेजय अपने पिता और उत्तङ्क के लिए तक्षक से प्रतिशोध लेने का संकल्प करते हैं।
मन्त्रिण ऊचुः
श्लोक 1 (1.50.1)
ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजंगमम् । मुनेः क्षुत्क्षाम आसज्य स्वपुरं प्रययौ पुनः ॥
tataḥ sa rājā rājendra skandhe tasya bhujaṃgamam | muneḥ kṣutkṣāma āsajya svapuraṃ prayayau punaḥ
हे राजेन्द्र, तब भूख से दुर्बल राजा उस मुनि के कंधे पर साँप डालकर फिर अपने नगर को लौट गए।
श्लोक 2 (1.50.2)
ऋषेस्तस्य तु पुत्रोऽभूद्गवि जातो महायशाः । शृङ्गी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योऽतिकोपनः ॥
ṛṣestasya tu putro'bhūdgavi jāto mahāyaśāḥ | śṛṅgī nāma mahātejāstigmavīryo'tikopanaḥ
उस ऋषि का एक महायशस्वी पुत्र था, जो गौ से उत्पन्न हुआ था। उसका नाम शृङ्गी था; वह महातेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी और अत्यन्त क्रोधी था।
श्लोक 3 (1.50.3)
ब्रह्माणं समुपागम्य मुनिः पूजां चकार ह । सोऽनुज्ञातस्ततस्तत्र शृङ्गी शुश्राव तं तदा ॥
brahmāṇaṃ samupāgamya muniḥ pūjāṃ cakāra ha | so'nujñātastatastatra śṛṅgī śuśrāva taṃ tadā
वह मुनिकुमार ब्रह्माजी के पास जाकर उनकी पूजा कर रहा था। फिर उनकी आज्ञा लेकर वहाँ शृङ्गी ने सुना
श्लोक 4 (1.50.4)
सख्युः सकाशात्पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा । मृतं सर्पं समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम् ॥
sakhyuḥ sakāśātpitaraṃ pitrā te dharṣitaṃ purā | mṛtaṃ sarpaṃ samāsaktaṃ sthāṇubhūtasya tasya tam
अपने मित्र से कि उसके पिता का आपके पिता ने अपमान किया है — कि ठूँठ की भाँति अचल खड़े उसके पिता पर एक मरा हुआ साँप डाल दिया गया है,
श्लोक 5 (1.50.5)
वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् । तपस्विनमतीवाथ तं मुनिप्रवरं नृप ॥
vahantaṃ rājaśārdūla skandhenānapakāriṇam | tapasvinamatīvātha taṃ munipravaraṃ nṛpa
और वे निरपराध होते हुए भी उसे कंधे पर ढो रहे हैं, हे राजसिंह — वे महान् तपस्वी, हे राजन्, मुनियों में श्रेष्ठ,
श्लोक 6 (1.50.6)
जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम् । तपसा द्योतितात्मानं स्वेष्वङ्गेषु यतं तदा ॥
jitendriyaṃ viśuddhaṃ ca sthitaṃ karmaṇyathādbhutam | tapasā dyotitātmānaṃ sveṣvaṅgeṣu yataṃ tadā
जितेन्द्रिय, शुद्ध, अद्भुत कर्म में स्थित, तप से प्रकाशित आत्मावाले और अपने अंगों को संयम में रखनेवाले,
श्लोक 7 (1.50.7)
शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम् । अक्षुद्रमनसूयं च वृद्धं मौनव्रते स्थितम् । शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव ॥
śubhācāraṃ śubhakathaṃ susthitaṃ tamalolupam | akṣudramanasūyaṃ ca vṛddhaṃ maunavrate sthitam | śaraṇyaṃ sarvabhūtānāṃ pitrā vinikṛtaṃ tava
शुभ आचरण और शुभ वाणीवाले, स्थिर, लोभरहित, क्षुद्रता और ईर्ष्या से रहित, वृद्ध, मौनव्रत में स्थित, सब प्राणियों को शरण देनेवाले — ऐसे मुनि का आपके पिता ने तिरस्कार किया था।
श्लोक 8 (1.50.8)
शशापाथ महातेजाः पितरं ते रुषान्वितः । ऋषेः पुत्रो महातेजा बालोऽपि स्थविरद्युतिः ॥
śaśāpātha mahātejāḥ pitaraṃ te ruṣānvitaḥ | ṛṣeḥ putro mahātejā bālo'pi sthaviradyutiḥ
तब उस ऋषि के महातेजस्वी पुत्र ने, जो बालक होकर भी वृद्धों जैसे तेजवाला था, क्रोध में भरकर आपके पिता को शाप दे दिया।
श्लोक 9 (1.50.9)
स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोषादिदमुवाच ह । पितरं तेऽभिसन्धाय तेजसा प्रज्वलन्निव ॥
sa kṣipramudakaṃ spṛṣṭvā roṣādidamuvāca ha | pitaraṃ te'bhisandhāya tejasā prajvalanniva
उसने तुरन्त जल का स्पर्श किया और आपके पिता को लक्ष्य करके, मानो तेज से जलते हुए, रोषपूर्वक यह वचन कहा —
श्लोक 10 (1.50.10)
अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत् । तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति ॥
anāgasi gurau yo me mṛtaṃ sarpamavāsṛjat | taṃ nāgastakṣakaḥ kruddhastejasā pradahiṣyati
"जिसने मेरे निरपराध पिता और गुरु पर मरा हुआ साँप डाला है, उसे क्रुद्ध नाग तक्षक अपने तेज से भस्म कर देगा,
श्लोक 11 (1.50.11)
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः । सप्तरात्रादितः पापं पश्य मे तपसो बलम् ॥
āśīviṣastigmatejā madvākyabalacoditaḥ | saptarātrāditaḥ pāpaṃ paśya me tapaso balam
वह तीक्ष्ण तेजवाला विषधर, मेरे वचन के बल से प्रेरित होकर, आज से सातवीं रात तक उस पापी को जला देगा। मेरी तपस्या का बल देखो।"
श्लोक 12 (1.50.12)
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्राऽस्य सोऽभवत् । दृष्ट्वा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत् ॥
ityuktvā prayayau tatra pitā yatrā'sya so'bhavat | dṛṣṭvā ca pitaraṃ tasmai taṃ śāpaṃ pratyavedayat
यह कहकर वह वहाँ गया जहाँ उसके पिता थे, और पिता को देखकर उसने उन्हें वह शाप सुना दिया।
श्लोक 13 (1.50.13)
स चापि मुनिशार्दूलः प्रेरयामास ते पितुः । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम् ॥
sa cāpi muniśārdūlaḥ prerayāmāsa te pituḥ | śiṣyaṃ gauramukhaṃ nāma śīlavantaṃ guṇānvitam
तब उन मुनिश्रेष्ठ ने भी आपके पिता के पास गौरमुख नामक एक शीलवान् और गुणवान् शिष्य को भेजा।
श्लोक 14 (1.50.14)
आचख्यौ स तु विश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः । शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते ॥
ācakhyau sa tu viśrānto rājñaḥ sarvamaśeṣataḥ | śapto'si mama putreṇa yatto bhava mahīpate
विश्राम कर लेने पर उसने राजा को सब कुछ पूरा-पूरा कह सुनाया — "मेरे पुत्र ने आपको शाप दे दिया है; हे पृथ्वीपति, सावधान रहिए।
श्लोक 15 (1.50.15)
तक्षकस्त्वां महाराज तेजसाऽसौ दहिष्यति । श्रुत्वा च तद्वचो घोरं पिता ते जनमेजय ॥
takṣakastvāṃ mahārāja tejasā'sau dahiṣyati | śrutvā ca tadvaco ghoraṃ pitā te janamejaya
हे महाराज, तक्षक अपने तेज से आपको भस्म कर देगा।" हे जनमेजय, वह भयानक वचन सुनकर आपके पिता
श्लोक 16 (1.50.16)
यत्तोऽभवत्परित्रस्तस्तक्षकात्पन्नगोत्तमात् । ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते ॥
yatto'bhavatparitrastastakṣakātpannagottamāt | tatastasmiṃstu divase saptame samupasthite
नागश्रेष्ठ तक्षक से अत्यन्त भयभीत होकर सावधान हो गए। फिर जब वह सातवाँ दिन आ पहुँचा,
श्लोक 17 (1.50.17)
राज्ञः समीपं ब्रह्मर्षिः काश्यपो गन्तुमैच्छत । तं ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं तदा ॥
rājñaḥ samīpaṃ brahmarṣiḥ kāśyapo gantumaicchata | taṃ dadarśātha nāgendrastakṣakaḥ kāśyapaṃ tadā
तब ब्रह्मर्षि काश्यप राजा के पास जाना चाहते थे। उसी समय नागराज तक्षक ने काश्यप को देखा।
श्लोक 18 (1.50.18)
तमब्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं त्वरितं द्विजम् । क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति ॥
tamabravītpannagendraḥ kāśyapaṃ tvaritaṃ dvijam | kva bhavāṃstvarito yāti kiṃ ca kāryaṃ cikīrṣati
नागराज ने शीघ्रता से जाते हुए ब्राह्मण काश्यप से कहा — "आप इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं, और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?"
काश्यप उवाच
श्लोक 19 (1.50.19)
यत्र राजा कुरुश्रेष्ठः परिक्षिन्नाम वै द्विज । तक्षकेण भुजंगेन धक्ष्यते किल सोऽद्य वै ॥
yatra rājā kuruśreṣṭhaḥ parikṣinnāma vai dvija | takṣakeṇa bhujaṃgena dhakṣyate kila so'dya vai
हे द्विज, जहाँ कुरुश्रेष्ठ परीक्षित् नामक राजा हैं, वहाँ; सुना है कि आज सर्प तक्षक उन्हें भस्म कर देगा।
श्लोक 20 (1.50.20)
गच्छाम्यहं तं त्वरितः सद्यः कर्तुमपज्वरम् । मयाऽभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षयिष्यति ॥
gacchāmyahaṃ taṃ tvaritaḥ sadyaḥ kartumapajvaram | mayā'bhipannaṃ taṃ cāpi na sarpo dharṣayiṣyati
मैं शीघ्र वहाँ जा रहा हूँ, ताकि उन्हें तुरन्त विष-ज्वर से मुक्त कर दूँ। मेरे पहुँच जाने पर वह सर्प उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।
तक्षक उवाच
श्लोक 21 (1.50.21)
किमर्थं तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि । अहं स तक्षको ब्रह्मन्पश्य मे वीर्यमद्भुतम् ॥
kimarthaṃ taṃ mayā daṣṭaṃ saṃjīvayitumicchasi | ahaṃ sa takṣako brahmanpaśya me vīryamadbhutam
जिसे मैंने डस लिया हो, उसे आप क्यों जीवित करना चाहते हैं? हे ब्रह्मन्, मैं वही तक्षक हूँ। मेरा अद्भुत बल देखिए।
श्लोक 22 (1.50.22)
न शक्तस्त्वं मया दष्टं तं संजीवयितुं नृपम् । इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोऽदशद्वै वनस्पतिम् ॥
na śaktastvaṃ mayā daṣṭaṃ taṃ saṃjīvayituṃ nṛpam | ityuktvā takṣakastatra so'daśadvai vanaspatim
"मेरे डसे हुए उस राजा को आप जीवित नहीं कर सकते।" यह कहकर तक्षक ने वहाँ एक विशाल वृक्ष को डस लिया।
मन्त्रिण ऊचुः
श्लोक 23 (1.50.23)
स दष्टमात्रो नागेन भस्मीभूतोऽभवन्नगः । काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत तं नगम् ॥
sa daṣṭamātro nāgena bhasmībhūto'bhavannagaḥ | kāśyapaśca tato rājannajīvayata taṃ nagam
हे राजन्, नाग के डसते ही वह वृक्ष भस्म हो गया; और तब काश्यप ने उस वृक्ष को फिर जीवित कर दिया।
श्लोक 24 (1.50.24)
ततस्तं लोभयामास कामं ब्रूहीति तक्षकः । स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुनः ॥
tatastaṃ lobhayāmāsa kāmaṃ brūhīti takṣakaḥ | sa evamuktastaṃ prāha kāśyapastakṣakaṃ punaḥ
तब तक्षक ने उसे लुभाते हुए कहा — "जो चाहिए, बोलिए।" यह सुनकर काश्यप ने तक्षक को उत्तर दिया —
श्लोक 25 (1.50.25)
धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः । तमुवाच महात्मानं तक्षकः श्लक्ष्णया गिरा ॥
dhanalipsurahaṃ tatra yāmītyuktaśca tena saḥ | tamuvāca mahātmānaṃ takṣakaḥ ślakṣṇayā girā
"मैं धन की इच्छा से वहाँ जा रहा हूँ।" उनके ऐसा कहने पर तक्षक ने उन महात्मा से मधुर वाणी में कहा —
श्लोक 26 (1.50.26)
यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात्ततोऽधिकम् । गृहाण मत्त एव त्वं सन्निवर्तस्व चानघ ॥
yāvaddhanaṃ prārthayase rājñastasmāttato'dhikam | gṛhāṇa matta eva tvaṃ sannivartasva cānagha
"आप उस राजा से जितना धन चाहते हैं, उससे अधिक मुझसे ही ले लीजिए, और हे निष्पाप, लौट जाइए।"
श्लोक 27 (1.50.27)
स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वरः । लब्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद्यावदीप्सितम् ॥
sa evamukto nāgena kāśyapo dvipadāṃ varaḥ | labdhvā vittaṃ nivavṛte takṣakādyāvadīpsitam
नाग के ऐसा कहने पर मनुष्यों में श्रेष्ठ काश्यप तक्षक से मनचाहा धन लेकर लौट गए।
श्लोक 28 (1.50.28)
तस्मिन्प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षकः । तं नृपं नृपतिश्रेष्ठं पितरं धार्मिकं तव ॥
tasminpratigate vipre chadmanopetya takṣakaḥ | taṃ nṛpaṃ nṛpatiśreṣṭhaṃ pitaraṃ dhārmikaṃ tava
उस ब्राह्मण के लौट जाने पर तक्षक ने छल से पास पहुँचकर उन नृपश्रेष्ठ राजा, आपके धर्मात्मा पिता को,
श्लोक 29 (1.50.29)
प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान्विषवह्निना । ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजयायाभिषेचितः ॥
prāsādasthaṃ yattamapi dagdhavānviṣavahninā | tatastvaṃ puruṣavyāghra vijayāyābhiṣecitaḥ
महल में सावधान रहने पर भी अपनी विषाग्नि से जला डाला। उसके बाद, हे पुरुषसिंह, विजय के लिए आपका अभिषेक किया गया।
श्लोक 30 (1.50.30)
एतद्दृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नृपसत्तम । अस्माभिर्निखिलं सर्वं कथितं तेऽतिदारुणम् ॥
etaddṛṣṭaṃ śrutaṃ cāpi yathāvannṛpasattama | asmābhirnikhilaṃ sarvaṃ kathitaṃ te'tidāruṇam
हे नृपश्रेष्ठ, यह जैसा हमने देखा और सुना, वह सारा अत्यन्त दारुण वृत्तान्त हमने आपको ठीक-ठीक और पूरा कह दिया।
श्लोक 31 (1.50.31)
श्रुत्वा चैतं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम् । अस्य चर्षेरुदङ्कस्य विधत्स्व यदनन्तरम् ॥
śrutvā caitaṃ naraśreṣṭha pārthivasya parābhavam | asya carṣerudaṅkasya vidhatsva yadanantaram
हे नरश्रेष्ठ, राजा के इस पराभव को और इन ऋषि उत्तङ्क की बात को सुनकर अब आगे जो करना हो, उसका निश्चय कीजिए।
सौतिरुवाच
श्लोक 32 (1.50.32)
एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजयः । उवाच मन्त्रिणः सर्वानिदं वाक्यमरिदमः ॥
etasminneva kāle tu sa rājā janamejayaḥ | uvāca mantriṇaḥ sarvānidaṃ vākyamaridamaḥ
उसी समय शत्रुदमन राजा जनमेजय ने अपने सब मन्त्रियों से यह वचन कहा —
जनमेजय उवाच
श्लोक 33 (1.50.33)
अथ तत्कथितं केन यद्वृत्तं तद्वनस्पतौ । आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा ॥
atha tatkathitaṃ kena yadvṛttaṃ tadvanaspatau | āścaryabhūtaṃ lokasya bhasmarāśīkṛtaṃ tadā
किन्तु उस वृक्ष के साथ जो घटा, जो लोक के लिए आश्चर्य की बात थी कि वह राख का ढेर बन गया — यह किसने बताया?
श्लोक 34 (1.50.34)
यद्वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै । नूनं मन्त्रैर्हतविषो न प्रणश्येत काश्यपात् ॥
yadvṛkṣaṃ jīvayāmāsa kāśyapastakṣakeṇa vai | nūnaṃ mantrairhataviṣo na praṇaśyeta kāśyapāt
जब काश्यप ने तक्षक के डसे वृक्ष को जीवित कर दिया, तो निश्चय ही काश्यप के मन्त्रों से विष नष्ट हो जाने पर मेरे पिता नष्ट न होते।
श्लोक 35 (1.50.35)
चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधमः । दष्टं यदि मया विप्रः पार्थिवं जीवयिष्यति ॥
cintayāmāsa pāpātmā manasā pannagādhamaḥ | daṣṭaṃ yadi mayā vipraḥ pārthivaṃ jīvayiṣyati
उस पापी, नीच नाग ने मन में सोचा होगा — "यदि मेरे डसे हुए राजा को यह ब्राह्मण जीवित कर देगा,
श्लोक 36 (1.50.36)
तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम् । विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुष्टिर्द्विजस्य वै ॥
takṣakaḥ saṃhataviṣo loke yāsyati hāsyatām | vicintyaivaṃ kṛtā tena dhruvaṃ tuṣṭirdvijasya vai
तो विषहीन होकर तक्षक संसार में हँसी का पात्र बन जाएगा।" ऐसा विचार करके उसने निश्चय ही उस ब्राह्मण को सन्तुष्ट कर दिया।
श्लोक 37 (1.50.37)
भविष्यति ह्युपायेन यस्य दास्यामि यातनाम् । एकं तु श्रोतुमिच्छामि तद्वृत्तं निर्जने वने ॥
bhaviṣyati hyupāyena yasya dāsyāmi yātanām | ekaṃ tu śrotumicchāmi tadvṛttaṃ nirjane vane
कोई ऐसा उपाय अवश्य होगा जिससे मैं उसे यातना दूँगा। पर एक बात मैं सुनना चाहता हूँ — उस निर्जन वन में जो हुआ,
श्लोक 38 (1.50.38)
संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा । श्रुतवान्दृष्टवांश्चापि भवत्सु कथमागतम् । श्रुत्वा तस्य विधास्येऽहं पन्नगान्तकरीं मतिम् ॥
saṃvādaṃ pannagendrasya kāśyapasya ca kastadā | śrutavāndṛṣṭavāṃścāpi bhavatsu kathamāgatam | śrutvā tasya vidhāsye'haṃ pannagāntakarīṃ matim
नागराज और काश्यप का वह संवाद — उस समय उसे किसने सुना या देखा, और वह आप तक कैसे पहुँचा? उसे सुनकर मैं सर्पों का अन्त करनेवाला निश्चय करूँगा।
मन्त्रिण ऊचुः
श्लोक 39 (1.50.39)
शृणु राजन्यथास्माकं येन तत्कथितं पुरा । समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि ॥
śṛṇu rājanyathāsmākaṃ yena tatkathitaṃ purā | samāgataṃ dvijendrasya pannagendrasya cādhvani
हे राजन्, सुनिए कि उस श्रेष्ठ ब्राह्मण और नागराज के मार्ग में हुए मिलन का वृत्तान्त हमें पहले किसने सुनाया था।
श्लोक 40 (1.50.40)
तस्मिन्वृक्षे नरः कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव । विचिन्वन्पूर्वमारूढः शुष्कशाखावनस्पतौ ॥
tasminvṛkṣe naraḥ kaścidindhanārthāya pārthiva | vicinvanpūrvamārūḍhaḥ śuṣkaśākhāvanaspatau
हे राजन्, उस वृक्ष पर कोई मनुष्य ईंधन के लिए सूखी डालियाँ बीनता हुआ पहले से चढ़ा हुआ था।
श्लोक 41 (1.50.41)
न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्विजौ । सह तेनैव वृक्षेण भस्मीभूतोऽभवन्नृप ॥
na budhyetāmubhau tau ca nagasthaṃ pannagadvijau | saha tenaiva vṛkṣeṇa bhasmībhūto'bhavannṛpa
नाग और ब्राह्मण, दोनों में से किसी को भी वृक्ष पर बैठे उस मनुष्य का पता नहीं चला; और हे राजन्, वह उसी वृक्ष के साथ भस्म हो गया।
श्लोक 42 (1.50.42)
द्विजप्रभावाद्राजेन्द्र व्यजीवत्स वनस्पतिः । तेनागम्य द्विजश्रेष्ठ पुंसाऽस्मासु निवेदितम् ॥
dvijaprabhāvādrājendra vyajīvatsa vanaspatiḥ | tenāgamya dvijaśreṣṭha puṃsā'smāsu niveditam
हे राजेन्द्र, ब्राह्मण के प्रभाव से वह वृक्ष फिर जी उठा। हे द्विजश्रेष्ठ, उसी पुरुष ने आकर हमें बताया
श्लोक 43 (1.50.43)
यथा वृत्तं तु तत्सर्वं तक्षकस्य द्विजस्य च । एतत्ते कथितं राजन्यथादृष्टं श्रुतं च यत् । श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम् ॥
yathā vṛttaṃ tu tatsarvaṃ takṣakasya dvijasya ca | etatte kathitaṃ rājanyathādṛṣṭaṃ śrutaṃ ca yat | śrutvā ca nṛpaśārdūla vidhatsva yadanantaram
कि तक्षक और ब्राह्मण के बीच क्या-क्या हुआ। हे राजन्, जैसा देखा और सुना गया, वैसा हमने आपसे कह दिया। हे नृपसिंह, इसे सुनकर अब आगे जो करना हो, उसका निश्चय कीजिए।
सौतिरुवाच
श्लोक 44 (1.50.44)
मन्त्रिणां तु वचः श्रुत्वा स राजा जनमेजयः । पर्यतप्यत दुःखार्तः प्रत्यपिंषत्करं करे ॥
mantriṇāṃ tu vacaḥ śrutvā sa rājā janamejayaḥ | paryatapyata duḥkhārtaḥ pratyapiṃṣatkaraṃ kare
मन्त्रियों की बात सुनकर राजा जनमेजय दुःख से व्याकुल होकर संतप्त हो उठे और हाथ से हाथ मलने लगे।
श्लोक 45 (1.50.45)
निःश्वासमुष्णमसकृद्दीर्घं राजीवलोचनः । मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन्नृपः ॥
niḥśvāsamuṣṇamasakṛddīrghaṃ rājīvalocanaḥ | mumocāśrūṇi ca tadā netrābhyāṃ prarudannṛpaḥ
कमलनयन राजा बार-बार लम्बी और गरम साँसें लेने लगे, और रोते हुए उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
श्लोक 46 (1.50.46)
उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वितः । दुर्धरं बाष्पमुत्सृज्य स्पृष्ट्वा चापो यथाविधि ॥
uvāca ca mahīpālo duḥkhaśokasamanvitaḥ | durdharaṃ bāṣpamutsṛjya spṛṣṭvā cāpo yathāvidhi
तब दुःख और शोक से भरे उन पृथ्वीपालक ने बड़ी कठिनाई से रोके हुए आँसुओं को बहाकर, विधिपूर्वक जल का स्पर्श किया और बोले।
श्लोक 47 (1.50.47)
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृपः । अमर्षी मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥
muhūrtamiva ca dhyātvā niścitya manasā nṛpaḥ | amarṣī mantriṇaḥ sarvānidaṃ vacanamabravīt
क्षण भर सोचकर और मन में निश्चय करके उस अमर्षशील राजा ने अपने सब मन्त्रियों से यह वचन कहा —
जनमेजय उवाच
श्लोक 48 (1.50.48)
श्रुत्वैतद्भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति । निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत । अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने ॥
śrutvaitadbhavatāṃ vākyaṃ piturme svargatiṃ prati | niściteyaṃ mama matiryā ca tāṃ me nibodhata | anantaraṃ ca manye'haṃ takṣakāya durātmane
अपने पिता के स्वर्गगमन के विषय में आपकी बात सुनकर मेरा यह निश्चित विचार है, उसे मुझसे समझ लीजिए। मैं मानता हूँ कि अब बिना विलम्ब उस दुष्टात्मा तक्षक से,
श्लोक 49 (1.50.49)
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसितः पिता । शृङ्गिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम् ॥
pratikartavyamityevaṃ yena me hiṃsitaḥ pitā | śṛṅgiṇaṃ hetumātraṃ yaḥ kṛtvā dagdhvā ca pārthivam
प्रतिशोध लेना चाहिए, जिसने मेरे पिता की हत्या की — जिसने शृङ्गी को केवल निमित्त बनाकर राजा को जला डाला।
श्लोक 50 (1.50.50)
इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत् । यद्यागच्छेत्स वै विप्रो ननु जीवेत्पिता मम ॥
iyaṃ durātmatā tasya kāśyapaṃ yo nyavartayat | yadyāgacchetsa vai vipro nanu jīvetpitā mama
उसकी यही दुष्टता है कि उसने काश्यप को लौटा दिया। यदि वह ब्राह्मण आ जाता, तो निश्चय ही मेरे पिता जीवित होते।
श्लोक 51 (1.50.51)
परिहीयेत किं तस्य यदि जीवेत्स पार्थिवः । काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च ॥
parihīyeta kiṃ tasya yadi jīvetsa pārthivaḥ | kāśyapasya prasādena mantriṇāṃ vinayena ca
यदि काश्यप की कृपा और मन्त्रियों की नीति से वे राजा जीवित रह जाते, तो उसकी क्या हानि होती?
श्लोक 52 (1.50.52)
स तु वारितवान्मोहात्काश्यपं द्विजसत्तमम् । संजिजीवयिषुं प्राप्तं राजानमपराजितम् ॥
sa tu vāritavānmohātkāśyapaṃ dvijasattamam | saṃjijīvayiṣuṃ prāptaṃ rājānamaparājitam
फिर भी मोहवश उसने अपराजित राजा को जीवित करने की इच्छा से आए हुए द्विजश्रेष्ठ काश्यप को रोक दिया।
श्लोक 53 (1.50.53)
महानतिक्रमो ह्येष तक्षकस्य दुरात्मनः । द्विजस्य योऽददद्द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति ॥
mahānatikramo hyeṣa takṣakasya durātmanaḥ | dvijasya yo'dadaddravyaṃ mā nṛpaṃ jīvayediti
दुष्टात्मा तक्षक का यह बहुत बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मण को धन दिया, ताकि वह राजा को जीवित न करे।
श्लोक 54 (1.50.54)
उत्तङ्कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्च महत्प्रियम् । भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितुः ॥
uttaṅkasya priyaṃ kartumātmanaśca mahatpriyam | bhavatāṃ caiva sarveṣāṃ gacchāmyapacitiṃ pituḥ
उत्तङ्क का प्रिय करने के लिए, अपना भी परम प्रिय करने के लिए और आप सबके प्रिय के लिए, मैं अपने पिता का प्रतिशोध लेने जा रहा हूँ।