आदि पर्व · अध्याय 5
भृगुवंश और पुलोमा राक्षस
शौनक सौति से, जिनके पिता ने पुराणों का अध्ययन किया था, भृगुवंश से कथा आरम्भ करने को कहते हैं। सौति वरुण के यज्ञ में अग्नि से उत्पन्न भृगु से लेकर च्यवन, प्रमति और रुरु होते हुए शौनक के पूर्वज शुनक तक वंश बताते हैं। च्यवन के नाम का कारण पूछे जाने पर वे बताते हैं कि भृगु की पत्नी पुलोमा, जो कभी पुलोमा नामक राक्षस को देने की बात हुई थी, जब गर्भवती थीं और भृगु बाहर गए थे, तब वह राक्षस आश्रम में आया। राक्षस अग्नि से पूछता है कि यह किसकी पत्नी है, और झूठ के भय और भृगु के शाप के भय के बीच फँसे अग्निदेव सच बता देते हैं कि पहले राक्षस ने उसे चुना था, पर वैदिक विधि से उसका विवाह भृगु से हुआ है।
शौनक उवाच
श्लोक 1 (1.5.1)
पुराणमखिलं तात पिता तेऽधीतवान्पुरा । भारताध्ययनं सर्वं कृष्णद्वैपायनात्तदा । कच्चित्त्वमपि तत्सर्वमधीषे रौमहर्षणे ॥
purāṇamakhilaṃ tāta pitā te'dhītavānpurā | bhāratādhyayanaṃ sarvaṃ kṛṣṇadvaipāyanāttadā | kaccittvamapi tatsarvamadhīṣe raumaharṣaṇe
"वत्स, तुम्हारे पिता ने पूर्वकाल में सम्पूर्ण पुराणों का अध्ययन किया था, और कृष्णद्वैपायन से सारा भारत भी पढ़ा था। हे रोमहर्षणपुत्र, क्या तुमने भी वह सब पढ़ा है?
श्लोक 2 (1.5.2)
पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम् । कथ्यन्ते ये पुराऽस्माभिः श्रुतपूर्वाः पितुस्तव ॥
purāṇe hi kathā divyā ādivaṃśāśca dhīmatām | kathyante ye purā'smābhiḥ śrutapūrvāḥ pitustava
पुराण में दिव्य कथाएँ और बुद्धिमानों के आदि वंश कहे गए हैं, जिन्हें हमने पहले तुम्हारे पिता से सुना था।
श्लोक 3 (1.5.3)
तत्र वंशमहं पूर्वं श्रोतुमिच्छामि भार्गवम् । कथयस्व कथामेतां कल्याः स्मः श्रवणे तव ॥
tatra vaṃśamahaṃ pūrvaṃ śrotumicchāmi bhārgavam | kathayasva kathāmetāṃ kalyāḥ smaḥ śravaṇe tava
उनमें से मैं पहले भृगुवंश की कथा सुनना चाहता हूँ। वह कथा सुनाओ; हम तुम्हें सुनने के लिए तैयार हैं।"
सौतिरुवाच
श्लोक 4 (1.5.4)
यदधीतं पुरा सम्यग्द्विजश्रेष्ठैर्महात्मभिः । वैशंपायनविप्राग्र्यैस्तैश्चापि कथितं यथा ॥
yadadhītaṃ purā samyagdvijaśreṣṭhairmahātmabhiḥ | vaiśaṃpāyanaviprāgryaistaiścāpi kathitaṃ yathā
"जो पूर्वकाल में महात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने भली-भाँति पढ़ा था, और वैशम्पायन आदि अग्रगण्य विप्रों ने जैसा था वैसा ही कहा था;
श्लोक 5 (1.5.5)
यदधीतं च पित्रा मे सम्यक्चैव ततो मया । तावच्छृणुष्व यो देवैः सेन्द्रैः सर्षिमरुद्गणैः ॥
yadadhītaṃ ca pitrā me samyakcaiva tato mayā | tāvacchṛṇuṣva yo devaiḥ sendraiḥ sarṣimarudgaṇaiḥ
और जो मेरे पिता ने भली-भाँति पढ़ा और उनसे फिर मैंने पढ़ा — वह पहले सुनिए। जिस वंश का इन्द्र सहित देवताओं ने, ऋषियों और मरुद्गणों के साथ,
श्लोक 6 (1.5.6)
पूजितः प्रवरो वंशो भार्गवो भृगुनन्दन । इमं वंशमहं पूर्वं भार्गवं ते महामुने ॥
pūjitaḥ pravaro vaṃśo bhārgavo bhṛgunandana | imaṃ vaṃśamahaṃ pūrvaṃ bhārgavaṃ te mahāmune
सम्मान किया है, वह भृगु का श्रेष्ठ वंश है, हे भृगुनन्दन। हे महामुने, यह भार्गव वंश मैं पहले
श्लोक 7 (1.5.7)
निगदामि यथायुक्तं पुराणाश्रयसंयुतम् । भृगुर्महर्षिर्भगवान्ब्रह्मणा वै स्वयंभुवा ॥
nigadāmi yathāyuktaṃ purāṇāśrayasaṃyutam | bhṛgurmaharṣirbhagavānbrahmaṇā vai svayaṃbhuvā
पुराणों के आधार पर यथाक्रम आपको सुनाता हूँ। भगवान् महर्षि भृगु स्वयम्भू ब्रह्मा के द्वारा
श्लोक 8 (1.5.8)
वरुणस्य क्रतौ जातः पावकादिति नः श्रुतम् । भृगोः सुदयितः पुत्रश्च्यवनो नाम भार्गवः ॥
varuṇasya kratau jātaḥ pāvakāditi naḥ śrutam | bhṛgoḥ sudayitaḥ putraścyavano nāma bhārgavaḥ
वरुण के यज्ञ में अग्नि से उत्पन्न हुए थे — ऐसा हमने सुना है। भृगु के अत्यन्त प्रिय पुत्र भार्गव च्यवन थे।
श्लोक 9 (1.5.9)
च्यवनस्य च दायादः प्रमतिर्नाम धार्मिकः । प्रमतेरप्यभूत्पुत्रो घृताच्यां रुरुरित्युत ॥
cyavanasya ca dāyādaḥ pramatirnāma dhārmikaḥ | pramaterapyabhūtputro ghṛtācyāṃ rururityuta
च्यवन के उत्तराधिकारी धर्मात्मा प्रमति हुए, और प्रमति के घृताची से रुरु नामक पुत्र हुआ।
श्लोक 10 (1.5.10)
रुरोरपि सुतो जज्ञे शुनको वेदपारगः । प्रमद्वरायां धर्मात्मा तव पूर्वपितामहः ॥
rurorapi suto jajñe śunako vedapāragaḥ | pramadvarāyāṃ dharmātmā tava pūrvapitāmahaḥ
रुरु के प्रमद्वरा से वेदों के पारंगत शुनक उत्पन्न हुए, जो धर्मात्मा थे और आपके पूर्वपितामह थे।
श्लोक 11 (1.5.11)
तपस्वी च यशस्वी च श्रुतवान्ब्रह्मवित्तमः । धार्मिकः सत्यवादी च नियतो नियताशनः ॥
tapasvī ca yaśasvī ca śrutavānbrahmavittamaḥ | dhārmikaḥ satyavādī ca niyato niyatāśanaḥ
वे तपस्वी, यशस्वी, विद्वान और ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ थे; धार्मिक, सत्यवादी, संयमी और नियमित आहार करने वाले थे।"
शौनक उवाच
श्लोक 12 (1.5.12)
सूतपुत्र यथा तस्य भार्गवस्य महात्मनः । च्यवनत्वं परिख्यातं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥
sūtaputra yathā tasya bhārgavasya mahātmanaḥ | cyavanatvaṃ parikhyātaṃ tanmamācakṣva pṛcchataḥ
"हे सूतपुत्र, मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ — उन महात्मा भार्गव का च्यवन नाम कैसे प्रसिद्ध हुआ?"
सौतिरुवाच
श्लोक 13 (1.5.13)
भृगोः सुदयिता भार्या पुलोमेत्यभिविश्रुता । तस्यां समभवद्गर्भो भृगुवीर्यसमुद्भवः ॥
bhṛgoḥ sudayitā bhāryā pulometyabhiviśrutā | tasyāṃ samabhavadgarbho bhṛguvīryasamudbhavaḥ
"भृगु की अत्यन्त प्रिय पत्नी पुलोमा नाम से विख्यात थीं। उनके गर्भ में भृगु के वीर्य से एक शिशु आया।
श्लोक 14 (1.5.14)
तस्मिन्गर्भेऽथ संभूते पुलोमायां भृगूद्वह । समये समशीलिन्यां धर्मपत्न्यां यशस्विनः ॥
tasmingarbhe'tha saṃbhūte pulomāyāṃ bhṛgūdvaha | samaye samaśīlinyāṃ dharmapatnyāṃ yaśasvinaḥ
हे भृगुश्रेष्ठ, जब उस यशस्वी ऋषि की समान शील वाली धर्मपत्नी पुलोमा के गर्भ में वह शिशु पल रहा था, तब एक समय
श्लोक 15 (1.5.15)
अभिषेकाय निष्क्रान्ते भृगौ धर्मभृतां वरे । आश्रमं तस्य रक्षोऽथ पुलोमाऽभ्याजगाम ह ॥
abhiṣekāya niṣkrānte bhṛgau dharmabhṛtāṃ vare | āśramaṃ tasya rakṣo'tha pulomā'bhyājagāma ha
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भृगु स्नान के लिए बाहर गए हुए थे, तभी पुलोमा नाम का एक राक्षस उनके आश्रम में आया।
श्लोक 16 (1.5.16)
तं प्रविश्याश्रमं दृष्ट्वा भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् । हृच्छयेन समाविष्टो विचेताः समपद्यत ॥
taṃ praviśyāśramaṃ dṛṣṭvā bhṛgorbhāryāmaninditām | hṛcchayena samāviṣṭo vicetāḥ samapadyata
आश्रम में प्रवेश करके और भृगु की निर्दोष पत्नी को देखकर वह कामवासना से भर गया और उसकी सुध-बुध जाती रही।
श्लोक 17 (1.5.17)
अभ्यागतं तु तद्रक्षः पुलोमा चारुदर्शना । न्यमन्त्रयत वन्येन फलमूलादिना तदा ॥
abhyāgataṃ tu tadrakṣaḥ pulomā cārudarśanā | nyamantrayata vanyena phalamūlādinā tadā
सुन्दर पुलोमा ने आए हुए उस राक्षस का अतिथि की तरह स्वागत किया और उसे वन के फल, मूल आदि भोजन के लिए दिए।
श्लोक 18 (1.5.18)
तां तु रक्षस्तदा ब्रह्मन्हृच्छयेनाभिपीडितम् । दृष्ट्वा हृष्टमभूद्राजञ्जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ॥
tāṃ tu rakṣastadā brahmanhṛcchayenābhipīḍitam | dṛṣṭvā hṛṣṭamabhūdrājañjihīrṣustāmaninditām
हे ब्राह्मण, कामपीड़ित वह राक्षस उसे देखकर प्रसन्न हो उठा और उस निर्दोष स्त्री को हर ले जाना चाहने लगा।
श्लोक 19 (1.5.19)
जातमित्यब्रवीत्कार्यं जिहीर्षुर्मुदितः शुभाम् । सा हि पूर्वं वृता तेन पुलोम्ना तु शुचिस्मिता ॥
jātamityabravītkāryaṃ jihīrṣurmuditaḥ śubhām | sā hi pūrvaṃ vṛtā tena pulomnā tu śucismitā
"मेरा काम बन गया" — यह कहकर वह प्रसन्न राक्षस उस सुन्दरी को हरने के लिए उतावला हो गया; क्योंकि वह मधुर मुस्कान वाली स्त्री पहले इसी पुलोमा द्वारा वरी गई थी।
श्लोक 20 (1.5.20)
तां तु प्रादात्पिता पश्चाद्भृगवे शास्त्रवत्तदा । तस्य तत्किल्बिषं नित्यं हृदि वर्तति भार्गव ॥
tāṃ tu prādātpitā paścādbhṛgave śāstravattadā | tasya tatkilbiṣaṃ nityaṃ hṛdi vartati bhārgava
परन्तु बाद में उसके पिता ने शास्त्रविधि से उसे भृगु को दे दिया। हे भार्गव, वह अपराध राक्षस के हृदय में सदा खटकता रहता था।
श्लोक 21 (1.5.21)
इदमन्तरमित्येवं हर्तुं चक्रे मनस्तदा । अथाग्निशरणेऽपश्यज्ज्वलन्तं जातवेदसम् ॥
idamantaramityevaṃ hartuṃ cakre manastadā | athāgniśaraṇe'paśyajjvalantaṃ jātavedasam
"यही अवसर है" — ऐसा सोचकर उसने उसे हरने का निश्चय किया। तभी उसने अग्निशाला में प्रज्वलित जातवेदा अग्नि को देखा।
श्लोक 22 (1.5.22)
तमपृच्छत्ततो रक्षः पावकं ज्वलितं तदा । शंस मे कस्य भार्येयमग्ने पृच्छे ऋतेन वै ॥
tamapṛcchattato rakṣaḥ pāvakaṃ jvalitaṃ tadā | śaṃsa me kasya bhāryeyamagne pṛcche ṛtena vai
तब उस राक्षस ने प्रज्वलित अग्निदेव से पूछा — "हे अग्नि, मुझे बताओ, यह किसकी पत्नी है? मैं सत्य की शपथ देकर पूछता हूँ।
श्लोक 23 (1.5.23)
मुखं त्वमसि देवानां वद पावक पृच्छते । मया हीयं वृता पूर्वं भार्यार्थे वरवर्णिनी ॥
mukhaṃ tvamasi devānāṃ vada pāvaka pṛcchate | mayā hīyaṃ vṛtā pūrvaṃ bhāryārthe varavarṇinī
तुम देवताओं के मुख हो; हे पावक, पूछने वाले को उत्तर दो। इस सुन्दरी को पहले मैंने ही पत्नी बनाने के लिए वरा था।
श्लोक 24 (1.5.24)
पश्चादिमां पिता प्रादाद्भृगवेऽनृतकारकः । सेयं यदि वरारोहा भृगोर्भार्या रहोगता ॥
paścādimāṃ pitā prādādbhṛgave'nṛtakārakaḥ | seyaṃ yadi varārohā bhṛgorbhāryā rahogatā
बाद में उसके छली पिता ने इसे भृगु को दे दिया। यदि एकान्त में मिली यह सुन्दरी भृगु की पत्नी है,
श्लोक 25 (1.5.25)
तथा सत्यं समाख्याहि जिहीर्षाम्याश्रमादिमाम् । स मन्युस्तत्र हृदयं प्रदहन्निव तिष्ठति ॥
tathā satyaṃ samākhyāhi jihīrṣāmyāśramādimām | sa manyustatra hṛdayaṃ pradahanniva tiṣṭhati
तो मुझे सच-सच बताओ, क्योंकि मैं इसे आश्रम से हर ले जाना चाहता हूँ। मेरा क्रोध मेरे हृदय को जलाता-सा वहाँ बैठा है,
श्लोक 26 (1.5.26)
मत्पूर्वभार्यां यदिमां भृगुराप सुमध्यमाम् । असंमतमिदं मेऽद्य हरिष्याम्याश्रमादिमाम् ॥
matpūrvabhāryāṃ yadimāṃ bhṛgurāpa sumadhyamām | asaṃmatamidaṃ me'dya hariṣyāmyāśramādimām
क्योंकि भृगु ने इस पतली कमर वाली स्त्री को पा लिया है, जो पहले मेरी पत्नी थी। यह मेरी इच्छा के विरुद्ध हुआ; आज मैं इसे आश्रम से हर ले जाऊँगा।"
श्लोक 27 (1.5.27)
एवं रक्षस्तमामन्त्र्य ज्वलितं जातवेदसम् । शङ्कमानं भृगोर्भार्यां पुनःपुनरपृच्छत ॥
evaṃ rakṣastamāmantrya jvalitaṃ jātavedasam | śaṅkamānaṃ bhṛgorbhāryāṃ punaḥpunarapṛcchata
इस प्रकार प्रज्वलित अग्नि को सम्बोधित करके, उसके भृगु की पत्नी होने में संदेह करता हुआ वह राक्षस बार-बार पूछने लगा —
श्लोक 28 (1.5.28)
त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यदा । साक्षिवत्पुण्यपापेषु सत्यं ब्रूहि कवे वचः ॥
tvamagne sarvabhūtānāmantaścarasi nityadā | sākṣivatpuṇyapāpeṣu satyaṃ brūhi kave vacaḥ
"हे अग्नि, तुम सदा सब प्राणियों के भीतर विचरते हो और उनके पुण्य-पाप के साक्षी हो। हे कवि, सत्य वचन कहो।
श्लोक 29 (1.5.29)
मत्पूर्वभार्याऽपहृता भृगुणाऽनृतकारिणा । सेयं यदि तथा मे त्वं सत्यमाख्यातुमर्हसि ॥
matpūrvabhāryā'pahṛtā bhṛguṇā'nṛtakāriṇā | seyaṃ yadi tathā me tvaṃ satyamākhyātumarhasi
मेरी पूर्व पत्नी को छली भृगु ने हर लिया है। यदि यह वही है, तो तुम्हें मुझे सच-सच बताना चाहिए।
श्लोक 30 (1.5.30)
श्रुत्वा त्वत्तो भृगोर्भार्यां हरिष्याम्याश्रमादिमाम् । जातवेदः पश्यतस्ते वद सत्यां गिरं मम ॥
śrutvā tvatto bhṛgorbhāryāṃ hariṣyāmyāśramādimām | jātavedaḥ paśyataste vada satyāṃ giraṃ mama
तुमसे सुनकर ही मैं तुम्हारे देखते-देखते भृगु की पत्नी को इस आश्रम से हर ले जाऊँगा। हे जातवेदा, मुझसे सत्य वाणी कहो।"
श्लोक 31 (1.5.31)
तस्यैतद्वचनं श्रुत्वा सप्तार्चिर्दुःखितोऽभवत् । सत्यं वदामि यदि मे शापः स्याद्ब्रह्मवित्तमात् ॥
tasyaitadvacanaṃ śrutvā saptārcirduḥkhito'bhavat | satyaṃ vadāmi yadi me śāpaḥ syādbrahmavittamāt
उसकी यह बात सुनकर सात ज्वालाओं वाले अग्निदेव दुःखी हो गए — "यदि मैं सच बोलूँ, तो उन श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता से मुझे शाप मिल सकता है;
श्लोक 32 (1.5.32)
असत्यं चेदहं ब्रूयां पतिष्ये नरकान्ध्रुवम् । भीतोऽनृताच्च शापाच्च भृगोरित्यब्रवीच्छनैः ॥
asatyaṃ cedahaṃ brūyāṃ patiṣye narakāndhruvam | bhīto'nṛtācca śāpācca bhṛgorityabravīcchanaiḥ
और यदि झूठ बोलूँ, तो निश्चय ही नरक में गिरूँगा।" झूठ से और भृगु के शाप से — दोनों से डरे हुए अग्निदेव धीरे से बोले —
श्लोक 33 (1.5.33)
त्वया वृता पुलोमेयं पूर्वं दानवनन्दन । किं त्वियं विधिना पूर्वं मन्त्रवन्न वृता त्वया ॥
tvayā vṛtā pulomeyaṃ pūrvaṃ dānavanandana | kiṃ tviyaṃ vidhinā pūrvaṃ mantravanna vṛtā tvayā
"हे दानवनन्दन, यह सच है कि इस पुलोमा को पहले तुमने वरा था। किन्तु तुमने इसे विधिपूर्वक, मन्त्रों के साथ नहीं वरा था।
श्लोक 34 (1.5.34)
पित्रा तु भृगवे दत्ता पुलोमेयं यशस्विनी । ददाति न पिता तुभ्यं वरलोभान्महायशाः ॥
pitrā tu bhṛgave dattā pulomeyaṃ yaśasvinī | dadāti na pitā tubhyaṃ varalobhānmahāyaśāḥ
इस यशस्विनी पुलोमा को उसके पिता ने भृगु को दिया था। उसके यशस्वी पिता ने श्रेष्ठ वर पाने की इच्छा से उसे तुम्हें नहीं दिया।
श्लोक 35 (1.5.35)
अथेमां वेददृष्टेन कर्मणा विधिपूर्वकम् । भार्यामृषिर्भृगुः प्राप मां पुरस्कृत्य दानव ॥
athemāṃ vedadṛṣṭena karmaṇā vidhipūrvakam | bhāryāmṛṣirbhṛguḥ prāpa māṃ puraskṛtya dānava
हे दानव, फिर ऋषि भृगु ने वेदोक्त कर्म द्वारा विधिपूर्वक, मुझे साक्षी बनाकर, इसे पत्नी रूप में प्राप्त किया।
श्लोक 36 (1.5.36)
सेयमित्यवगच्छामि नानृतं वक्तुमुत्सहे । नानृतं हि सदा लोके पूज्यते दानवोत्तम ॥
seyamityavagacchāmi nānṛtaṃ vaktumutsahe | nānṛtaṃ hi sadā loke pūjyate dānavottama
मैं जानता हूँ कि यह वही है; मैं झूठ नहीं बोल सकता। हे दानवश्रेष्ठ, संसार में झूठ का कभी आदर नहीं होता।"