आदि पर्व · अध्याय 53
सत्र के ऋत्विज और वासुकि की विनती
शौनक पूछते हैं कि सर्पसत्र में कौन-कौन सम्मिलित थे, और सौति होता चण्डभार्गव से लेकर व्यास और उनके शिष्यों तक सब ऋत्विजों और सदस्यों के नाम बताते हैं। जब सर्प निरन्तर जलने लगे, तो तक्षक भागकर इन्द्र की शरण में जाता है, जो उसे आश्रय देकर अभय का आश्वासन देते हैं। अपने बन्धुओं के विनाश से भय और मूर्च्छा से घिरे वासुकि अपनी बहन जरत्कारु को याद दिलाते हैं कि उन्होंने उसका विवाह किस प्रयोजन से किया था, और उससे विनती करते हैं कि वह अपने पुत्र आस्तीक को यज्ञ रोकने के लिए भेजे, जैसा ब्रह्मा ने पहले कहा था।
शौनक उवाच
श्लोक 1 (1.53.1)
सर्पसत्रे तदा राज्ञः पाण्डवेयस्य धीमतः । जनमेजयस्य के त्वासन्नृत्विजः परमर्षयः ॥
sarpasatre tadā rājñaḥ pāṇḍaveyasya dhīmataḥ | janamejayasya ke tvāsannṛtvijaḥ paramarṣayaḥ
पाण्डववंशी बुद्धिमान राजा जनमेजय के उस सर्पसत्र में कौन-कौन महर्षि ऋत्विज थे?
श्लोक 2 (1.53.2)
के सदस्या बभूवुश्च सर्पसत्रे सुदारुणे । विषादजननेऽत्यर्थं पन्नगानां महाभये ॥
ke sadasyā babhūvuśca sarpasatre sudāruṇe | viṣādajanane'tyarthaṃ pannagānāṃ mahābhaye
और सर्पों को अत्यन्त विषाद और महान् भय देनेवाले उस भीषण सर्पसत्र में सदस्य कौन-कौन थे?
श्लोक 3 (1.53.3)
सर्वं विस्तरशस्तात भवाञ्छंसितुमर्हति । सर्पसत्रविधानज्ञा विज्ञेयाः के च सूतज ॥
sarvaṃ vistaraśastāta bhavāñchaṃsitumarhati | sarpasatravidhānajñā vijñeyāḥ ke ca sūtaja
हे तात, आप यह सब विस्तार से बताने योग्य हैं। हे सूतपुत्र, सर्पसत्र की विधि के ज्ञाता कौन-कौन जानने योग्य हैं?
सौतिरुवाच
श्लोक 4 (1.53.4)
हन्त ते कथयिष्यामि नामानीह मनीषिणाम् । ये ऋत्विजः सदस्याश्च तस्यासन्नृपतेस्तदा ॥
hanta te kathayiṣyāmi nāmānīha manīṣiṇām | ye ṛtvijaḥ sadasyāśca tasyāsannṛpatestadā
अच्छा, मैं आपको उन मनीषियों के नाम बताता हूँ जो उस समय उस राजा के ऋत्विज और सदस्य थे।
श्लोक 5 (1.53.5)
तत्र होता बभूवाथ ब्राह्मणश्चण्डभार्गवः । च्यवनस्यान्वये ख्यातो जातो वेदविदां वरः ॥
tatra hotā babhūvātha brāhmaṇaścaṇḍabhārgavaḥ | cyavanasyānvaye khyāto jāto vedavidāṃ varaḥ
वहाँ होता थे ब्राह्मण चण्डभार्गव, जो च्यवन के वंश में उत्पन्न, प्रसिद्ध और वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ थे।
श्लोक 6 (1.53.6)
उद्गाता ब्राह्मणो वृद्धो विद्वान्कौत्सोऽथ जैमिनिः । ब्रह्माऽभवच्छार्ङ्गरवोऽथाध्वर्युश्चापि पिङ्गलः ॥
udgātā brāhmaṇo vṛddho vidvānkautso'tha jaiminiḥ | brahmā'bhavacchārṅgaravo'thādhvaryuścāpi piṅgalaḥ
उद्गाता थे वृद्ध और विद्वान् ब्राह्मण कौत्स, और जैमिनि; ब्रह्मा बने शार्ङ्गरव, और अध्वर्यु थे पिङ्गल।
श्लोक 7 (1.53.7)
सदस्यश्चाभवद्व्यासः पुत्रशिष्यसहायवान् । उद्दालकः प्रमतकः श्वेतकेतुश्च पिङ्गलः ॥
sadasyaścābhavadvyāsaḥ putraśiṣyasahāyavān | uddālakaḥ pramatakaḥ śvetaketuśca piṅgalaḥ
अपने पुत्रों और शिष्यों के साथ व्यास सदस्य थे; और उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु तथा पिङ्गल भी,
श्लोक 8 (1.53.8)
असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा । आत्रेयः कुण्डजठरो द्विजः कालघटस्तथा ॥
asito devalaścaiva nāradaḥ parvatastathā | ātreyaḥ kuṇḍajaṭharo dvijaḥ kālaghaṭastathā
असित और देवल, नारद और पर्वत, आत्रेय, ब्राह्मण कुण्डजठर और कालघट,
श्लोक 9 (1.53.9)
वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धो जपस्वाध्यायशीलवान् । कोहलो देवशर्मा च मौद्गल्यः समसौरभः ॥
vātsyaḥ śrutaśravā vṛddho japasvādhyāyaśīlavān | kohalo devaśarmā ca maudgalyaḥ samasaurabhaḥ
वात्स्य, जप और स्वाध्याय में निरत वृद्ध श्रुतश्रवा, कोहल, देवशर्मा, मौद्गल्य और समसौरभ।
श्लोक 10 (1.53.10)
एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणा वेदपारगाः । सदस्याश्चाभवंस्तत्र सत्रे पारिक्षितस्य ह ॥
ete cānye ca bahavo brāhmaṇā vedapāragāḥ | sadasyāścābhavaṃstatra satre pārikṣitasya ha
ये और दूसरे बहुत-से वेदपारंगत ब्राह्मण परीक्षित्-पुत्र के उस सत्र में सदस्य थे।
श्लोक 11 (1.53.11)
जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ । अहयः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः ॥
juhvatsvṛtvikṣvatha tadā sarpasatre mahākratau | ahayaḥ prāpataṃstatra ghorāḥ prāṇibhayāvahāḥ
जब उस महायज्ञ सर्पसत्र में ऋत्विज आहुतियाँ दे रहे थे, तब प्राणियों को भय देनेवाले भयंकर सर्प उसमें आ गिरे।
श्लोक 12 (1.53.12)
वसामेदोवहाः कुल्या नागानां संप्रवर्तिताः । ववौ गन्धश्च तुमुलो दह्यतामनिशं तदा ॥
vasāmedovahāḥ kulyā nāgānāṃ saṃpravartitāḥ | vavau gandhaśca tumulo dahyatāmaniśaṃ tadā
नागों की चर्बी और मेद को बहानेवाली नालियाँ बह चलीं, और निरन्तर जलते सर्पों की तीव्र दुर्गन्ध फैलने लगी।
श्लोक 13 (1.53.13)
पततां चैव नागानां धिष्ठितानां तथाम्बरे । अश्रूयतानिशं शब्दः पच्यतां चाग्निना भृशम् ॥
patatāṃ caiva nāgānāṃ dhiṣṭhitānāṃ tathāmbare | aśrūyatāniśaṃ śabdaḥ pacyatāṃ cāgninā bhṛśam
गिरते हुए, आकाश में अटके हुए और अग्नि में बुरी तरह पकते हुए नागों का कोलाहल निरन्तर सुनाई देता रहा।
श्लोक 14 (1.53.14)
तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरंदरनिवेशनम् । गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम् ॥
takṣakastu sa nāgendraḥ puraṃdaraniveśanam | gataḥ śrutvaiva rājānaṃ dīkṣitaṃ janamejayam
परन्तु नागराज तक्षक, राजा जनमेजय के दीक्षित होने की बात सुनते ही, पुरन्दर (इन्द्र) के भवन में चला गया।
श्लोक 15 (1.53.15)
ततः सर्वं यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तमः । अगच्छच्छरणं भीत आगस्कृत्वा पुरंदरम् ॥
tataḥ sarvaṃ yathāvṛttamākhyāya bhujagottamaḥ | agacchaccharaṇaṃ bhīta āgaskṛtvā puraṃdaram
वहाँ उस नागश्रेष्ठ ने सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुनाया, और अपराध करने के कारण भयभीत होकर पुरन्दर की शरण ली।
श्लोक 16 (1.53.16)
तमिन्द्रः प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक । भयं नागेन्द्र तस्माद्वै सर्पसत्रात्कदाचन ॥
tamindraḥ prāha suprīto na tavāstīha takṣaka | bhayaṃ nāgendra tasmādvai sarpasatrātkadācana
इन्द्र ने प्रसन्न होकर उससे कहा — "हे नागराज तक्षक, यहाँ तुम्हें उस सर्पसत्र से कभी कोई भय नहीं है।
श्लोक 17 (1.53.17)
प्रसादितो मया पूर्वं तवार्थाय पितामहः । तस्मात्तव भयं नास्ति व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥
prasādito mayā pūrvaṃ tavārthāya pitāmahaḥ | tasmāttava bhayaṃ nāsti vyetu te mānaso jvaraḥ
मैंने तुम्हारे लिए पहले ही पितामह ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया था। इसलिए तुम्हें कोई भय नहीं है; तुम्हारे मन का ताप दूर हो जाए।"
श्लोक 18 (1.53.18)
एवमाश्वासितस्तेन ततः स भुजगोत्तमः । उवास भवने तस्मिञ्शक्रस्य मुदितः सुखी ॥
evamāśvāsitastena tataḥ sa bhujagottamaḥ | uvāsa bhavane tasmiñśakrasya muditaḥ sukhī
इस प्रकार उनके आश्वासन पाकर वह नागश्रेष्ठ प्रसन्न और सुखी होकर इन्द्र के भवन में रहने लगा।
श्लोक 19 (1.53.19)
अजस्रं निपतत्स्वग्नौ नागेषु भृशदुःखितः । अल्पशेषपरीवारो वासुकिः पर्यतप्यत ॥
ajasraṃ nipatatsvagnau nāgeṣu bhṛśaduḥkhitaḥ | alpaśeṣaparīvāro vāsukiḥ paryatapyata
जब नाग निरन्तर अग्नि में गिरते रहे, तब अत्यन्त दुःखी वासुकि, जिनके परिवार में थोड़े ही शेष रह गए थे, शोक से संतप्त हो उठे।
श्लोक 20 (1.53.20)
कश्मलं चाविशद्धोरं वासुकिं पन्नगोत्तमम् । स घूर्णमानहृदयो भगिनीमिदमब्रवीत् ॥
kaśmalaṃ cāviśaddhoraṃ vāsukiṃ pannagottamam | sa ghūrṇamānahṛdayo bhaginīmidamabravīt
नागश्रेष्ठ वासुकि पर भयानक मूर्च्छा छा गई, और व्याकुल हृदय से उन्होंने अपनी बहन से यह कहा —
श्लोक 21 (1.53.21)
दह्यन्तेऽङ्गानि मे भद्रे न दिशः प्रतिभान्ति माम् । सीदामीव च संमोहाद्धूर्णतीव च मे मनः ॥
dahyante'ṅgāni me bhadre na diśaḥ pratibhānti mām | sīdāmīva ca saṃmohāddhūrṇatīva ca me manaḥ
"हे भद्रे, मेरे अंग जल रहे हैं; मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं। मोह से मैं मानो डूबा जा रहा हूँ और मेरा मन चकरा रहा है।
श्लोक 22 (1.53.22)
दृष्टिर्भ्राम्यति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव च । पतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन्दीप्ते विभावसौ ॥
dṛṣṭirbhrāmyati me'tīva hṛdayaṃ dīryatīva ca | patiṣyāmyavaśo'dyāhaṃ tasmindīpte vibhāvasau
मेरी दृष्टि बहुत डगमगा रही है और हृदय मानो फटा जा रहा है। आज मैं विवश होकर उस धधकती अग्नि में गिर पड़ूँगा।
श्लोक 23 (1.53.23)
पारिक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मज्जिघांसया । व्यक्तं मयाऽभिगन्तव्यं प्रेतराजनिवेशनम् ॥
pārikṣitasya yajño'sau vartate'smajjighāṃsayā | vyaktaṃ mayā'bhigantavyaṃ pretarājaniveśanam
परीक्षित्-पुत्र का यह यज्ञ हमें मारने के उद्देश्य से ही चल रहा है। स्पष्ट है कि मुझे प्रेतराज यम के लोक में जाना ही होगा।
श्लोक 24 (1.53.24)
अयं स कालः संप्राप्तो यदर्थमसि मे स्वसः । जरत्कारौ मया दत्ता त्रायस्वास्मान्सबान्धवान् ॥
ayaṃ sa kālaḥ saṃprāpto yadarthamasi me svasaḥ | jaratkārau mayā dattā trāyasvāsmānsabāndhavān
हे बहन, वह समय आ गया है जिसके लिए मैंने तुम्हें जरत्कारु को ब्याहा था। बन्धु-बान्धवों सहित हमारी रक्षा करो।
श्लोक 25 (1.53.25)
आस्तीकः किल यज्ञं तं वर्तन्तं भुजगोत्तमे । प्रतिषेत्स्यति मां पूर्वं स्वयमाह पितामहः ॥
āstīkaḥ kila yajñaṃ taṃ vartantaṃ bhujagottame | pratiṣetsyati māṃ pūrvaṃ svayamāha pitāmahaḥ
हे नागकन्याओं में श्रेष्ठ, कहा गया है कि चलते हुए उस यज्ञ को आस्तीक रोक देगा — यह स्वयं पितामह ने पहले मुझसे कहा था।
श्लोक 26 (1.53.26)
तद्वत्से ब्रूहि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसंमतम् । ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम् ॥
tadvatse brūhi vatsaṃ svaṃ kumāraṃ vṛddhasaṃmatam | mamādya tvaṃ sabhṛtyasya mokṣārthaṃ vedavittamam
इसलिए, हे वत्से, वृद्धों द्वारा सम्मानित और वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ अपने उस बालक से कहो कि वह आज मुझे और मेरे आश्रितों को इस संकट से मुक्त करे।"