आदि पर्व · अध्याय 54
आस्तीक का सर्पयज्ञ की ओर प्रस्थान
वासुकि के कहने पर जरत्कारु अपने पुत्र आस्तीक को बताती हैं कि उन्हें उसके पिता को क्यों सौंपा गया था: कद्रू ने नागों को जनमेजय के यज्ञ में जल जाने का शाप दिया था, और ब्रह्माजी ने कहा था कि दोनों जरत्कारुओं से उत्पन्न पुत्र उन्हें बचाएगा। आस्तीक वासुकि को शाप से छुड़ाने की प्रतिज्ञा करते हैं और भयभीत नागराज को ढाढ़स बँधाते हैं। फिर वे शीघ्र ही जनमेजय के यज्ञ में पहुँचते हैं और द्वार पर रोके जाने पर यज्ञ, राजा, ऋत्विजों और अग्नि की स्तुति करने लगते हैं।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.54.1)
तत आहूय पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजंगमा । वासुकेर्नागराजस्य वचनादिदमब्रवीत् ॥
tata āhūya putraṃ svaṃ jaratkārurbhujaṃgamā | vāsukernāgarājasya vacanādidamabravīt
तब नागकन्या जरत्कारु ने नागराज वासुकि के कहने पर अपने पुत्र को बुलाया और उससे यह कहा —
जरत्कारुरुवाच
श्लोक 2 (1.54.2)
अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः । कालः स चायं संप्राप्तस्तत्कुरुष्व यथातथम् ॥
ahaṃ tava pituḥ putra bhrātrā dattā nimittataḥ | kālaḥ sa cāyaṃ saṃprāptastatkuruṣva yathātatham
"पुत्र, मेरे भाई ने एक प्रयोजन से मुझे तुम्हारे पिता को सौंपा था। वह समय अब आ गया है; जो करना उचित है, वह करो।"
आस्तीक उवाच
श्लोक 3 (1.54.3)
किंनिमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे । तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन श्रुत्वा कर्ताऽस्मि तत्तथा ॥
kiṃnimittaṃ mama piturdattā tvaṃ mātulena me | tanmamācakṣva tattvena śrutvā kartā'smi tattathā
"मेरे मामा ने आपको मेरे पिता को किस प्रयोजन से सौंपा था? मुझे ठीक-ठीक बताइए। सुनकर मैं वैसा ही करूँगा।"
सौतिरुवाच
श्लोक 4 (1.54.4)
तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैषिणी । भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्लबा ॥
tata ācaṣṭa sā tasmai bāndhavānāṃ hitaiṣiṇī | bhaginī nāgarājasya jaratkāruraviklabā
तब नागराज की बहन जरत्कारु ने, जो अपने बन्धुओं का हित चाहती थीं, बिना घबराए उसे सब कुछ बता दिया।
जरत्कारुरुवाच
श्लोक 5 (1.54.5)
पन्नगानामशेषाणां माता कद्रूरिति श्रुता । तया शप्ता रुषितया सुता यस्मान्निबोध तत् ॥
pannagānāmaśeṣāṇāṃ mātā kadrūriti śrutā | tayā śaptā ruṣitayā sutā yasmānnibodha tat
"सभी नागों की माता कद्रू के नाम से प्रसिद्ध हैं। सुनो, उन्होंने क्रोध में आकर अपने पुत्रों को किस कारण शाप दिया।
श्लोक 6 (1.54.6)
उच्चैःश्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिथ्या न कृतो मम । विनतार्थाय पणिते दासभावाय पुत्रकाः ॥
uccaiḥśravāḥ so'śvarājo yanmithyā na kṛto mama | vinatārthāya paṇite dāsabhāvāya putrakāḥ
'पुत्रो, विनता के साथ दासी होने की जो बाज़ी लगी थी, उसमें तुमने मेरे कहने पर अश्वराज उच्चैःश्रवा को झूठा नहीं ठहराया।
श्लोक 7 (1.54.7)
जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः । तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ ॥
janamejayasya vo yajñe dhakṣyatyanilasārathiḥ | tatra pañcatvamāpannāḥ pretalokaṃ gamiṣyatha
इसलिए जनमेजय के यज्ञ में वायु जिसका सारथि है, वह अग्नि तुम्हें जला डालेगा। वहाँ मृत्यु को प्राप्त होकर तुम प्रेतलोक को जाओगे।'
श्लोक 8 (1.54.8)
तां च शप्तवतीं देवः साक्षाल्लोकपितामहः । एवमस्त्विति तद्वाक्यं प्रोवाचानुमुमोद च ॥
tāṃ ca śaptavatīṃ devaḥ sākṣāllokapitāmahaḥ | evamastviti tadvākyaṃ provācānumumoda ca
जब उन्होंने यह शाप दिया, तब लोकपितामह ब्रह्माजी ने स्वयं उनके वचन पर "ऐसा ही हो" कहकर उसका अनुमोदन किया।
श्लोक 9 (1.54.9)
वासुकिश्चापि तच्छ्रुत्वा पितामहवचस्तदा । अमृते मथिते तात देवाञ्छरणमीयिवान् ॥
vāsukiścāpi tacchrutvā pitāmahavacastadā | amṛte mathite tāta devāñcharaṇamīyivān
वत्स, वासुकि ने भी तब पितामह के वे वचन सुने, और अमृत-मन्थन हो जाने पर वे देवताओं की शरण में गए।
श्लोक 10 (1.54.10)
सिद्धार्थाश्च सुराः सर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम् । भ्रातरं मे पुरस्कृत्य पितामहमुपागमन् ॥
siddhārthāśca surāḥ sarve prāpyāmṛtamanuttamam | bhrātaraṃ me puraskṛtya pitāmahamupāgaman
उत्तम अमृत पाकर सफल-मनोरथ हुए सब देवता मेरे भाई को आगे करके पितामह के पास पहुँचे।
श्लोक 11 (1.54.11)
ते तं प्रसादयामासुः सुराः सर्वेऽब्जसंभवम् । राज्ञा वासुकिना सार्धं शापोऽसौ न भवेदिति ॥
te taṃ prasādayāmāsuḥ surāḥ sarve'bjasaṃbhavam | rājñā vāsukinā sārdhaṃ śāpo'sau na bhavediti
राजा वासुकि के साथ सब देवताओं ने कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी को प्रसन्न किया, ताकि वह शाप पूरा न हो।
देवा ऊचुः
श्लोक 12 (1.54.12)
वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो ज्ञातिकारणात् । अभिशापः स मातुस्तु भगवन्न भवेत्कथम् ॥
vāsukirnāgarājo'yaṃ duḥkhito jñātikāraṇāt | abhiśāpaḥ sa mātustu bhagavanna bhavetkatham
"नागराज वासुकि अपने बन्धुओं के कारण दुःखी हैं। भगवन्, इनकी माता का वह शाप किस प्रकार निष्फल हो?"
ब्रह्मोवाच
श्लोक 13 (1.54.13)
जरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्यां समवाप्स्यति । तत्र जातो द्विजः शापान्मोक्षयिष्यति पन्नगान् ॥
jaratkārurjaratkāruṃ yāṃ bhāryāṃ samavāpsyati | tatra jāto dvijaḥ śāpānmokṣayiṣyati pannagān
"जरत्कारु मुनि जिस जरत्कारु नाम की पत्नी को प्राप्त करेंगे, उससे उत्पन्न ब्राह्मण नागों को शाप से छुड़ाएगा।"
जरत्कारुरुवाच
श्लोक 14 (1.54.14)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वासुकिः पन्नगोत्तमः । प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ vāsukiḥ pannagottamaḥ | prādānmāmamaraprakhya tava pitre mahātmane
हे देवतुल्य पुत्र, यह वचन सुनकर नागश्रेष्ठ वासुकि ने मुझे तुम्हारे महात्मा पिता को सौंप दिया,
श्लोक 15 (1.54.15)
प्रागेवानागते काले तस्मात्त्वं मय्यजायथाः । अयं स कालः संप्राप्तो भयान्नस्त्रातुमर्हसि ॥
prāgevānāgate kāle tasmāttvaṃ mayyajāyathāḥ | ayaṃ sa kālaḥ saṃprāpto bhayānnastrātumarhasi
समय आने से बहुत पहले ही; इसी कारण तुम मुझसे उत्पन्न हुए। अब वह समय आ पहुँचा है; तुम्हें हमारी भय से रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 16 (1.54.16)
भ्रातरं चापि मे तस्मात्त्रातुमर्हसि पावकात् । न मोघं तु कृतं तत्स्याद्यदहं तव धीमते । पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे ॥
bhrātaraṃ cāpi me tasmāttrātumarhasi pāvakāt | na moghaṃ tu kṛtaṃ tatsyādyadahaṃ tava dhīmate | pitre dattā vimokṣārthaṃ kathaṃ vā putra manyase
इसलिए तुम्हें मेरे भाई को भी अग्नि से बचाना चाहिए। हमारी मुक्ति के लिए मुझे तुम्हारे बुद्धिमान पिता को जो सौंपा गया, वह व्यर्थ न जाए। अथवा पुत्र, तुम क्या सोचते हो?"
सौतिरुवाच
श्लोक 17 (1.54.17)
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सास्तीको मातरं तदा । अब्रवीद्दुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव ॥
evamuktastathetyuktvā sāstīko mātaraṃ tadā | abravīdduḥkhasaṃtaptaṃ vāsukiṃ jīvayanniva
ऐसा कहे जाने पर आस्तीक ने माता से "ऐसा ही होगा" कहा और फिर दुःख से संतप्त वासुकि को मानो जीवन-दान देते हुए बोले —
आस्तीक उवाच
श्लोक 18 (1.54.18)
अहं त्वां मोक्षयिष्यामि वासुके पन्नगोत्तम । तस्माच्छापान्महासत्त्व सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
ahaṃ tvāṃ mokṣayiṣyāmi vāsuke pannagottama | tasmācchāpānmahāsattva satyametadbravīmi te
"हे नागश्रेष्ठ, हे महाबली वासुकि, मैं आपको उस शाप से छुड़ाऊँगा। यह मैं आपसे सच कहता हूँ।
श्लोक 19 (1.54.19)
भव स्वस्थमना नाग न हि ते विद्यते भयम् । प्रयतिष्ये तथा राजन्यथा श्रेयो भविष्यति ॥
bhava svasthamanā nāga na hi te vidyate bhayam | prayatiṣye tathā rājanyathā śreyo bhaviṣyati
हे नाग, निश्चिन्त रहिए; आपको कोई भय नहीं है। हे राजन्, मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे कल्याण हो।
श्लोक 20 (1.54.20)
न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा । तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजयम् ॥
na me vāganṛtaṃ prāha svaireṣvapi kuto'nyathā | taṃ vai nṛpavaraṃ gatvā dīkṣitaṃ janamejayam
मेरी वाणी ने हँसी-विनोद में भी कभी असत्य नहीं कहा, फिर इस समय कैसे कहेगी? मैं उस श्रेष्ठ राजा जनमेजय के पास जाऊँगा, जो यज्ञ की दीक्षा ले चुके हैं,
श्लोक 21 (1.54.21)
वाग्भिर्मङ्गलयुक्ताभिस्तोषयिष्येऽद्य मातुल । यथा स यज्ञो नृपतेर्निर्वर्तिष्यति सत्तम ॥
vāgbhirmaṅgalayuktābhistoṣayiṣye'dya mātula | yathā sa yajño nṛpaternirvartiṣyati sattama
और हे मामा, आज ही मंगलमय वचनों से उन्हें प्रसन्न करूँगा, जिससे हे सज्जनश्रेष्ठ, राजा का वह यज्ञ समाप्त हो जाए।
श्लोक 22 (1.54.22)
स संभावय नागेन्द्र मयि सर्वं महामते । न ते मयि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति ॥
sa saṃbhāvaya nāgendra mayi sarvaṃ mahāmate | na te mayi mano jātu mithyā bhavitumarhati
हे नागराज, हे महाबुद्धिमान, इस सब में मुझ पर भरोसा रखिए। मुझ पर रखा आपका विश्वास कभी झूठा नहीं होगा।"
वासुकिरुवाच
श्लोक 23 (1.54.23)
आस्तीक परिघूर्णामि हृदयं मे विदीर्यते । दिशो न प्रतिजानामि ब्रह्मदण्डनिपीडितः ॥
āstīka parighūrṇāmi hṛdayaṃ me vidīryate | diśo na pratijānāmi brahmadaṇḍanipīḍitaḥ
"आस्तीक, मेरा सिर चकरा रहा है और हृदय फटा जा रहा है। ब्रह्मा के दण्ड से पीड़ित होकर मुझे दिशाओं तक का ज्ञान नहीं रहा।"
आस्तीक उवाच
श्लोक 24 (1.54.24)
न सन्तापस्त्वया कार्यः कथंचित्पन्नगोत्तम । प्रदीप्ताग्नेः समुत्पन्नं नाशयिष्यामि ते भयम् ॥
na santāpastvayā kāryaḥ kathaṃcitpannagottama | pradīptāgneḥ samutpannaṃ nāśayiṣyāmi te bhayam
"हे नागश्रेष्ठ, आपको किसी प्रकार का संताप नहीं करना चाहिए। प्रज्वलित अग्नि से उत्पन्न आपके भय को मैं नष्ट कर दूँगा।
श्लोक 25 (1.54.25)
ब्रह्मदण्डं महाघोरं कालाग्निसमतेजसम् । नाशयिष्यामि माऽत्र त्वं भयं कार्षीः कथंचन ॥
brahmadaṇḍaṃ mahāghoraṃ kālāgnisamatejasam | nāśayiṣyāmi mā'tra tvaṃ bhayaṃ kārṣīḥ kathaṃcana
ब्रह्मा का दण्ड अत्यन्त भयानक और प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी है, पर मैं उसे नष्ट कर दूँगा। इस विषय में आप तनिक भी भय न करें।"
सौतिरुवाच
श्लोक 26 (1.54.26)
ततः स वासुकेर्घोरमपनीय मनोज्वरम् । आधाय चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम् ॥
tataḥ sa vāsukerghoramapanīya manojvaram | ādhāya cātmano'ṅgeṣu jagāma tvarito bhṛśam
तब वासुकि के मन के भयंकर ज्वर को दूर करके और उसे अपने ऊपर लेकर वे बड़ी शीघ्रता से चल पड़े।
श्लोक 27 (1.54.27)
जनमेजयस्य तं यज्ञं सर्वैः समुदितं गुणैः । मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तमः ॥
janamejayasya taṃ yajñaṃ sarvaiḥ samuditaṃ guṇaiḥ | mokṣāya bhujagendrāṇāmāstīko dvijasattamaḥ
द्विजश्रेष्ठ आस्तीक नागराजों को मुक्त कराने के लिए जनमेजय के उस यज्ञ की ओर गए, जो सब गुणों से सम्पन्न था।
श्लोक 28 (1.54.28)
स गत्वाऽपश्यदास्तीको यज्ञायतनमुत्तमम् । वृतं सदस्यैर्बहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभैः ॥
sa gatvā'paśyadāstīko yajñāyatanamuttamam | vṛtaṃ sadasyairbahubhiḥ sūryavahnisamaprabhaiḥ
वहाँ पहुँचकर आस्तीक ने वह उत्तम यज्ञमण्डप देखा, जो सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी अनेक सदस्यों से घिरा हुआ था।
श्लोक 29 (1.54.29)
स तत्र वारितो द्वास्थैः प्रविशन्द्विजसत्तमः । अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतपः ॥
sa tatra vārito dvāsthaiḥ praviśandvijasattamaḥ | abhituṣṭāva taṃ yajñaṃ praveśārthī paraṃtapaḥ
भीतर जाते समय द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया। तब शत्रुओं को तपाने वाले उन द्विजश्रेष्ठ ने प्रवेश पाने के लिए उस यज्ञ की स्तुति आरम्भ की।
श्लोक 30 (1.54.30)
स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्ठं द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः । तुष्टाव राजानमनन्तकीर्तिमृत्विक्सदस्यांश्च तथैव चाग्निम् ॥
sa prāpya yajñāyatanaṃ variṣṭhaṃ dvijottamaḥ puṇyakṛtāṃ variṣṭhaḥ | tuṣṭāva rājānamanantakīrtimṛtviksadasyāṃśca tathaiva cāgnim
उस श्रेष्ठ यज्ञमण्डप में पहुँचकर पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ उन द्विजोत्तम ने अनन्त कीर्ति वाले राजा की, ऋत्विजों और सदस्यों की तथा अग्नि की भी स्तुति की।