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आदि पर्व · अध्याय 55

आस्तीक द्वारा जनमेजय के यज्ञ की स्तुति

युवा ब्राह्मण आस्तीक सर्पयज्ञ में पहुँचकर उसकी स्तुति करते हैं और उसे सोम, वरुण और इन्द्र से लेकर युधिष्ठिर और व्यास तक, देवताओं और प्राचीन राजाओं के प्रसिद्ध यज्ञों के समान बताते हैं। फिर वे व्यास को सर्वश्रेष्ठ ऋत्विक् कहकर उनकी, यज्ञाग्नि की और राजा जनमेजय की प्रशंसा करते हैं तथा राजा की तुलना देवताओं, महर्षियों और यशस्वी राजाओं से करते हैं। सुनने वाले सब प्रसन्न हो जाते हैं और जनमेजय उत्तर देने को उद्यत होते हैं।

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आस्तीक उवाच

श्लोक 1 (1.55.1)

सोमस्य यज्ञो वरुणस्य यज्ञः । प्रजापतेर्यज्ञ आसीत्प्रयागे । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य । पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥

somasya yajño varuṇasya yajñaḥ | prajāpateryajña āsītprayāge | tathā yajño'yaṃ tava bhāratāgrya | pārikṣita svasti no'stu priyebhyaḥ

जैसा सोम का यज्ञ था, जैसा वरुण का यज्ञ था, और जैसा प्रयाग में प्रजापति का यज्ञ हुआ था, हे भरतश्रेष्ठ, वैसा ही यह तुम्हारा यज्ञ है। हे परीक्षित्-पुत्र, हमारे प्रियजनों का कल्याण हो।

श्लोक 2 (1.55.2)

शक्रस्य यज्ञः शतसङ्ख्य उक्त- । स्तथापरं तुल्यसङ्ख्यं शतं वै । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य । पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥

śakrasya yajñaḥ śatasaṅkhya ukta- | stathāparaṃ tulyasaṅkhyaṃ śataṃ vai | tathā yajño'yaṃ tava bhāratāgrya | pārikṣita svasti no'stu priyebhyaḥ

कहा जाता है कि इन्द्र के यज्ञ सौ थे, और उतने ही और सौ भी। हे भरतश्रेष्ठ, वैसा ही यह तुम्हारा यज्ञ है। हे परीक्षित्-पुत्र, हमारे प्रियजनों का कल्याण हो।

श्लोक 3 (1.55.3)

यमस्य यज्ञो हरिमेधसश्च । यथा यज्ञो रन्तिदेवस्य राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य । पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥

yamasya yajño harimedhasaśca | yathā yajño rantidevasya rājñaḥ | tathā yajño'yaṃ tava bhāratāgrya | pārikṣita svasti no'stu priyebhyaḥ

जैसा यम का और हरिमेधा का यज्ञ था, और जैसा राजा रन्तिदेव का यज्ञ था, हे भरतश्रेष्ठ, वैसा ही यह तुम्हारा यज्ञ है। हे परीक्षित्-पुत्र, हमारे प्रियजनों का कल्याण हो।

श्लोक 4 (1.55.4)

गयस्य यज्ञः शशबिन्दोश्च राज्ञो । यज्ञस्तथा वैश्रवणस्य राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य । पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥

gayasya yajñaḥ śaśabindośca rājño | yajñastathā vaiśravaṇasya rājñaḥ | tathā yajño'yaṃ tava bhāratāgrya | pārikṣita svasti no'stu priyebhyaḥ

जैसा गय का और राजा शशबिन्दु का यज्ञ था, और वैसे ही राजा वैश्रवण का यज्ञ था, हे भरतश्रेष्ठ, वैसा ही यह तुम्हारा यज्ञ है। हे परीक्षित्-पुत्र, हमारे प्रियजनों का कल्याण हो।

श्लोक 5 (1.55.5)

नृगस्य यज्ञस्त्वजमीढस्य चासी- । द्यथा यज्ञो दाशरथेश्च राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य । पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥

nṛgasya yajñastvajamīḍhasya cāsī- | dyathā yajño dāśaratheśca rājñaḥ | tathā yajño'yaṃ tava bhāratāgrya | pārikṣita svasti no'stu priyebhyaḥ

जैसा नृग का और अजमीढ का यज्ञ था, और जैसा दशरथ-पुत्र राजा राम का यज्ञ था, हे भरतश्रेष्ठ, वैसा ही यह तुम्हारा यज्ञ है। हे परीक्षित्-पुत्र, हमारे प्रियजनों का कल्याण हो।

श्लोक 6 (1.55.6)

यज्ञः श्रुतो दिवि देवस्य सूनो- । र्युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य । पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥

yajñaḥ śruto divi devasya sūno- | ryudhiṣṭhirasyājamīḍhasya rājñaḥ | tathā yajño'yaṃ tava bhāratāgrya | pārikṣita svasti no'stu priyebhyaḥ

देवता के पुत्र, अजमीढ-वंशी राजा युधिष्ठिर के यज्ञ की ख्याति स्वर्ग तक सुनी गई थी। हे भरतश्रेष्ठ, वैसा ही यह तुम्हारा यज्ञ है। हे परीक्षित्-पुत्र, हमारे प्रियजनों का कल्याण हो।

श्लोक 7 (1.55.7)

कृष्णस्य यज्ञः सत्यवत्याः सुतस्य । स्वयं च कर्म प्रचकार यत्र । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य । पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥

kṛṣṇasya yajñaḥ satyavatyāḥ sutasya | svayaṃ ca karma pracakāra yatra | tathā yajño'yaṃ tava bhāratāgrya | pārikṣita svasti no'stu priyebhyaḥ

जैसा सत्यवती-पुत्र कृष्ण (द्वैपायन) का यज्ञ था, जिसमें उन्होंने स्वयं कर्म सम्पन्न किया था, हे भरतश्रेष्ठ, वैसा ही यह तुम्हारा यज्ञ है। हे परीक्षित्-पुत्र, हमारे प्रियजनों का कल्याण हो।

श्लोक 8 (1.55.8)

इमे च ते सूर्यसमानवर्चसः । समासते वृत्रहणः क्रतुं यथा । नैषां ज्ञातुं विद्यते ज्ञानमद्य । दत्तं येभ्यो न प्रणश्येत्कदाचित् ॥

ime ca te sūryasamānavarcasaḥ | samāsate vṛtrahaṇaḥ kratuṃ yathā | naiṣāṃ jñātuṃ vidyate jñānamadya | dattaṃ yebhyo na praṇaśyetkadācit

सूर्य के समान तेजस्वी ये तुम्हारे ऋत्विज इस यज्ञ में वैसे ही बैठे हैं जैसे वृत्रहन्ता इन्द्र के यज्ञ में। आज इनके लिए जानने योग्य कोई ज्ञान शेष नहीं है, और इन्हें दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं होता।

श्लोक 9 (1.55.9)

ऋत्विक्समो नास्ति लोकेषु चैव । द्वैपायनेनेति विनिश्चितं मे । एतस्य शिष्या हि क्षितिं संचरन्ति । सर्वर्त्विजः कर्मसु स्वेषु दक्षाः ॥

ṛtviksamo nāsti lokeṣu caiva | dvaipāyaneneti viniścitaṃ me | etasya śiṣyā hi kṣitiṃ saṃcaranti | sarvartvijaḥ karmasu sveṣu dakṣāḥ

मेरा निश्चित मत है कि लोकों में द्वैपायन के समान कोई ऋत्विक् नहीं है। उनके शिष्य पृथ्वी पर विचरते हैं; वे सब ऋत्विज हैं और अपने-अपने कर्मों में निपुण हैं।

श्लोक 10 (1.55.10)

विभावसुश्चित्रभानुर्महात्मा । हिरण्यरेता हुतभुक्कृष्णवर्त्मा । प्रदक्षिणावर्तशिखः प्रदीप्तो । हव्यं तवेदं हुतभुग्वष्टि देवः ॥

vibhāvasuścitrabhānurmahātmā | hiraṇyaretā hutabhukkṛṣṇavartmā | pradakṣiṇāvartaśikhaḥ pradīpto | havyaṃ tavedaṃ hutabhugvaṣṭi devaḥ

महात्मा विभावसु, चित्रभानु, हिरण्यरेता, हविर्भोजी, कृष्णवर्त्मा अग्निदेव, जिनकी ज्वालाएँ दाहिनी ओर घूमती हुई प्रज्वलित हैं, तुम्हारी इस आहुति को ग्रहण करना चाहते हैं।

श्लोक 11 (1.55.11)

नैह त्वदन्यो विद्यते जीवलोके । समो नृपः पालयिता प्रजानाम् । धृत्या च ते प्रीतमनाः सदाहं । त्वं वा वरुणो धर्मराजो यमो वा ॥

naiha tvadanyo vidyate jīvaloke | samo nṛpaḥ pālayitā prajānām | dhṛtyā ca te prītamanāḥ sadāhaṃ | tvaṃ vā varuṇo dharmarājo yamo vā

इस जीवलोक में तुम्हारे समान प्रजा का पालन करने वाला दूसरा कोई राजा नहीं है। तुम्हारे धैर्य से मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। तुम या तो वरुण हो, या धर्मराज यम।

श्लोक 12 (1.55.12)

शक्रः साक्षाद्वज्रपाणिर्यथेह । त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम् । मतस्त्वं नः पुरुषेन्द्रेह लोके । न च त्वदन्यो भूपतिरस्ति यज्ञे ॥

śakraḥ sākṣādvajrapāṇiryatheha | trātā loke'smiṃstvaṃ tatheha prajānām | matastvaṃ naḥ puruṣendreha loke | na ca tvadanyo bhūpatirasti yajñe

जैसे वज्रधारी इन्द्र स्वयं इस लोक के रक्षक हैं, वैसे ही तुम यहाँ प्रजा के रक्षक हो। हे पुरुषेन्द्र, इस लोक में हम तुम्हें ही राजा मानते हैं; यज्ञ में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भूपति नहीं है।

श्लोक 13 (1.55.13)

खट्वाङ्गनाभगदिलीपकल्प । ययातिमान्धातृसमप्रभाव । आदित्यतेजःप्रतिमानतेजा । भीष्मो यथा राजसि सुव्रतस्त्वम् ॥

khaṭvāṅganābhagadilīpakalpa | yayātimāndhātṛsamaprabhāva | ādityatejaḥpratimānatejā | bhīṣmo yathā rājasi suvratastvam

तुम खट्वांग, नाभाग और दिलीप के समान हो; तुम्हारा प्रभाव ययाति और मान्धाता के बराबर है; तुम्हारा तेज सूर्य के तेज जैसा है; उत्तम व्रत वाले तुम भीष्म की भाँति शोभा पाते हो।

श्लोक 14 (1.55.14)

वाल्मीकिवत्ते निभृतं स्ववीर्यं । वसिष्ठवत्ते नियतश्च कोपः । प्रभुत्वमिन्द्रत्वसमं मतं मे । द्युतिश्च नारायणवद्विभाति ॥

vālmīkivatte nibhṛtaṃ svavīryaṃ | vasiṣṭhavatte niyataśca kopaḥ | prabhutvamindratvasamaṃ mataṃ me | dyutiśca nārāyaṇavadvibhāti

वाल्मीकि की भाँति तुम्हारा पराक्रम संयत है; वसिष्ठ की भाँति तुम्हारा क्रोध वश में है; मेरी दृष्टि में तुम्हारा प्रभुत्व इन्द्र के समान है; और तुम्हारी कान्ति नारायण की भाँति चमकती है।

श्लोक 15 (1.55.15)

यमो यथा धर्मविनिश्चयज्ञः । कृष्णो यथा सर्वगुणोपपन्नः । श्रियां निवासोऽसि यथा वसूनां । निधानभूतोऽसि तथा क्रतूनाम् ॥

yamo yathā dharmaviniścayajñaḥ | kṛṣṇo yathā sarvaguṇopapannaḥ | śriyāṃ nivāso'si yathā vasūnāṃ | nidhānabhūto'si tathā kratūnām

यम की भाँति तुम धर्म के निर्णय को जानते हो; कृष्ण की भाँति सब गुणों से सम्पन्न हो; जैसे वसु धन के आश्रय हैं, वैसे तुम लक्ष्मी के निवास हो, और यज्ञों के भण्डार हो।

श्लोक 16 (1.55.16)

दम्भोद्भवेनासि समो बलेन । रामो यथा शस्त्रविदस्त्रविच्च । और्वत्रिताभ्यामसि तुल्यतेजा । दुष्प्रेक्षणीयोऽसि भगीरथेन ॥

dambhodbhavenāsi samo balena | rāmo yathā śastravidastravicca | aurvatritābhyāmasi tulyatejā | duṣprekṣaṇīyo'si bhagīrathena

बल में तुम दम्भोद्भव के समान हो; राम (परशुराम) की भाँति शस्त्र और अस्त्र दोनों के ज्ञाता हो; तेज में और्व और त्रित के बराबर हो; और भगीरथ की भाँति तुम्हारी ओर देखना कठिन है।

सौतिरुवाच

श्लोक 17 (1.55.17)

एवं स्तुताः सर्व एव प्रसन्ना । राजा सदस्या ऋत्विजो हव्यवाहः । तेषां दृष्ट्वा भावितानीङ्गितानि । प्रोवाच राजा जनमेजयोऽथ ॥

evaṃ stutāḥ sarva eva prasannā | rājā sadasyā ṛtvijo havyavāhaḥ | teṣāṃ dṛṣṭvā bhāvitānīṅgitāni | provāca rājā janamejayo'tha

इस प्रकार स्तुति किए जाने पर राजा, सदस्य, ऋत्विज और अग्निदेव, सभी प्रसन्न हो गए। उनके मन के भावों को पहचानकर तब राजा जनमेजय बोले।

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