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आदि पर्व · अध्याय 56

आस्तीक का वर

जनमेजय युवा आस्तीक को वर देना चाहते हैं, पर होता आपत्ति करता है कि तक्षक अभी तक नहीं आया। ऋत्विजों को पता चलता है कि तक्षक इन्द्र की शरण में है, और राजा आज्ञा देते हैं कि इन्द्र सहित उसे अग्नि में गिराया जाए; इन्द्र आते हैं, भयभीत होकर नाग को छोड़ देते हैं, और तक्षक विवश होकर ज्वालाओं की ओर खिंचने लगता है। उसी क्षण आस्तीक वर के रूप में यज्ञ को रोकने की माँग करते हैं। अनिच्छुक राजा बदले में सोना और गौएँ देना चाहते हैं, पर आस्तीक उन्हें अस्वीकार कर देते हैं, और सभासद राजा से आग्रह करते हैं कि ब्राह्मण को उसका वर मिले।

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जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (1.56.1)

बालोऽप्ययं स्थविर इवावभाषते । नायं बालः स्थविरोऽयं मतो मे । इच्छाम्यहं वरमस्मै प्रदातुं । तन्मे विप्राः संविदध्वं यथावत् ॥

bālo'pyayaṃ sthavira ivāvabhāṣate | nāyaṃ bālaḥ sthaviro'yaṃ mato me | icchāmyahaṃ varamasmai pradātuṃ | tanme viprāḥ saṃvidadhvaṃ yathāvat

यह बालक होकर भी वृद्ध की भाँति बोलता है। यह बालक नहीं, मेरी दृष्टि में वृद्ध है। मैं इसे वर देना चाहता हूँ। हे ब्राह्मणो, आप लोग इस विषय में यथोचित एकमत हो जाइए।

सदस्या ऊचुः

श्लोक 2 (1.56.2)

बालोऽपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञां । यश्चाविद्वान्यश्च विद्वान्यथावत् । सर्वान्कामांस्त्वत्त एषोऽर्हतेऽद्य । यथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् ॥

bālo'pi vipro mānya eveha rājñāṃ | yaścāvidvānyaśca vidvānyathāvat | sarvānkāmāṃstvatta eṣo'rhate'dya | yathā ca nastakṣaka eti śīghram

ब्राह्मण बालक हो तब भी राजाओं के लिए सम्माननीय ही है, चाहे वह विद्वान् हो या अविद्वान्। आज यह आपसे अपनी सब कामनाएँ पाने का अधिकारी है — किन्तु तब, जब तक्षक शीघ्र ही हमारे पास आ जाए।

सौतिरुवाच

श्लोक 3 (1.56.3)

व्याहर्तुकामे वरदे नृपे द्विजं । वरं वृणीष्वेति ततोऽभ्युवाच । होता वाक्यं नातिहृष्टान्तरात्मा । कर्मण्यस्मिंस्तक्षको नैति तावत् ॥

vyāhartukāme varade nṛpe dvijaṃ | varaṃ vṛṇīṣveti tato'bhyuvāca | hotā vākyaṃ nātihṛṣṭāntarātmā | karmaṇyasmiṃstakṣako naiti tāvat

वरदाता राजा जब ब्राह्मण से "वर माँगो" कहने ही वाले थे, तभी होता ने, जिसका मन प्रसन्न नहीं था, कहा — "इस यज्ञकर्म में तक्षक अभी तक नहीं आया है।"

जनमेजय उवाच

श्लोक 4 (1.56.4)

यथा चेदं कर्म समाप्यते मे । यथा च वै तक्षक एति शीघ्रम् । तथा भवन्तः प्रयतन्तु सर्वे । परं शक्त्या स हि मे विद्विषाणः ॥

yathā cedaṃ karma samāpyate me | yathā ca vai takṣaka eti śīghram | tathā bhavantaḥ prayatantu sarve | paraṃ śaktyā sa hi me vidviṣāṇaḥ

आप सब पूरी शक्ति से ऐसा प्रयत्न कीजिए कि मेरा यह कर्म पूरा हो और तक्षक भी शीघ्र यहाँ आ जाए; क्योंकि वह मेरा शत्रु है।

ऋत्विज ऊचुः

श्लोक 5 (1.56.5)

यथा शस्त्राणि नः प्राहुर्यथा शंसति पावकः । इन्द्रस्य भवने राजंस्तक्षको भयपीडितः ॥

yathā śastrāṇi naḥ prāhuryathā śaṃsati pāvakaḥ | indrasya bhavane rājaṃstakṣako bhayapīḍitaḥ

हे राजन्, जैसा मन्त्र हमें बताते हैं और जैसा अग्निदेव सूचित करते हैं, भय से पीड़ित तक्षक इन्द्र के भवन में है।

सौतिरुवाच

श्लोक 6 (1.56.6)

यथा सूतो लोहिताक्षो महात्मा । पौराणिको वेदितवान्पुरस्तात् । स राजानं प्राह पृष्टस्तदानीं । यथाहुर्विप्रास्तद्वदेतन्नृदेव ॥

yathā sūto lohitākṣo mahātmā | paurāṇiko veditavānpurastāt | sa rājānaṃ prāha pṛṣṭastadānīṃ | yathāhurviprāstadvadetannṛdeva

पुराणों के ज्ञाता महात्मा सूत लोहिताक्ष ने यह बात पहले ही बता दी थी। तब राजा के पूछने पर उन्होंने कहा — "हे नरदेव, जैसा ब्राह्मण कहते हैं, यह वैसा ही है।

श्लोक 7 (1.56.7)

पुराणमागम्य ततो ब्रवीम्यहं । दत्तं तस्मै वरमिन्द्रेण राजन् । वसेह त्वं मत्सकाशे सुगुप्तो । न पावकस्त्वां प्रदहिष्यतीति ॥

purāṇamāgamya tato bravīmyahaṃ | dattaṃ tasmai varamindreṇa rājan | vaseha tvaṃ matsakāśe sugupto | na pāvakastvāṃ pradahiṣyatīti

प्राचीन वृत्तान्त जानकर मैं आपसे कहता हूँ, हे राजन् — इन्द्र ने उसे यह वर दिया है कि 'तुम यहाँ मेरे पास सुरक्षित होकर रहो, अग्नि तुम्हें नहीं जलाएगी।'"

श्लोक 8 (1.56.8)

एतच्छ्रुत्वा दीक्षितस्तप्यमान । आस्ते होतारं चोदयन्कर्मकाले । होता च यत्तः स जुहाव मन्त्रै- । रथो इन्द्रः स्वयमेवाजगाम ॥

etacchrutvā dīkṣitastapyamāna | āste hotāraṃ codayankarmakāle | hotā ca yattaḥ sa juhāva mantrai- | ratho indraḥ svayamevājagāma

यह सुनकर यज्ञ में दीक्षित राजा संतप्त होकर कर्म के समय होता को प्रेरित करते हुए बैठे रहे। होता ने सावधान होकर मन्त्रों से आहुति दी; तब स्वयं इन्द्र वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 9 (1.56.9)

आयातु चेन्द्रोऽपि सतक्षकः पते- । द्विभावसौ नागराजेन तूर्णम् । जम्भस्य हन्तेति जुहाव होता । तदा जगामाहिदत्ताभयः प्रभुः ॥

āyātu cendro'pi satakṣakaḥ pate- | dvibhāvasau nāgarājena tūrṇam | jambhasya hanteti juhāva hotā | tadā jagāmāhidattābhayaḥ prabhuḥ

"इन्द्र भी आएँ, और तक्षक के साथ, नागराज के साथ, शीघ्र ही अग्नि में गिरें!" — "हे जम्भ के संहारक!" कहते हुए होता ने आहुति दी। तब नाग को अभय देने वाले प्रभु इन्द्र चल पड़े।

श्लोक 10 (1.56.10)

विमानमारुह्य महानुभावः । सर्वैर्देवैः परिसंस्तूयमानः । बलाहकैश्चाप्यनुगम्यमानो । विद्याधरैरप्सरसां गणैश्च । नागस्य नाशो मम चैव नाशो । भविष्यतीत्येव विचिन्तयानः ॥

vimānamāruhya mahānubhāvaḥ | sarvairdevaiḥ parisaṃstūyamānaḥ | balāhakaiścāpyanugamyamāno | vidyādharairapsarasāṃ gaṇaiśca | nāgasya nāśo mama caiva nāśo | bhaviṣyatītyeva vicintayānaḥ

वे महाप्रभावशाली इन्द्र विमान पर चढ़कर आए; सब देवता उनकी स्तुति कर रहे थे, और मेघ, विद्याधर तथा अप्सराओं के समूह उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। वे यही सोच रहे थे कि "नाग का नाश होगा और मेरा भी नाश होगा।"

श्लोक 11 (1.56.11)

तस्योत्तरीये निहितः स नागो । भयोद्विग्नः शर्म नैवाभ्यगच्छत् । ततो राजा मन्त्रविदोऽब्रवीत्पुनः । क्रुद्धो वाक्यं तक्षकस्यान्तमिच्छन् ॥

tasyottarīye nihitaḥ sa nāgo | bhayodvignaḥ śarma naivābhyagacchat | tato rājā mantravido'bravītpunaḥ | kruddho vākyaṃ takṣakasyāntamicchan

इन्द्र के उत्तरीय में छिपा वह नाग भय से व्याकुल था और उसे कहीं चैन नहीं मिला। तब तक्षक का अन्त चाहने वाले राजा ने क्रुद्ध होकर मन्त्रवेत्ता ऋत्विजों से फिर कहा —

जनमेजय उवाच

श्लोक 12 (1.56.12)

इन्द्रस्य भवने विप्रा यदि नागः स तक्षकः । तमिन्द्रेणैव सहितं पातयध्वं विभावसौ ॥

indrasya bhavane viprā yadi nāgaḥ sa takṣakaḥ | tamindreṇaiva sahitaṃ pātayadhvaṃ vibhāvasau

हे ब्राह्मणो, यदि वह नाग तक्षक इन्द्र के भवन में है, तो उसे इन्द्र सहित ही अग्नि में गिरा दीजिए।

सौतिरुवाच

श्लोक 13 (1.56.13)

जनमेजयेन राज्ञा तु नोदितस्तक्षकं प्रति । होता जुहाव तत्रस्थं तक्षकं पन्नगं तथा ॥

janamejayena rājñā tu noditastakṣakaṃ prati | hotā juhāva tatrasthaṃ takṣakaṃ pannagaṃ tathā

राजा जनमेजय द्वारा तक्षक के विरुद्ध प्रेरित होकर होता ने, जहाँ वह था वहीं से, नाग तक्षक का आवाहन करते हुए आहुति दी।

श्लोक 14 (1.56.14)

हूयमाने तथा चैव तक्षकः सपुरन्दरः । आकाशे ददृशे तत्र क्षणेन व्यथितस्तदा ॥

hūyamāne tathā caiva takṣakaḥ sapurandaraḥ | ākāśe dadṛśe tatra kṣaṇena vyathitastadā

आहुति दी जाते ही तक्षक इन्द्र के साथ आकाश में दिखाई दिया; वह उसी क्षण व्याकुल हो उठा था।

श्लोक 15 (1.56.15)

पुरन्दरस्तु तं यज्ञं दृष्ट्वोरुभयमाविशत् । हित्वा तु तक्षकं त्रस्तः स्वमेव भवनं ययौ ॥

purandarastu taṃ yajñaṃ dṛṣṭvorubhayamāviśat | hitvā tu takṣakaṃ trastaḥ svameva bhavanaṃ yayau

उस यज्ञ को देखकर इन्द्र बहुत भयभीत हो गए और तक्षक को छोड़कर डरते हुए अपने ही भवन को लौट गए।

श्लोक 16 (1.56.16)

इन्द्रे गते तु राजेन्द्र तक्षको भयमोहितः । मन्त्रशक्त्या पावकार्चिस्समीपमवशो गतः । तं दृष्ट्वा ऋत्विजस्तत्र वचनं चेदमब्रुवन् ॥

indre gate tu rājendra takṣako bhayamohitaḥ | mantraśaktyā pāvakārcissamīpamavaśo gataḥ | taṃ dṛṣṭvā ṛtvijastatra vacanaṃ cedamabruvan

हे राजेन्द्र, इन्द्र के चले जाने पर भय से मोहित तक्षक मन्त्रों की शक्ति से विवश होकर अग्नि की ज्वालाओं के समीप आ गया। उसे देखकर वहाँ ऋत्विजों ने यह वचन कहा —

ऋत्विज ऊचुः

श्लोक 17 (1.56.17)

अयमायाति तूर्णं स तक्षकस्ते वशं नृप । श्रूयतेऽस्य महान्नादो नदतो भैरवं रवम् ॥

ayamāyāti tūrṇaṃ sa takṣakaste vaśaṃ nṛpa | śrūyate'sya mahānnādo nadato bhairavaṃ ravam

हे राजन्, यह तक्षक शीघ्र ही आपके वश में आ रहा है। भयंकर गर्जना करते हुए उसका महान् नाद सुनाई दे रहा है।

श्लोक 18 (1.56.18)

नूनं मुक्तो वज्रभृता स नागो । भ्रष्टो नाकान्मन्त्रवित्रस्तकायः । घूर्णन्नाकाशे नष्टसंज्ञोऽभ्युपैति । तीव्रान्निश्वासान्निश्वसन्पन्नगेन्द्रः ॥

nūnaṃ mukto vajrabhṛtā sa nāgo | bhraṣṭo nākānmantravitrastakāyaḥ | ghūrṇannākāśe naṣṭasaṃjño'bhyupaiti | tīvrānniśvāsānniśvasanpannagendraḥ

निश्चय ही वज्रधारी इन्द्र ने इस नाग को छोड़ दिया है। स्वर्ग से गिरा, मन्त्रों से काँपते शरीर वाला यह नागराज अचेत होकर आकाश में चक्कर खाता हुआ, तीव्र साँसें लेता हुआ पास आ रहा है।

श्लोक 19 (1.56.19)

वर्तते तव राजेन्द्र कर्मैतद्विधिवत्प्रभो । अस्मै तु द्विजमुख्याय वरं त्वं दातुमर्हसि ॥

vartate tava rājendra karmaitadvidhivatprabho | asmai tu dvijamukhyāya varaṃ tvaṃ dātumarhasi

हे राजेन्द्र, हे प्रभो, आपका यह कर्म विधिपूर्वक चल रहा है। अब आप इस श्रेष्ठ ब्राह्मण को वर दे सकते हैं।

जनमेजय उवाच

श्लोक 20 (1.56.20)

बालाभिरूपस्य तवाप्रमेय । वरं प्रयच्छामि यथानुरूपम् । वृणीष्व यत्तेऽभिमतं हृदि स्थितं । तत्ते प्रदास्याम्यपि चेददेयम् ॥

bālābhirūpasya tavāprameya | varaṃ prayacchāmi yathānurūpam | vṛṇīṣva yatte'bhimataṃ hṛdi sthitaṃ | tatte pradāsyāmyapi cedadeyam

हे सुन्दर बालक, हे अप्रमेय, मैं तुम्हें तुम्हारे योग्य वर देता हूँ। तुम्हारे मन में जो अभीष्ट हो, वह माँग लो; न देने योग्य होने पर भी मैं उसे तुम्हें दूँगा।

सौतिरुवाच

श्लोक 21 (1.56.21)

पतिष्यमाणे नागेन्द्रे तक्षके जातवेदसि । इदमन्तरमित्येवं तदास्तीकोऽभ्यचोदयत् ॥

patiṣyamāṇe nāgendre takṣake jātavedasi | idamantaramityevaṃ tadāstīko'bhyacodayat

जब नागराज तक्षक अग्नि में गिरने ही वाला था, तब "यही अवसर है" यह जानकर आस्तीक बोल उठे —

आस्तीक उवाच

श्लोक 22 (1.56.22)

वरं ददासि चेन्मह्यं वृणोमि जनमेजय । सत्रं ते विरमत्वेतन्न पतेयुरिहोरगाः ॥

varaṃ dadāsi cenmahyaṃ vṛṇomi janamejaya | satraṃ te viramatvetanna pateyurihoragāḥ

हे जनमेजय, यदि आप मुझे वर देते हैं तो मैं यह माँगता हूँ — आपका यह सत्र रुक जाए और यहाँ अब और नाग न गिरें।

सौतिरुवाच

श्लोक 23 (1.56.23)

एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मन्पारिक्षितस्तु सः । नातिहृष्टमनाश्चेदमास्तीकं वाक्यमब्रवीत् ॥

evamuktastadā tena brahmanpārikṣitastu saḥ | nātihṛṣṭamanāścedamāstīkaṃ vākyamabravīt

हे ब्रह्मन्, उनके ऐसा कहने पर परीक्षित्-पुत्र ने, जिनका मन बहुत प्रसन्न नहीं था, आस्तीक से यह वचन कहा —

जनमेजय उवाच

श्लोक 24 (1.56.24)

सुवर्णं रजतं गाश्च यच्चान्यन्मन्यसे विभो । तत्ते दद्यां वरं विप्र न निवर्तेत्क्रतुर्मम ॥

suvarṇaṃ rajataṃ gāśca yaccānyanmanyase vibho | tatte dadyāṃ varaṃ vipra na nivartetkraturmama

हे विप्र, सोना, चाँदी, गौएँ, या और जो कुछ भी आप चाहें, वह मैं आपको वर में दूँगा; पर मेरा यज्ञ न रुके।

आस्तीक उवाच

श्लोक 25 (1.56.25)

सुवर्णं रजतं गाश्च न त्वां राजन्वृणोम्यहम् । सत्रं ते विरमत्वेतत्स्वस्ति मातृकुलस्य नः ॥

suvarṇaṃ rajataṃ gāśca na tvāṃ rājanvṛṇomyaham | satraṃ te viramatvetatsvasti mātṛkulasya naḥ

हे राजन्, मैं आपसे सोना, चाँदी या गौएँ नहीं माँगता। आपका यह सत्र रुक जाए, जिससे मेरे मातृकुल का कल्याण हो।

सौतिरुवाच

श्लोक 26 (1.56.26)

आस्तीकेनैवमुक्तस्तु राजा पारिक्षितस्तदा । पुनःपुनरुवाचेदमास्तीकं वदतां वरः ॥

āstīkenaivamuktastu rājā pārikṣitastadā | punaḥpunaruvācedamāstīkaṃ vadatāṃ varaḥ

आस्तीक के ऐसा कहने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ परीक्षित्-पुत्र राजा जनमेजय ने आस्तीक से बार-बार यही कहा —

श्लोक 27 (1.56.27)

अन्यं वरय भद्रं ते वरं द्विजवरोत्तम । अयाचत न चाप्यन्यं वरं स भृगुनन्दन ॥

anyaṃ varaya bhadraṃ te varaṃ dvijavarottama | ayācata na cāpyanyaṃ varaṃ sa bhṛgunandana

"हे द्विजश्रेष्ठ, आपका कल्याण हो, कोई दूसरा वर माँग लीजिए।" परन्तु हे भृगुनन्दन, आस्तीक ने कोई दूसरा वर नहीं माँगा।

श्लोक 28 (1.56.28)

ततो वेदविदस्तात सदस्याः सर्व एव तम् । राजानमूचुः सहिता लभतां ब्राह्मणो वरम् ॥

tato vedavidastāta sadasyāḥ sarva eva tam | rājānamūcuḥ sahitā labhatāṃ brāhmaṇo varam

हे तात, तब वेदों के ज्ञाता सभी सभासदों ने मिलकर राजा से कहा — "ब्राह्मण को उसका वर मिलना चाहिए।"

अध्याय 55अध्याय-सूचीअध्याय 57