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आदि पर्व · अध्याय 7

अग्नि का प्रतिवाद और ब्रह्मा का समाधान

भृगु के शाप से पीड़ित अग्नि प्रतिवाद करते हैं कि उन्होंने तो साक्षी के धर्म के अनुसार केवल सच कहा था, और बताते हैं कि यज्ञ की अग्नि के रूप में वे देवताओं और पितरों के मुख हैं। सर्वभक्षी होना न चाहकर वे सब कर्मों से अपने को हटा लेते हैं, जिससे लोकों में संकट छा जाता है। ऋषि और देवता ब्रह्मा के पास जाते हैं, और ब्रह्मा अग्नि को आश्वासन देते हैं कि उनका केवल एक अंश सब कुछ खाएगा और उनकी ज्वालाएँ जो भी जलाएँगी वह पवित्र हो जाएगा; इस प्रकार भृगु का शाप भी सत्य रहता है और अग्नि अपने स्थान पर लौट आते हैं। सौति अग्निशाप, पुलोमा के विनाश और च्यवन के जन्म की कथा यहीं पूरी करते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.7.1)

शप्तस्तु भृगुणा वह्निः क्रुद्धो वाक्यमथाब्रवीत् । किमिदं साहसं ब्रह्मन्कृतवानसि मां प्रति ॥

śaptastu bhṛguṇā vahniḥ kruddho vākyamathābravīt | kimidaṃ sāhasaṃ brahmankṛtavānasi māṃ prati

भृगु के शाप से क्रुद्ध होकर अग्निदेव बोले — "हे ब्राह्मण, तुमने मेरे प्रति यह कैसा दुस्साहस किया है?

श्लोक 2 (1.7.2)

धर्मे प्रयतमानस्य सत्यं च वदतः समम् । पृष्टो यदब्रवं सत्यं व्यभिचारोऽत्र को मम ॥

dharme prayatamānasya satyaṃ ca vadataḥ samam | pṛṣṭo yadabravaṃ satyaṃ vyabhicāro'tra ko mama

मैं धर्म का पालन करने का प्रयत्न करता हूँ और निष्पक्ष होकर सच बोलता हूँ। पूछे जाने पर मैंने सच कहा, तो इसमें मेरा क्या अपराध है?

श्लोक 3 (1.7.3)

पृष्टो हि साक्षी यः साक्ष्यं जानानोऽप्यन्यथा वदेत् । स पूर्वानात्मनः सप्त कुले हन्यात्तथाऽपरान् ॥

pṛṣṭo hi sākṣī yaḥ sākṣyaṃ jānāno'pyanyathā vadet | sa pūrvānātmanaḥ sapta kule hanyāttathā'parān

जो साक्षी पूछे जाने पर सच जानते हुए भी उलटा कहता है, वह अपने कुल की सात पीढ़ियाँ पहले की और सात पीढ़ियाँ बाद की नष्ट कर देता है।

श्लोक 4 (1.7.4)

यश्च कार्यार्थतत्त्वज्ञो जानानोऽपि न भाषते । सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशयः ॥

yaśca kāryārthatattvajño jānāno'pi na bhāṣate | so'pi tenaiva pāpena lipyate nātra saṃśayaḥ

और जो किसी विषय का वास्तविक तत्त्व जानते हुए भी नहीं बोलता, वह भी उसी पाप से लिप्त होता है — इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 5 (1.7.5)

शक्तोऽहमपि शप्तुं त्वां मान्यास्तु ब्राह्मणा मम । जानतोऽपि च ते ब्रह्मन्कथयिष्ये निबोध तत् ॥

śakto'hamapi śaptuṃ tvāṃ mānyāstu brāhmaṇā mama | jānato'pi ca te brahmankathayiṣye nibodha tat

मैं भी तुम्हें शाप दे सकता हूँ, परन्तु ब्राह्मण मेरे लिए आदरणीय हैं। हे ब्राह्मण, तुम जानते हो फिर भी मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो।

श्लोक 6 (1.7.6)

योगेन बहुधाऽऽत्मानं कृत्वा तिष्ठामि मूर्तिषु । अग्निहोत्रेषु सत्रेषु क्रियासु च मखेषु च ॥

yogena bahudhā''tmānaṃ kṛtvā tiṣṭhāmi mūrtiṣu | agnihotreṣu satreṣu kriyāsu ca makheṣu ca

योगबल से मैं अपने को अनेक रूपों में बाँटकर अनेक मूर्तियों में रहता हूँ — अग्निहोत्रों में, सत्रों में, कर्मकाण्डों में और यज्ञों में।

श्लोक 7 (1.7.7)

वेदोक्तेन विधानेन मयि यद्धूयते हविः । देवताः पितरश्चैव तेन तृप्ता भवन्ति वै ॥

vedoktena vidhānena mayi yaddhūyate haviḥ | devatāḥ pitaraścaiva tena tṛptā bhavanti vai

वेदोक्त विधि से मुझमें जो हवि डाली जाती है, उससे देवता और पितर दोनों तृप्त होते हैं।

श्लोक 8 (1.7.8)

आपो देवगणाः सर्वे आपः पितृगणास्तथा । दर्शश्च पौर्णमासश्च देवानां पितृभिः सह ॥

āpo devagaṇāḥ sarve āpaḥ pitṛgaṇāstathā | darśaśca paurṇamāsaśca devānāṃ pitṛbhiḥ saha

जल ही सब देवगण हैं और जल ही पितृगण भी हैं; दर्श और पौर्णमास याग पितरों सहित देवताओं के लिए होते हैं।

श्लोक 9 (1.7.9)

देवताः पितरस्तस्मात्पितरश्चापि देवताः । एकीभूताश्च दृश्यन्ते पृथक्त्वेन च पर्वसु ॥

devatāḥ pitarastasmātpitaraścāpi devatāḥ | ekībhūtāśca dṛśyante pṛthaktvena ca parvasu

इसलिए देवता ही पितर हैं और पितर ही देवता हैं। वे एक रूप में भी दिखाई देते हैं और पर्व के दिनों में अलग-अलग भी।

श्लोक 10 (1.7.10)

देवताः पितरश्चैव भुञ्जते मयि यद्धुतम् । देवतानां पितॄणां च मुखमेतदहं स्मृतम् ॥

devatāḥ pitaraścaiva bhuñjate mayi yaddhutam | devatānāṃ pitṝṇāṃ ca mukhametadahaṃ smṛtam

मुझमें जो आहुति दी जाती है, उसे देवता और पितर खाते हैं; इसीलिए मैं देवताओं और पितरों का मुख कहलाता हूँ।

श्लोक 11 (1.7.11)

अमावास्यां हि पितरः पौर्णमास्यां हि देवताः । मन्मुखेनैव हूयन्ते भुञ्जते च हुतं हविः ॥

amāvāsyāṃ hi pitaraḥ paurṇamāsyāṃ hi devatāḥ | manmukhenaiva hūyante bhuñjate ca hutaṃ haviḥ

अमावस्या को पितर और पूर्णिमा को देवता मेरे ही मुख से आहुति पाते हैं और दी हुई हवि खाते हैं।

श्लोक 12 (1.7.12)

सर्वभक्षः कथं त्वेषां भविष्यामि मुखं त्वहम् । चिन्तयित्वा ततो वह्निश्चक्रे संहारमात्मनः ॥

sarvabhakṣaḥ kathaṃ tveṣāṃ bhaviṣyāmi mukhaṃ tvaham | cintayitvā tato vahniścakre saṃhāramātmanaḥ

मैं उनका मुख होकर सर्वभक्षी कैसे बनूँ?" ऐसा सोचकर अग्निदेव ने अपने को समेट लिया —

श्लोक 13 (1.7.13)

द्विजानामग्निहोत्रेषु यज्ञसत्रक्रियासु च । निरोंकारवषट्काराः स्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥

dvijānāmagnihotreṣu yajñasatrakriyāsu ca | niroṃkāravaṣaṭkārāḥ svadhāsvāhāvivarjitāḥ

द्विजों के अग्निहोत्रों से और यज्ञों, सत्रों तथा कर्मकाण्डों से। ॐकार और वषट्कार से रहित, स्वधा और स्वाहा से वंचित,

श्लोक 14 (1.7.14)

विनाऽग्निना प्रजाः सर्वास्तत आसन्सुदुःखिताः । अथर्षयः समुद्विग्ना देवान् गत्वाब्रुवन्वचः ॥

vinā'gninā prajāḥ sarvāstata āsansuduḥkhitāḥ | atharṣayaḥ samudvignā devān gatvābruvanvacaḥ

और अग्नि के बिना सारी प्रजा तब बहुत दुःखी हो गई। तब घबराए हुए ऋषियों ने देवताओं के पास जाकर कहा —

श्लोक 15 (1.7.15)

अग्निनाशात्क्रियाभ्रंशाद्भ्रान्ता लोकास्त्रयोऽनघाः । विधध्वमत्र यत्कार्यं न स्यात्कालात्ययो यथा ॥

agnināśātkriyābhraṃśādbhrāntā lokāstrayo'naghāḥ | vidhadhvamatra yatkāryaṃ na syātkālātyayo yathā

"हे निष्पाप देवताओ, अग्नि के लुप्त होने और कर्मों के छूट जाने से तीनों लोक भ्रम में पड़ गए हैं। यहाँ जो करना हो वह कीजिए, जिससे समय न बीत जाए।"

श्लोक 16 (1.7.16)

अथर्षयश्च देवाश्च ब्रह्माणमुपगम्य तु । अग्नेरावेदयञ्शापं क्रियासंहारमेव च ॥

atharṣayaśca devāśca brahmāṇamupagamya tu | agnerāvedayañśāpaṃ kriyāsaṃhārameva ca

तब ऋषियों और देवताओं ने ब्रह्मा के पास जाकर उन्हें अग्नि के शाप और कर्मों के रुक जाने की बात बताई।

श्लोक 17 (1.7.17)

भृगुणा वै महाभाग शप्तोऽग्निः कारणान्तरे । कथं देवमुखो भूत्वा यज्ञभागाग्रभुक् तथा ॥

bhṛguṇā vai mahābhāga śapto'gniḥ kāraṇāntare | kathaṃ devamukho bhūtvā yajñabhāgāgrabhuk tathā

"हे महाभाग, किसी कारणवश भृगु ने अग्नि को शाप दे दिया है। जो देवताओं के मुख हैं और यज्ञ-भाग सबसे पहले ग्रहण करते हैं,

श्लोक 18 (1.7.18)

हुतभुक्सर्वलोकेषु सर्वभक्षत्वमेष्यति । श्रुत्वा तु तद्वचस्तेषामग्निमाहूय विश्वकृत् ॥

hutabhuksarvalokeṣu sarvabhakṣatvameṣyati | śrutvā tu tadvacasteṣāmagnimāhūya viśvakṛt

जो सब लोकों में हवि खाने वाले हैं, वे सर्वभक्षी कैसे हो जाएँगे?" उनकी बात सुनकर विश्व के रचयिता ने अग्नि को बुलाया,

श्लोक 19 (1.7.19)

उवाच वचनं श्लक्ष्णं भूतभावनमव्ययम् । लोकानामिह सर्वेषां त्वं कर्ता चान्त एव च ॥

uvāca vacanaṃ ślakṣṇaṃ bhūtabhāvanamavyayam | lokānāmiha sarveṣāṃ tvaṃ kartā cānta eva ca

जो प्राणियों को उत्पन्न करने वाले और अविनाशी हैं, और उनसे कोमल वचन कहे — "तुम ही यहाँ सब लोकों के कर्ता हो और उनके अन्त भी।

श्लोक 20 (1.7.20)

त्वं धारयसि लोकांस्त्रीन्क्रियाणां च प्रवर्तकः । स तथा कुरु लोकेश नोच्छिद्येरन्यथा क्रियाः ॥

tvaṃ dhārayasi lokāṃstrīnkriyāṇāṃ ca pravartakaḥ | sa tathā kuru lokeśa nocchidyeranyathā kriyāḥ

तुम तीनों लोकों को धारण करते हो और कर्मों को चलाते हो। इसलिए हे लोकेश, ऐसा करो जिससे कर्म नष्ट न हों।

श्लोक 21 (1.7.21)

कस्मादेवं विमूढस्त्वमीश्वरः सन् हुताशनः । त्वं पवित्रं सदा लोके सर्वभूतगतिश्च ह ॥

kasmādevaṃ vimūḍhastvamīśvaraḥ san hutāśanaḥ | tvaṃ pavitraṃ sadā loke sarvabhūtagatiśca ha

हे हुताशन, तुम ईश्वर होकर भी इस प्रकार मोह में क्यों पड़े हो? तुम संसार में सदा पवित्र करने वाले हो और सब प्राणियों की गति हो।

श्लोक 22 (1.7.22)

न त्वं सर्वशरीरेण सर्वभक्षत्वमेष्यसि । अपाने ह्यर्चिषो यास्ते सर्वं भक्ष्यन्ति ताः शिखिन् ॥

na tvaṃ sarvaśarīreṇa sarvabhakṣatvameṣyasi | apāne hyarciṣo yāste sarvaṃ bhakṣyanti tāḥ śikhin

तुम अपने सम्पूर्ण शरीर से सर्वभक्षी नहीं बनोगे। हे शिखी, तुम्हारे अधोभाग की जो ज्वालाएँ हैं, वही सब कुछ खाएँगी,

श्लोक 23 (1.7.23)

क्रव्यादा च तनुर्या ते सा सर्वं भक्षयिष्यति । यथा सूर्यांशुभिः स्पृष्टं सर्वं शुचि विभाव्यते ॥

kravyādā ca tanuryā te sā sarvaṃ bhakṣayiṣyati | yathā sūryāṃśubhiḥ spṛṣṭaṃ sarvaṃ śuci vibhāvyate

और तुम्हारा जो मांसभक्षी शरीर है, वह सब कुछ खाएगा। जैसे सूर्य की किरणों से छुई हुई हर वस्तु पवित्र मानी जाती है,

श्लोक 24 (1.7.24)

तथा त्वदर्चिर्निर्दग्धं सर्वं शुचि भविष्यति । त्वमग्ने परमं तेजः स्वप्रभावाद्विनिर्गतम् ॥

tathā tvadarcirnirdagdhaṃ sarvaṃ śuci bhaviṣyati | tvamagne paramaṃ tejaḥ svaprabhāvādvinirgatam

वैसे ही तुम्हारी ज्वालाओं से जली हुई हर वस्तु पवित्र हो जाएगी। हे अग्नि, तुम अपने ही प्रभाव से प्रकट हुए परम तेज हो।

श्लोक 25 (1.7.25)

स्वतेजसैव तं शापं कुरु सत्यमृषेर्विभो । देवानां चात्मनो भागं गृहाण त्वं मुखे हुतम् ॥

svatejasaiva taṃ śāpaṃ kuru satyamṛṣervibho | devānāṃ cātmano bhāgaṃ gṛhāṇa tvaṃ mukhe hutam

हे विभो, अपने ही तेज से ऋषि का वह शाप सत्य करो, और अपने मुख में डाली गई देवताओं की तथा अपनी आहुति का भाग ग्रहण करो।"

श्लोक 26 (1.7.26)

एवमस्त्विति तं वह्निः प्रत्युवाच पितामहम् । जगाम शासनं कर्तुं देवस्य परमेष्ठिनः ॥

evamastviti taṃ vahniḥ pratyuvāca pitāmaham | jagāma śāsanaṃ kartuṃ devasya parameṣṭhinaḥ

"ऐसा ही हो" — अग्निदेव ने पितामह को उत्तर दिया और परमेष्ठी देव की आज्ञा का पालन करने चल दिए।

श्लोक 27 (1.7.27)

देवर्षयश्च मुदितास्ततो जग्मुर्यथागतम् । ऋषयश्च यथा पूर्वं क्रियाः सर्वाः प्रचक्रिरे ॥

devarṣayaśca muditāstato jagmuryathāgatam | ṛṣayaśca yathā pūrvaṃ kriyāḥ sarvāḥ pracakrire

देवर्षि प्रसन्न होकर जैसे आए थे वैसे लौट गए, और ऋषि पहले की तरह अपने सब कर्म करने लगे।

श्लोक 28 (1.7.28)

दिवि देवा मुमुदिरे भूतसङ्घाश्च लौकिकाः । अग्निश्च परमां प्रीतिमवाप हतकल्मषः ॥

divi devā mumudire bhūtasaṅghāśca laukikāḥ | agniśca paramāṃ prītimavāpa hatakalmaṣaḥ

स्वर्ग में देवता आनन्दित हुए और पृथ्वी के प्राणिसमूह भी; और पाप से मुक्त होकर अग्निदेव को परम प्रसन्नता हुई।

श्लोक 29 (1.7.29)

एवं स भगवाञ्छापं लेभेऽग्निर्भृगुतः पुरा । एवमेष पुरा वृत्त इतिहासोऽग्निशापजः । पुलोम्नश्च विनाशोऽयं च्यवनस्य च संभवः ॥

evaṃ sa bhagavāñchāpaṃ lebhe'gnirbhṛgutaḥ purā | evameṣa purā vṛtta itihāso'gniśāpajaḥ | pulomnaśca vināśo'yaṃ cyavanasya ca saṃbhavaḥ

इस प्रकार पूर्वकाल में भगवान् अग्नि को भृगु से शाप मिला था। यही अग्निशाप से उत्पन्न प्राचीन इतिहास है — पुलोमा का विनाश और च्यवन का जन्म।

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