आदि पर्व · अध्याय 8
रुरु और प्रमद्वरा
सौति भृगुवंश का वर्णन आगे बढ़ाते हैं — च्यवन ने सुकन्या से प्रमति को, प्रमति ने घृताची से रुरु को और रुरु ने प्रमद्वरा से शुनक को जन्म दिया। फिर वे बताते हैं कि गन्धर्वराज विश्वावसु और अप्सरा मेनका की पुत्री प्रमद्वरा को नदी के किनारे छोड़ दिया गया था और ऋषि स्थूलकेश ने उसे पाला। रुरु उससे प्रेम करने लगते हैं और विवाह निश्चित हो जाता है, परन्तु विवाह से कुछ दिन पहले वह एक सोए हुए साँप पर पैर रख देती है और उसके डसने से उसकी मृत्यु हो जाती है; ऋषि शोक में इकट्ठे होते हैं और रुरु व्याकुल होकर अकेले बाहर चले जाते हैं।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.8.1)
स चापि च्यवनो ब्रह्मन्भार्गवोऽजनयत्सुतम् । सुकन्यायां महात्मानं प्रमतिं दीप्ततेजसम् ॥
sa cāpi cyavano brahmanbhārgavo'janayatsutam | sukanyāyāṃ mahātmānaṃ pramatiṃ dīptatejasam
हे ब्राह्मण, भार्गव च्यवन ने भी सुकन्या के गर्भ से प्रमति नामक महात्मा और प्रखर तेज वाले पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 2 (1.8.2)
प्रमतिस्तु रुरुं नाम घृताच्यां समजीजनत् । रुरुः प्रमद्वरायां तु शुनकं समजीजनत् ॥
pramatistu ruruṃ nāma ghṛtācyāṃ samajījanat | ruruḥ pramadvarāyāṃ tu śunakaṃ samajījanat
प्रमति ने घृताची से रुरु नामक पुत्र उत्पन्न किया, और रुरु ने प्रमद्वरा से शुनक को जन्म दिया।
श्लोक 3 (1.8.3)
शुनकस्तु महासत्त्वः सर्वभार्गवनन्दनः । जातस्तपसि तीव्रे च स्थितः स्थिरयशास्ततः ॥
śunakastu mahāsattvaḥ sarvabhārgavanandanaḥ | jātastapasi tīvre ca sthitaḥ sthirayaśāstataḥ
महान सत्त्व वाले और सब भार्गवों को आनन्द देने वाले शुनक का जन्म हुआ; वे कठोर तपस्या में लगे रहे, जिससे उनका यश स्थिर हो गया।
श्लोक 4 (1.8.4)
तस्य ब्रह्मन्रुरोः सर्वं चरितं भूरितेजसः । विस्तरेण प्रवक्ष्यामि तच्छृणु त्वमशेषतः ॥
tasya brahmanruroḥ sarvaṃ caritaṃ bhūritejasaḥ | vistareṇa pravakṣyāmi tacchṛṇu tvamaśeṣataḥ
हे ब्राह्मण, अब मैं उन महातेजस्वी रुरु का सम्पूर्ण चरित्र विस्तार से कहूँगा; तुम उसे पूरा सुनो।
श्लोक 5 (1.8.5)
ऋषिरासीन्महान्पूर्वं तपोविद्यासमन्वितः । स्थूलकेश इति ख्यातः सर्वभूतहिते रतः ॥
ṛṣirāsīnmahānpūrvaṃ tapovidyāsamanvitaḥ | sthūlakeśa iti khyātaḥ sarvabhūtahite rataḥ
पूर्वकाल में तप और विद्या से सम्पन्न एक महान ऋषि थे, जो स्थूलकेश नाम से प्रसिद्ध थे और सब प्राणियों के हित में लगे रहते थे।
श्लोक 6 (1.8.6)
एतस्मिन्नेव काले तु मेनकायां प्रजज्ञिवान् । गन्धर्वराजो विप्रर्षे विश्वावसुरिति स्मृतः ॥
etasminneva kāle tu menakāyāṃ prajajñivān | gandharvarājo viprarṣe viśvāvasuriti smṛtaḥ
हे विप्रर्षि, उसी समय विश्वावसु नाम से प्रसिद्ध गन्धर्वराज ने मेनका के गर्भ से एक संतान उत्पन्न की।
श्लोक 7 (1.8.7)
अप्सरा मेनका तस्य तं गर्भं भृगुनन्दन । उत्ससर्ज यथाकालं स्थूलकेशाश्रमं प्रति ॥
apsarā menakā tasya taṃ garbhaṃ bhṛgunandana | utsasarja yathākālaṃ sthūlakeśāśramaṃ prati
हे भृगुनन्दन, अप्सरा मेनका ने समय आने पर उसकी उस संतान को स्थूलकेश के आश्रम के पास छोड़ दिया।
श्लोक 8 (1.8.8)
उत्सृज्य चैव तं गर्भं नद्यास्तीरे जगाम सा । अप्सरा मेनका ब्रह्मन्निर्दया निरपत्रपा ॥
utsṛjya caiva taṃ garbhaṃ nadyāstīre jagāma sā | apsarā menakā brahmannirdayā nirapatrapā
हे ब्राह्मण, उस संतान को नदी के किनारे छोड़कर निर्दय और निर्लज्ज अप्सरा मेनका चली गई।
श्लोक 9 (1.8.9)
कन्याममरगर्भाभां ज्वलन्तीमिव च श्रिया । तां ददर्श समुत्सृष्टां नदीतीरे महानृषिः ॥
kanyāmamaragarbhābhāṃ jvalantīmiva ca śriyā | tāṃ dadarśa samutsṛṣṭāṃ nadītīre mahānṛṣiḥ
महर्षि ने नदी के किनारे छोड़ी हुई उस कन्या को देखा, जो देवताओं की संतान-सी थी और शोभा से मानो दमक रही थी।
श्लोक 10 (1.8.10)
स्थूलकेशः स तेजस्वी विजने बन्धुवर्जिताम् । स तां दृष्ट्वा तदा कन्यां स्थूलकेशो महाद्विजः ॥
sthūlakeśaḥ sa tejasvī vijane bandhuvarjitām | sa tāṃ dṛṣṭvā tadā kanyāṃ sthūlakeśo mahādvijaḥ
तेजस्वी स्थूलकेश ने उस निर्जन स्थान में बन्धु-बान्धवों से रहित उस कन्या को देखा; और उसे देखकर महान ब्राह्मण स्थूलकेश ने
श्लोक 11 (1.8.11)
जग्राह च मुनिश्रेष्ठः कृपाविष्टः पुपोष च । ववृधे सा वरारोहा तस्याश्रमपदे शुभे ॥
jagrāha ca muniśreṣṭhaḥ kṛpāviṣṭaḥ pupoṣa ca | vavṛdhe sā varārohā tasyāśramapade śubhe
उस मुनिश्रेष्ठ ने करुणा से भरकर उसे उठा लिया और उसका पालन-पोषण किया। वह सुन्दरी उनके पवित्र आश्रम में बड़ी होने लगी।
श्लोक 12 (1.8.12)
जातकाद्याः क्रियाश्चास्या विधिपूर्वं यथाक्रमम् । स्थूलकेशो महाभागश्चकार सुमहानृषिः ॥
jātakādyāḥ kriyāścāsyā vidhipūrvaṃ yathākramam | sthūlakeśo mahābhāgaścakāra sumahānṛṣiḥ
महाभाग महर्षि स्थूलकेश ने विधिपूर्वक और क्रम से उसके जातकर्म आदि सब संस्कार किए।
श्लोक 13 (1.8.13)
प्रमदाभ्यो वरा सा तु सत्त्वरूपगुणान्विता । ततः प्रमद्वरेत्यस्या नाम चक्रे महानृषिः ॥
pramadābhyo varā sā tu sattvarūpaguṇānvitā | tataḥ pramadvaretyasyā nāma cakre mahānṛṣiḥ
वह सत्त्व, रूप और गुणों में सब युवतियों से श्रेष्ठ थी, इसलिए महर्षि ने उसका नाम प्रमद्वरा रखा।
श्लोक 14 (1.8.14)
तामाश्रमपदे तस्य रुरुर्दृष्ट्वा प्रमद्वराम् । बभूव किल धर्मात्मा मदनोपहतस्तदा ॥
tāmāśramapade tasya rururdṛṣṭvā pramadvarām | babhūva kila dharmātmā madanopahatastadā
रुरु ने स्थूलकेश के आश्रम में प्रमद्वरा को देखा, और कहते हैं कि वे धर्मात्मा युवक उसी समय काम से आहत हो गए।
श्लोक 15 (1.8.15)
पितरं सखिभिः सोऽथ श्रावयामास भार्गवम् । प्रमतिश्चाभ्ययाचत्तां स्थूलकेशं यशस्विनम् ॥
pitaraṃ sakhibhiḥ so'tha śrāvayāmāsa bhārgavam | pramatiścābhyayācattāṃ sthūlakeśaṃ yaśasvinam
उन्होंने अपने मित्रों के द्वारा अपने पिता भार्गव प्रमति को यह बात बताई, और प्रमति ने यशस्वी स्थूलकेश से उस कन्या को माँगा।
श्लोक 16 (1.8.16)
ततः प्रादात्पिता कन्यां रुरवे तां प्रमद्वराम् । विवाहं स्थापयित्वाग्रे नक्षत्रे भगदैवते ॥
tataḥ prādātpitā kanyāṃ rurave tāṃ pramadvarām | vivāhaṃ sthāpayitvāgre nakṣatre bhagadaivate
तब पिता ने भग देवता वाले नक्षत्र में विवाह निश्चित करके वह कन्या प्रमद्वरा रुरु को दे दी।
श्लोक 17 (1.8.17)
ततः कतिपयाहस्य विवाहे समुपस्थिते । सखीभिः क्रीडती सार्धं सा कन्यावरवर्णिनी ॥
tataḥ katipayāhasya vivāhe samupasthite | sakhībhiḥ krīḍatī sārdhaṃ sā kanyāvaravarṇinī
कुछ दिनों बाद, जब विवाह निकट आ गया, वह सुन्दरी कन्या अपनी सखियों के साथ खेल रही थी।
श्लोक 18 (1.8.18)
नापश्यत्संप्रसुप्तं वै भुजंगं तिर्यगायतम् । पदा चैनं समाक्रामन्मुमूर्षुः कालचोदिता ॥
nāpaśyatsaṃprasuptaṃ vai bhujaṃgaṃ tiryagāyatam | padā cainaṃ samākrāmanmumūrṣuḥ kālacoditā
उसने रास्ते में आड़े फैले हुए एक सोए साँप को नहीं देखा; काल से प्रेरित, मृत्यु की ओर बढ़ती हुई उस कन्या ने उस पर पैर रख दिया।
श्लोक 19 (1.8.19)
स तस्याः संप्रमत्तायाश्चोदितः कालधर्मणा । विषोपलिप्तान्दशनान्भृशमङ्गे न्यपातयत् ॥
sa tasyāḥ saṃpramattāyāścoditaḥ kāladharmaṇā | viṣopaliptāndaśanānbhṛśamaṅge nyapātayat
काल के नियम से प्रेरित उस साँप ने असावधान कन्या के शरीर में अपने विष से भरे दाँत गहरे गड़ा दिए।
श्लोक 20 (1.8.20)
सा दष्टा तेन सर्पेण पपात सहसा भुवि । विवर्णा विगतश्रीका भ्रष्टाभरणचेतना ॥
sā daṣṭā tena sarpeṇa papāta sahasā bhuvi | vivarṇā vigataśrīkā bhraṣṭābharaṇacetanā
साँप के डसते ही वह सहसा भूमि पर गिर पड़ी — उसका रंग उड़ गया, उसकी शोभा जाती रही, आभूषण बिखर गए और चेतना लुप्त हो गई।
श्लोक 21 (1.8.21)
निरानन्दकरी तेषां बन्धूनां मुक्तमूर्धजा । व्यसुरप्रेक्षणीया सा प्रेक्षणीयतमाऽभवत् ॥
nirānandakarī teṣāṃ bandhūnāṃ muktamūrdhajā | vyasuraprekṣaṇīyā sā prekṣaṇīyatamā'bhavat
उसके केश खुल गए और वह अपने बन्धुओं को दुःख देने वाली हो गई। प्राणहीन होकर उसे देखना असह्य होना चाहिए था, फिर भी वह देखने में सबसे सुन्दर लग रही थी।
श्लोक 22 (1.8.22)
प्रसुप्तेवाभवच्चापि भुवि सर्पविषार्दिता । भूयो मनोहरतरा बभूव तनुमध्यमा ॥
prasuptevābhavaccāpi bhuvi sarpaviṣārditā | bhūyo manoharatarā babhūva tanumadhyamā
साँप के विष से पीड़ित वह भूमि पर मानो सो रही थी, और वह पतली कमर वाली कन्या पहले से भी अधिक मनोहर लगने लगी।
श्लोक 23 (1.8.23)
ददर्श तां पिता चैव ये चैवान्ये तपस्विनः । विचेष्टमानां पतितां भूतले पद्मवर्चसम् ॥
dadarśa tāṃ pitā caiva ye caivānye tapasvinaḥ | viceṣṭamānāṃ patitāṃ bhūtale padmavarcasam
उसके पिता ने और दूसरे तपस्वियों ने भी कमल के समान कान्ति वाली उस कन्या को भूमि पर छटपटाकर गिरी हुई देखा।
श्लोक 24 (1.8.24)
ततः सर्वे द्विजवराः समाजग्मुः कृपान्विताः । स्वस्त्यात्रेयो महाजानुः कुशिकः शङ्खमेखलः ॥
tataḥ sarve dvijavarāḥ samājagmuḥ kṛpānvitāḥ | svastyātreyo mahājānuḥ kuśikaḥ śaṅkhamekhalaḥ
तब करुणा से भरे सब श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ आ गए — स्वस्त्यात्रेय, महाजानु, कुशिक, शङ्खमेखल,
श्लोक 25 (1.8.25)
उद्दालकः कठश्चैव श्वेतश्चैव महायशाः । भरद्वाजः कौणकृत्स्य आर्ष्टिषेणोऽथ गौतमः ॥
uddālakaḥ kaṭhaścaiva śvetaścaiva mahāyaśāḥ | bharadvājaḥ kauṇakṛtsya ārṣṭiṣeṇo'tha gautamaḥ
उद्दालक, कठ, महायशस्वी श्वेत, भरद्वाज, कौणकृत्स्य, आर्ष्टिषेण और गौतम,
श्लोक 26 (1.8.26)
प्रमतिः सह पुत्रेण तथान्ये वनवासिनः । तां ते कन्यां व्यसुं दृष्ट्वा भुजंगस्य विषार्दिताम् ॥
pramatiḥ saha putreṇa tathānye vanavāsinaḥ | tāṃ te kanyāṃ vyasuṃ dṛṣṭvā bhujaṃgasya viṣārditām
पुत्र सहित प्रमति, और अन्य वनवासी भी। उस कन्या को साँप के विष से पीड़ित और प्राणहीन देखकर
श्लोक 27 (1.8.27)
रुरुदुः कृपयाऽविष्टा रुरुस्त्वार्तो बहिर्ययौ । ते च सर्वे द्विजश्रेष्ठास्तत्रैवोपाविशंस्तदा ॥
ruruduḥ kṛpayā'viṣṭā rurustvārto bahiryayau | te ca sarve dvijaśreṣṭhāstatraivopāviśaṃstadā
वे सब करुणा से भरकर रोने लगे, और रुरु व्यथित होकर बाहर चले गए। वे सब श्रेष्ठ ब्राह्मण वहीं बैठ गए।