Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 9

रुरु ने प्रमद्वरा को अपनी आधी आयु दी

जब ब्राह्मण मृत प्रमद्वरा के पास बैठे थे, तब रुरु घने वन में जाकर विलाप करता है और अपने दान, तप और भक्ति के बल पर उसे लौटाने की प्रार्थना करता है। एक देवदूत आकर बताता है कि जिसकी आयु पूरी हो चुकी हो वह लौट नहीं सकता, जब तक रुरु उसे अपनी आधी आयु न दे दे। रुरु मान जाता है, धर्मराज स्वीकृति देते हैं और प्रमद्वरा मानो नींद से उठ बैठती है। दोनों का विवाह होता है और रुरु हर दिखने वाले सर्प को मारने का व्रत ले लेता है; एक दिन वह एक बूढ़े डुण्डुभ पर डंडा उठाता है, तो वह कहता है कि उसने रुरु का कोई अपराध नहीं किया।

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.9.1)

तेषु तत्रोपविष्टेषु ब्राह्मणेषु महात्मसु । रुरुश्चुक्रोश गहनं वनं गत्वाऽतिदुःखितः ॥

teṣu tatropaviṣṭeṣu brāhmaṇeṣu mahātmasu | ruruścukrośa gahanaṃ vanaṃ gatvā'tiduḥkhitaḥ

जब वे महात्मा ब्राह्मण वहाँ बैठे हुए थे, तब अत्यन्त दुःखी रुरु घने वन में जाकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।

श्लोक 2 (1.9.2)

शोकेनाभिहतः सोऽथ विलपन्करुणं बहु । अब्रवीद्वचनं शोचन्प्रियां स्मृत्वा प्रमद्वराम् ॥

śokenābhihataḥ so'tha vilapankaruṇaṃ bahu | abravīdvacanaṃ śocanpriyāṃ smṛtvā pramadvarām

शोक से आहत होकर वह बहुत देर तक करुण विलाप करता रहा, और अपनी प्रिया प्रमद्वरा का स्मरण करके शोक में ये वचन बोला —

रुरुरुवाच

श्लोक 3 (1.9.3)

शेते सा भुवि तन्वङ्गी मम शोकविवर्धिनी । प्राणानपहरन्तीव पूर्णचन्द्रनिभानना ॥

śete sā bhuvi tanvaṅgī mama śokavivardhinī | prāṇānapaharantīva pūrṇacandranibhānanā

पूर्ण चन्द्रमा के समान मुखवाली वह कोमलांगी भूमि पर पड़ी है; मेरा शोक बढ़ाती हुई वह मानो मेरे प्राण ही खींचे लिए जा रही है।

श्लोक 4 (1.9.4)

यदि पीनायतश्रोणी पद्मपत्रनिभेक्षणा । मुमूर्षुरपि मे प्राणानादायाशु गमिष्यति ॥

yadi pīnāyataśroṇī padmapatranibhekṣaṇā | mumūrṣurapi me prāṇānādāyāśu gamiṣyati

यदि भरे-पूरे नितम्बों और कमलदल-से नेत्रोंवाली वह मरणासन्न है, तो वह शीघ्र ही मेरे प्राण भी साथ लेकर चली जाएगी।

श्लोक 5 (1.9.5)

पितृमातृसखीनां च लुप्तपिण्डस्य तस्य मे । बान्धवानां च सर्वेषां किं नु दुःखमतःपरम् ॥

pitṛmātṛsakhīnāṃ ca luptapiṇḍasya tasya me | bāndhavānāṃ ca sarveṣāṃ kiṃ nu duḥkhamataḥparam

उसके पिता, माता और सखियों के लिए, पिण्डदान की परम्परा से वंचित हो चुके मेरे लिए, और सभी बन्धु-बान्धवों के लिए इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?

श्लोक 6 (1.9.6)

यदि दत्तं तपस्तप्तं गुरवो वा मया यदि । सम्यगाराधितास्तेन संजीवतु मम प्रिया ॥

yadi dattaṃ tapastaptaṃ guravo vā mayā yadi | samyagārādhitāstena saṃjīvatu mama priyā

यदि मैंने दान दिया है, तप किया है, अथवा गुरुजनों की भली-भाँति सेवा की है, तो उस पुण्य से मेरी प्रिया फिर से जीवित हो उठे।

श्लोक 7 (1.9.7)

यथा च जन्मप्रभृति यतात्माऽहं धृतव्रतः । प्रमद्वरा तथाद्यैषा समुत्तिष्ठतु भामिनी ॥

yathā ca janmaprabhṛti yatātmā'haṃ dhṛtavrataḥ | pramadvarā tathādyaiṣā samuttiṣṭhatu bhāminī

और जैसे मैं जन्म से ही संयमी और अपने व्रतों में दृढ़ रहा हूँ, वैसे ही यह सुन्दरी प्रमद्वरा आज ही उठ खड़ी हो।

सौतिरुवाच

श्लोक 8 (1.9.8)

एवं लालप्यतस्तस्य भार्यार्थे दुःखितस्य च । देवदूतस्तदाऽभ्येत्य वाक्यमाह रुरुं वने ॥

evaṃ lālapyatastasya bhāryārthe duḥkhitasya ca | devadūtastadā'bhyetya vākyamāha ruruṃ vane

जब वह पत्नी के लिए दुःखी होकर बार-बार इस प्रकार विलाप कर रहा था, तब एक देवदूत वन में रुरु के पास आया और उससे बोला।

रुरुरुवाच

श्लोक 9 (1.9.9)

कृष्णे विष्णौ हृषीकेशे लोकेशेऽसुरविद्विषि । यदि मे निश्चला भक्तिर्मम जीवतु सा प्रिया ॥

kṛṣṇe viṣṇau hṛṣīkeśe lokeśe'suravidviṣi | yadi me niścalā bhaktirmama jīvatu sā priyā

यदि लोकों के स्वामी, असुरों के शत्रु, हृषीकेश, विष्णु, श्रीकृष्ण में मेरी भक्ति अटल है, तो मेरी वह प्रिया जीवित हो जाए।

सौतिरुवाच

श्लोक 10 (1.9.10)

विलप्यमाने तु रुरौ सर्वे देवाः कृपान्विताः । दूतं प्रस्थापयामासुः संदिश्यास्य हितं वचः ॥

vilapyamāne tu rurau sarve devāḥ kṛpānvitāḥ | dūtaṃ prasthāpayāmāsuḥ saṃdiśyāsya hitaṃ vacaḥ

रुरु के विलाप करते समय सभी देवता करुणा से भर गए और उन्होंने उसके हित का संदेश देकर एक दूत को भेजा।

श्लोक 11 (1.9.11)

स दूतस्त्वरितोऽभ्येत्य देवानां प्रियकृच्छुचिः । उवाच देववचनं रुरुमाभाष्य दुःखितम् ॥

sa dūtastvarito'bhyetya devānāṃ priyakṛcchuciḥ | uvāca devavacanaṃ rurumābhāṣya duḥkhitam

देवताओं का प्रिय करनेवाला वह पवित्र दूत शीघ्रता से आया और दुःखी रुरु को सम्बोधित करके उसने देवताओं का संदेश कहा।

देवदूत उवाच

श्लोक 12 (1.9.12)

देवैः सर्वैरहं ब्रह्मन्प्रेषितोऽस्मि तवान्तिकम् । त्वद्धितं त्वद्धितैरुक्तं शृणु वाक्यं द्विजोत्तम ॥

devaiḥ sarvairahaṃ brahmanpreṣito'smi tavāntikam | tvaddhitaṃ tvaddhitairuktaṃ śṛṇu vākyaṃ dvijottama

हे ब्राह्मण, सभी देवताओं ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारा हित चाहनेवालों ने तुम्हारे हित के लिए जो वचन कहा है, उसे सुनो।

श्लोक 13 (1.9.13)

अभिधत्से ह यद्वाचा रुरो दुःखान्न तन्मृषा । न तु मर्त्यस्य धर्मात्मन्नायुरस्ति गतायुषः ॥

abhidhatse ha yadvācā ruro duḥkhānna tanmṛṣā | na tu martyasya dharmātmannāyurasti gatāyuṣaḥ

हे रुरु, दुःख में तुम जो कुछ कह रहे हो वह झूठा नहीं है; परन्तु हे धर्मात्मा, जिस मनुष्य की आयु पूरी हो चुकी हो, उसके लिए आगे आयु नहीं बचती।

श्लोक 14 (1.9.14)

गतायुरेषा कृपणा गन्धर्वाप्सरसोः सुता । तस्माच्छोके मनस्तात मा कृथास्त्वं कथंचन ॥

gatāyureṣā kṛpaṇā gandharvāpsarasoḥ sutā | tasmācchoke manastāta mā kṛthāstvaṃ kathaṃcana

गन्धर्व और अप्सरा की यह बेचारी पुत्री अपनी आयु पूरी कर चुकी है। इसलिए हे तात, तुम किसी भी प्रकार अपने मन को शोक में मत डुबाओ।

श्लोक 15 (1.9.15)

उपायश्चात्र विहितः पूर्वं देवैर्महात्मभिः । तं यदीच्छसि कर्तुं त्वं प्राप्स्यसीह प्रमद्वराम् ॥

upāyaścātra vihitaḥ pūrvaṃ devairmahātmabhiḥ | taṃ yadīcchasi kartuṃ tvaṃ prāpsyasīha pramadvarām

किन्तु महात्मा देवताओं ने इसके लिए पहले से ही एक उपाय निश्चित कर रखा है। यदि तुम उसे करना चाहो, तो यहीं प्रमद्वरा को फिर पा लोगे।

रुरुरुवाच

श्लोक 16 (1.9.16)

क उपायः कृतो देवैर्ब्रूहि तत्त्वेन खेचर । करिष्येऽहं तथा श्रुत्वा त्रातुमर्हति मां भवान् ॥

ka upāyaḥ kṛto devairbrūhi tattvena khecara | kariṣye'haṃ tathā śrutvā trātumarhati māṃ bhavān

हे आकाशचारी, देवताओं ने कौन-सा उपाय निश्चित किया है? मुझे ठीक-ठीक बताओ। सुनकर मैं वैसा ही करूँगा। आप मेरी रक्षा करें।

देवदूत उवाच

श्लोक 17 (1.9.17)

आयुषोऽर्धं प्रयच्छ त्वं कन्यायै भृगुनन्दन । एवमुत्थास्यति रुरो तव भार्या प्रमद्वरा ॥

āyuṣo'rdhaṃ prayaccha tvaṃ kanyāyai bhṛgunandana | evamutthāsyati ruro tava bhāryā pramadvarā

हे भृगुनन्दन, अपनी आधी आयु इस कन्या को दे दो। इस प्रकार, हे रुरु, तुम्हारी पत्नी प्रमद्वरा उठ खड़ी होगी।

रुरुरुवाच

श्लोक 18 (1.9.18)

आयुषोऽर्धं प्रयच्छामि कन्यायै खेचरोत्तम । शृङ्गाररूपाभरणा समुत्तिष्ठतु मे प्रिया ॥

āyuṣo'rdhaṃ prayacchāmi kanyāyai khecarottama | śṛṅgārarūpābharaṇā samuttiṣṭhatu me priyā

हे आकाशचारियों में श्रेष्ठ, मैं अपनी आधी आयु इस कन्या को देता हूँ। मेरी प्रिया अपने शृंगार, रूप और आभूषणों सहित उठ खड़ी हो।

सौतिरुवाच

श्लोक 19 (1.9.19)

ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमौ । धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम् ॥

tato gandharvarājaśca devadūtaśca sattamau | dharmarājamupetyedaṃ vacanaṃ pratyabhāṣatām

तब गन्धर्वराज और देवदूत, दोनों श्रेष्ठ जन, धर्मराज के पास गए और यह वचन बोले —

देवदूत उवाच

श्लोक 20 (1.9.20)

धर्मराजायुषोऽर्धेन रुरोर्भार्या प्रमद्वरा । समुत्तिष्ठतु कल्याणी मृतैवं यदि मन्यसे ॥

dharmarājāyuṣo'rdhena rurorbhāryā pramadvarā | samuttiṣṭhatu kalyāṇī mṛtaivaṃ yadi manyase

हे धर्मराज, यदि आप उचित समझें तो रुरु की आधी आयु से उसकी कल्याणी पत्नी प्रमद्वरा, जो मृत पड़ी है, फिर उठ खड़ी हो।

धर्मराज उवाच

श्लोक 21 (1.9.21)

प्रमद्वरा रुरोर्भार्या देवदूत यदीच्छसि । उत्तिष्ठत्वायुषोऽर्धेन रुरोरेव समन्विता ॥

pramadvarā rurorbhāryā devadūta yadīcchasi | uttiṣṭhatvāyuṣo'rdhena ruroreva samanvitā

हे देवदूत, यदि तुम ऐसा चाहते हो, तो रुरु की पत्नी प्रमद्वरा रुरु की ही आधी आयु से युक्त होकर उठ खड़ी हो।

सौतिरुवाच

श्लोक 22 (1.9.22)

एवमुक्ते ततः कन्या सोदतिष्ठत्प्रमद्वरा । रुरोस्तस्यायुषोऽर्धेन सुप्तेव वरवर्णिनी ॥

evamukte tataḥ kanyā sodatiṣṭhatpramadvarā | rurostasyāyuṣo'rdhena supteva varavarṇinī

ऐसा कहे जाते ही वह सुन्दरी कन्या प्रमद्वरा रुरु की आधी आयु पाकर ऐसे उठ बैठी मानो सोकर उठी हो।

श्लोक 23 (1.9.23)

एतद्दृष्टं भविष्ये हि रुरोरुत्तमतेजसः । आयुषोऽतिप्रवृद्धस्य भार्यार्थेऽर्धमलुप्यत ॥

etaddṛṣṭaṃ bhaviṣye hi ruroruttamatejasaḥ | āyuṣo'tipravṛddhasya bhāryārthe'rdhamalupyata

उत्तम तेजवाले रुरु के भविष्य में यही देखा गया था कि उसकी अत्यन्त लम्बी आयु का आधा भाग पत्नी के लिए कट जाएगा।

श्लोक 24 (1.9.24)

तत इष्टेऽहनि तयोः पितरौ चक्रतुर्मुदा । विवाहं तौ च रेमाते परस्परहितैषिणौ ॥

tata iṣṭe'hani tayoḥ pitarau cakraturmudā | vivāhaṃ tau ca remāte parasparahitaiṣiṇau

फिर एक शुभ दिन दोनों के पिताओं ने प्रसन्नतापूर्वक उनका विवाह कर दिया, और वे एक-दूसरे का हित चाहते हुए आनन्द से रहने लगे।

श्लोक 25 (1.9.25)

स लब्ध्वा दुर्लभां भार्यां पद्मकिञ्जल्कसुप्रभाम् । व्रतं चक्रे विनाशाय जिह्मगानां धृतव्रतः ॥

sa labdhvā durlabhāṃ bhāryāṃ padmakiñjalkasuprabhām | vrataṃ cakre vināśāya jihmagānāṃ dhṛtavrataḥ

कमल के केसर के समान कान्तिवाली उस दुर्लभ पत्नी को पाकर दृढ़व्रती रुरु ने टेढ़ी चाल वाले सर्पों के विनाश का व्रत ले लिया।

श्लोक 26 (1.9.26)

स दृष्ट्वा जिह्मगान्सर्वांस्तीव्रकोपसमन्वितः । अभिहन्ति यथासत्त्वं गृह्य प्रहरणं सदा ॥

sa dṛṣṭvā jihmagānsarvāṃstīvrakopasamanvitaḥ | abhihanti yathāsattvaṃ gṛhya praharaṇaṃ sadā

जब भी वह किसी सर्प को देखता, तीव्र क्रोध से भरकर हथियार उठा लेता और अपनी पूरी शक्ति से उसे मार डालता।

श्लोक 27 (1.9.27)

स कदाचिद्वनं विप्रो रुरुरभ्यागमन्महत् । शयानं तत्र चापश्यड्डुण्डुभं वयसान्वितम् ॥

sa kadācidvanaṃ vipro rururabhyāgamanmahat | śayānaṃ tatra cāpaśyaḍḍuṇḍubhaṃ vayasānvitam

एक बार ब्राह्मण रुरु एक विशाल वन में पहुँचा और वहाँ उसने एक बूढ़े डुण्डुभ सर्प को लेटे हुए देखा।

श्लोक 28 (1.9.28)

तत उद्यम्य दण्डं स कालदण्डोपमं तदा । जिघांसुः कुपितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः ॥

tata udyamya daṇḍaṃ sa kāladaṇḍopamaṃ tadā | jighāṃsuḥ kupito viprastamuvācātha ḍuṇḍubhaḥ

तब क्रोधित ब्राह्मण ने उसे मार डालने की इच्छा से कालदण्ड के समान अपना डंडा उठाया। तब डुण्डुभ ने उससे कहा —

डुण्डुभ उवाच

श्लोक 29 (1.9.29)

नापराध्यामि ते किंचिदहमद्य तपोधन । संरम्भाच्च किमर्थं मामभिहंसि रुषान्वितः ॥

nāparādhyāmi te kiṃcidahamadya tapodhana | saṃrambhācca kimarthaṃ māmabhihaṃsi ruṣānvitaḥ

हे तपोधन, आज मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया है। फिर आप इतने आवेश और क्रोध में भरकर मुझ पर क्यों प्रहार कर रहे हैं?

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10